Wednesday, 24 August 2016

अधिकारों की इस लड़ाई में आम जनता कहां?

 

लोकतांत्रिक प्रणाली को सहज रूप से चलाने के लिए जरूरी है कि लोकतंत्र के सभी स्तंभ एक दुसरे से समंजस्य बना कर चलें. सभी स्तंभों के बेहतर तालमेल से ही एक स्वस्थ लोकतंत्र का वातावरण बना रहता है. किन्तु भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में पिछले कुछ महीनों से देश के चारों स्तंभ की स्थिति किसी से छुपी नहीं है.इनदिनों जजों की नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार और न्यायपालिका में जो गतिरोध खुलकर सामने आ रहा है वो लोकतन्त्र के लिए किसी भी सूरतेहाल में सही नहीं है. सीधे तौर पर हम कहें तो न्यायपालिका और सरकार में अधिकारों की लड़ाई अब खुलकर लड़ी जा रही है. दरअसल जजों की नियुक्ति के लिए सरकार ने राष्ट्रीय न्यायायिक नियुक्ति आयोग विधेयक को संसद के दोनों सदनों में पास कराया था. जिसमें सरकार ने दावा किया था कि एनजेएसी प्रकिया लागू होने के पश्चात जजों की न्युक्ति कॉलेजियम की अपेक्षा पारदर्शिता आएगी.लेकिन इस विधेयक को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इस आयोग के आने से न्यायपालिका में सरकार का दखल बढ़ जायेगा. वहीँ, जजों की नियुक्ति जिस कॉलेजियम प्रणाली के तहत हो रही थी उसे ही जारी रखा गया. गौर करें तो अपने फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को स्वीकारा था कि कॉलेजियम में जो कमियां हैं उसे जल्द ही दूर किया जायेगा. अब सवाल ये उठता है कि न्यायपालिका ने कॉलेजियम को लेकर सुधार की दिशा में क्या कदम उठाये हैं? जाहिर है कि कॉलेजियम व्यवस्था में भारी खामियां सामने आई हैं. मसलन इस प्रणाली में पारदर्शिता का आभाव देखने को मिलता रहा है. बंद कमरों में जजों की न्युक्ति की जाती रही है, व्यक्तिगत और प्रोफेशनल प्रोफाइल जांचने की कोई नियामक आज तक तय नहीं हो पायी है. जिसके चलते इसके पारदर्शिता को लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं. कुछ लोगों ने तो कॉलेजियम प्रणाली पर आपत्ति जताते हुए भाई–भतीजावाद एवं अपने चहेतों की नियुक्ति करने का आरोप भी लगाया. जो हमें आएं दिन खबरों के माध्यम से देखने को मिलता है. बहरहाल, देश के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रधानमंत्री के संबोधन में न्यायपालिका का जिक्र नहीं होने पर निराशा जाहिर की. इससे पहले भी मुख्य न्यायाधीश अदालतों पर मुकदमों की बढ़ती संख्या को लेकर कई बार अपनी चिंता जता चुके हैं.जाहिर है कि इस टकराव के बाद से सुप्रीम कोर्ट ने जजों की न्युक्ति के लिए जो मसौदा सरकार के पास भेजा है सरकार ने इस मसौदे पर कोई सक्रियता नहीं दिखाई है.उन्होंने सरकार से अपील की, कि सरकार जल्द से जल्द न्यायाधीशों की नियुक्ति को हरी झंडी दे, ताकि लंबित मुकदमों का निपटारा जल्द से जल्द हो सके. गौरतलब है कि भारतीय न्याय तंत्र मुकदमों के बढ़ते ढेर तले कराह रही है. किन्तु न तो सरकार इसकी सूद ले रही है और न ही न्यायपालिका उन समस्त खामियों पर नजर रख पा रही है. इन सब के बीच इसकी मार आम आदमी झेल रहा है.न्याय प्रकिया में आम जनता उलझ कर रह जाती है.एक मुकदमें के निपटाने में पीढियां खप जा रही फिर न्यायपालिका से लोगों को विश्वास भी कम होनें लगा है जिसके कारणों की एक लम्बी फेहरिस्त है.आज जनता के हितों को ध्यान रखते हुए यह जरूरी है कि दोनों स्तंभों को इस गतिरोध को समाप्त करना होगा इस दिशा में साथ मिलकर काम करना होगा.सरकार को न्यायपालिका के साथ परस्पर सम्मान का भाव रखना होगा तो वहीँ न्यायपालिका को भी सरकार से समन्वय बनानें की जरूरत है.निश्चित तौर पर इस गतिरोध जिनके मुकदमें लंबित हैं उनके लिए दिन –ब –दिन उसके निपटारे की अवधि बढती जा रही है न्यायपालिका और कार्यपालिका को यह भूलना नहीं चाहिए कि इन दोनों के टकराव के चलतें आम जनता पीस रही है. न्यायिक सुधार की आस सभी लगाएं बैठे है इस दिशा में बड़े सुधार की दरकार है.केवल जजों की न्युक्ति भर से लंबित मामलें अपने समयावधि में निपट जायेंगें हमें इस गफलत से बाहर आना होगा क्योंकि न्यायालय की जटिल प्रक्रियाओं से हम सब अवगत हैं. इसीलिए जरुरी हो जाता है कि महज जजों की न्युक्ति ही नहीं वरन हमें न्यायपालिका की उन खामियों की जड़ो की तरफ ध्यान आकृष्ट करना होगा जहाँ से मुकदमें शुरू होतें हैं जाहिर है कि मुकदमें की शुरुआत जिला न्यायालय से होती है वहां की स्थिति और दयनीय हैं आयें दिन हमें भ्रष्टाचार सहित कई मामलें सामने आतें हैं.दीवानी व फौजदारी के मुकदमों में तो फर्जी दस्तेवेजों तक की बात सामने आती है.भारतीय न्याय व्यवस्था की रफ्तार कितनी धीमी है.ये बात किसी से छिपी नहीं है,आये दिन हम देखतें है कि मुकदमों के फैसले आने में साल ही नहीं अपितु दशक लग जाते हैं.ये हमारी न्याय व्यवस्था का स्याह सच है,जिससे मुंह नही मोड़ा जा सकता.देश के सभी अदालतों में बढ़ते मुकदमों और घटते जजों की संख्या न्याय की अवधारणा पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाती है.गौरतलब है कि 1987 में लॉ कमीशन ने प्रति 10 लाख की आबादी पर जजों की संख्या 50 करनें की अनुशंसा की थी लेकिन आज 29 साल बाद भी हमारे हुक्मरानों ने लॉ कमीशन की सिफारिशों को लागू करने की जहमत नही उठाई.ये हक़ीकत है कि पिछले दो दशकों से अदालतों के बढ़ते कामों पर किसी ने गौर नही किया.जजों के कामों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई.केसों की संख्यां रोज़ बढ़ते चले गए लेकिन जजों की संख्या में कोई इजाफा नही हुआ.इस 29 साल के दरमियान कई मुख्य न्यायाधीश बदले,हुकूमतें बदली परंतु किसी का ध्यान इस गंभीर समस्या की तरफ नही गया लिहाजा आज 10 लाख की आबादी पर  जजों की संख्या महज 15 रह गई है.जिससे स्थिति और भयावह होती चली जा रही है.गौरतलब है कि देश लगभग 39 लाख केस उच्च न्यायालयों में लंबित हैं तो देश के अन्य न्यायालयों में साढ़े तीन करोड़ से अधिक मुकदमों की फाइलों पर धुल जम रहें है.देश के कोर्ट कचहरियों में फाइलों की संख्या बढ़ती जा रही है,लंबित मुकदमों की संख्या में हर रोज  इजाफ़ा हो रहा है.न्याय की अवधारणा है कि जनता को न्याय सुलभ और त्वरित मिलें.परन्तुं आज की स्थिति इसके ठीक विपरीत है.आमजन को इंसाफ पाने में एड़ियाँ घिस जा रही,पीढियां खप जा रही है.त्वरित न्याय अब स्वप्न समान हो गया है.लोग कानूनों के मकड़जाल में उलझ कर रह जा रहें हैं.आम जनमानस को इस मकड़जाल से मुक्ति मिले.जनता के हितों की पूर्ति के लिए न्यायपालिका और सरकार दोनों को साथ काम करना होगा इस टकराव को समाप्त करने के लिए बीच का कोई रास्ता निकलना होगा.

Thursday, 18 August 2016

कश्मीर की उलझन

 

कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान में वाक् युद्ध चलता रहा है लेकिन अब मामला गंभीर हो गया है.भारत सरकार ने भी कश्मीर को साधने की नई नीति की घोषणा की जिससे पाक बौखला उठा है.यूँ तो पाकिस्तान अपनी आदतों से बाज़ नहीं आता. जब भी उसे किसी वैश्विक मंच पर कुछ बोलने का अवसर मिलता है तो वह कश्मीर का राग अलापकर मानवाधिकारों की दुहाई देते हुए भारत को बेज़ा कटघरे में खड़ा करने का कुत्सित प्रयास करता है. परंतु अब स्थितयां बदल रहीं हैं,कश्मीर पर भारत सरकार ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए गुलाम कश्मीर में पाक सेना द्वारा किये जा रहे जुर्म पर कड़ा रुख अख्तियार किया है. साथ ही गुलाम कश्मीर की सच्चाई सबके सामने लाने की बात कही है. गौरतलब है कि पहले संसद में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि कश्मीर पर बात होगी लेकिन गुलाम कश्मीर पर, इसके बाद सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर को लेकर ऐतिहासिक बात कही है. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पाक अधिकृत कश्मीर भी भारत का अभिन्न हिस्सा है. जब हम जम्मू–कश्मीर की बात करते हैं तो राज्य के चारों भागों जम्मू ,कश्मीर ,लद्दाख और गुलाम कश्मीर की बात करते हैं. प्रधानमंत्री के इस बयान के गहरे निहितार्थ हैं. एक समय तक हम बलूचिस्तान ,मुज्जफराबाद समेत गुलाम कश्मीर के कई हिस्सों में पाक सेना के द्वारा वहां के स्थानीय नागरिकों के दमन उत्पीडन को मानवाधिकार हनन तक सीमित कर मौन हो जाते थे. जिससे वैश्विक मंच पर संकेत यह जाता था कि स्थिति भारतीय कश्मीर की ही खराब है गुलाम कश्मीर की नहीं, किंतु अब सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि गुलाम कश्मीर की सच्चाई समूचे विश्व के सामने लायी जानी चाहिए. कश्मीर को लेकर पाकिस्तान घड़ियाली आंसू बहाता रहा है लेकिन अब वो पूरी तरह से बेनकाब हो चुका है. आतंकवाद और कश्मीर दोनों पर पाकिस्तान की कथनी और करनी का अंतर हम समझ चुके हैं. प्रधानमंत्री मोदी के बयान के बाद बौखलाए पाकिस्तान ने सीमा पर गोलीबारी की तो इधर पाक उच्चायुक्त के बोल भी बिगड़ गये. इन सब के बीच इयू और मानवाधिकार आयोग में बलूचिस्तान के प्रतिनिधि ने इलाके में मानवाधिकार का मसला उठाते हुआ कहा है कि जबसे नवाज शरीफ की सरकार आई है बलूच के लोगों पर पाक सेना ने लगातार जुल्म किये हैं, इसके अलावा अपहरण और अन्य ज्यादतियों का जिक्र किया है. दरअसल बलूचिस्तान 1948 से पाक के कब्जे में है और तभी से ही वहां आज़ादी की मांग समय –समय उठती रही है इस विद्रोह को दबाने के लिए पाकिस्तान सैन्य अभियान भी चलाता रहा हैं. बहरहाल इनदिनों पाक अधिकृत कश्मीर से  खबरें आ रही है कि वहां के लोग पाकिस्तान सरकार के नीतियों से खुश नहीं है.वहां की आम जनता पाकिस्तान सरकार और सेना के विरोध में सड़क पर उतर आई है.दरअसल एक और आबादी पाकिस्तान से मुक्ति चाहती है,जो उसके दमन और उत्पीड़न से तंग आ गई है.यहाँ तक कि लोग न केवल सरकार के विरुद्ध में नारें लगा रहें बल्कि गुलाम कश्मीर में लोग चीख –चीख कर भारत में शामिल होने की मांग कर रहें है.मोदी के बयान के बाद से पाक परस्त कश्मीर के लोगों में एक नई आस जगी है. गौरतलब है कि मोदी के बयान के अगले ही दिन गुलाम कश्मीर के लोगों ने पाक सरकार के विरुद्ध पुन: आवाज उठाई और राजनीतिक अधिकारों की मांग करते हुए पाकिस्तान के विरोध में जमकर नारेबाजी की. विरोध कर रहे लोगों ने सेना को गिलगित से बाहर करने की मांग की है. पाकिस्तानी सेना किस प्रकार से जुल्म कर रही है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि महज एक विरोध के चलते पांच सौ से अधिक लोगों को पाक सेना ने अपनी गिरफ्त में लिया ये लोग पाक गुलामी से आज़ादी चाहते हैं. लेकिन वहां की सेना ने उनका जीना मुहाल कर रखा है गुलाम कश्मीर में पाक सेना द्वारा जो क्रूरता की जा रही है उसपर चुप्पी साध लेता है. बहरहाल, सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान भारत अधिकृत कश्मीर की मांग करता है, लेकिन जिसपर उसने नाजायज अधिकार जमा रखा है वहां ऐसी बर्बरता क्यों ?सवाल की तह में जाएं तो कई बातें सामने आती हैं, पहली बात पाकिस्तान इन लोगों के साथ हमेशा गुलामों की तरह बर्ताव करता रहा है तथा राजनीतिक वस्तु की तरह इनका इस्तेमाल करता आया है. नतीजन वहां रत्ती भर विकास नहीं हुआ है, अब लोग इससे त्रस्त आ चुके हैं. पिछले बार की तरह ही इस साल भी चुनावों में लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाते हुए पाकिस्तान सरकार ने यहाँ असंवैधानिक रूप से मतदान करवाए. वहीँ हमारे कश्मीर में लोकतंत्र है, लोगों को अपने पसंद के प्रत्याशी को वोट देने की पूरी स्वंत्रता है. लोगों को धार्मिक, समाजिक हर प्रकार की स्वत्रंता हमारे संविधान ने दे रखी है, हमारे यहाँ सिस्टम है, नियम है, सरकार की नीतियाँ हैं जो भारतीय कश्मीर के विकास के लिए समर्पित है. आज हमारे कश्मीर में सरकार निवेश करती है, अच्छे –अच्छे संस्थान है, शिक्षा, पर्यटन आदि के क्षेत्रों में हमारा कश्मीर विकास की ओर अग्रसर है. जो पाक कश्मीर के लोगों को लुभा रही है. वहीँ दूसरी तरफ पीओके की हालत दयनीय है. इस्लामाबाद में रहने वाले अधिकारी इन्हें उपेक्षित नजरों से देखते हैं, सरकार इनकी हर मांग को दरकिनार कर देती है. बहरहाल, दूसरी बात पर गौर करें तो पाक अधिकृत कश्मीर में भारी तादाद में शिया मुसलमान रहते हैं, जो बाकी पाकिस्तान में शिया मस्जिदों पर लगातार हो रहे हमलों से डरे हुए हैं, खेती–बाड़ी, पर्यटन,औधोगिक विकास आदि के मसलों पर पाक अधिकृत कश्मीर शुरू से ही पिछड़ा रहा है. आज़ादी के बाद से ही पीओके पाकिस्तान का सबसे गरीब और उपेक्षित हिस्सा रहा है, सरकारें बदली, सत्ताधीश बदले, लेकिन किसी ने भी इनकी समस्याओं को दूर करना, इस क्षेत्र का विकास करना वाजिब नहीं समझा. वहीँ हमारे कश्मीर के विकास में सभी सरकारों ने महती भूमिका निभाई है. हमारी सरकार ने श्रीनगर से रेलवे की सुविधा वहां के नागरिकों के लिए शुरु कर दी है ,तो वहीँ पाक अधिकृत कश्मीर में लोग सड़कों के लिए तरस रहें हैं. इन्हीं सब कारणों से तंग आकर आज ये स्थिति पैदा हो गई है कि ये लोग आज़ादी की मांग कर रहें हैं. इन लोगों से पाकिस्तान सरकार और सेना बेरहमी से पेश आ रही है, फिर भी ये आज़ादी का नाराबुलंद किये हुए हैं. भारत को चाहिए कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की जो खबरें हैं तथा वहां के आवाम की जो आवाज़ है. उसे एक रणनीति के तहत दुनिया के सामने रखे ताकि पाकिस्तान जो हमेशा कश्मीर पर जनमत संग्रह की बात करता है, उसका ये दोहरा चरित्र दुनिया के सामने आ सके. इसके साथ ही ये आंदोलन उनके गालों पर भी करारा तमाचा है जो आए दिन भारत में पाकिस्तान के झंडे लहराते हैं. पाक अधिकृत कश्मीर की हालत पाकिस्तानी हुकूमत के नियंत्रण से बाहर है. अत: इससे यही प्रतीत होता है कि इसको स्वतंत्र किये जाने की मांग जो भारत करता रहा है, वह निश्चित रूप से जायज है. इस पर विश्व समुदाय एवं संयुक्त राष्ट्र को भी गंभीरता से विचार करना होगा. भारत सरकार को भी चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र का ध्यान पाक अधिकृत कश्मीर की तरफ आकृष्ट करे. जिससे नवाज शरीफ का कश्मीर के प्रति जो ढोंग है, उसे दुनिया देख सके.




Thursday, 11 August 2016

देश की उर्जा आपूर्ति में होगा इजाफा

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुडनकुलम परमाणु उर्जा संयंत्र की पहली यूनिट देश को समर्पित किया.गौरतलब है कि यह देश का सबसे बड़ा उर्जा संयंत्र है.1000 मेगावाट की क्षमता वाले इस परमाणु बिजली संयंत्र को दुनिया की सबसे सुरक्षित परमाणु संयंत्रो में से एक बताया गया है कुडनकुलम की पहली यूनिट भारतीय परमाणु उर्जा निगम और रूस के रोसाटॉम ने संयुक्त रूप से बनाया है.यूनिट एक और दो के निर्माण में 20,962 करोड़ रूपये का खर्च आया है.जिसका 85% का आर्थिक सहयोग रूस ने दिया है.इस परमाणु संयंत्र में  संवर्धित युरेनियम आधारित आधारित रुसी वीवीइआर टाइप के रियेक्टरों का इस्तेमाल किया गया है.इसकी दूसरी यूनिट इसी साल के अंत का शुरू होने की उम्मीद है. कुडनकुलम परियोजना का शुरू होना उर्जा के क्षेत्र में भारत के लिए ऐतिहासिक क्षण था.इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये एक साथ इस परियोजना को राष्ट्र के लिए लाभकारी बताया. गौरतलब है कि इस परियोजना के साथ एक लंबा इतिहास जुड़ा है अगर हम कुडनकुलम परियोजना के घटनाक्रमों पर सरसरी तौर पर निगाह डालें तो पायेंगे कि अगर हमारे हुक्मरानों में इच्छाशक्ति दिखाती है तो कोई भी परियोजना अधर में नहीं जा सकती.इस परियोजना की कल्पना पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने किया था भारत और सवियत रूस के बीच 1988 में हुए समझौते के तहत दोनों देशों ने परमाणु संयंत्र बनाने के लिए हाथ मिलाया था.इस समझौते के तहत एक हजार मेगावाट की क्षमता वाले दो परमाणु संयंत्रों का निर्माण होना था.किंतु सेवियत रूस के विघटन के बाद इस परियोजना में तकरीबन एक दशक से अधिक समय तक खतरे के बादल मंडराते रहें.खैर, लंबे इंतजार के बाद 1999 में इस परियोजना की शुरुआत की गई. जाहिर है कि लगातार हो रहे स्थानीय विरोध के बावजूद सरकार ने इस परियोजना को लेकर लगातार जनता से संवाद कायम रखा और जनता को ये भरोसा दिलाया कि इस परियोजना से तमिलनाडु ही नहीं अपितु देश को उर्जा के क्षेत्र में नया आयाम मिलेगा. स्थानीय नागरिकों को डर था कि इस परमाणु संयंत्र के शुरू होने के कई खतरें उत्पन्न होंगें .मसलन रुसी तकनीकी सुरक्षित नहीं है यह एक जिंदा बम की तरह है,इससे निकलने वाली गैस उनके स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध होगी.डर यह भी था कि उस क्षेत्र की मछलियाँ मर जाएंगी जिसके चलते उन्हें रोजगार में समस्या आएगी. खैर,प्रेसराइज्ड वाटर रिएक्टर’ (पीडब्यूआर) वीवीईआर-1000 ने जुलाई, 2014 में बिजली की आपूर्ति की स्थिति प्राप्त कर ली थी और वाणिज्यि परिचालन उसी साल 31 दिसंबर से आरंभ हो गया था.वाणिज्यिक परिचालन की तिथि के बाद से यूनिट-1 का संचयी उत्पादन 6,4980 लाख यूनिट है तथा इस साल जून में इसकी क्षमता 100 फीसदी तक पहुंच गई. बरहाल, यह परियोजना भारत और रूस के संबंधो की प्रगाढ़ता को दर्शता है.रूस के लगातार आर्थिक, तकनीकी वैज्ञानिकों के सहयोग से ही तमाम प्रकार की बाधाओं के बावजूद हमने केवल इस परियोजना को शुरू किया बल्कि इसके और भी यूनिटों को जल्द शुरू करने की दिशा में लगे हुए हैं, भारत के लिए उर्जा के क्षेत्र में  में कुडनकुलम परियोजना में बड़ी उपलब्धी है.,इस मौके पर प्रधानमंत्री ने  भारत में स्वच्छ उर्जा का उत्पादन बढ़ाने के प्रयास में एक हजार मेगावाट के इस यूनिट को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इसी क्षमता वाले पांच और यूनिटे लगाए जाने की  योजना है.वहीँ मोदी ने रूस  के सहयोग का उल्लेख करते हुए कहा कि कुडनकुलम परिमाणु संयंत्र -1 देश को समर्पित करना भारत और रूस संबंधो में एक और एहितासिक कदम है वहीँ रूस के राष्ट्रपति ने भी परमाणु उर्जा साझदारी को भारत के रणनीतिक साझदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया.जाहिर है कि रूस परमाणु प्रोधोगिकी के मामले में विश्व के अगुवा देशों में से एक है.ऐसे में रूस का परमाणु उर्जा के क्षेत्र में केवल तकनीकी के मामले में बल्कि आर्थिक रूप से भी सहयोग देना भारत और रूस के संबंधो की ऊचाई को बतलाता है.इस मौके पर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने अपने संबोधन में बताया कि राज्य सरकार इस परियोजना को लेकर सजग रही है और स्थानीय लोगों के भरोसे को जीता है.अपने दस साल के कार्यकाल में हमेशा इस परियोजना के लिए अपना समर्थन दिया है. कुडनकुलम परियोजना के शुरू होना भारत के लिए एक सुखद स्थिति यह भी है कि भारत उर्जा की कमी से जूझता रहा है.जल और कोयला की कमी के कारण भारत में उर्जा का उत्पादन उस पैमाने पर नहीं हो पाता था, फलस्वरूप देश में बिजली की कमी होती थी किंतु यह परियोजना उर्जा के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी है.निश्चित तौर पर इस उर्जा संयंत्र के शुरूहोने  के बाद देश की उर्जा आपूर्ति में भारी इजाफा होगा.