Wednesday, 29 November 2017

कबतक जारी रहेगा गतिरोध ?

    विगत दो साल से सरकार और न्यायपालिका के बीच जमी बर्फ पिघलने का नाम नहीं ले रही.यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कई बार सार्वजनिक मंचों से कभी न्यायपालिका सरकार को निशाने पर लेने से नहीं चुकती तो ,सरकार भी न्यायपालिका को कार्यपालिका के कामों में दखल न देने की सलाह देने से बाज़ नहीं आती.लेकिन, प्रधानमंत्री हर बार इस जमी बर्फ को मंच से ही पिघलाने की कवायद करते नजर आते हैं. विगत दिनों संविधान दिवस के मौके पर कुछ ऐसा ही हुआ विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मंच से ही न्यायपालिका को आड़े हाथो लेते हुए अपरोक्ष रूप से पुन: राष्ट्रीय न्यायिक न्युक्ति आयोग की वकालत करने से नहीं चुके.वहीँ मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा ने रविशंकर प्रसाद को जवाब देते हुए कहा कि नगारिकों के मौलिक अधिकार सबसे ऊपर हैं. उन्होंने संविधान द्वारा न्यायपालिका की तय की गई भूमिका को याद दिलाते हुए कहा कि संविधान ने न्यायपालिका को संविधान के संरक्षक की भूमिका सौंपी है ,जिसका निर्वहन न्यायपालिका समय-समय पर करती आई है. इससे पहले केन्द्रीय मंत्री अरूण जेटली  ने भी न्यायिक सक्रियता पर सवाल उठाते हुए कहा था कि न्यायपालिका सरकार के कामकाज में दखल दे रही है.केंद्र में मोदी सरकार के स्थापित होने के पश्चात् कई ऐसे मौके आए हैं जब सरकार और न्यायपालिका का गतिरोध खुलकर सामने आया है .सरकार और न्यायपलिका के बीच यह तकरार किसी भी सूरतेहाल में लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है.लोकतांत्रिक प्रणाली को सहज रूप से चलाने के लिए जरूरी है कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ एक दुसरे से सामंजस्य बना कर चलें.तीनों स्तंभों  के बेहतर तालमेल से ही एक स्वस्थ लोकतंत्र का वातावरण बना रहता है. इन सबके के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जरूर यह भरोसे देते आएं हैं कि सरकार न्यायपालिका का पूरा सम्मान करती है और इससे जुड़े मसले को गंभीरता से लेती है.संविधान दिवस पर भी प्रधानमंत्री मोदी ने लोकतंत्र तीनों स्तम्भों को एक दुसरे पर निशाना नहीं बनाने की अपील करते हुए कहा कि तीनों स्तंभों में संतुलन हमारे संविधान की रीढ़ है और हमारा दायित्व बनता है कि हम इसे बनाये रखें.सवाल यह उठता है कि प्रधानमंत्री के इस नसीहत से न्यायपालिका और सरकार के बीच का यह तकरार समाप्त हो जायेगा ? यह समझने के लिए हमें सबसे पहले विवाद की जड़ को समझना होगा.दरअसल, जजों की नियुक्ति के लिए सरकार ने  राष्ट्रीय न्यायिक  नियुक्ति आयोग विधेयक को संसद के दोनों सदनों में पास कराया था.जिसमें सरकार ने दावा किया था कि एनजेएसी प्रकिया लागू होने के पश्चात जजों की न्युक्ति कॉलेजियम की अपेक्षा अधिक पारदर्शिता के साथ हो सकेगी.किन्तु इस विधेयक को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि इस आयोग के आने से न्यायपालिका में सरकार का दखल बढ़ जायेगा. वहीँ, जजों की नियुक्ति जिस कॉलेजियम प्रणाली के तहत हो रही थी,उसे ही जारी रखा गया.सरकार और न्यायपालिका के बीच अपने अधिकार की लड़ाई यहीं से शुरू हुई,जो अभी तक चल रही है.इन दो सालों में न्यायपालिका और सरकार दोनों ने इस टकराव को दूर करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया लिहाज़ा यह टकराव कब तक समाप्त होगा यह कहना मुश्किल है.गौर करें तो जब सुप्रीम कोर्ट ने इस विधेयक पर फैसला सुनाया था तब अपने फैसले के दौरान कोर्ट ने भी इस बात को स्वीकारा था कि कॉलेजियम में जो कमियां हैं उसे जल्द ही दूर किया जायेगा. अब सवाल ये उठता है कि न्यायपालिका ने कॉलेजियम में सुधार की दिशा में अभी तक क्या महत्वपूर्ण कदम उठाये हैं ? जाहिर है कि कॉलेजियम व्यवस्था में भारी खामियां सामने आई हैं.मसलन इस प्रणाली में पारदर्शिता का घोर आभाव देखने को मिलता रहा है. बंद कमरों में जजों की न्युक्ति की जाती रही है, व्यक्तिगत और प्रोफेशनल प्रोफाइल जांचने की कोई नियामक आज तक तय नहीं हो पाया है. जिसके चलते इसके पारदर्शिता को लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं. कुछ लोगों ने तो कॉलेजियम प्रणाली पर आपत्ति जताते हुए भाईभतीजावाद एवं अपने चहेतों की नियुक्ति करने का आरोप भी लगाया. जो हमें आएं दिन खबरों के माध्यम से देखने को भी मिलता है.न्यायपालिका पर जब इस तरह के संशय व्यक्त होने लगे तो मामला गंभीर हो जाता है.बहरहाल,इस दोनों स्तंभों में अधिकारों के खींचतान का असर लोकतांत्रिक मूल्यों व नैतिकता से इतर देश की न्याय व्यवस्था पर पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है.देश के कोर्ट-कचहरियों में फाइलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है,लंबित मुकदमों की फेहरिस्त हर रोज़ बढ़ती जा रही है.फिर भी हमारे लिए गौरव की बात है कि आज भी आमजन का विश्वास न्यायपालिका पर बना हुआ है.अगर उसे शासन से न्याय की उम्मीद नही बचती तब वो न्यायपालिका ने शरण में जाता है.ताकि उसे उसका हक अथवा न्याय मिल सकें.लेकिन, न्यायपालिका की सुस्त कार्यशैली एवं इसमें बढ़ते भ्रष्टाचार आदालतों की छवि को धूमिल कर रहे हैं. ग्रामीण क्षेत्रों का आलम ये है कि लोग कोर्ट -कचहरी के नाम पर ही सिर पकड़ लेते है,इसका मतलब ये नही कि उनका अदालती प्रक्रिय से भरोसा उठ गया है,वरन इसलिए कि न्यायालय की लचर व सुस्त कार्यप्रणाली से उन्हें तमाम प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. जो अपने आप में न्यायालय की चरमराती वर्तमान स्थिति को बयाँ कर रहा है.अगर देश की अदालतों में लंबित मुकदमों पर नज़र डालें तो स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी ताज़े आकड़ों के अनुसार जुलाई मध्य तक सुप्रीम कोर्ट में लगभग 58,438 मामले आज भी लंबित हैं,जो पिछले साल की अपेक्षा कम है.वहीँ देश के उच्च न्यायलयों में 40.15 लाख मामले अभी भी उस समय का इंतजार कर रहे जब उन्हें न्याय की तराज़ू पर रखा जाएगा.देश के निचली अदालतों की स्थिति तो और ज्यादा गंभीर है यहाँ 2016 के अंत तक लंबित मुकदमों कि संख्या 2.74 करोड़ से अधिक पहुँच गई है.इन आकड़ों को देखकर स्पष्ट होता है कि भारतीय न्याय तंत्र मुकदमों के बढ़ते बोझ तले कराह रही है. किन्तु न तो सरकार इसकी सुध ले रही है और न ही न्यायपालिका उन समस्त खामियों के मद्देनजर कोई ठोस कदम उठा रही है.देश में निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जजों की भारी कमी है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता.हालाँकि सरकार ने तमाम टकराव के बावजूद न्यायपालिका का सम्मान व इन दिक्कतों को समझते हुए 2016 में 126 जजों की न्युक्ति को हरी झंडी दी, जो हाल के वर्षों में सर्वाधिक था.सवाल यह उठता है कि जजों की न्युक्ति हो जाने से समस्याएं समाप्त हो जाएँगी ? केवल जजों की न्युक्ति भर से लंबित मामलें अपने समयावधि में निपट जायेंगें हमें इस गफलत से बाहर आना होगा.क्योंकि न्यायालय की जटिल प्रक्रियाओं से हम सब अवगत हैं. इसीलिए जरुरी हो जाता है कि महज जजों की न्युक्ति ही नहीं, वरन हमें न्यायपालिका की उन खामियों की जड़ो की तरफ भी ध्यान आकृष्ट करना होगा.जहाँ से समस्याएँ शुरू हो रहीं हैं. इसके अतिरिक्त लंबित पड़े मामलों के जल्द निपटारे के लिए समूची अदालती प्रक्रिया को भी पूर्ण रूप से तकनीकी से जोड़ा जाना चाहिए.तकनीकी का ज्यादा इस्तेमाल होने से न्याय में भी तेज़ी आएगी और पारदर्शिता भी बनी रहेगी.बहरहाल,न्याय की अवधारणा है कि जनता को न्याय सुलभ और त्वरित प्राप्त हो, परन्तुं आज की स्थिति इसके ठीक विपरीत है.आमजन को इंसाफ पाने में एड़ियाँ घिस जा रही,पीढियां खप जा रही है.त्वरित न्याय अब स्वप्न समान हो गया है. अर्थात देश की जनता और लोकतांत्रिक गरिमा को बनाये रखने के लिए जरूरी है कि न्यायपालिका और सरकार के बीच का यह गतिरोध अब समाप्त हो तथा न्यायपालिका में बड़े सुधारों की जो बात निकलकर सामने आ रही हैं उसे अमल करने की दिशा में कदम बढ़ाया जाए. .          x
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Sunday, 19 November 2017

देश के आर्थिक सुधारों पर वैश्विक स्वीकार्यता


पिछला सप्ताह नरेंद्र मोदी सरकार को काफ़ी राहत देने वाला रहा है.एक तरफ़ उनकी लोकप्रियता को लेकर आया सर्वेक्षण जहाँ व्यतिगत तौर पर मोदी और बीजेपी को आश्वस्त करता है वहीँ, नोटबंदी और जीएसटी के बेज़ा विरोध में जुटे विपक्ष को अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडिज़ ने भारत की क्रेडिट रेटिंग को बढ़ाकर करारा झटका दिया है.गौरतलब है कि अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा करवाए गये सर्वे में आज भी नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बरकरार है.इस सर्वे में 24,464 लोगों को शामिल किया गया.जिसके आंकलन के उपरांत यह बात निकल कर सामने आई कि 88 प्रतिशत लोगों की आज भी पहली पसंद नरेंद्र मोदी हैं. यह सर्वेक्षण फ़रवरी और मार्च के बीच किया गया इसमें एक तर्क यह भी है उसवक्त जीएसटी लागू नहीं किया गया था.पर,यह स्याह सच है कि जबसे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री में उम्मीदवार घोषित हुए तबसे अभी तक सत्ता में आये साढ़े तीन साल होने को हैं किन्तु प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में कमी देखने को नहीं मिली है.उससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि यह सर्वे उस वक्त किया गया जब देश की आम जनता नोटबंदी के कारण हुई परेशानियों से ठीक से उबर भी नहीं पाई थी.बहरहाल, इसी बीच क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत की रेटिंग को बढाते हुए बीएए-3 से बीएए-2 श्रेणी वाले देशों में शामिल कर दिया है.निश्चितरूप से यह केंद्र सरकार के लिए बड़ी उपलब्धी है.रेटिंग में सुधार ऐसे वक्त में आया है जब विपक्ष से लगाए तमाम अर्थशात्रियों ने मोदी सरकार के अर्थनीतियों के खिलाफ़ मोर्चा खोल रखा है.हिमाचल प्रदेश में अभी सम्पन्न हुए चुनाव की बात हो अथवा गुजरात में चल रहे विधानसभा चुनाव की बात विपक्ष जीएसटी और नोटबंदी पर सरकार को लगातार घेरने की असफ़ल कोशिश में लगा हुआ है.विरोधी दल अगर इस मुगालते में हैं कि नोटबंदी व सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना करके जनता को लुभाया जा सकता है तो ,उन्हें इस मुगालते से बाहर आना होगा.यदपि  ऐसा संभव होता तो उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में भाजपा को प्रचंड बहुमत कतई नहीं प्राप्त होता. बहरहाल,यह जानना जरूरी है की आखिर किस कारण से भारत की बीएए-2  श्रेणी में रखा गया है और इसके क्या लाभ देश को होने वाले हैं ? दरअसल, बीएए-2 में उन देशों को शामिल किया जाता है जो देश आर्थिक तौर पर मजबूती के साथ आगे बढ़ रहें है तथा जिस देश की अर्थनीति में मकड़जाल जैसी स्थिति न हो,बीएए -2 को सकारात्मक श्रेणी माना जाता है.इस श्रेणी में निवेशकों के निवेश को सुरक्षित माना जाता है.वहीँ बीएए-3 श्रेणी में उन देशों को रखा जाता है जिन देशों की अर्थव्यवस्था गतिमान नहीं होती अर्थात इसे निवेश का सबसे निचला पायदान माना जाता है.गौरतलब है कि जिस जीएसटी के विरोध में विपक्षी दल यह कहने से नहीं चुक रहे हैं कि जीएसटी के लागू होने से देश की आर्थिक हालत चरमरा गई है , वही मूडिज़ ने जो तर्क दिए हैं उसमें जीएसटी को सबसे प्रमुख बताया है.मूडिज़ के अनुसार जीएसटी के आने से माल का आवागमन सुगम हो जायेगा जिससे व्यापार आसन हो जायेगा,अन्तर्राज्यीय व्यापार को बढ़ावा मिलेगा,श्रेणी को बढ़ाने में सस्था ने जो तर्क दिए हैं उसमें आधार कार्ड,नोटबंदी,प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी), एनपीए की दिशा में सरकार गंभीरता तथा बैंको को आर्थिक तौर पर मज़बूत करने के लिए दी गई पूंजी को प्रमुख माना है.जाहिर है कि मूडिज़ ने भारत में आर्थिक सुधारों व संस्थानिक सुधारों की दिशा में बन रहीं नीतियों तथा उसके क्रियान्वयन का गहरा अध्ययन किया होगा, उसके उपरांत ही भारत की रेटिंग स्थिति में सुधार की बात निकल कर सामने आई है.यह महज संयोग ही है कि यूपीए सरकार ने 2004 में जब सत्ता संभाली उसके बाद भारत की रेटिंग बीएए-2 से गिरकर बीएए-3 पर पहुँच गई.एक दशक तक सत्ता के रहने वाले अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने भी गिरी हुई रेटिंग को हासिल करने की दिशा में कोई ठोस प्रयास किया होगा ऐसा प्रतीत नहीं होता अन्यथा इस रेटिंग को उस दैरान ही पुनः हासिल कर लिया गया होता.खैर,तबसे लगभग चौदह वर्ष के बनवास के बाद आज भारत पुनः उन देशों की कतार में खड़ा हो गया जहाँ निवेश करना आसान होगा तथा देश की सुदृढ़ आर्थिक स्थिति तथा अर्थव्यवस्था में स्थिरता के कारण निवेशकों को अपनी तरफ आकृष्ट कर सकेगा. यह बात सर्वविदित है कि अगर किसी भी देश की आर्थिक नीतियों पर एक प्रतिष्ठित वैश्विक संस्था द्वारा सराहा जाता है तो, उस देश की तरफ अन्तरराष्ट्रीय समुदाय एक उम्मीदों के साथ अपार संभावनाओं की दृष्टि से देखता है.इससे देश की साख तो मजबूत होती ही है साथ में अधिक निवेश की संभावनाएं भी प्रबल होती हैं मूडिज़ ने यह बात भी  कही है कि जीएसटी और नोटबंदी के कारण जीडीपी में गिरावट दर्ज की गई है लेकिन, यह अल्पकालिक हैं इसके परिणाम दीर्घकालिक होंगे.अगर हम मूडिज़ के केवल किन्ही दो वजहों की पड़ताल करें जिसके कारण भारत की रैंकिंग सुधरी है तो वस्तुस्थिति का पता चल सकेगा.इसमें सबसे पहले अगर हम डीबीटी यानी प्रत्यक्ष लाभ अंतरण की बात करें तो इस दिशा में सरकार ने अभूतपूर्व परिणाम हासिल किये हैं आम जनता का पैसा सीधे तौर पर आम जनता के खाते में जाए इसके लिए सरकार ने इसकी शुरूआत की.जिसमें रसोई गैस सब्सिडी,यूरिया सब्सिडी,सरकार द्वारा मिलने वाला मुआवजा सहित कई योजनाओं सीधा लाभ लाभार्थी तक पहुंचाया जा रहा है. सरकार सरकारी बैंको को मजबूत बनाने के लिए दो लाख ग्यारह हज़ार करोड़ रूपये की मदद की है.जिससे बैंको की आर्थिक स्थिति में बड़ा सुधार होने की संभावना  है,इसके साथ ही एनपीए के बोझ तले दबे इन बैंको को राहत देने का काम किया है.मूडिज़ ने इस तरह भारत सरकार तमाम आर्थिक सुधारों की दिशा में बढ़ते कदम  को इंगित करते हुए यह माना है कि आने वाले दिनों में इन सब आर्थिक नीतियों का भारत की अर्थव्यवस्था पर सकरात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे.ज्ञातव्य ही कि अभी कुछ रोज़ पहले वर्ल्डबैंक की भी इज ऑफ़ डूइंग बिज़नेस की लिस्ट में भी भारत ने तीस अंको लंबी छलांग लगाई है.इस तरह भारत की आर्थिक स्थिति के चिन्तन में दुबले हो रहे अर्थशास्त्रियों को चिंता छोड़ मूडिंग और विश्व बैंक द्वारा जो आकड़े प्रस्तुत किये गये हैं उनको ध्यानपूर्वक देखना चाहिए.आज भारत की आर्थिक स्थिति मज़बूती के साथ बढ़ रही जिसकी सराहना एक के बाद एक वैश्विक संस्थान कर रहें है.सरकार को चाहिए कि इस अवसर का लाभ उठाते हुए निवेशकों का ध्यान भारत की तरफ़ आकृष्ट करें.


Wednesday, 15 November 2017

सेक्स सीडी से उपजे कई गंभीर सवाल

गुजरात में मतदान की तारीख जैसे –जैसे करीब आ रही रोज़ कुछ न कुछ सियासी भूचाल आ रहा है.सभी दल अपनी जीत को सुनिश्चित करने के लिए सभी प्रकार के हथकंडे अपना रहें है. चुनावी समर के मध्य पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल का एक अश्लील वीडियो जैसे ही सामने आया गुजरात का सियासी[पारा अपने परवान पर चढ़ गया.दरअसल,इस वीडियो में हार्दिक पटेल किसी होटल के कमरे में लड़की के साथ आपत्तिजनक स्थिति में दिख रहें है.गुजरात के चुनावी मौसम में यह वीडियो इस राजनीतिक माहौल में आग में घी डालने जैसा काम किया है.जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया के वाया वायरल हुआ इसको लेकर भारी हंगामा मच गया.सबसे पहले यह स्पष्ट करना उचित होगा कि यह वीडियो गुजरात की चुनावी राजनीति को विशेष रूप से प्रभावित करेगी, ऐसा नहीं लगता और ना ही इसका कोई सरोकार सीधे तौर पर जनता से है.बहरहाल,यह ओछी राजनीति का एक उदाहरण भर है.यह वीडियो किस मकसद से और किसने वायरल किया है,यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है. किन्तु विरोधी दल से लगाए सोशल मीडिया पर एक कबीले के लोग बिना किसी पुख्ता सुबूत के यह साबित करने में लग गये की यह वीडियो बीजेपी ने वायरल किया है.जाहिर तौर पर इस वीडियो को चुनाव से ऐन पहले सार्वजनिक करना और किसी के निजता में दखल देना किसी रूप में जायज नहीं है.वीडियो सामने आने के बाद आरोपों से घिरे हार्दिक पटेल ने भी इसको राजनीतिक से प्रेरित बताते हुए बिना किसी ठोस बुनियादी सुबूत के इसका ठीकरा बीजेपी के सिर मढ़ दिया.उनके आरोपों में सच्चाई कम राजनीतिक चतुराई स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है.अभी कुछ रोज़ पहले ही हार्दिक पटेल ने इस बात का अंदेशा जताया था कि उनको बदनाम करने के लिए बीजेपी कोई वीडियो वायरल कर सकती है.हार्दिक का यह बयान और सेक्स सीडी का सामने आना कहीं न कहीं इस बात की तरह इशारा करता है कि यह वीडियो कांड पूर्व नियोजित एक योजना थी. हार्दिक के बयानों को समझे तो इसमें कई प्रकार के तथ्य सामने आतें है.जो खुद इस सीडी काण्ड की कहानी को बयाँ करने के लिए काफ़ी हैं और साफ़ तौर पर संकेत दे रहे हैं कि हार्दिक को इस सीडी काण्ड के बारे में पूरी जानकारी थी.जैसा की जानकारी निकलकर आ रही है वायरल वीडियो सोलह मई का है तब से अभी तक हार्दिक इस मामले को दबाए रहे.चुनाव आते ही उनको इस वीडियो की याद आई.हार्दिक के दिए बयान से ही कई सवाल उठने लाजिमी हैं.पहला सवाल क्या हार्दिक को पता था कि उनका कोई सेक्स वीडियो बना है.अगर पता था तो उन्होंने उस वक्त इसका खुलासा क्यों नहीं किया ?जाहिर है कि अगर किसी भी व्यक्ति को इसका अंदेशा होता है कि उसकी निजता में कोई दखल देकर इस प्रकार की गतिविधि करने की चेष्टा कर रहा है तो, सबसे पहले वह उस पर कार्यवाही करता है किन्तु यहाँ हार्दिक पटेल किस कारणवश मौन रहे यह अपने आप में बड़ा सवाल है.कहीं ऐसा तो नहीं खुद के बुने जाल में हार्दिक फँस रहे ? जाहिर है की यह वीडियो बेहद निजी है और किसी के भी निजी जीवन में ताकझांक करना किसी रूप में सहीं नहीं है.किन्तु अगर कोई आपके निजी जीवन में ताकझांक आपकी जानकरी में कर रहा है इसपर चुप बैठना भी संशय पैदा करता है.यह शुद्ध तौर पर राजनीतिक नफ़े नुकसान के मद्देनजर वायरल किया गया छायाचित्र है.खैर, इस सीडी काण्ड को नारी सम्मान से जोड़कर हार्दिक ने यह साबित किया है कि वह किसी भी स्तर की राजनीति करने से परहेज़ नहीं करने वाले.हार्दिक को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उन्हें जब पता था उनका उनका  वीडियो किसी ने बनाया है तो उस पर अभी तक कार्यवाही करने की बजाय ख़ामोशी की चादर क्यों ओढ़े हुए थे.जहां तक बात बीजेपी द्वारा वीडियो वायरल करने की है इसके कोई ठोस कारण नज़र नहीं आते.गुजरात में बीजेपी मजबूत स्थिति में है.हाल में जो चुनावी सर्वे सामने आयें है उसमें बीजेपी को भारी बढत मिलती दिख रही है.इस तरह गुजरात में बीजेपी का विजय रथ रोकना मुश्किल है.जिससे हार्दिक पटेल,कांग्रेस समेत उनके साथी हतासा के दौर से गुजर रहे हैं. हार्दिक पटेल भले ही खुद को बड़ा नेता मान बैठे हों पर सच्चाई यह है कि आज भी उनके पास कोई सियासी जमीन नहीं है जिसपर वह बैटिंग कर सकें.यह बात न्यूज़ चैनलों द्वारा किये गये ओपिनियन पोल में स्पष्ट हो चुका है कि गुजरात की राजनीतिक पीच पर हार्दिक अभी बारहवे नम्बर के खिलाड़ी है अर्थात उनकी राजनीतिक जमीन इतनी भी नहीं कि किसी की जीत या हार सुनिश्चित कर सकें इन सब के बावजूद बीजेपी इस तरह के कोई दोयम दर्जे का काम करेगी यह आरोप बेदम से लगते हैं.यह बात पहले ही सर्वविदित है कि विभिन्न प्रकार के दिखावे के बाद हार्दिक कांग्रेस से ही हाथ मिलायेंगे आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस से सवाल –जवाब मांग कर हार्दिक  ने पाटीदारों को खुश करने का एक सियासी नाटक जल्द खत्म होने से आसार हैं .गुजरात विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे मतदान की तारीखों की तरफ बढ़ रहा है.वैसे –वैसे दिलचस्प राजनीति देखने को मिल रही है.लेकिन, हमारे राजनेताओं को इस बात का जरूर ख्याल रखना चाहिए कि कम से कम राजनीतिक शुचिता का न्यूनतम स्तर भी बरकारा रहे.उल्लेखित है कि यह वीडियो काण्ड गुजरात की सियासत में कोई बड़ा उलटफेर लायेगा, ऐसा नहीं है.किन्तु यह सीडी काण्ड हार्दिक पटेल की राजनीतिक करियर शुरू होने से पहले ही बड़ा झटका दिया है. हार्दिक का यह कहना कि चुनाव में लाभ के लिए बीजेपी ने इस वीडियो को वायरल करवाया है यह उनका प्योर राजनीतिक स्टंट मालूम पड़ता है. 

भारत और बंग्लादेश के रिश्तों पर दौड़ेगी बंधन एक्सप्रेस



भारत और बंग्लादेश के बीच गुरुवार का दिन दोनों देशों के लिए बेहद एतिहासिक दिन रहा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बंग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिये बंधन एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाई.यह सुखद था कि इनदिनों मोदी सरकार के हर फैसले पर विरोध का झंडा बुलंद करने वाली बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी इस अवसर पर कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़ी रहीं. यह रेल सेवा सप्ताह में एक दिन बंग्लादेश के खुलना शहर से पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के बीच चलेगी.अगले सप्ताह यानी 16 नवंबर से यह रेल सेवा आम जनता के लिये शुरु हो जाएगी. यह क्रास कंट्री सेवा दोनों देशों के रिश्ते को बंधन एक्सप्रेस और मजबूती देगा. भारत और बंग्लादेश के बीच संबंधों में जो ऊंचाई पिछले दो सालों में देखने को मिली है,वह अभूतपूर्व है जाहिर है कि दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच बेहतर तालमेल का ही परिणाम है कि आज दोनों देशों के बीच परमाणु से लेकर आतंकवाद तक दोनों राष्ट्र एक ध्रुव पर खड़े होकर एक दुसरे के सहयोग से आगे बढ़ रहें हैं.यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भारत और बंग्लादेश के बीच पहले मैत्री एक्सप्रेस ने दोनों को मित्रता के बंधन में बाँधा अब बंधन एक्सप्रेस दोनों देशों के मित्रता के बंधन को अटूट बनाने का काम करेगा. दोनों देशों ने जिस कूटनीति के साथ आगे बढ़ रहें है वह स्पष्ट तौर पर एक दुसरे को भरोसे में लेकर चलने वाली है.गौरतलब है कि तमाम प्रकार के विवाद बंग्लादेश से होते हुए धीरे –धीरे दोनों देश आपसी समझदारी से विवादों को निपटाकर एक दुसरे को मित्रवत साथ लेकर चलने की रणनीति अपना रहे हैं.शेख हसीना शुरू से ही भारत से अच्छे रिश्ते रखने की पक्षधर रहीं है और भारत की विदेश नीति शुरू से ही पड़ोसियों के साथ सहयोग की रही है और एक अच्छे पड़ोसी देश का भी यह कर्तव्य बनता है कि वह पड़ोसी देश की भावना का सम्मान करे, तो भारत की इस भावना को समझने में शेख हसीना के जरा भी देर नहीं किया और भारत के साथ संबंधों को नया आयाम दिया.परिणामस्वरुप अब दोनों देशों के बीच में जो विवाद था वह अब धीरे-धीरे सभी विवादों का निस्तारण एक –एककर हो रहा है.गौरतलब है कि 1996 में भारत और बंग्लादेश के बीच रिश्तों में गर्माहट आनी शुरू हुई, इस गर्माहट के बीच में ही उसी वर्ष गंगा जल समझौते पर बात बनी थी, इसके बाद 1997 में चकमा और अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले समूहों की स्वदेश वापसी अपने आप में इस बात के संकेत देती है कि दिल्ली और ढाका के बीच रिश्ते कितने मज़बूत हैं, यह ढाका की सत्ता पर कौन क़ाबिज़ है इस बात पर ज्यादा निर्भर करता है.इससे पहले 2015 नरेंद्र मोदी और शेख हसीना ने मिलकर चार दशक पुराने सीमा विवाद का हल निकाल उसपर ऐतिहासिक द्विपक्षीय सीमा समझौता किया. यह समझौता दोनों देशों के रिश्तें में नई जान फूंक दी.उसके बाद से मोदी और हसीना एक साथ,एक –दुसरे के सहयोग के लिए सदैव तत्पर दिखाई दिए.शेख हसीना जब भारत दौरे पर आई थीं तो, भारत से उन्होंने भावनात्मक संबंधों की भी बात कही थी.आज दोनों देशों की सुझ-बुझ का बंधन एक्सप्रेस इसका सबसे प्रमुख उदाहरण  है.इससे पहले इसी वर्ष अप्रैल में जब बंग्लादेश की प्रधानमंत्री भारत के दौरे पर आई थी तभी स्पष्ट हो गया था कि शेख हसीना भारत के साथ आर्थिक,परमाणु,रक्षा सभी प्रमुख क्षेत्रों में भारत से सहयोग की अपेक्षा रखती हैं भारत भी इन सभी मसलों पर बंग्लादेश की मदद कर रहा है.चाहें बंग्लादेश के सैन्य आपूर्ति के लिए दिया गया पचास करोड़ डॉलर का अतिरिक्त कर्ज हो अथवा रेल संपर्क और सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढाने की बात इन सब से दोनों देशों के संबंधो में जो प्रगाढ़ता आई है.वह दीर्घकाल के लिए है अब यह उम्मीद भी जाग पड़ी है कि दोनों देश जल्द ही कई विवादों में सबसे प्रमुख तीस्ता संधि पर भी बात बन जाएगी जिसका भरोसा हसीना ने भारत यात्रा के दौरान दिया था.बहरहाल, इस समय दोनों देशों के बीच शुरू हुई यह रेल सेवा दोनों देशों के नागरिको के लिए यात्रा तो आरामदायक करेगी ही साथ विकास के नये द्वार के मार्ग को भी प्रशस्त करेगी. बंधन एक्सप्रेस दोनों देशों के कुटनीतिक समझदारी का एक बंधन है जो एस दुसरे के विश्वास और सहयोग की मिशाल है .
 
 

Saturday, 16 September 2017

खुद को स्थापित करने का विचित्र तर्क




कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया,बर्कले में छात्रों से चर्चा के दौरान कई ऐसी बातें कहीं जो कांग्रेस के भूत और भविष्य की रूपरेखा के संकेत दे रहे हैं. इस व्याख्यान में राहुल गाँधी ने नोटबंदी ,वंशवाद की राजनीति सहित खुद की भूमिका को लेकर पूछे गये सवालों के स्पष्ट जवाब दिए.मसलन 2014 के आम चुनाव से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए राहुल गाँधी ने कहा कि कांग्रेस 2012 के आसपास घमंडी हो गई थी और लोगो से संवाद करना बंद कर दिया था.वहीँ अपनी भूमिका को लेकर पूछे गये सवाल में राहुल ने कांग्रेस में आगामी बड़े बदलाव के संकेत देते हुए कहा कि वह पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं.राहुल भले ही यह सब बातें अमेरिका में बोल रहे थे किन्तु, भारत के सियासी गलियारों में इसकी चर्चा जोर पकड़ने लगी है कि क्या कांग्रेस की ताकत का स्थानांतरण दस जनपथ से बारह तुगलक लेन होने जा रहा है ? ऐसा माना जा रहा है कि अगले महीने होने जा रहे संगठनात्मक चुनाव में समूची कांग्रेस पर राहुल गाँधी का वर्चस्व होगा अर्थात राहुल को पार्टी की कमान सौंप दी जाएगी.राहुल को अध्यक्ष बनाएं जाने की चर्चा पहले भी होती रही है किन्तु एक सतही सवाल भी खड़ा होता है कि क्या दस जनपथ को मानने वाले राहुल को अध्यक्ष के रूप में स्वीकार करेंगे ? यह सर्वविदित है कि कांग्रेस में सत्ता के दो केंद्र है कांग्रेस का युवा गुट लोकसभा चुनाव के बाद से ही राहुल को अध्यक्ष बनाने के लिए प्रयासरत है,वहीँ जो कांग्रेस के बुजुर्ग अथवा वरिष्ठ नेता हैं वो सोनिया को ही कांग्रेस का सर्वेसर्वा मानते हैं.ऐसे स्थिति में बिखराव से गुजर रही कांग्रेस में टकराव की स्थिति बनेगी इस बात को खारिज नहीं किया जा सकता है. सिकुड़ती हुई कांग्रेस में बड़े बदलाव की जरूरत है यह बात लोकसभा चुनाव से ही उठ रही है किन्तु यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस आज भी परिवारवाद से ऊपर कुछ सोच नहीं रही. कांग्रेस में बदलाव से पहले इस बात को गंभीरता से लेना होगा कि जो भी नेतृत्वकर्ता होगा उसके लिए पार्टी ने अंदर तथा बहार दोनों तरह चुनौतियों का ताज़ सर पर सजेगा.एक तरफ़ जहाँ मोदी और शाह की जुगलबंदी से बनी रणनीति ने सबको हैरत में डाल रखा है.पार्टी सत्तासीन होने के बावजूद लगातार लोगो से संवाद स्थापित कर रही है,वहीँ दूसरी तरफ़ कांग्रेस नेतृत्व के संकट से गुजर रही है.अगर राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनाया जाता है तो यह कांग्रेस के लिए बदलाव तो होगा लेकिन यह असरकारी बदलाव होगा यह मानना कठिन है.क्योंकि राहुल गाँधी में राजनीतिक परिपक्वता का घोर आभाव नज़र आता है.समय –समय पर उनके कई ऐसे बचकाने बयान आते हैं जो उनकी राजनीतिक समझ पर सवालिया निशान लगा देते हैं.बहरहाल, राहुल गाँधी ने बड़ी साफगोई से यह स्वीकार कर लिया कि लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस नेता घमंडी हो गये थे पर सवाल यह भी है कि अब कांग्रेस लोगो से संवाद स्थापित कर रही है ? क्या कांग्रेस के नेताओं का घमंड टूट चुका है ? यह सवाल इसलिए क्योंकि 2014 आम चुनाव के बाद से तीन वर्ष का समय गुज़र चुका है.किन्तु अभी तक कांग्रेस द्वारा कोई संवाद काऐसा कार्यक्रम नहीं दिखा कि यह कहा जा सके कि अब कांग्रेस में बदलाव दिख रहा है.कांग्रेस अब भी उसी मनोस्थिति से गुज़र रही है जैसा राहुल 2012 में बता रहे हैं. यह हैरानी की बात है कि राहुल इस बात को जानते हुए भी इसे ठीक करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.नरेंद्र मोदी और अमित शाह की रणनीति अगर आज हर जगह सफ़ल हो रही है तो इसका एक बड़ा कारण कांग्रेस की सुस्ती भी है.देश के राजनीतिक जानकारों को इस सुस्त पड़ी कांग्रेस की वजह से यह कहने से गुरेज नहीं कर रहे है कि देश में विपक्ष जा रहा है.सियासत के नजरिये से देश की सबसे अनुभवी पार्टी आज हर मसले पर बीजेपी की प्रत्येक रणनीति के आगे घुटने टेक दे रही है.मुख्य विपक्षी दल होने के नातें कांग्रेस का दायित्व है कि वह सरकार की नाकामियों,आम जनता की समस्याओं को लेकर सरकार को घेरे किन्तु इस मोर्चे पर भी कांग्रेस अभी तक फेल रही है.राहुल ने छात्रों से चर्चा के दौरान परिवारवाद से जुड़े सवाल पर घिरते नज़र आयें तो उसके जवाब में खुद को स्थापित करने के लिए राहुल ने विचित्र तर्क गढ़ दिया उनका कहना है कि भारत वंशवाद से चलता है.इसी कड़ी में उन्होंने अखिलेश,स्टालिन और अभिषेक बच्चन का उदहारण देते हुए परिवारवाद को जायज ठहराने की नाकाम कोशिश करते हुए नज़र आए.हालाँकि राहुल गाँधी को यह समझना चाहिए उन्होंने जिन –जिन नेताओं का नाम लिया वह सभी वर्तमान में भारतीय राजनीति में हाशिये पर हैं,इस हिसाब से यह कहना गलत नहीं होगा कि जनता वंशवाद की राजनीति को खारिज़ कर रही है.राहुल का तर्क को इसलिए भी जायज नहीं ठहराया जा सकता है कि आज भारत के सभी सर्वोच्च पदों मसलन राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति  और प्रधानमंत्री तीनों लोग मामूली परिवार से निकले हुए हैं.इनको कोई राजनीतिक विरासत नहीं मिली बल्कि वह खुद अपने परिश्रम से अपनी राजनीतिक जमीन को तैयार किया और आजइस मुकाम पर पहुंचें हैं राहुल गाँधी ने बर्कले में दिए व्याख्यान में कई मामलों पर खुलकर अपने विचार व्यक्त किये जिसमें भारत सरकार की आलोचना के साथ –साथ प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ़ भी शामिल है.बहरहाल, गौरक्षा और असहिष्णुता जैसी बातो काजिक्र न करके राहुल आलोचना से बच सकते थे.किन्तु उनके इस बयान ने फिर उनके आलोचकों को उनको घेरने का मौका दे दिया.

Thursday, 24 August 2017

माखनलाल चतुर्वेदी जिनके गौरक्षा आंदोलन के आगे अंग्रेजों को घुटने टेकने पड़े थे,आज माखनलाल विश्वविद्यालय में गौशाला खुलने पर इतना विरोध क्यों ?


माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के विशनखेड़ी में बनने वाले नए परिसर में गौशाला खुलने का प्रस्ताव जैसे ही सामने आया.कांग्रेस ,माकपा सहित एक विशेष समूह ने इस फैसले पर बेजा विरोध शुरू कर दिया है.मीडिया ने भी इस मसले को पूरी तरजीह दी है लेकिन, कुछेक बड़े समाचार चैनलों और अख़बारों ने तथ्यों के साथ न केवल छेडछाड़ किया है बल्कि समूचे प्रकरण को अलग रंग देने की कोशिश भी की है .इस विवाद की पृष्ठभूमि पर नज़र डालें तो यह विवाद तब तूल पकड़ा जब संस्थान के नए परिसर में बची भूमि पर गौशाला खोलने के लिए विज्ञापन दिया  गया .जिसमें गौशाला चलाने वाली संस्थाओं को आमंत्रित किया गया है.विश्वविद्यालय प्रशासन का यह कहना है कि नए परिसर में बची पांच एकड़ जमीन में से दो एकड़ में गौशाला खोलने की योजना है तथा गौशाला के लिए विश्वविद्यालय अपना धन व्यय नहीं करेगा बल्कि इसे आउटसोर्सिंग के जरिये चलाया जायेगा.खैर,इस मामले को लेकर जबरन विश्वविद्यालय को बदनाम करने की साजिश रची जा रही है.माखनलाल ऐसा पहला विश्वविद्यालय नहीं है जिसमें गौशाला खोलने का फैसला लिया गया हो देश के कई संस्थानों में पहले से गौशालाएं चल रही हैं.जिसमें शिक्षा संस्थानों में अग्रणी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में भी शामिल है.वहां न केवल गौ सेवा की जा रही है बल्कि विलुप्त होती गौ नस्लों का संवर्धन भी हो रहा है.बहरहाल, बहुत ही विचारणीय स्थिति है कि जिस माखनलाल चतुर्वेदी ने 1920 में एक ब्रिटिश कंपनी द्वारा सागर के रतौना नामक जगह पर कसाईखाना खोलने समूची योजना पर पानी फेर दिया तथा अंग्रेजो के इस फैसले को वापस लेने को मजबूर कर दिया था.उनके नाम पर खुले विश्वविद्यालय में गौशाला का विरोध होना आश्चर्यजनक है.उल्लेखनीय है कि रतौना कसाईखाने से फिरंगीयों ने प्रतिदिन 2500 गायों को काटने की योजना बनाई थी.माखनलाल चतुर्वेदी को जैसे ही इस बात की जानकारी प्राप्त हुई उन्होंने इसके खिलाफ के बड़ा आंदोलन छेड़ा.समाज के हर तबके के लोगों का समर्थन उन्हें प्राप्त हुआ.17 जुलाई 1920  के ‘कर्मवीर’ में उन्होंने “गोबध की खूंखार तैयारी” नाम से संपादकीय लिखा जिसका असर यह हुआ कि यह आंदोलन राष्ट्रीय स्तर का हो गया.देश में चारो तरफ इस कसाईखाने का व्यापक स्तर पर विरोध हुआ और जिसके परिणामस्वरूप अंग्रेजों को इस आंदोलन के आगे घुटने टेकने पड़े थे.बहरहाल ,अब सवाल यह उठता है कि इस गौशाले को लेकर इतना व्यर्थ का वितंडा क्यों खड़ा किया जा रहा है ? दूसरा सवाल यह कौन लोग हैं तो विश्वविद्यालय के हर फैसले को राजनीतिक रंग देने का प्रयास कर रहें हैं ? पहले सवाल के तह में जाएँ तो आजकल गौरक्षा का मसला चर्चा के केंद्र बिन्दु में है और वामपंथियों और तथाकथित सेकुलर कबीले के लोगों के लिए गाय आस्था समान पशु न होकर महज एक पशु है.यह सर्वविदित है कि भारत का एक बड़ा जनमानस गाय को माँ के समान मानता है.और इसे श्रधा के भाव से पूजता भी है.इस मसले को अलग दृष्टि से समझें तो दिलचस्प यह भी है कि यही ब्रिग्रेड कुछ दिन पहले गौसेवा के लिए गौशालाएं और उनके रख –रखाव की मांग करता था.अब, जब एक संस्थान ऐसा कुछ नया करने का प्रयास कर रहा है फिर इसका विरोध इस कबीले के दोमुहेंपन को दर्शाता है.दरअसल,नए परिसर में गौशाला खोलने से छात्रों को किसी तरह से समस्या खड़ी होने वाली है ऐसा सोचना समझ से परे है.गौशाला से छात्रों का अहित होने वाला है इस प्रकार की भ्रामक अफवाहें क्यों फैलाई जा रही हैं? देश के कई संस्थान अध्ययन के अतिरिक्त कई अन्य प्रोजेक्ट और स्वयंसेवी कार्य करते हैं गौशाला भी उसी का हिस्सा है.विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी यह दलील दी है कि गौशाला खोलने से वहां के छात्रों तथा आसपास के लोगों के लिए शुद्ध दूध इत्यादि का प्रबंध हो सकेगा.लेकिन, कुछ लोग जिसमें छात्र भी शामिल है इस मुद्दे को लेकर ऐसे बवाल खड़ा कर रहे मानों अब पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने अपने सभी कार्यों को छोडकर महज गौशाला पर ही ध्यान केन्द्रित किया है,दूसरा सवाल आज के दौर का सबसे प्रासंगिक सवाल है जब भी देश के किसी भी संस्थान में कोई फैसला हो रहा उसे इस तरह से प्रस्तुत कर रहें जैसे आसमान गिर रहा हो.गौशाला खोलने के प्रस्ताव पर भी ऐसा ही हुआ.दरअसल कुछ बाहरी आराजक तत्व विश्वविद्यालय की साख को चोट पहुँचाने का निरंतर प्रयास कर रहें है. वह हर मसले पर राजनीति,धर्म और विचारधारा से जोड़ने का जबरन प्रयास करते रहे हैं. उनका इतिहास रहा है कि यह ब्रिगेड कभी भी छात्र हित से जुड़े मुद्दों को नहीं उठाया है.उनका विरोध हमेशा चयनित और उनके राजनीतिक आकाओं के इशारे पर होता है.उसी का परिणाम है कि आजतक यह विरोधी गुट विश्वविद्यालय के किसी भी फैसले को बदलवाने में असफल रहा है.हरबार उनके विरोध की हवा कुछ दिन में ही निकल जाती है.ऐसे लोग न केवल विश्वविद्यालय के परिवेश के लिए घातक हैं बल्कि संस्थान के पठन –पाठन और छवि को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं.विरोध में यह तर्क कटाक्ष के साथ दिया जा रहा है कि अब पत्रकारिता विश्वविद्यालय से गोसेवक निकलेंगे.यह हास्यास्पद है कि गौशाला को पढाई से क्यों जोड़ा जा रहा है ? क्या माखनलाल विश्वविद्यालय छात्रों को गौसेवा का पाठ पढ़ाने जा रहा है ? क्या छात्र गौशाला में रहकर पठन –पाठन करने जा रहें हैं ?क्या उनकी बेसिक समझ यह समझने में असमर्थ है कि गौशाला और पठन –पाठन से कोई वास्ता नहीं है.जिनको ऐसा लग रहा उनको अपनी जानकारी दुरुस्त कर लेनी चाहिए.ऐसा बिल्कुल नहीं है न तो इससे छात्रों के अध्ययन पर कोई प्रभाव पड़ने वाला है और न ही गौसेवा को स्लेबस का हिस्सा बनाया गया है.फिर इस विरोध करने का मकसद क्या है ?दरअसल विरोध के उत्सुक लोगों को यह लगता है कि इन छोटे –छोटे मुद्दों पर विरोध जताकर अपनी राजनीति को चमकाया तथा इससे अपने राजनीतिक स्वामियों को खुश कर सकें जिससे रजनीतिक महत्वाकांक्षा को बल मिले.एक महत्वपूर्ण चीज़ यह भी है अगर विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों  के हित को नज़रंदाज़ करके यह फैसला लेता है तो, विरोध जायज है.जानकारी निकलकर आ रही है कि विश्वविद्यालय प्रशासन नए कैम्पस में छात्रों के लिए हर अत्याधुनिक सुविधाओं के प्रबंध करने के उपरांत बची भूमि में यह प्रस्ताव रखा है.अगर सुविधाओं में कटौती करके गौशाला का प्रस्ताव पारित किया गया होता तो यह विरोध जायज होता पर, संस्थान के लिए आवंटित भूमि में छात्रों और कर्मचारियों के मूलभूत सुविधाओं के मद्देनज़र यह फैसला लिया गया है फिर ऐसा विरोध औचित्यहीन है.विरोध कर रहे छात्रों जो बाहरी अराजक तत्वों के गिरफ्त में आ चुके हैं उनको सोचना चाहिए कि उनका विश्वविद्यालय में दाखिले का मूल उद्देश्य क्या है.कहीं आवेश के आकर वह गुरू –शिष्य परंपरा का अनादर तो नहीं कर रहे.हर छात्र को अपनी मूलभूत सुविधाओं और समस्याओं को लेकर संस्थान से संवाद स्थापित करना चाहिए परन्तु सबसे जरूरी बात यह है कि वह समस्या छात्र हित से जुड़ा हुआ हो,छात्रों के अधिकारों से जुड़ा हुआ हो.कहीं ऐसा न हो अनावश्यक विरोध के चलते आप अपने आवश्यक विरोध के अवसर को भी खो दें.

Tuesday, 20 June 2017

रामनाथ कोविंद के नाम पर आम राय क्यों नहीं !



सभी प्रकार की अटकलों पर विराम लगाते हुए एनडीए ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार बनाएं जाने की घोषणा की है. इससे पहले कई नाम चर्चा में रहे किन्तु एक गहन मंथन के बाद बीजेपी नेतृत्व ने रामनाथ कोविंद के नाम पर सहमती जताई तथा इसकी सूचना अन्य दलों को भी दी. रामनाथ कोविंद एक ऐसा नाम सामने आया जिसका अंजादा किसी को नही था. एक बात तो तय है अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी जबसे भारतीय राजनीति के क्षितिज पर पहुंची हैं, सभी कयास विफल साबित हो रहे हैं.राजनीतिक पंडितों के अनुमान धरे के धरे रह जा रहे.इनकी राजनीति की कार्यशैली न केवल चौंकाने वाली है बल्कि इस बात की तरफ भी इशारा करती है कि यह जोड़ी किसी भी फैसलें को लेने से पहले उस फैसले के सभी पहलुओं पर भारी विमर्श और उसके दीर्घकालिक परिणामों को जेहन में रखकर निर्णय लेने में विश्वास रखते हैं.इसमें कोई दोराय नही कि आज समूची भारतीय राजनीति की सबसे सफलतम जोड़ियों में से यह जोड़ी वर्तमान राजनीति की दिशा व दशा तय कर रहे  है.राष्ट्रपति उम्मीदवार की घोषणा होते ही पूरा विपक्ष काफी देर तक यह समझने में असमर्थ रहा की इस फैसला का विरोध कैसे करें !क्योंकि एनडीए ने  देश के सबसे सर्वोच्च पद के लिए दलित जाति से आने वाले रामनाथ कोविंद के नाम का चयन किया.रामनाथ कोविंद का जीवन सहज व सरल रहा है.दलगत राजनीति में सक्रिय रहने के बावजूद रामनाथ गोविन्द सबके प्रिय रहे तथा कभी विवादों में नही आए.उनका सार्वजनिक जीवन सहजता और अंतिम पंक्ति के खड़े व्यक्ति के लिए समर्पित रहा है. उनको जानने वाले यह तक बताते हैं कि सांसद होने के बावजूद वह वर्षों तक किराए के मकान में रहे.चुकी रामनाथ कोविंद का पूरा जीवन दलित ,शोषित ,पीड़ितो की आवाज उठाने तथा उनके हितों की पूर्ति के लिए संघर्ष करते हुए बीता है.इसके अतिरिक्त पेशे से वकील रह चुके रामनाथ कोविंद को कानून तथा संविधान के साथ राजनीति का भी लम्बा अनुभव रहा है.उनकी यह सब विशेषताएं उनको राष्ट्रपति पद के मानकों के लिए उपयुक्त बनाती हैं.एनडीए के साथ बाहरी दलों ने भी इस फैसले का समर्थन किया है.मोदी के धुर विरोधी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो नाम की घोषणा होते ही,राज भवन पहुंचकर उन्हें बधाई दी.मायावती भी इस बात को जानती है कि कोविंद उत्तर प्रदेश के निवासी है और दलित समुदाय से आते है.ऐसे मे मायावती इस फैसले का विरोध करने की जहमत नही उठाएंगी.मुलायम भी इस बात को कह चुके हैं कि वह एनडीए का साथ दे सकते है.टीआरएस,अन्नाद्रमुक और बीजद ने पहले ही समर्थन देने की घोषणा कर दी है. इन सबके बावजूद यह कहना मुश्किल है कि रामनाथ कोविंद के नाम पर आम राय बनेगी ?कांग्रेस और वामपंथीयों ने इस फैसले को एकतरफा बताते हुए  विरोध किया है और 22 जून को होने वाले विपक्षी दलों की बैठक में फैसला लेने की बात कही है. गौरतलब है कि कांग्रेस और वामदलों ने वर्षो से दलितों के नाम पर राजनीतिक रोंटी सेकते आएं है किन्तु जब एनडीए ने एक दलित तबके से आने वाले व्यक्ति को देश का सर्वोच्च पद का उम्मीदवार बनाया तो इनके दलित प्रेम के दोहरे मापदंडों की पोल खुल गई.बिहार से सटे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का यह कहना कि वह कोविंद को नही जानती,विपक्ष द्वारा नकारात्मक विरोध की मानसिकता को दर्शाता है.देश यह देख रहा है कि किस तरह राष्ट्रपति चुनाव में यह दल छिछली राजनीति करने पर आमादा है. दलित राग अलापने तथा आरएसएस और बीजेपी को दलित विरोधी बताने वाले विपक्षी  दलों पर मोदी व अमित शाह का यह फैसला करारा तमाचा है.22 जून को होने विपक्षी की बैठक के बाद यह स्पष्ट हो जायेगा कि उनका उम्मीदवार कौन होगा किन्तु सभी प्रकार के राजनीतिक पैतरें चलने के बावजूद भी विपक्षी इस बात को जानता हैं कि उनके खेमे के व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाना टेढ़ी खीर है.बीजेपी ने इस निर्णय के साथ देश को यह संदेश देने का काम किया है कि उसके एजेंडे में वर्षों से उपेक्षित दलित समाज का विशेष महत्व है.यह भी लगभग तय हो चुका है कि कोविंद ही भारत के अगले राष्ट्रपति होंगें.विपक्ष इस बात को जानता है कि सभी दावों के बाद भी वह अपनी पसंद का राष्ट्रपति नही बना सकता है लेकिन, इसी बहाने वह अपनी राजनीतिक शक्ति दिखाने की रस्मअदायगी भर कर सकते हैं.

Sunday, 16 April 2017

पूर्व प्रधानमंत्री पर गंभीर आरोप !




देश में घोटालों के मामले में कीर्तिमान स्थापित कर चुकी कांग्रेस को सत्ता से बेदखल हुए लगभग तीन साल होनें को है लेकिन, घोटालों की जमी मजबूत परत एक –एक कर सामने आ रही है.यह जगजाहिर है कि मनमोहन सिंह के नेतृत्व के चल रही यूपीए सरकार में कोयला ,टू जी ,आगस्टा तथा कॉमनवेल्थ गेम जैसे बड़े घोटाले हुए हैं.जिसको लेकर कांग्रेस हमेशा से प्रधानमंत्री की भूमिका को खारिज करती रही है किन्तु अब कॉमनवेल्थ घोटाले का जिन्न फिरसे बाहर आ गया है.संसद की लोक लेखा समिति ने उस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है,जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भूमिका को लेकर आलोचना की गई है.रिपोर्ट में कई ऐसे गंभीर आरोप लगायें हैं जिससे घोटाले में मनमोहन सिंह की भूमिका को संशय के घेरे में खड़ा करती है.रिपोर्ट में कहा गया है कि पीएमओ ने तत्कालीन खेल मंत्री सुनीत दत्त के एतराज को दरकिनार करते हुए सुरेश कलमाड़ी को आयोजन समिति का अध्यक्ष बनाया जो भारी गलती थी. रिपोर्ट में पीएमओ द्वारा गलत जानकारी देने पर भी सवाल उठाते हुए कहा है कि जनवरी 2005 में खेलों की तैयारी के सिलसिले में हुई मंत्रीमंडल समूह की बैठक के मिनट्स ना बटने की जिम्मेदारी खेल मंत्रालय की थी.इस प्रकार पीएमओ ने खेल को लेकर चल रही तैयारियों से भी पल्ला झाड़ लिया.रिपोर्ट में जो बातें कहीं गई हैं वह सिर्फ मनमोहन सिंह की भूमिका नही वरन इस बात को भी दर्शाता है राष्ट्रमंडल खेल जैसे वैश्विक विषय पर पीएमओ कितना ढुलमुल रवैया अख्तियार किये हुए था.जाहिर है कि राष्ट्रमंडल खेलों में कई देशों के प्रतिनिधि भाग लेने आते हैं.मेज़बान को इस बात की चिंता रहती है कि खेल में दौरान किसी भी प्रकार की चुक न हो ताकि देश की गरिमा बनी रहे लेकिन, मनमोहन सिंह राष्ट्रमंडल खेल तो दूर की कौड़ी है तैयारियों को लेकर कितना गंभीर थे यह सच्चाई  भी रिपोर्ट के माध्यम से सामने आ रही है. बहरहाल, रिपोर्ट में तत्कालीन कैबिनेट सचिवालय को भी आड़े हाथो लेते हुए कहा है कि सचिवालय आयोजन से जुड़ी जवाबदेही तय करने में पूरी तरह नाकाम रहा है तथा लगातार सियासी दबाव के आगे घुटने टेकता रहा समिति ने कैबिनेट सचिवालय की भी जमकर आलोचना की है.गौरतलब है कि यह रिपोर्ट 2010 में तैयार की गई थी किन्तु कांग्रेस सरकार ने इस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया था ताकि देश की जनता के सामने घोटाले का सच न पहुँच सके. सवाल यह उठता है कि घोटाले के बाद जब मुरली मनोहर जोशी कि अध्यक्षता वाली पीएसी ने यह रिपोर्ट पेश की थी तो इसे दरकिनार क्यों किया गया ? उसवक्त भी मनमोहन सिंह की भूमिका को लेकर सवाल उठे थे जो आजतक कायम है,पर सत्ता का दुरुपयोग करते हुए कांग्रेस ने इस रिपोर्ट को दबा दिया था.दरअसल मनमोहन सिंह की सरकार ने अपने राज में हुए घोटालों पर पर्दा डालने की हर सभव कोशिश की लेकिन, हर प्रयास  विफल साबित हुए थे. यह बात पहले भी सामने आ चुकी है कि जो अधिकारी घोटालों से जुडी जांच में लगे हुए थे उनपर राजनीतिक दबाव बनाने के साथ –साथ प्रलोभन भी दिया गया था.कई वरिष्ठ अधिकारी समेत पूर्व सीएजी विनोद राय इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि कोलगेट तथा राष्ट्र मंडल खेलों में हुए घोटालों से जुड़ी ऑडिट रिपोर्ट में से कुछ नामों को हटाने के लिए यूपीए सरकार के पदाधिकारियों ने कुछ नेताओं को यह जिम्मा दिया था कि वह अधिकारियों पर दबाव बनाएं.खैर, कॉमनवेल्थ घोटाले की वजह से वैश्विक स्तर पर हमारी जो जगहंसाई हुई यह बात किसी से छुपी नहीं है.वस वक्त यह खेल महोत्सव लूट महोत्सव का रूप ले लिया था,कांग्रेस का हर नेता मनमाने ढंग से लूटखसोट मचाया हुआ था.भ्रष्ट अधिकारीयों की मिलीभगत के चलते  आज़ाद भारत का सबसे बड़ा खेल समारोह आज़ाद हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा खेल घोटाले में शुमार हो  गया,पर उसवक्त के प्रधानमंत्री हर बात की तरह इस गंभीर विषय पर भी मौन की चादर ओढ़े सोते रहे.कैग ,सीबीआई से लगाये पीएसी जब भी प्रधानमंत्री की भूमिका को लेकर सवाल उठाये पीएमओ इससे पल्ला झाड़ता रहा,किन्तु यह स्याह सच है कि हर घोटालों के तार पीएमओ से जुड़े हुए थे.अपने साफगोई का तगमा लिए डा. मनमोहन सिंह कभी खुद को असहाय तो कभी अनजाना बनकर हर सवालों को टालते गये किन्तु असल सवाल अब आने वाला है.लोक लेखा समिति ने रिपोर्ट को स्वीकार करने के साथ –साथ बंद पड़े हुए छह केसों की जांच फिर से करने को कहा है.जो पूर्व प्रधानमंत्री के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं.वहीँ कांग्रेस तो वैसे भी घोटालों के भार तले ऐसे दबी हुई है कि जनता सिरे से खारिज कर रही अब अगर इन फाइलों में मनमोहन सिंह की भूमिका को लेकर सवाल उठें हैं जो कांग्रेस के लिए नया सिरदर्द है.

Thursday, 6 April 2017

किसानों को समृद्ध बनाने की दिशा में योगी सरकार

  
उत्तर प्रदेश सरकार की पहली बहुप्रतीक्षित कैबिनेट बैठक मंगलवार को हुई.जैसा  की अनुमान लगाया जा रहा था कि योगी सरकार अपने लोककल्याण संकल्प पत्र में किसानों के ऋण माफ़ के वादे को पूरा करेगी ,वैसा ही हुआ.जाहिर है कि चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व पार्टी अध्यक्ष अमित शाह बार –बार इस बात पर जोर दे रहे थे कि, अगर यूपी में भाजपा सत्ता में आती है तो, सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में ही किसानों का ऋण माफ़ कर दिया जायेगा,यही कारण है की सरकार गठन के एक पखवारे बाद कैबिनेट की पहली बैठक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुलाई और किसानों को कर्ज मुआफी के जरिये बड़ी राहत देने की घोषणा की.अपने वायदे के मुताबिक उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य के दो करोड़ से ज्यादा लघु व सीमांत किसानों के कुल 36,359 करोड़ का ऋण माफ़ किया है.इससे एक लाख तक का फसल ऋण लेने वाले किसानों को बड़ी राहत मिली है.सरकार ने उन किसानों को भी मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया है.जिन्होंने कर्ज लिया था मगर उसका भुगतान नहीं कर पाए थे.जिससे वह ऋण गैर निष्पक्षता आस्तियां बन गया था फलस्वरूप उन्हें बैंको ने ऋण देना बंद कर दिया.इन सात लाख किसानों के 5630 करोड़ रूपये की धनराशि को सरकार ने  एकमुश्त समाधान योजना के तहत माफ़ कर दिए.कर्ज माफ़ी को लेकर जब चर्चा शुरू हुई तो सबके सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा था कि पैसे कहाँ से आयेंगें? क्योंकि वित्त मंत्री अरुण जेटली पहले ही स्पष्ट कर चूंके हैं कि राज्य सरकारें अपने संसाधन से किसानों का कर्ज माफ़ कर सकती हैं केंद्र सरकार इसमें कोई मदद नहीं करेगी.इसलिए योगी सरकार ने किसान बांड जारी कर आवश्यक धनराशि जुटाने का फैसला लिया है.कैबिनेट बैठक में किसानों की कर्ज माफ़ी के साथ –साथ कई और अहम फैसलें हुए जिसमें अवैध खनन पर सख्ती,आलू किसानों के लिए समिति का गठन,उधोग को बढ़ावा देने के लिए मंत्रियों का समूह बनाया गया,गेहूं की खरीदारी के लिए 80 लाख मैट्रिक टन का लक्ष्य रखा गया,एंटी रोमियों स्क्वायड केवल मनचलों पर कार्यवाही करें.इसप्रकार पहली मंत्रिपरिषद की बैठक में योगी आदित्यनाथ ने नौ बड़े फैसले लिए.जिसमें कर्जमाफी के अतिरिक्त किसानों को समृद्ध व सशक्त बनानें के लिए दो और महत्वपूर्ण फैसलें लिए हैं.पहला पांच हजार गेहूं क्रय केंद्र बनेगें सरकार ने 80 लाख मैट्रिक टन गेहूं खरीदी का लक्ष्य रखा हैं .सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1625 रूपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया है. किसानों को इसमें भी राहत देते हुए सरकार ने दस रूपये क्विंटल दुलाई व लदाई का पैसा भी स्वंय वहन करने की घोषणा की है.खरीदी में पारदर्शिता पर भी सरकार ने जोर दिया है.इसके लिए क्रय केंद्र आधार कार्ड के माध्यम से किसानों की खरीदारी करेंगे तथा आनाज का जो पैसा हुआ वह धनराशी सीधे किसानों के बैंक खातें चली जाएगी.योगी सरकार के इस फैसले को समग्रता से समझें तो इसके कई लाभ हैं.इससे पहले क्रय केन्द्रों की कमी व सही नीति न होने के कारण यूपी सरकार महज पांच से आठ लाख टन ही आनाज किसानों से खरीद पाती थी.किसान क्रय केंद पर अपने आनाज लेकर जाता था तो उसे खुद ही सारे खर्च वहन करते पड़ते थे. स्थिति कितनी बदतर थी इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि किसान क्रय केन्दों पर अपने आनाज को देने से ठगा हुआ महसूस करते थे.समय से भुगतान न होना ,आनाज के तौल पर मनमाने तरीके से कटौती करने से किसान त्रस्त आ चूका था.उपर से बिचौलियों का बोलबाला रहता था जिससे वह औने –पौने दाम में अपने आनाज को व्यापारीयों के हाथों बेचने को मजबूर था. योगी सरकार के इस फैसलें से बिचौलियों की भूमिका को समाप्त कर दिया है.जिसका लाभ किसानों  मिलना तय है.दूसरे अहम फैसले की बात करें तो उत्तर प्रदेश में पूरब से पश्चिम तक हर किसान आलू की खेती करता हैं.जिससे आलू की पैदावार इतनी हो जाती है कि किसान की लागत मूल्य भी नसीब नहीं होती. कोल्डस्टोरेज की कमी के कारण आलू सड़ने लगते हैं,जिसके चलते किसान आलू को कम दाम में बेचने को मजबूर हो जाता है. सरकार ने किसानों की इस पीड़ा को समझते हुए उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया है हालाँकि अभी यह कमेटी किस तरह से काम करेगी आलू किसानों को किसप्रकार से लाभ की दिशा में ले जाएगी इसको स्पष्ट नहीं किया गया है.योगी सरकार की पहली बैठक में जो फैसले लिए गयें हैं उससे प्रतीत होता है कि सरकार में मुख्य एजेंडे में गावं ,गरीब ,किसान हैं.सरकार अगर इसी मंशा के साथ किसानों को सशक्त बनाने का दिशा में कदम उठती गई तो, जो किसान खेती छोड़ने को मजबूर हैं,कर्ज के कारण आत्महत्या जैसे बड़े कदम उठाने को मजबूर हैं उसमें भारी कमी आएगी.सरकार के एक के बाद एक किसान हितैषी फैसलों से निश्चित तौर पर यूपी में किसानों को नई आस जगेगी. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ  इस बात को बखूबी जानतें हैं कि अगर उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाना है तो किसानों को निराशा के माहौल से निकलना होगा.किसानों को सशक्त बनाना होगा. 

Wednesday, 5 April 2017

‘एंटी रोमियो अभियान’ के अनुसरण की तैयारी में अन्य राज्य !


उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के गठन उपरांत महिलाओं की सुरक्षा के मद्देनजर एंटी रोमियों स्क्वायड की शुरुआत की गई,वर्तमान में एंटी रोमियों स्क्वायड चर्चा के केंद्र में बना हुआ है,यूपी पुलिस द्वारा चलाये जा रहें इस अभियान की कहीं तारीफ़ तो कहीं आलोचना भी सुनने को मिल रही है,पुलिस जिसतरह से इस अभियान के लिए मनचलों को सबक सिखा रही है.उससे प्रदेश की महिलाओं में सुरक्षा को लेकर नया विश्वास पैदा हुआ है.यूपी पुलिस द्वारा चलाया जा रहे इस अभियान को आम लोगों ने तथा खासकर महिलाओं ने खूब सराहा है.यही कारण है कि महिलाओं कि सुरक्षा की दृष्टिकोण से अन्य राज्य भी प्रभावित हुए हैं. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी यूपी के तर्ज पर एंटी रोमियों अभियान चलाने कि वकालत की है.जाहिर है कि मध्यप्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा सरकार तथा प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती रही है और सरकार इस चुनौती से निपटने में विफल साबित हुई है.नेशनल रिकार्ड क्राइम ब्यूरों के आकड़े बतातें हैं कि मध्यप्रदेश महिलाओं की सुरक्षा के मामले में फिसड्डी रहा है.आकड़ों पर गौर करें तो प्रदेश में 2014  और 2015 में क्रमशः 5076 और 9391 मामलें बलात्कार और छेड़छाड़ के सामने आये. यहीं नही महिलाओं के बढ़ते अपराध कि सूचि में मध्यप्रदेश शीर्ष पर रहा है.यह आकड़े सरकार को तथा प्रशासन को शर्मशार करने वालें हैं.तमाम दावों कि बावजूद आज अन्य राज्यों की अपेक्षा मध्यप्रदेश में महिलाओं पर सबसे ज्यादा दुराचार हो रहा है,पुलिसिया तंत्र इसे रोकने में विफल साबित हुआ है.यह आकड़े सरकार की महिला सुरक्षा के दावों की भी पोल खोल रहें हैं.महिलाओं के सुरक्षा के मामले में मध्यप्रदेश की स्थिति बदतर रही है,इसमें कोई दोराय नहीं कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बालिका जन्म को प्रोत्साहित करने से लेकर महिला सशक्तिकरण के लिए लाडली लक्ष्मी योजना,लाडो योजना के साथ युवतियों को आत्मसुरक्षा के लिए सक्षम बनाने हेतु  शौर्या दल भी बनाएं किन्तु, बलात्कार और छेड़छाड़ जैसे अमानवीय कृत्य को रोकने में यह सब प्रयास थोथे दिखाई दे रहें हैं. महिलाओं पर बढ़ रहें अत्याचार व छेड़खानी का मामले ने शिवराज सरकार के साख पर बट्टा लगाने का काम किया है. खैर ,महिलाओं की  सुरक्षा व छेड़छाड़ की घटनाओं को रोकने के लिए मप्र प्रदेश सरकार ने बलात्कार करने वालें को फांसी की सज़ा देने का विधेयक भी आगामी मानसून सत्र में लाने की तैयारी कर रही है.इससे अब यह प्रतीत हो रहा है कि शिवराज सरकार भी अब मनचलों को सबक सिखाने का मूड बना चुकी है. सवाल यह उठता है कि इस तरह के कठोर फैसले मप्र सरकार ने पहले क्यों नहीं किया ? जाहिर है कि महिला सुरक्षा में मामले में जिस स्तर पर सरकार को सक्रिय होना चाहिए सरकार का रवैया अभीतक ढुलमुल रहा है,पुलिस प्रशासन की सुस्ती भी इसकी बड़ी वजह मानी जा सकती है किन्तु, प्रशासन अमला को चुस्त करने का दायित्व भी राज्य सरकार का होता है.अगले वर्ष प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वालें हैं इसके मद्देनजर महिलाओं कि स्र्रक्षा एक बड़ा मुद्दा बन सकता है.ऐसे में सरकार का सक्रिय होना लाजमी है.दरअसल,यूपी में योगी सरकार ने जिसतरह से एंटी रोमियों स्क्वायड का गठन किया और प्रशासन उत्साह में आकर जो कार्यवाही कर रहा है, उसके भी कई पहलू हैं,इसका सबसे प्रमुख पहलू यह है कि स्कूल ,कॉलेज ,बाजार व भीड़भाड़ वाले इलाकों में महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की शिकायतें ज्यादें आती हैं इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कुछ असामजिक तत्व महिलाओं को देखकर अनावश्यक टिप्पणी भी करतें हैं इन मनचलों को जिसतरह यूपी पुलिस ने एंटी रोमियों स्क्वायड अभियान के तहत सख्ती बरती है,उससे मनचलों में भय पैदा हुआ है और महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस कर रहीं हैं,यही कारण है कि अन्य राज्यों की सरकारों को यूपी सरकार का यह प्रयास प्रभावित करने का काम किया है. इसका दूसरा पहलु को समझें तो यह बात निकल कर सामने आ रही है कि  महिलाओं के सुरक्षा के नाम पर कहीं आमजन को परेशान तो नहीं किया जा रहा है ? गौरतलब है कि यूपी से यह भी खबरें आई हैं कि पुलिस अतिउत्साह में आकर सगे भाइयो –बहनों पर भी कार्यवाही करने से बाज़ नहीं आ रही है.गौर करें तो अभी एंटी रोमियों स्क्वायड का गठन हुए दो पखवारें भी नहीं हुए ऐसे में यह इसकी सार्थकता का मूल्यांकन करना जल्दीबाज़ी होगी, मीडिया में आ रही खबरें व उसके सक्रियता पर भरोसा कर मध्यप्रदेश सरकार ने एंटी रोमियो स्क्वायड का गठन करने का संकेत तो दिया है किन्तु, उसे यह भी भरोसा देना होगा कि पुलिस इसके लिए पूरी तैयारी के साथ काम करेगी इसमें आपसी सहमती से बात –चित कर रहें युवक –युवतियों को कोई दिक्कत न हो.यूपी पुलिस द्वरा चलाये जा रहे एंटी रिमोयों अभियान की जमीनी हकीकत यह भी है यह कि इससे महिलाओं में आत्मविश्वास आया हैं तथा उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर जो भय रहता था वो अब समाप्त हुआ है.अन्य राज्यों की पुलिस  भी अगर इस तरह के अभियान के जरिये मजनुओं को सबक सिखाकर महिलाओं में सुरक्षा का भाव पैदा करती है तो शासन तथा प्रशासन दोनों के लिए बड़ी उपलब्धी होगी.  

Tuesday, 10 January 2017

फतवा,हिंसा और ध्वस्त कानून व्यवस्था पर खामोश ममता तानाशाही की ओर अग्रसर !

   


आज बंगाल तथा बंगाल की मुख्यमंत्री दोनों चर्चा के केंद्र में हैं.  बंगाल, रक्तरंजित राजनीति, साम्प्रदायिक हिंसा तथा शाही इमाम द्वारा जारी फतवे के लिए चर्चा में है. तो वहीँ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मोदी विरोध के हट तथा भ्रष्ट नेताओं के बचाव के चलते लगातार सुर्ख़ियों में हैं. दरअसल, नोटबंदी का फैसला जैसे ही मोदी सरकार ने लिया तभी से ममता, मोदी पर पूरी तरह से बौखलाई हुई हैं. ऐसा कोई दिन नहीं बीतता जब ममता मोदी पर व्यर्थ में निशाना न साधे. खैर, अभी नोटबंदी के सदमे से ममता उभर पाती इससे पहले ही सीबीआई ने रोजवैली चिटफंड के करोड़ो के घोटाले में तृणमूल के दो सांसदों को गिरफ्तार कर लिया. जैसे ही यह गिरफ्तारी हुई ममता पूरी तरह तिलमिला उठीं तथा जरूरत से ज्यादा उग्र प्रतिक्रिया देते हुए इस गिरफ्तारी को राजनीतिक बदला करार दिया. लेकिन, हकीकत यह है कि यह पूरी जाँच सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हो रही है और सरकार की इसमें कोई भूमिका नहीं है. बावजूद इसके सांसदों की गिरफ्तारी के बाद तृणमूल के नेताओं ने जिस तरह उपद्रव मचा रखा है, वह अपनेआप में शर्मनाक कृत्य है. गिरफ्तारी के विरोध में यातायात को बाधित करना, ट्रेनों को रोक देना भाजपा कार्यालय के सामने हिंसा फैलाना किस हद तक जायज है ? उससे भी बड़ी बात यह है कि यह सब कुछ पुलिस के सामने होता रहा और पुलिस मूकदर्शक बने तमाशा देखती रही. अभी यह मामला ठंडा भी नहीं हुआ था कि टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम बरकती ने देश के प्रधानमंत्री के ऊपर फतवा जारी कर दिया. इस असंवैधानिक, अक्षम्य, गैर क़ानूनी फतवा जारी होने के बाद भी बंगाल की नकारा शासन व्यवस्था उस ईमाम को अभी तक गिरफ्तार करने का साहस नहीं जुटा पा रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उस मौलवी को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है ? अथवा उसे इसलिए नहीं गिरफ्तार किया जा रहा है कि इमाम ममता के वोटबैंक का सुगम जरिया है ? ऐसा इसलिए क्योंकि यह शाही ईमाम पहले भी कई आपत्तिजनक फतवे के चलते चर्चा में रहे हैं और ममता के काफी करीबी भी माने जाते हैं. विडंबना देखिये इस कार्यक्रम में जब इमाम बरकाती प्रधानमंत्री पर अलोकतांत्रिक ढंग से फतवे की घोषणा कर रहे थे, तब हमारे इसी लोकतंत्र के एक सांसद वहां बैठ के मेज़ थपथपा रहे है और पुलिस भी तमाशाबिन बनी बैठी रही. बहरहाल, बंगाल में हाल ही में घटित कई घटनाओं पर सरसरी तौर पर निगाह डालें तो कई ऐसी घटनाएँ हो रही हैं जो किसी भी सूरतेहाल में एक लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है. नोटबंदी के बाद से ही केंद्र और बंगाल सरकार में तल्खी हर रोज बढती जा रही है. ममता के इस व्यर्थ के उतावलेपन को समझना मुश्किल है. एक तरफ जहाँ बंगाल में हिंसा बढती जा रही है ,तालिबानी सोच पाँव पसार रही है, कानून व्यवस्था ताक पर है. वहीँ ममता बंगाल पर ध्यान देने की बजाय केंद्र सरकार पर बेजा आरोप तथा राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीति चमकाने की जुगत में लगी हुई हैं. ममता बनर्जी के इस बौखलाहट को देखकर बहुतेरे सवाल जेहन में खड़े होते हैं. पहला सवाल क्या ममता राष्ट्रीय राजनीति में खुद को स्थापित करना चाहती हैं? दूसरा सवाल राज्य की विफल शासन तंत्र की जवाबदेही से बच रही हैं ? अंतिम सवाल ममता बार–बार संघीय ढांचे को चोट क्यों पहुंचा रही हैं ? पहले सवाल की तह में जाएँ तो जिसतरह नोटबंदी के बाद से ममता घबराई हुई है और मोदी सरकार पर व्यर्थ का गर्जन–तर्जन कर रही हैं. उससे यही लगता है कि ममता ने एकसूत्रीय अभियान के तहत मोदी की आलोचना कर राष्ट्रीय राजनीति में खुद को स्थापित करने का पैंतरा चला है. जाहिर है कि इन दिनों कांग्रेस की हालात पस्त है वामदलों के पास नौ मन तेल नहीं बचा है और उसकी हालत कांग्रेस से भी बुरी है. इसलिए ममता  समाजवादी गुट के साथ खुद को खड़ा कर मोदी विरोध का अगुआ बनने को बेताब हैं. लेकिन, इस खोखले और बेजा विरोध में अतिरिक्त परिश्रम खपा रहीं बंगाल की मुख्यमंत्री ने जो रास्ता अख्तियार किया है उससे किसी अन्य दल का न तो समर्थन मिल रहा है और न ही कोई दल ममता को अगुआ मानने को तैयार है. ऐसे में ममता का यह पैंतरा तो सफल होने से रहा. अभी हाल ही में ममता बेनर्जी ने जो राजनीतिक बयानबाजी मोदी के खिलाफ की है तथा मोदी हटाओ का जो नारा बुलंद किया है. उसमें किसी भी दल ने दिलचस्पी नहीं दिखाई है. सियासत में नई राह व कद बढ़ाने की हड़बड़ी में मशगुल ममता शायद यह भूल रही हैं कि उनके दामन इतने भी पाक–साफ नहीं है कि वह राष्ट्रीय पटल पर अपनी राजनीति को चमका सकें. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मोदी से इतना खार खाए बैठीं हैं कि उन्होंने मोदी हटाओ - देश बचाओ का नारा बुलंद कर दिया इसी के तहत उन्होंने एक हास्यास्पद प्रस्ताव दिया है. जिसमें न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत देश में सरकार गठित हो अथवा राष्ट्रपति शासन लगाने की अपील की. ममता यहीं नहीं रुकी उन्होंने एक मझे हुए राजनेता का परिचय देते हुए कहा कि देश को बचाने के लिए जरूरी है देश की कमान आडवाणी, जेटली अथवा राजनाथ सिंह को दे दिया जाये. अब इस प्रस्ताव का क्या मतलब निकाला जाए? गौरतलब है कि वर्तमान में देश में एक मजबूत व स्थाई सरकार है. मोदी के पास पूर्ण बहुमत है ऐसे में सभी राजनीतिक दल एक साथ भी आ जाएँ तो सरकार को टस से मस नहीं कर सकते. दूसरी बात क्या यह ममता तय करेंगी कि बीजेपी किसे प्रधानमंत्री बनाए या फिर एक मुख्यमंत्री अपनी पसंद का प्रधानमंत्री तय करेगा ? ममता को यह प्रस्ताव पेश करने से पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि देश पर कौन सा ऐसा संकट आ पड़ा है कि राष्ट्रपति दखल दें? शायद यही सब कारण है कि ममता के इस प्रस्ताव को अन्य बीजेपी विरोधी दलों ने भी तरजीह नहीं दी. दूसरे सवाल को समझें तो किसी भी मुख्यमंत्री का यह दायित्व होता है कि वह अपने राज्य में शासन वयवस्था को मजबूत रखे. लेकिन आज बंगाल की हालत बदतर होती जा रही है. प्रायः राज्य में साम्प्रदायिक हिंसे, भ्रष्टाचार दमन, शोषण की खबरें सामने आ रही हैं. बंगाल की समूची शासन व्यवस्था ममता की तानाशाही रवैये के चलते ताक पर है. गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल की सियासत में निज़ाम तो बदला लेकिन, उसके बाद भी वहां की स्थिति जस की तस बनी हुई है. भ्रष्टाचार ,बेरोजगारी ,हिंसा ,राजनीतिक हिंसा आज भी उसी सतह पर काबिज़ है, जहाँ वामपंथी छोड़ कर गये थे. ममता को बंगाल की कमान जब जनता ने सौंपी थी उस वक्त इस बात कि कल्पना तक नहीं की होगी कि ममता भी वामपंथियों की बनाई लीक पर ही चलने लगेंगी. लेकिन ममता के राजनीतिक चेष्टा ने उन्हें उसी रास्ते पर ला खड़ा किया है. बंगाल की राजनीति पहले भी रक्तरंजित रही है ममता खुद भी बंगाल में वामपंथियों द्वारा किये गये हिंसा का शिकार हुई हैं. आज उन्ही के पार्टी के लोग बीजेपी के दफ्तरों तथा कार्यकर्ताओं के साथ हाथापाई कर रहे हैं और पुलिस चुप्पी साधे तमाशा देख रही है. बंगाल को बदलने आई ममता, बंगाल को तो अभी तक नहीं बदल पायीं, लेकिन खुद उसी चोले में रंग गई जो वामपंथियों का था. ममता भी राज्य में बढ़ते राजनीतिक और साम्प्रदायिक हिंसा रोकने में पूरी तरह विफल रहीं हैं. पिछले साल मालदा की घटना के बाद अन्य छोटे–छोटे जगहों पर साम्प्रदायिक हिंसा होती रही है. अति तो तब हो गई जब पिछले माह ममता नोटबंदी के विरोध के लिए दिल्ली में डेरा जमाई हुई थीं उसवक्त बंगाल का धुलागढ़ हिंसा की चपेट में जल रहा रहा था. लेकिन ममता का शासन तंत्र इन हिंसा को रोकने में नाकाम साबित हुआ था. ममता इन सभी मामलों पर चुप्पी की चादर ओढ़े सोई हुई हैं. अंतिम सवाल के निहितार्थ को समझें तो आये दिन ममता संघीय ढांचे की आड़ में मोदी सरकार पर हमला करती है तथा यह बेबुनियाद आरोप लगाती हैं कि मोदी संघीय ढांचे के लिए खतरा हैं. लेकिन स्थिति इसके ठीक विपरीत है ममता के कई ऐसे काम तथा कई ऐसे बयान सामने आये हैं जो सीधे तौर पर संघीय ढांचे को तहस–नहस करने वाले हैं. ध्यान दें तो कुछ सप्ताह पहले सेना के नियमित अभ्यास को बड़े नाटकीय ढंग से ममता ने तख्तापलट की साजिश बताते हुए सेना को भी आरोपों की जद में ले लिया. अब ममता क्या यह बतायेंगी कि ऐसे बेफिजूल के आरोप संघीय ढांचे को चोट नहीं पहुंचा रहें हैं ? आये दिन कोई छोटी–मोटी घटना पर बगैर कुछ विचार किये सीधे तौर पर ममता का यह कहना कि  प्रधानमंत्री उनकी जान के पीछे पड़े है. क्या ममता यह बतायेंगी कि ऐसे मनगढंत आरोप लगाने से संघीय ढांचा मजबूत होगा ?ममता बेनर्जी को संघीय ढांचे और संविधान का कितनी चिंता है इसका अंजादा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उन्होंने केंद्र सरकार की योजनाओं में सहयोग करने तक से इंकार कर दिया है.ममता की इस छिछली और दोयम दर्जे की राजनीति भर्त्सना योग्य है.संघीय ढांचे को सही ढंग से चलाने के लिए चाहिए कि केंद्र और राज्य दोनों सरकारों में समन्यव रहे लेकिन नोटबंदी के बाद से ममता निरंतर इसपर प्रहार करती आई हैं.बहरहाल,पश्चिम बंगाल में फैले भ्रष्टाचार ,दमन ,शोषण और विफल शासन तंत्र चरमराती कानून व्यवस्था, ममता की तानाशाही व अड़ियल रवैये को देखते हुए बंगाल की जनता की भलाई व सुरक्षा की दृष्टि से जरूरी हो गया है कि केंद्र सरकार अथवा राष्ट्रपति जल्द हस्तक्षेप करे वरना ममता का राजनीतिक द्वेष,व्यर्थ का घमंड बंगाल की जनता तथा संघीय ढांचे के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है.  

Saturday, 7 January 2017

यह चुनाव साख और नाक बचाने की लड़ाई है !


सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए चुनाव आयोग ने बुधवार को पांच राज्यों  में होने वाले विधानसभा चुनाव का शंखनाद कर दिया है.यूपी,पंजाब ,गोवा,उत्तराखंड तथा मणिपुर में होने जा रहे विधानसभा चुनाव की घोषणा होते ही सभी राजनीतिक दलों में हलचल तेज़ हो गई है.इन राज्यों में चुनाव परिणाम भविष्य के गर्भ में है लेकिन, यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यह चुनाव सभी राजनीतिक दलों के लिए वर्चस्व की लड़ाई है. चार फरवरी से शुरू होने जा रहा यह चुनावी दंगल आठ मार्च तक चलेगा तथा ग्यारह मार्च को सभी राज्यों के नतीजे एक साथ आयेंगे.चार फरवरी को गोवा –पंजाब से चुनाव की शुरुआत होगी.ग्यारह फरवरी से सात चरण में यूपी विधानसभा के चुनाव संपन्न होंगे.वहीँ मणिपुर में पहले चरण का मतदान चार मार्च को और दूसरे चरण का का मतदान आठ मार्च को समाप्त होंगे तथा उत्तराखंड में पन्द्रह फरवरी को वोटिंग होगी.इन सभी राज्यों के चुनाव परिणाम निश्चित तौर पर भविष्य की राजनीति की दिशा व दशा तय करने वाले होंगे.गौरतलब है कि यह चुनाव राष्ट्रीय दलों के साथ-साथ क्षेत्रीय दलों के लिए भी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा.केंद्र में सत्तारूढ़ दल बीजेपी को सरकार में आये ढाई वर्ष का समय बीत चुका है.इस चुनाव में केंद्र सरकार अपने तमाम विकास के दावों तथा  लोककल्याणकारी योजनाओं को लेकर जनता के बीच जाएगी वो वहीँ अन्य विपक्षी दल सरकार के ढाई की विफलता का ढोल जनता के सामने पिटते हुए नजर आएंगे. ऐसे में बीजेपी के सामने दोहरी चुनौती मुंह बाए खड़ी है जिससे निपटना आसन नहीं होगा.पंजाब और गोवा का किला बरकरार रखने के साथ –साथ अन्य राज्यों में खासकर उत्तर प्रदेश में बीजेपी को अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव होगा.जाहिर है कि लोकसभा चुनाव में यूपी की जनता ने अस्सी में से 71 सीटें बीजेपी की झोली में डाल दी थी.अब यह देखने वाली बात होगी कि बीजेपी इस बार उत्तर प्रदेश की जनता को रास आती है या नही.वहीँ दूसरी तरफ कांग्रेस में समक्ष भी कमोबेश यही स्थिति है उसे भी मणिपुर तथा उत्तराखंड की सत्ता को बचाए रखने के बाद अन्य राज्यों में भी अपने प्रदर्शन को सुधारने की बड़ी चुनौती सामने है. गौरतलब है कि एक के बाद एक हो रहे चुनाव में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ रही है ऐसे में कांग्रेस के लिए यह चुनाव बची –खुची साख को बचाने की लड़ाई है.कांग्रेस के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि जब पांच राज्यों का सियासी पारा हाई है उसवक्त कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी का विदेश में है.सहजता से अंजादा लगाया जा सकता है कि कांग्रेस इन राज्यों के चुनाव को लेकर कितनी गंभीर है ! इन सभी के अलावा आम आदमी पार्टी पंजाब व गोवा में जीत का दावा कर रही है उसके इस दावे में कितना दम है,चुनाव के उपरांत यह भी स्पष्ट हो जायेगा.बहरहाल,इसमें कोई दोराय नहीं कि पांच राज्यों में होने रहे इस विधानसभा चुनाव का केंद्र बिन्दु उत्तर प्रदेश रहने वाला है. जाहिर है कि उत्तर प्रदेश चुनाव परिणाम का सीधा प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ता है. वर्तमान दौर में चुनाव सिर है लेकिन, उत्तर प्रदेश की सियासत में भारी उठापटक का दौर जारी है.वर्तमान में यूपी के चुनाव में सक्रिय मुख्य राजनीतिक दलों का सरसरी तौर पर मूल्यांकन करें तो बीजेपी को छोड़ सभी दलों में भारी अस्थिरता का महौल है.जिसका लाभ बीजेपी को मिलन तय है.समाजवादी पार्टी की नौटंकी हम सबके सामने है, कभी पिता –पुत्र तो कभी चाचा –भतीजे की लड़ाई इस हद तक पहुंच चुकी है कि समाजवादी पार्टी में दो फाड़ हो चुके हैं,यहाँ तक की मामला चुनाव आयोग तक पहुँच चुका है,अभी यह पार्टी तथा  चुनाव चिन्ह वजूद में रहेगा की नही इसपर भी कुछ कहना जोखिम भरा होगा.कोई भी पार्टी जब अपने शासन का कार्यकाल पूरा कर रही होती है तो उसका दायित्व बनता है कि वह अपने कामकाज का लेखा –जोखा ईमानदारीपूर्वक जनता के समक्ष रखे लेकिन समाजवादी पार्टी ने इससे बचने का दूसरा रास्ता इजात कर लिया,.इन पांच वर्ष की हुकूमत के दौरान प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी, कुशासन सर चढ़ के बोलता रहा है, जाहिर है कि अखिलेश के नेतृत्व वाली सरकार ने प्रदेश में विकास का कोई ठोस खाका भी तैयार करने में पूर्णतया विफल साबित हुई है.जिसके कारण यूपी की जनता खार खाए बैठी हुई है.यूपी की जनता अखिलेश से बीते पांच वर्षों के कामकाज का हिसाब मांग रही रही है,जिसका जवाब न तो पार्टी के पास है तथा न ही मुख्यमंत्री के पास. जनता के इन सवालों का जवाब देने की बजाय पूरा समाजवादी खेमा जनता को भ्रमित करने में पूरी ताकत झोंक रखी है, लेकिन इस सियासी ड्रामे ने समाजवाद का परिवारवादी विभत्स चेहरे को जनता के सामने बेनकाब कर के रख दिया है. हास्यास्पद स्थिति यह है कि इस वर्चस्व की लड़ाई में समाजवादी पार्टी के दोनों खेमे अब भी अच्छे और सच्चे समाजवादी का नारा बुलंद करने में नहीं थक रहे हैं.उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल बसपा की विडम्बना अलग है,वह नोटबंदी के फैसले से लगे सदमे से अभीतक उभर नहीं पा रही है.गौरतलब है कि नोटबंदी के बाद मायावती पूरी तरह बौखलाई हुई हैं वह यह साबित करने में अतिरिक्त मेहनत लगा रहीं हैं कि वर्तमान में स्थित केद्र सरकार दलित विरोधी है तथा नोटबंदी से सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों तथा किसानों का हुआ है बल्कि स्थिति इसके विपरीत है.खैर, पहले से ही लगातार मुंह की खा रही कांग्रेस यूपी चुनाव को लेकर पहले से ही निराश नजर आ रही है.इन समस्त अवलोकन के बाद से यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी की लोकप्रियता में दिनोंदिन इजाफ़ा देखने को मिल रहा है. गौर करें तो सभी दल एक- दुसरे पर आरोप –प्रत्यारोप लगाने में  इतने व्यस्त हो गयें हैं कि प्रदेश में विकास का मुद्दा गौण हो गया है लेकिन बीजेपी विकास के एजेंडे के सहारे ही प्रदेश चुनाव को लड़ने की कवायद कर रही है.बीजेपी की परिवर्तन रैली में जो जन समुदाय इकट्टा हो रहा है वह बीजेपी विरोधी दलों की नींद उड़ाने वाला था ,बेशक बीजेपी विरोधी दल इस भीड़ को ‘भाड़े की भीड़” बोलकर खुद की पीठ थपथपा ले लेकिन सच्चाई यही है कि बीजेपी हररोज प्रदेश में मजबूत हो रही है जिसका असर चुनाव परिणाम में देखने को अवश्य मिलेगा.बहरहाल,जैसे –जैसे  चुनाव करीब आते जायेंगें सियासी सरगर्मी और बढ़ेगी है.अत :एक बात तो स्पष्ट है इस चुनाव में किसी दल को नाक बचाना है तो किसी को साख लिहाजा यह चुनाव बहुत दिलचस्प होने वाला है. सभी पार्टियाँ पूरी तैयारी के साथ पांच राज्यों के चुनावी दंगल में उतरने के लिए बेताब हैं,सभी दल अपनी –अपनी दावेदारी पेश करने से नहीं चुक रहें है किन्तु लोकतंत्र में असल दावेदार कौन होगा इसकी चाभी जनता के पास होती है, सत्ता की चाभी पांच राज्यों में की जनता किस –किस दल को सौंपती है यह भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है.