Sunday, 20 November 2016

बैंक डिफाल्टरों पर सुप्रीमकोर्ट का रुख सही

   
    

बैंक डिफाल्टरों का मुद्दा समय –समय संसद से सड़क तक चर्चा का विषय बना रहता है.चुकी बैंको पर एनपीए का बढ़ता दबाव देश की आर्थिक स्थिति को दीमक की तरह चाट रहा है बावजूद इसके हमारे बैंक खुद के पैसे वसूलने में असहाय दिख रहें है. सर्वोच्च न्यायालय भी इस विकराल समस्या पर अपनी नजर गढाये हुए है. न्यायपालिका लोन डिफाल्टर में मामले पर कई दफा सरकार आरबीआई समेत कई बैंको को आड़े हाथों लेता रहा है.वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि डिफाल्टरों के नाम खुलासा अब कोई बड़ा मसला नहीं रह गया है.जाहिर है कि सुप्रीमकोर्ट ने अपनी पिछली सुनवाई के दौरान आरबीआई और सरकार से पूछा था कि क्यों न 500 करोड़ के अधिक बैंक डिफाल्टरों के नाम सार्वजनिक कर दिए जाएँ.लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट इस मसले पर और सख्ती दिखाते हुए सरकार और आरबीआई को इस मामले का निवारण ढूंढने को कहा है.कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि डिफाल्टरों से कर्ज वसूली के लिए क्या प्लान है ?माननीय कोर्ट से सरकार से यह भी पूछा है कि सरकार ने अभी तक इसके लिए क्या –क्या कदम उठायें हैं ? कोर्ट ने केंद्र सरकार ने तीन सप्ताह के भीतर रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है.कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी कहा है कि हमें यह देखना है कि इस समस्या की जड़ आखिर है कहाँ और इससे कैसे निपटा जाए. मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर,जस्टिस एएम कंविल्कर और डीवाई चंद्रचुड की तीन सदस्यीय बैंच ने कहा कि केंद्र की विशेषज्ञ समिति जो इस पर विचार कर रही है उसे अपनी रिपोर्ट को जल्द पेश करना चाहिए कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि कमेटी की रिपोर्ट आने के उपरांत ही अगला कदम उठाया जायेगा तथा अगली सुनवाई 12 अगस्त को होगी.गौरतलब है कि देशभर के कई बैंको से 500 करोड़ और उससे ज्यादा लोन लेकर डिफाल्टर होने वाले 57 लोंगो पर करीब 85 हजार करोड़ रूपये की देनदारी है यदि 500 करोड़ के कम के डिफाल्टरों की बात करें तो यह एक लाख करोड़ होगा जो एक बहुत बड़ी राशि है.जिसे कोर्ट ने भी स्वीकार किया है. लगातार यह बड़ी राशि बैंको के लिए सरदर्द बना हुआ है यह पैसा कबतक बैंक को वापस मिलेगा या बैंक इस रकम को वसूल पायेगा की नहीं ये खुद बैंक को नहीं पता .ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बैंक व सरकार डिफाल्टरों से अपने पैसे वापस कैसे ले ? यह एक यक्ष प्रश्न की तरह है जिसका जवाब न तो सरकार के पास है और न तो बैंक के पास. गौरतलब है कि एनपीए को लेकर सरकार भी कुछ महत्वपूर्ण कदम उठायें है जिसे दरकिनार नहीं किया जा सकता मसलन केंद्र सरकार ने बैंकों की एनपीए के खिलाफ एक महत्वपूर्ण और सार्थक कानून मानसून सत्र में पास करवाया था.द इंफोर्समेंट ऑफ़ सिक्यूरिटी इंटरेस्ट एंड रिकवरी ऑफ़ डेब्ट्स लॉस एंड मिसलेनियस प्रोविजन्स नाम का विधेयक सरकार ने संसद के दोनों सदनों द्वारा पास करवाया था.बैंक एनपीए को लेकर  सरकार का यह एक महत्वपूर्ण कदम था.जिसमें ना सिर्फ सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों को और अधिकार प्रदान किये गए हैं बल्कि इस महत्वपूर्ण संशोधन की बदौलत  एनपीए के मामलो में निपटारा भी जल्द से जल्द हो सके.बहरहाल,आरबीआई के अनुसार सरकारी बैंकों के चार लाख करोड़ से ज्यादा की राशि एनपीए के तौर पर फंसी हुई है. जिसके मिलने की आस न के बराबर है. ऐसे वक्त में सुप्रीम कोर्ट ने समस्या की जड़ की तरफ सरकार का ध्यान आकृष्ट किया है.सनद रहे कि सरकारी बैंकों के एनपीए का मुद्दा लगातार काफी गर्म रहा है. ऑल इंडिया बैंक एम्पलॉय एसोसिएशन (एआईबीईए) ने बैंकों से कर्ज़ लेकर साफ़ हजम कर जाने वाले 5610 कथित उद्यमियों की जो लिस्ट उजागर की थी. उससे पता चलता है कि हमारे देश में कर्जखोरी की बीमारी ने अब महामारी का रूप धारण कर लिया है. खासकर उद्योगपति विजय माल्या की कंपनी किंगफ़िशर पर बकाये कर्ज़ का मुद्दा आज भी चर्चा का विषय बना हुआ है.अकेले विजय माल्या बैंकों का करीब 9,000 करोड़ लेकर चंपत हो गये हैं. ऐसे बकायदारों की एक लंबी फेहरिस्त है जो बैंकों का कर्ज देने में टालमटोली कर रहें हैं. खैर,हमें एनपीए की मुख्य जड़ो की तरफ भी ध्यान देना होगा जहाँ से यह समस्या विकराल रूप धारण करने लगी. हमारे देश में एनपीए की समस्या ने मुख्य रूप से अपनी जड़ो को यूपीए शासन के समय से जमानाव विस्तार करना शुरू कर दिया था.जिसने अब विकराल रूप धारण कर लिया है. 2009 से ही बैंकों में कर्जदारों की संख्या लगातार बढती चली गई. खासकर बड़े उद्योगपति जिन्होंने अपने उद्योग के लिए बैंक से बड़ी रकम लेना शुरू किया. 2008 में जब वैश्विक मंदी छाई हुई थी, उस समय भारत की जीडीपी भी निचले स्तर पर थी. लेकिन भारत में मंदी का असर विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा कम था. इसका लाभ लेते हुए उस समय कांग्रेस नेतृत्व ने जिस तरह से अपने करीबी उद्योगपतियों को दिलखोलकर ऋण दिए. जिसमें विजय माल्या, जिंदल, जेपी आदि प्रमुख थे. आज भी यह समझना मुश्किल है कि जब विश्व मंदी के चपेट में था, आर्थिक त्रासदी से गुजर रहा था. ऐसी विकट परिस्थिति में इतने कर्ज़ क्यों बांटे गये? यही नहीं यूपीए सरकार ने बढ़ते एनपीए पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जिससे बैंक एनपीए की बोझ तले दब गये. आज सरकारी बैंकों की एनपीए इतनी बढ़ चुकी है.समूचे देश का अर्थ विकास इसके गिरफ्त में है.अब समय आ चुका है बैंको को इससे मुक्ति दिलाये जाए जो बड़े डिफाल्टर हैं उनपर कड़ी कार्यवाही कर राशि को वसूली जाए.सुप्रीम कोर्ट की बात पर गौर करें तो इसमें कोई दोराय नहीं कि सरकार इस समस्या का दीर्घकालीन निवारण ढूंढने में कभी पूर्णतया सफल नहीं रहीं है.बैंक डिफाल्टरों की समस्या धीरे –धीरे आज आर्थिक त्रासदी का रूप धारण करने मुहाने पर खड़ा है.जिससे देश की आर्थिक स्थिति पर असर तो पड़ता ही है आम जनता के मन भी यह धारण पैदा हो जाती है कि हमारे बैंक बड़े व्यापारियों को सहूलियत प्रदान करती है किन्तु गरीब किसान को मामूली राशि के लिए परेशान किया जाता है.देश की इस विकराल समस्या को लेकर कोर्ट समय समय पर सरकारों को फटकार लगाता रहा है लेकिन सरकारें इस मुद्दे पर कोई ठोस रणनीति के तहत कार्यवाही करने से बचती रहीं है जिससे बैंको पर बढ़ता एनपीए आर्थिक स्थिति को खोखला करता जा रहा है.सरकार व बैंको को जल्द ही इससे मुक्ति का कोई ठोस रास्ता ढूँढना होना जिससे लोन रिकवर हो सके.

Wednesday, 2 November 2016

वर्चस्व की लड़ाई में सपा खो रही राजनीतिक जमीन

  
 


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जैसे –जैसे करीब आ रहें है सियासत हर रोज़ नए करवट लेती नजर आ रही है.हर रोज़ ऐसी खबरें सामने आ रहीं हैं जो प्रदेश की सियासत में बड़ा उलट फेर करने का माद्दा रखतीं है.सत्तारूढ़ दल समाजवादी पार्टी की आंतरिक कलह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है, चुकी यहाँ मामला जटिल इसलिए भी हो जाता है कि एक तरफ पार्टी में दरार तो आ ही रही है वहीँ दूसरी तरफ मुलायम परिवार में बिखराव भी हो रहा है.इन दोनों को बिखरने से रोकने में अभी तक पार्टी व परिवार मुखिया मुलायम सिंह भी सफल नहीं हुए हैं. गत जून माह से ही चाचा शिवपाल और भतीजे अखिलेश में बीच शुरू हुई तल्खी लागतार बढती जा रही है. अगर गौर करें तो चुनाव में अब ज्यादा समय शेष नहीं रह गया है सभी दल चुनावी बिसात बिछाने में लगें हुए ऐसे में सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी दो खेमे में बंटी हुई नजर आ रही  है.जिसकी बानगी हम कई बार पहले भी देख चुके हैं एक तरफ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तो दूसरी तरफ शिवपाल यादव खड़ें हैं.ताज़ा मामला पोस्टर वार को लेकर सामने आया है आगामी तीन नवम्बर को जहाँ अखिलेश यादव “ रथ यात्रा” शुरू करने जा रहें है.वहीँ पञ्च तारीख को पार्टी के पचीस साल पूरे होने पर भव्य आयोजन की तैयारी की जा रही है जिसके कर्ता-धर्ता शिवपाल यादव हैं. पहले दिन अखिलेश अपने रथ की लेकर उन्नाव जायेंगें उसके बाद पार्टी के रजत जयंती समारोह में शिरकत करने के लिए लखनऊ लौट आयेंगें. जिससे यह सन्देश दिया जा सके कि तमाम मतभेद के बावजूद समाजवादी पार्टी एक है.गौरतलब है कि शिवपाल और अखिलेश के बीच घमासान थमने का नाम नही ले रहा है.इस बार कड़वाहट पोस्टरों में माध्यम से सामने आई है मुख्यमंत्री अखिलेश की रथ यात्रा “विकास से विजय की ओर” के लिए लगे पोस्टरों में शिवपाल यादव नदारद हैं जाहिर है कि शिवपाल यादव पार्टी प्रदेश अध्यक्ष भी हैं सत्ताधारी दल के प्रदेश अध्यक्ष होकर भी मुख्यमंत्री के एक अहम रथ यात्रा के लिए लगे पोस्टर से गायब कर दिया जाना कोई छोटी घटना नही हैं, खबर तो यह भी है कि नेता जी को भी पहले जितना तवज्जो नही दी गई है उनके पोस्टर भी एकाध जगह ही दिख रहें है.इन सब के बीच बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या अखिलेश अलग रास्ता चुनकर सत्ता तक पहुंचना चाहतें हैं ? इस सवाल की तह में जाएँ तो समझ में आता है कि अखिलेश की छवि एक युवा और गंभीर मुख्यमंत्री के रूप में बनी हुई है.वहीँ दूसरी तरफ सपा के कई आला नेता मसलन मुलायम सिंह यादव ,आजम खांन हो अथवा शिवपाल यादव समय –समय पर विवादास्पद बयानों के चलते पार्टी के साथ –साथ  सरकार की छवि को घूमिल करने का काम करतें है.बल्कि अखिलेश अपने बयानों के जरिये चर्चा के केंद्र बनने से बचतें रहें हैं.बहरहाल ,शिवपाल और अखिलेश में जबसे रार सामने आई हैं मुखिया मुलायम सिंह ने भी कई ऐसे बयान दिए हैं जिससे अखिलेश अलग रुख रखने को विवश हुए हैं. इस पुरे प्रकरण में एक और प्रमुख वजह पर ध्यान दें तो  गायत्री प्रजापति का रोल भी कम नहीं है.भ्रष्टाचार और कई मामलों से घिरे गायत्री को अखिलेश ने अपने मंत्रीमंडल से बर्खास्त तो कर दिया लेकिन मुलायम और शिवपाल के राजनीतिक वर्चस्व के आगे  अखिलेश का मुख्यमंत्री पद  बौना और लाचार दिखाई  दिया.इन सब से खिन्न आकर पिछले कुछ समय से पिछले कुछ समय से अखिलेश की कार्यशैली को देखकर यही प्रतीत होता है कि अगर अखिलेश अकेले भी चुनाव में जाने से गुरेज नहीं करने वालें हैं.खैर, अखिलेश की रथयात्रा से शिवपाल की तस्वीर का गायब होना इस बात को साबित करता है कि लाख समाजवादी कुनबे और उसके मुखिया मुलायम सिंह यादव ये रट लगातें रहें कि पार्टी और परिवार एक है लेकिन इसकी सच्चाई जगजाहिर है इस पूरे प्रकरण एक बात तो स्पष्ट है  कि अंतर्कलह से सबसे ज्यादा नुकसान आगामी चुनाव में पार्टी को होने वाला है.शायद इसका अंजादा पार्टी नेताओं को भी हो गया है.इसके बावजूद समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह और अखिलेश खेमे के कार्यकर्ता यह  मुगालता पाले बैठें हैं कि इस कलह के उपरांत उनके अखिलेश की एक मजबूत छवि जनता के बीच बनी हैं.उस मजबूत छवि का आधार क्या है ? इस सवाल का जवाब शायद किसी के पास मौजूं नहीं है खैर, पार्टी के रजत जयंती समारोह और अखिलेश की रथयात्रा की  दोनों ऐसे वक्त में हो रही है जब सपा दो धड़ों में बटी हुई हैं पार्टी के अधिकतर कार्यकर्ता मुख्यमंत्री के साथ खड़े दिखाई दे रहें है.कुछ कार्यकर्ता इस असमंजस की स्थिति में हैं कि ऐसे नाज़ुक दौर में वह मुख्यमंत्री के साथ खड़ें दिखाई दे या शिवपाल को बल दें अथवा सपा मुखिया की बात सुने यह पूरी स्थिति में सपा को आगामी चुनाव में भारी नुकसान होना तय है. इसमें कोई दोराय नहीं है कि यह वर्चस्व की लड़ाई है इस लड़ाई में एक तरफ अखिलेश तो दूसरी तरफ शिवपाल यादव हैं.पार्टी में मुलायम सिंह के बाद संगठन के स्तर पर तथा राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में शिवपाल यादव शुरू से जाने जाते रहें हैं किन्तु अखिलेश के बढ़ते राजनीतिक कद ने जहाँ उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया वहीँ अखिलेश के मंत्रीमंडल से शिवपाल की मंत्रिमंडल से बर्खास्तगी शिवपाल के राजनीतिक वजूद पर ही सवाल खड़े कर दिए.अखिलेश और शिवपाल की बर्चस्व की इस लड़ाई में सपा की राजनीतिक जमीन खोती हुई दिखाई दे रही है.इन सब के बीच शिवपाल यादव ने एक ऐसी चाल चली है जो अखीलेश की रथयात्रा के सफलता को सीधे तौर पर प्रभावित करने वालें हैं.तीन नवम्बर को जहाँ अखिलेश यादव “रथ यात्रा निकालने जा रहें है वहीँ उनके प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखे जा रहे चाचा पञ्च नवम्बर को पार्टी रजत जयंती उत्सव मनाएगी यह कार्यक्रम शिवपाल सिंह की अगुआई में हो रहें है.इससे एक और बात निकलकर सामने आ रही है वह है खुद को शक्तिशाली दिखाने का एक तरफ जहाँ अखिलेश रथ यात्रा के जरिये अपनी शक्ति का आभास करायेंगें वहीँ शिवपाल यादव भी रजत जयंती के बहाने सभी समाजवादी कुनबे को जुटा अपने राजनीतिक शक्ति को दिखाने का प्रयास करेंगें.इस भारी खेमेबाज़ी और वर्चस्ववादी रवैये से एक बात तो तय है कि इसबार सपा की सत्ता तक पहुचने वाली डगर कठिन होने वाली  है. हालिये में आये चुनावी सर्वेक्षण भी इस बात के तस्दीक कर चुकें हैं ऐसे में अगर पार्टी में और बिखराव होता है तो यह समाजवादी पार्टी के लिए ऐसा घाव होगा जिसेसे उभरने में पार्टी को कितना समय लगेगा यह कहना मुश्किल होगा.