Wednesday, 28 September 2016

निष्पक्ष चुनाव कराने की चुनौती


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जैसे –जैसे करीब आता जा रहा है सभी राजनीतिक दलों के साथ चुनाव आयोग भी चुस्त होता जा रहा है.दरअसल,  देश के सबसे बड़े सूबे में चुनाव के दरमियान अनियमितताओं को लेकर भारी मात्रा में शिकायत सुनने को मिलती रहती है. जिसके मद्देनजर चुनाव आयोग ने अभी से कमर कस ली है जिससे आने वाले विधानसभा चुनाव को सही ढंग से कराया जा सके. इसको ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग पूरी तरह से सक्रिय हो गया है. मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपनी पूरी टीम के साथ लखनऊ में पुलिस के आला अधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की. जिसमें चुनाव की तैयारियों का जायजा लिया गया तथा आगे की रणनीति पर चर्चा हुई, चुनाव आयुक्त ने स्पष्ट किया है कि चुनाव से पहले सभी चिन्हित अपराधियों को जेल में डाला जाए इसके उपरांत ही भयमुक्त चुनाव कराए जा सकते हैं. इसके साथ ही मुख्य चुनाव आयुक्त ने पुलिस अधिकारियों को सख्त लहजे में कह दिया है कि चुनाव के दौरान किसी भी प्रकार की लापरवाही क्षम्य नहीं होगी. इस तरह यूपी चुनाव में जैसे राजनीतिक दल अपनी–अपनी तैयारियों में लगे हुए हैं, वैसे ही चुनाव आयोग ने भी अपनी तैयारियों में तेज़ी लाई है. उत्तर प्रदेश चुनाव कब तक होगा इसको लेकर संशय अभी बना हुआ है, लेकिन चुनाव आयोग की चुस्ती यह दर्शाती है कि अब चुनाव में बहुत लंबा वक्त नहीं बचा है. दरअसल यह चुनाव सभी राजनीतिक दलों के लिए जितना कठिन है उससे कहीं ज्यादा चुनाव आयोग को पारदर्शी चुनाव कराने की चुनौती भी है. अगर हम चुनाव आयोग की चुनौतियों की बात करें तो सबसे पहली चुनौती भय मुक्त मतदान कराने की है. जाहिर है कि प्रदेश में कुछ बाहुबली नेता चुनाव के दौरान मतदाताओं को डरा, धमकाकर अपने पक्ष में वोट करा लेते हैं. यह भारत जैसे स्वस्थ लोकतन्त्र पर कुठाराघात से कम नहीं है, मतदाता अपने प्रतिनिधि को चुनने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि वर्तमान परिवेश में यह संभव नहीं हो पा रहा है. जहाँ–तहां से ऐसी खबरें आये दिन पढ़ने को मिल जाती हैं जिसमें मतदाताओं को डराया–धमकाया जाता है, जिसके फलस्वरूप मतदाता अपनी इच्छा के विपरीत जाकर मतदान करने को विवश हो जाता है. यह स्थिति लोकतन्त्र के लिए घातक है. चुनाव आयोग ने इस मामले पर गंभीरता बरतनी शुरू कर दी है, उत्तर प्रदेश में निष्पक्ष चुनाव कराने में दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है थानों पर एक ही जाति विशेष के थानाध्यक्ष का होना. गौरतलब है कि अखिलेश सरकार की तुष्टीकरण की नीति की वजह से प्रदेश के कई अहम पदों पर एक खास जाति के लोगों का वर्चस्व बना हुआ है. पचास प्रतिशत थानों पर यादव जाति के प्रभारियों की तैनाती की गई है, ऐसे में चुनाव के समय पुलिस से निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त को यह शिकायत पहले से ही मिली हुई है इसलिए उन्होंने पुलिस प्रशासन पर पैनी निगाह रखने की बात कही है. ज्ञातव्य हो कि चुनाव के समय निर्वाचन आयोग अपनी नीतियों के अनुसार पुलिस बलों की तैनाती करेगा. जिसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिन थानों में इंस्पेक्टर स्तर की तैनाती होनी चाहिए वहां दरोगा स्तर के प्रभारी को तैनात किया गया है जो अपने पक्षपातपूर्ण से बाज़ नहीं आने वाले है. ऐसे में चुनाव आयोग ने इंस्पेक्टर स्तर के थानों की कमान उसी स्तर के अधिकारी की तैनाती के आदेश दिए हैं. चुनाव आयोग पूरी तरह सख्ती से पेश आ रहा है. कड़े लहजे में दोषी अधिकारियों को फटकार भी लगाई जा रही है. ऐसे में चुनाव से ठीक पहले मुख्य चुनाव आयुक्त का अपनी टीम के साथ यूपी दौरा यह बताने के लिए काफी है कि चुनाव आयोग अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रहा है और निष्पक्ष एवं भयमुक्त मतदान कराने के लिए प्रतिबद्ध है. बहरहाल, उत्तर प्रदेश में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 14.04 करोड़ है. चुनाव आयोग साथ ही युवाओं तथा जिनका नाम मतदाता सूची के बाहर है उसे दुरुस्त करने का काम भी कर रही है. जगह–जगह कैंपेन के जरिये मतदाता पहचान पत्र के कामों में तेज़ी आई है इसका कारण यह भी है चुनाव आयोग को अपना लक्ष्य हासिल करना है. गौरतलब है कि आगामी विधानसभा चुनाव में निर्वाचन आयोग ने 75 फीसद मतदान का लक्ष्य रखा है, यह तभी संभव है जब प्रदेश की जनता को मतदान के लिए जागरूक किया जाये, उन्हें भयमुक्त किया जाये. इसके लिए अभी से निर्वाचन आयोग ने इन सभी चुनौतियों पर चर्चा शुरू कर दी है. यहाँ तक कि मतदाताओं को मतदान के लिए कहीं दूर न जाना पड़े, इसको ध्यान में रखते हुए बूथों की संख्या पिछली बार की अपेक्षा बढ़ाए जाने पर भी बात बनती दिख रही है. खैर, उत्तर प्रदेश का चुनाव निर्वाचन आयोग के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की चुनौती तो है ही, साथ ही साथ मतदान फीसद बढ़ाने की भी चुनौती है.
 

Tuesday, 27 September 2016

कैराना का स्याह सच आया सामने


लगभग साढ़े तीन महीने पहले उत्तर प्रदेश के कैराना में हिन्दू समुदाय की पलायन की खबरें सामने आई थीं. यह पलायन चर्चा के केंद्र बिंदु में लंबे समय तक रहा किसी ने इस पलायन को सही बताया तो किसी ने इसे खारिज कर दिया, यहाँ तक की मीडिया के एक हिस्से ने भी पलायन की खबरों को नकार दिया था.जाहिर है कि उनदिनों कैराना में सब कुछ ठीक नहीं था,वहां के हिन्दूओं का जीना दूभर हो गया था, एक धर्म विशेष की उग्रता के कारण हिंदू परिवार पलायन कर रहे थे,प्रशासन मौन खड़े तमाशाबीन बनी हुई थी.स्थिति कितनी दयनीय थी इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि लोग अपने घरों को बेच वहां से निकलना चाहते थे.सवाल यह उठता है कि इन सच पर पर्दा डालने की कोशिश क्यों हुई ? उस समय जो सुबूत  हमारे सामने आये उससे ही स्पष्ट हो गया था कि पलायन की घटना कैराना का काला सच है जिसे स्वीकार करना ही होगा. गौरतलब है कि हिन्दूओं में दहशत का माहौल था, लोग किसी भी तरह कैराना को छोड़ना चाहते थे ,एक समुदाय विशेष द्वारा बनाएं गय भय से मुक्ति चाहते थे इसके लिए उनके पास पलायन के अलावा कोइ चारा नही था,मकानों को बेचने के पोस्टर अपनी जन्मभूमि से बिछड़ने की पीड़ा लोगो सता रही थी उसवक्त भी लोगों ने अपनी पीड़ा कैराना में मौजूद गुंडाराज पर प्रशासन की चुप्पी पर जम कर वार किया था लेकिन सियासत के नुमाइंदों ने उनकी हक की लड़ाई हो राजनीति के कसौटी पर उतार दिया था.चूंकी उत्तर प्रदेश में हालही में चुनाव है इसके मद्देनजर कांग्रेस,सपा आदि तथाकथित सेकुलर राजनीतिक पार्टियों  ने भी अपने –अपने लोंगो को कैराना भेजकर अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए सच्चाई को कहना वाजिब नहीं समझा था. हालांकि बीजेपी इस बात को शुरू से कहती आ रही है कि कैराना का पलायन एक कठोर सत्य है जिसे सबको स्वीकार करना पड़ेगा. लेकिन सपा ,कांग्रेस आदि कथित सेकुलर दलों को यह रास नहीं आया इन दलों को केवल  अपने  वोटबैंक की चिंता सता रही थी. ऐसे में उन्होंने इस सच्चाई को स्वीकार करने की जहमत नहीं उठाई. इस तरह राजनीति से लेकर मीडिया तक सेकुलर कबीले के सभी लोगों ने इस खबर को झूठा बताया था. दरअसल यह मामला बीजेपी सांसद हुकुम सिंह ने उठाया था जाहिर है कि वोटबैंक की राजनीति करने वाले राजनेता, सेकुलरिज्म का दंभ भरने वाले बुद्दिजीवियों को यह नागवार गुजरा था. उन्होंने इस सच पर पर्दा डालने के हर संभव प्रयास किये लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी जाँच में कैराना का काला सच सामने रख दिया है. रिपोर्ट में हिन्दू परिवारों के पलायन को सही पाया गया है पलायन की मुख्य वजह भी एक समुदाय विशेष की गुंडागर्दी और भय को बताया गया है. जाहिर है कि इस सच को नकारने का खूब कुत्सित प्रयास किया गया जिसमें यूपी की तथाकथित सेकुलर सरकार ने भी यह दावा किया कि पलायन की वजह मुस्लिम नहीं हैं और न वहां भय का माहौल है. लेकिन अब पलायन का स्याह सच सामने आ चुका है. मानवाधिकार आयोग  ने स्पष्ट किया है कि हिन्दूओं के पलायन की मुख्य वजह वहां पर व्याप्त गुंडाराज ही है. कैराना का मुद्दा जब प्रकाश में आया तभी से तथाकथित बुद्धिजीवियों ने यह राग अलापना शुरू कर दिया था कि यह प्रदेश में चुनाव के मद्देनजर बीजेपी वोटों का धुर्विकरण करने की कोशिश कर रही है. इस आड़ में कथित सेकुलर ब्रिगेड ने इस मामले को अफवाह बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. लेकिन आज यथार्त सबके सामने है, सवाल यह उठता है कि सेकुलरिज्म के झंडाबरदार इस सच को क्यों नही स्वीकार कर रहे थे ? सवाल की तह में जाएँ तो सेकुलर कबीले के लोग हमेशा से प्रो-इस्लाम रहे हैं. उनकी धर्मनिरपेक्षता का वास्ता केवल और केवल हिन्दू विरोध तक सीमित हो कर रह गया है, अखलाख के मामले में छाती कूटने वाले सेकुलरों ने मालदा की हिंसा पर चूं तक नहीं किया. ध्यान दें तो उस समय भी कटघरे में मुस्लिम समाज की उग्रता थी और कैराना में भी, क्या यह सेकुलरिज्म का ढोंग नहीं है ? ऐसे अनेकों मामलें  सामने आते हैं जब इनकी धर्मनिरपेक्षता का दोहरा चरित्र देखने को मिलता है. झूठ फरेब, अफवाहों पर टीका सेकुलरिज्म अपनी बुनियाद में कितना  ढोंग और दोमुँहापन भरा हुआ है,यह  सबके सामने आ गया है.ऐसा नहीं है कि उनकी इस तरह से भद्द पहली मर्तबा पिटी हो,याद करें तो इससे पहले जेएनयू में हुए देश विरोधी नारों के वीडियो को छेड़छाड़ की अफवाह इस गैंग ने उड़ाई लेकिन लैब रिपोर्ट ने इनको करारा तमाचा जड़ा, अख़लाक़ के घर बीफ नहीं था यह भ्रम इसी छद्म सेकुलरवादीयों के फैलाया लेकिन वहां जांच हुई तो सामने आया कि  अखलाख के घर बीफ ही था तब भी इनकी बोलती बंद हो गई थी.अब कैराना की रिपोर्ट भी इनकी गाल पर करार तमाचा जड़ा है.पलायन  की घटना को सिरे से खारिज करने वाले सेकुलर लोग रिपोर्ट के आने के बाद बगले झाँकने लगें है.

Thursday, 8 September 2016

पुलिस महकमे में सुधार की आस

 

   देश में समयसमय पर पुलिस की कार्य प्रणाली में सुधार की मांग उठती रही है. जाहिर है कि पुलिस महकमे में आज भी तमाम प्रकार की खामियां मौजूद हैं, पुलिस के ऊपर भ्रष्टाचार , दुरव्यवहार, एफआईआर न लिखने सहित कई आरोप आये दिन लगते रहते हैं. यही नहीं आरोप यह भी लगते रहे हैं कि पुलिस एफआईआर में छेड़छाड़ कर मुकदमे को कमजोर करने की कोशिश भी कई दफा करती है. ऐसे गंभीर मसले पर शीर्ष अदालत ने संज्ञान लेते हुए एक अहम आदेश जारी किया है. यूथ लॉयर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि देशभर के थानों में दर्ज एफआईआर को 24 घंटे के भीतर राज्य सरकार या पुलिस की वेबसाइट पर अपलोड किया जाये. न्यायाधीश दीपक मिश्रा और सी नगाप्प्न की बेंच ने याचिका की सुनवाई करते हुए यह आदेश देश के सभी राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों के लिए दिए हैं. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि जिन स्थानों पर नेट्वर्किंग की सुविधा नहीं है या जिन दुर्गम इलाकों में इंटरनेट स्लो है वहां समयावधि 24 की बजाय 72 घंटे के अंदर प्राथमिकी को वेबसाइट पर अपलोड करना जरूरी होगा. वहीँ कोर्ट ने संवेदनशील मामले मसलन महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन उत्पीड़न, छापेमारी, आतंकवाद, विद्रोह आदि मामलों में वेबसाइट पर एफआईआर अपलोड करने में छुट प्रदान की है. बशर्ते संवेदनशील मसले की श्रेणी जिला क्लेक्टर या डीएसपी मामले को समझने के उपरांत करेगा. सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश पुलिस सुधार की दृष्टि से काफी अहम माना जा रहा है, कोर्ट ने बुधवार को इस मामले पर फैसला सुनाया है. मुख्य अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर किसी कारणवश एफआईआर वेबसाइट पर अपलोड नहीं हुई है फिर भी आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं दी जाएगी. बहरहाल यह फैसला आम जनता के लिए राहत देने वाला फैसला है. जाहिर है कि एफआईआर की कॉपी आम जनता को थाने से प्राप्त करना आसान काम नहीं होता है. पुलिस प्रशासन इसकी कॉपी देने में आनाकानी करती है, जिसके कारण दोनों पक्षों को विधि परामर्श लेने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. कभी–कभी तो ऐसे मामले भी प्रकाश में आये हैं जहाँ एफआईआर के दौरान मामला कुछ अलग रहता था किन्तु कोर्ट में केस को कमजोर करने के लिए तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कर दिया जाता था. लेकिन इस आदेश के बाद से आम नागरिक इन परेशानियों से मुक्ति पा सकेगा. एफआईआर की इस प्रक्रिया में शुरू से ही पारदर्शिता का आभाव रहा है किन्तु अब कॉपी ऑनलाइन उपलब्ध रहेगी जिससे इस प्रक्रिया में पारदर्शिता  देखने को मिलेगी. कोर्ट के आदेश उपरांत एफआईआर पुलिस वेब पर उपलब्ध होने की वजह से आम जनता को इसकी कॉपी को हासिल करने की प्रक्रिया सुगम हो जाएगी और वेबसाइट पर आसानी से इसकी प्रति उपलब्ध रहेगी. गौरतलब है कि इससे पहले भी दिल्ली हाईकोर्ट ने 2010 में तथा इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले साल ही एफआईआर की कॉपी वेबसाइट पर डालने के निर्देश जारी कर चुके हैं. किन्तु अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे समूचे देश में लागू करने का आदेश किया है.गौर करें तो पुलिस कार्यप्रणाली में व्यापक सुधार की जरूरत है,जाहिर है कि कई बार पुलिस सुधार के लिए हमारे नीति –नियंताओं ने कमेटीयों का गठन किया किन्तु उसकी सिफारिशों को कूड़ेदान में फेक दिया. देश की आम जनता आज भी पुलिस महकमे से भयभीत रहती है. ग्रामीण क्षेत्रों का आलम यह है कि लोग अपने हक के लिए भी थाने जाने से कतराते हैं. हमें इस समस्या की जड़ को समझना होगा कि आखिर क्यों आम जनता पुलिस से मित्रवत संबधं नहीं रखती है? प्राथमिकी दर्ज कराने में एक साधारण व्यक्ति को कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं यह बात जगजाहिर है. सुप्रीम कोर्ट के इस सार्थक पहल के बाद पुलिस सुधार में एक आशा की किरण नजर आती है. ध्यान दें तो वर्तमान समय में पुलिस तंत्र में भ्रष्टाचार आम बात हो गई है एक प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए पीड़ित व्यक्ति को थाने के दस चक्कर लगाने पड़ते हैं. उसके उपरांत भी उसे तमाम प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. लेकिन बदलते समय के साथ तकनीकी ने आम जनता को जो शक्ति दी है उसी की नतीजा है कि आज व्यक्ति किसी भी काम को आसानी से घर बैठे कर सकता है. जाहिर है कि किसी भी मामले की बुनियाद एफआईआर ही होती है. अगर उसमें पिछले कुछ समय से भारी अनियमितता देखने को मिल रही है तो इसके सुधार के लिए सबसे पहले एफआईआर को तकनीकी से जोड़ते हुए ऑनलाइन किया गया. मगर यह भी स्याह सच है कि ऑनलाइन एफआईआर को कुछेक स्थानों पर ही शुरू किया जा सका हैं अधिकतर जगहों पर तो ऑनलाइन शिकायत मंजूर कर दी जा रही है किन्तु इसे एफआईआर के दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार नही किया जा रहा है. ऐसे में सवाल यह भी खड़ा होता है कि एफआईआर प्रक्रिया को पूर्णतया तकनीकी से क्यों नही जोड़ा जा रहा है ? सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को 13 सप्ताह के अंदर सभी राज्यों को  अमल करने के निर्देश दिए हैं लेकिन अब यह देखते वाली बात होगी कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को राज्य सरकार व पुलिस प्रशासन कितनी गंभीरता से लेती  हैं.