Tuesday, 13 December 2016

‘वरदा’ चक्रवात को लेकर दिखी कुशल तैयारी



तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में चक्रवात वरदा के आने से जनजीवन पूरी तरह से अस्त –व्यस्त हो गया है.मौसम विभाग ने इस बात की पहले ही जानकारी दी थी कि वरदा नाम का तूफान सोमवार को तमिलनाडु में प्रवेश करेगा. मौसम विभाग की जानकारी के अनुसार तैयारी भी पूरी कर ली गई थी. गौरतलब है कि चक्रवात वरदा सोमवार की दोपहर दो से चार बजे के बीच में चेन्नई के उतरी तट से टकराया. उस समय उसका वेग काफी ज्यादा था किन्तु धीरे –धीरे यह तूफान कमजोर पड़ता गया. बावजूद इसके अभी तक लगभग सात लोग काल के गाल में समा चुके हैं, घर तबाह हो गये हैं, बिजली काट दी गई है, पेड़ उखड़ गये हैं, बिजली के खम्भे धाराशाई हो गये हैं तथा रेल, सड़क व वायु यातायात अवरुद्ध हो गया है. तमिलनाडु में आठ हजार तथा आंध्रप्रदेश में नौ हजार से ज्यादा लोगों को राहत शिविरों में तूफान के अंदेशे के साथ ही पहुंचा दिया गया था. चेन्नई, तिरुवल्लुर, कांचीपुरम और विल्लीपुरम में वरदा का व्यापक असर देखने को मिला. मौसम विभाग ने इस तूफान की गति पहले 140 किलोमीटर प्रति घंटे से दर्ज की किन्तु कुछ देर बाद इसकी रफ्तार कम होती गई जो सौ किलोमीटर प्रति घंटा के आस –पास रही किन्तु यह रफ़्तार भी आम जनजीवन को तहस–नहस करने के लिए काफी थी. कई जगहों पर कारें पटल गई, झोपड़ियाँ एवं टीन-टप्पर उड़ गये. एहतियात के तौर पर स्कूल ,कॉलेज में अवकाश घोषित कर दिया गया है तथा प्रशासन ने अपील की है कि लोग अपने घरों से बाहर न निकले. तमिलनाडु के साथ ही आंध्र प्रदेश में भी अलर्ट जारी किया गया है, मछुआरों को अगले 48 घंटों तक समुंद्र में नहीं जाने की सलाह दी गई है. अलर्ट के बावजूद आंध्रप्रदेश के काकीनाडा में दो मछुआरे समुद्र तट के पास से लापता हो गये हैं. तटरक्षक ने उनके तलाश व बचाव करने के लिए पहले से जहाजों को तैयार रखा है. यह सुखद बात है कि आंध्रप्रदेश में अभी तक चक्रवात वरदा से कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ है. लेकिन भारी बारिश के चलते सामान्य जनजीवन पर बुरा असर पड़ा है. वैसे तो तमिलनाडु पिछले दो दशक से चक्रवाती तूफान वरदा की चपेट में आता रहा है, मगर इसबार इसकी रफ्तार हरबार से ज्यादा रहने का अनुमान लगाया गया था जिसके मद्देनजर राहत व बचाव की तमाम तैयारियां पहले से की जा चुकी थी. जिसके परिणामस्वरूप स्थिति उतनी कठिन नहीं हुई जिसका अंदाजा लगाया गया था. मौसम विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक तमिलनाडु में 1994 के बाद से चेन्नई तट की ओर से कुंच करने वाला यह पहला बहुत जोरदार चक्रवाती तूफ़ान है. तूफान के बाद से राहत व बचाव कार्यों में प्रशासन जुट गया है. गिरे पेड़ों, बिजली के खम्भों और तहस–नहस को दुरुस्त करने के लिए एनडीआरएफ के छह दल और एसडीआरएफ के चार दल राहत कार्यों में लगे हुए हैं. उम्मीद जताई जा रही है कि मंगलवार की शाम अथवा बुधवार तक जनजीवन पूर्णतया सामान्य पटरी पर लौट आएगा. बहरहाल, इस कठिन घड़ी में केंद्र तथा राज्य सरकारों की सुझबुझ और आपसी तालमेल के चलते हर स्थिति से निपटने की भरपूर तैयारी कर ली गई थी. इसी का नतीजा है लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया गया, सेना के जवान, कोस्टगार्ड के चार बड़े व छह पेट्रोलिंग जहाज, नेवी के 11 युद्धपोत समेत पुलिस प्रशासन, नगर निगम, फायर बिग्रेड सभी को तैयार रखा गया था ताकि किसी बड़े हादसे से आसानी से निपटा जा सके. वहीँ कांचीपुरम स्थित परमाणु संयंत्र की भी वरदा तूफान के मद्देनजर चौकसी बढ़ा दी गई है. मौसम विभाग के मुताबिक वरदा अब कमजोर पड़ चुका है गोवा पहुंचते –पहुंचते यह पूरी तरह कमजोर पड़ जाएगा. खैर, इतने एहतियात के बावजूद केंदीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने तमिलनाडु में मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम व आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चद्रबाबू नायडू से फोन पर हालात का जायजा लिया और वरदा चक्रवात को देखते हुए हरसंभव सहयोग करने का आश्वासन दिया. गौरतलब है कि इससे पहले भी देश में भिन्न –भिन्न नाम से चक्रवाती तूफान आते रहे हैं. एक भयंकर आपदा के रूप में 2013 में फैलिन आया था. इसीप्रकार ‘हुदहुद’ लगभग दौ सौ किलोमीटर से अधिक की रफ़्तार से अक्टूबर 2014 में आंध्र प्रदेश के तटीय शहर विशाखापत्तनम से टकराया था. तूफान प्रभावित क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन और बुनियादी सुविधाओं को सुनिश्चित करना सदैव चुनौतीपूर्ण रहा है. समुद्री चक्रवात एक ऐसी विपदा है जिससे निपटने के लिए योजनाबद्ध ढंग से रणनीति बनाकर समय रहते कम किया जा सकता है. तकनीकी के बढ़ते चलन व मौसम वैज्ञानिकों की दक्षता, आपदा प्रबंधन अधिकारियों के समय रहते कार्यवाही के चलते प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने में देश पहले की तुलना में अधिक सक्षम हुआ है. उपग्रह के जरिये मौसम के पूर्वानुमान की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध होने से जब भी कोई बड़ा चक्रवात अथवा तूफान आने वाला होता है इसकी सटीक जानकरी हमें प्राप्त हो जाती है. जिससे प्रशासन, आपदा प्रबंधन आमजनता की सहायता तथा  राहत व बचाव कार्य की तैयारी पूरी कर ली जाती है. ऐसे समय में प्रायः यह भी देखने को मिलता है कि प्रशासन द्वारा अल्टीमेटम के बावजूद लोग घरों से निकल जाते हैं अथवा एहतियात के लिए जो अपील सरकार द्वारा की जाती है उसे दरकिनार करने का दुस्साहस करते हैं. परिणामस्वरूप किसी अप्रिय घटना की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. जनता को भी इन आपदाओं के कठिन समय में धैर्य का परिचय देना चाहिए तथा प्राप्त निर्देशों का पालन करना चाहिए. बहरहाल, मौसम विभाग की सटीक भविष्यवाणी और प्रशासन की चुस्ती की वजह से चक्रवात वरदा से एक बड़ा संकट आसानी से टल गया. वरदा को लेकर शुरू से यह अंदाज़ा लगाया गया था इसके आने के पश्चात् जानमाल को भारी नुकसान होगा तथा इसके दुष्परिणाम दूरगामी होंगे. किन्तु कुशल रणनीति और आपदा प्रबंधन की सुझबुझ के चलते हम प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में अब सक्षम होते जा रहे हैं.    

संसद की प्रतिष्ठा को धूमिल करते सियासतदान



संसद  के शीतकालीन सत्र समाप्त होने में चंद दिन शेष बचे हैं और यह पूरा सत्र हंगामे की भेंट चढ़ता दिखाई दे रहा है. नोटबंदी को लेकर विपक्षी दल लोकतंत्र के मंदिर मे जो अराजकता का माहौल बनाए हुए हैं वह शर्मनाक है. गौरतलब है कि नोटबंदी एक ऐसा फैसला है जिसका प्रभाव देश के हर व्यक्ति पर पड़ा है और आमजनता कतार में खड़ी है. उसे तमाम प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. नोटबंदी के फैसले के बाद आमजनता के जहन में भी कई सवाल खड़े हुए हैं जिसके जवाब के लिए वह संसद की तरफ देख रही है. किन्तु हमारे द्वारा चुनकर भेजे गये प्रतिनिधि इन सवालों के जवाब तथा इस समस्या का हल निकालने की बजाय अपनी राजनीतिक शक्ति और झूठी प्रतिष्ठा की लड़ाई लड़ने में मशगूल हैं. ऐसे कठिन समय में और इतने गंभीर मुद्दे पर भी हमारे सियासतदान अपनी ओछी राजनीति से बाज़ नहीं आ रहे हैं. नोटबंदी के बाद जनता में अफरातफरी का जो महौल बना है उससे जनता को कैसे निकाला जाए, कैश को लेकर जो समस्याएँ आमजनता के समक्ष आ रही हैं, उस समस्या से निजात जनता को कैसे मिले? इसपर बात करने की बजाय हमारे राजनीतिक दल अपने अनुसार राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं. टकराव की ऐसी स्थिति बनी है कि समस्याओं को लेकर जो व्यापक बहस दिखनी चाहिए वो महज हुल्लड़बाजी तक सिमित होकर रह गई है. सदन को ठप्प हुए दो सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है तथा सत्र भी अब समाप्त होने वाला है, लेकिन संसद में कामकाज न के बराबर हुआ है. इस गतिरोध को देखते हुए वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सत्ता पक्ष तथा विपक्ष दोनों पक्षों पर नाराजगी जताई है. यही नहीं आडवाणी ने संसदीय कार्यमंत्री व लोकसभाध्यक्ष को भी कठघरे में खड़ा किया है. आडवाणी का यह कहना वाजिब ही है कि सदन में हल्ला मचाने वाले सांसदों को सदन से बाहर कर उनके वेतन में कटौती की जानी चाहिए. आडवाणी की फटकार के अगले ही दिन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी सांसदों से अपील की कि संसद में गतिरोध समाप्त कर काम शुरू किया जाए. लेकिन महामहिम के अपील का भी कोई असर हमारे माननीयों पर होता हुआ नहीं दिख रहा है. इस व्यर्थ के हंगामे को देखकर लगता है कि विपक्ष यह तय कर बैठा है कि हम संसद में काम नहीं होने देगें, वहीं सत्तापक्ष भी अपनी शर्तों पर सदन चलाने पर अड़ा हुआ है. बहरहाल, संसद बहस का मंच हैं जहाँ जनता से जुड़े मुद्दों पर हमारे द्वारा चुनकर भेजे गये प्रतिनिधि सकारात्मक चर्चा करते हैं. लेकिन अब हमारी संसद से सकारात्मकता विलुप्त होती चली जा रही है, हर मुद्दे पर बहस की जगह हंगामे ने ले लिया है. विपक्षी दलों को लगता है कि विरोध करने का सबसे सही तरीका यही है कि संसद के कार्यवाही को रोक दिया जाये, विपक्ष को इस तरीके को बदलना होगा. उसे आमजनता से जुड़ी समस्याओं को लेकर विरोध करने का हक है, उसे समस्याओं को लेकर सरकार को घेरने का अधिकार है किन्तु सदन की कार्यवाही को रोकना किसी भी स्थिति में सही नहीं है. नोटबंदी का फैसला जैसे ही सामने आया विपक्ष के रुख को देखकर ही अंदाज़ा हो गया था कि संसद तो चलने से रही और हुआ भी यही. सत्र शुरू होने के साथ ही विपक्ष ने नोटबंदी पर चर्चा की मांग की, सरकार ने विपक्ष की इस मांग को स्वीकार करते हुए विमुद्रीकरण पर चर्चा को राजी हो गई थी. किन्तु विपक्ष हर रोज़ नई शर्तों के साथ चर्चा चाहता है. पहले विपक्ष ने कहा प्रधानमंत्री की उपस्थिति होना जरूरी है, उसके बाद मतदान के नियमानुसार चर्चा की जिद पकड़ कर बैठ गया. सत्ता पक्ष ने विपक्ष की इस मांग को खारिज कर दिया. जिससे दोनों पक्ष अपनी –अपनी जिद पर अड़े हुए हैं.सरकार के सामने चुनौती होती है कि वह किसी भी तरह संसद को चलाने में सफल रहे. वहीँ विपक्ष का मिजाज़ होता है कि वे मुद्दे जिनका जनता से सीधा सरोकार हो और यदि सरकार जनता की उस परेशानी पर ध्यान नहीं दे रही हो तो विपक्ष सरकार को उन मुद्दों के सहारे घेरता है तथा संसद में व्यापक विचार–विमर्श की मांग करता है. किन्तु अब हमारे संसद प्रणाली में स्वस्थ बहस की गुंजाइश नहीं बची है. संसद अखाड़ा बन चुका है बहस की भाषा तीखी हो गई है, सवाल तो यह भी है स्वस्थ बहस चाहता कौन है ? यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि विपक्ष भी बहस के नियम और उसके स्वरूप को लेकर संशय में है. विमुद्रीकरण के फैसले के बाद संसद में जो अराजकता का माहौल बना हुआ है आखिर उसका जिम्मेदार कौन है ? जाहिर है कि विमुद्रीकरण के बाद से आम जनता को परेशानी हुई है. संसद से लेकर सड़क तक चल रहे गैरवाजिब हंगामे को देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि विपक्ष की आम जनता की परेशानीयों को दूर करने में कोई दिलचस्पी नहीं है. बल्कि विपक्ष इसपर अपना राजनीतिक नफा–नुकसान ढूंढने में लगा हुआ है, राजनीतिक लाभ के लिए संसद की गरिमा को ठेस पहुंचाना कतई उचित नहीं है. देश हित के लिए जरूरी है सत्तापक्ष तथा विपक्ष दोनों मिलकर संसद में एक सार्थक चर्चा करें जिससे समस्याओं का हल ढूंढा जा सकें.

Wednesday, 7 December 2016

बैकफूट पर पाकिस्तान

अमृतसर में आयोजित 7वें  हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन कई मायने में अहम रहा अफगानिस्तान के पुनर्गठन,सुरक्षा व आर्थिक विकास के साथ –साथ  आतंकवाद तथा नशीले पदार्थों की तस्करी रोकने जैसे गंभीर विषय चर्चा के केंद्र में रहे सम्मेलन के एजेंडे में आतंकवाद का मुद्दा प्रमुख था.जाहिर है कि जिस मंच पर पाकिस्तान के प्रतिनिधि मौजूद हों और बात आतंकवाद को उखाड़ फेकने की हो वहां पाक प्रतिनिधि का असहज होना स्वाभाविक है.भारत के प्रधानमंत्री और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति ने आतंकवाद के मसले को पाक को कटघरे में खड़ा किया तो वहीँ इस सम्मेलन में संयुक्त रूप से आतंकवाद के खिलाफ तैयार घोषणा पत्र में लश्करे-ए- तैयबा और जैश –ए –मोहम्मद समेत कई आतंकी संगठनों को रेखांकित किया गया है.यह भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक सफलता है जाहिर है कि ये आतंकी संगठन पाकिस्तान द्वारा पोषक हैं तथा पाकिस्तान इनके सहयोग से भारत के साथ –साथ अफगानिस्तान में अशांति और हिंसा के लिए इनका इस्तेमाल करता रहता है. एक बात जगजाहिर है कि पाकिस्तान आतंकियों को पनाह देता है और उसका इस्तेमाल भारत ,अफगानिस्तान जैसे देश में अस्थिरता उत्पन्न करने के लिए करता है.भारत पाकिस्तान को हर वैश्विक मंच से अलग –थलग करने में कुटनीतिक कामयाबी तो हासिल कर ले रहा है लेकिन आतंकवाद के मसले पर घुसपैठ के मसले पर पाकिस्तान का अड़ियल रवैये में जरा भी परिवर्तन देखने को नहीं मिल रहा है.हार्ट ऑफ़ एशिया सम्मेलन में भी पाकिस्तान ब्रिक्स और दक्षेश की तरह अलग –थलग पड़ गया और उसके प्रतिनिधि सरताज अजीज बचाव करते रह गये.बहरहाल,पाकिस्तान को हर मंच पर घेरने की रणनीति तो सही है भारत इसमें सफल भी दिख रहा है लेकिन सवाल यह खड़ा होता है क्या इससे आतंकवाद और घुसपैठ में रोकने में भारत को कामयाबी मिल रही है या नही ? इस सवाल की तह में जाएँ तो दो बातें स्पष्ट होती हैं.पाक को हर मंच से अलग –थलग करने की भारत की रणनीति के चलते पाकिस्तान अब बैकफूट पर  आ गया है तथा हर मंच से पाकिस्तान खुद का बचाव करने में ही अपनी भलाई समझ रहा है.आतंक को पनाह देने की बात भारत ने हर मंच से उठाई है और इसके पुख्ते सुबूत भी वैश्विक मंचो पर रखा है जिससे पाकिस्तान की फजीहत हर वैश्विक मंच पर हो रही है.दूसरी बात पर गौर करें तो यह भारत के दृष्टिकोण के कतई सही नहीं है भारत की नीति स्पष्ट है आतंक का खात्मा व सीमा पर शांति लेकिन पाकिस्तान इसके विपरीत काम कर रहा है यही कारण है कि भारतपाक को हर मंच से धुल चटा रहा है.आतंकवाद पाकिस्तान की कमजोड कड़ी है खुद पाकिस्तान भी आतंकवाद से पीड़ित है बावजूद इसके पाकिस्तान के रुख में कोई परिवर्तन देखने को नहीं मिल रहा है.उड़ी हमले व सर्जिकल स्ट्राइक के बाद आतंकी गतिविधियों और  घुसपैठ के मामले बढ़े है.आतंकवाद की इस लड़ाई में भारत के साथ अन्य देश जो भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहें है उनसब को भी यह मुल्यांकन करने की आवश्यकता है कि इस लड़ाई में अभीतक कितने सफल हुए हैं ? कहीं यह लड़ाई महज फाइलों तक तो नहीं सिमट रही ? हर वैश्विक मंच से भारत आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेकने की बात कर रहा है अमेरिका समेत कई राष्ट्र्मित्र देश इसका समर्थन तो कर रहें है लेकिन कार्यवाही करने में पीछे है.आतंकवाद पर बात तो समूचा विश्व कर रहा है लेकिन आतंक पर प्रहार कितने देश कर रहे हैं इस बात पर भी गौर करना चाहिए.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में संकेतों के जरिये पाक को खूब खरी –खोटी सुनाई हार्ट ऑफ़ एशिया सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते  महुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सीमा पार चल रहे आतंक की पहचान करनी होगी  और इससे मिलकर लड़ना होगा आतंकवाद से अफगानिस्तान की शांति को खतरा है प्रधानमंत्री ने सिर्फ आतंकवादियों की नहीं बल्कि आतंकवाद को आर्थिक मदद देने वालों के खिलाफ की कड़ी कार्यवाही करनी की बात कहीं वहीँ दूसरी तरफ अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को जम के लताड़ा उन्होंने पाकिस्तान को सीधे तौर पर निशाना साधते हुए कहा कि पाकिस्तान की मदद के बगैर तालिबान उसकी धरती पर एक दिन भी नहीं टिक सकता.मौके का फायदा उठाते हुए गनी ने यह भी कहा कि तालिबान के स्वीकार किया है कि उसे पाकिस्तान का सपोर्ट मिल रहा है गौरतलब है कि अफगानिस्तान में पिछले साल हिंसा और आतंकी हमलों से सबसे ज्यादा मौतें हुई है अफगानिस्तान की पीड़ा जायज भी है.पिछले दो सालों में तालिबान के हमलों से  अफगानिस्तान के लोगों का जीना मुहाल कर रखा है. अफगान आर्मी तालिबान लड़ाकों के आगे कमजोर दिखाई दे रही है किन्तु बड़ी बिडम्बना है कि अफगानिस्तान में स्थिरता और इसके पुर्निर्माण के मकसद से हुए इस सम्मेलन  में पाकिस्तान को भी शामिल किया गया है जो अफगानिस्तान में हिंसा और आतंक को फ़ैलाने के लिए जिम्मेदार है.गनी में इन सब को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान पर जमकर प्रहार किया वहीँ पाकिस्तान से 50 करोड़ डॉलर अफगानिस्तान के पुनर्निमाण के लिए देने की बात कही है ;लेकिन अफगान के राष्ट्रपति ने इसे यह कहते हुए इंकार कर दिया कि बेहतर होगा कि इन पैसों का इस्तेमाल पाकिस्तान आतंकवाद को रोकने के लिए करे.अफगानिस्तान के राष्ट्रपति ने पाकिस्तान के गालों पर करार तमाचा जड़ा है वहीँ भारत भी पाकिस्तान को लेकर अपने कड़े रुख पर कायम है.इन सब के बावजूद पाकिस्तान के रुख में कोई बदलाव देखने को मिलेगा ऐसा नही लगता. लेकिन पाकिस्तान को अलग-थलग करने की रणनीति भी तभी सफल होगी जब पाकिस्तान आतंकवाद और घुसपैठ जैसी हरकतों से बाज़ आ जायेगा.