Sunday, 24 July 2016

बैकफुट पर बसपा

यह भारतीय राजनीति का गिरता स्तर ही है कि गाली के प्रतिकार में गाली दी जा रही है. दरअसल,पिछले सप्ताह बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह ने बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती पर अभद्र टिप्पणी की थी. इस टिप्पणी ने सूबे की सियासत में भूचाल ला दिया.जाहिर है कि दयाशंकर सिंह ने मायावती के लिए बेहद आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल किया था जो किसी भी महिला के लिए अपमानजनक था. हालांकि जब दयाशंकर सिंह को अपनी गलती का एहसास हुआ, तो उन्होंने बिना देर किये अपने बयान पर दुःख जाहिर करते हुए माफी मांग ली. गौरतलब है कि दयाशंकर सिंह के बयान की चहुँओर निंदा हुई. जैसे ही ये मामला बीजेपी  आलाकमान के पास पहुंचा पार्टी ने त्वरित कार्यवाही करते हुए दयाशंकर सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया तथा खुद बीजेपी ने भी इस बयान की निंदा की. लेकिन बसपा के बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ने के बाद सियासत के भवंर में बसपा की डूबती नैया को दयाशंकर की गाली से संजीवन मिली जिसे भूनाने के लिए बसपा ने तनिक भी देर नहीं लगाई इस बयान के प्रतिकार में बसपा के कार्यकर्ता अगले दिन लखनऊ में विरोध प्रदर्शन किये किंतु बसपा के इस प्रदर्शन में जो नारे लग रहे थे उसमें मर्यादाओं को तार –तार किया जा रहा था,दयाशंकर सिंह के परिवार की  महिलाओं, बेटियों को पेश करने की मांग हो रही थी बात यहीं समाप्त नहीं होती बसपा की एक महिला नेता ने तो दयाशंकर सिंह के जबान लाने पर ईनाम की घोषणा कर दी वहीँ एक दुसरे नेता ने उन्हें नाजायज औलाद ही बता दिया.इस तरह गाली के बदले गाली की राजनीति में बीजेपी ने नैतिकता दिखाते हुए अपने नेता पर कार्यवाही की लेकिन मायावती उस प्रदर्शन में लगे अभद्र नारों पर मायावती ने खुद को देवी बताते हुए कहा कि मेरे अपमान से मेरे समर्थक गुस्से में हैं तब सवाल यह उठता है कि गुस्से में आने के बाद मायावती के समर्थक सभी मर्यादाओं को ताक पर रख देंगे ? बहरहाल, इस प्रदर्शन के जरिये बसपा राजनीतिक लाभ उठाते के फ़िराक में थी लेकिन बसपा नेताओं के बड़बोलेपन के कारण ही बसपा का यह दाव उल्टा पड़ गया. दयाशंकर की बेटी व पत्नी स्वाति ने बसपा की इस रणनीति पर पूरी तरह से पानी फेर दिया है. राजनीति की कसौटी अगर बसपा के प्रदर्शन और इस प्रकरण में स्वाति सिंह को जोड़ कर देखें तो जो बसपा दयाशंकर सिंह के  बयान आने के बाद से फ्रंटफूट पर नजर आ रही थी अब वो बैकफुट पर खड़ी दिख रही है. बसपा के उग्र प्रदर्शन में लग रहे नारों के बाद दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह ने मोर्चा सँभालते हुए बसपा नेताओं पर उनकी बेटी पर मानसिक रूप से परेसान करने का आरोप लगाया और कहा कि बसपा कार्यकर्ता लगातार उनके परिवार के खिलाफ अश्लील भाषा का इस्तेमाल कर रहें हैं जिससे उनकी 12 साल की बेटी काफी डरी हुई हैं. इन सब से आहत होकर स्वाति सिंह ने मायावती समेत बसपा के अन्य बड़े नेताओं के खिलाफ केस दर्ज कराया है. गौरतलब है कि मायावती भी महिला हैं और  दयाशंकर की बेटी व पत्नी भी महिला हैं. नारी सम्मान की दृष्टि से दोनों ही सम्मान की हकदार हैं. अगर मायावती को दी गई गाली से मायावती को दुःख पहुँचता हैं और खुद को अपमानित महसूस करती हैं तथा गाली देने वाले पर कड़ी कार्यवाही की मांग करती हैं तो फिर मायावती, स्वाति व उनकी बेटी को गाली देने वाले बसपा नेताओं पर कार्यवाही क्यों नहीं कर रही ? वक्त का तकाजा यही कहता है कि मायावती बीजेपी से प्रेरणा लेते हुए अपने उन सभी नेताओं को बर्खास्त करे जो  बेहूदगी के साथ सड़को पर स्वाति और उनकी बेटी को गाली दे रहे थे.खैर, जैसे ही स्वाति सिंह मीडिया के सामने अपनी बात को रखा अगले दिन बीजेपी भी सड़क पर ‘बेटी के सम्मान ने भाजपा मैदान में’ के नारों से साथ उतर गई और बसपा के खिलाफ प्रदेशव्यापी प्रदर्शन किया.दरअसल यह गाली प्रकरण उत्तर प्रदेश की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाला हैं बसपा आने वाले विधानसभा चुनाव में हर जगह इसे दलित व महिलाओं के सम्मान से जोड़ कर बीजेपी पर निशाना साधने से नहीं चुकेगी.बहरहाल, इस तरह के बयान को किसी भी सुरत में स्वीकार नही किया जा सकता. ऐसे बयानों पर कड़ी निंदा होनी करनी चाहिए बीजेपी ने दयाशंकर सिंह को पार्टी व पद से बर्खास्त कर अच्छी मिशल दी है, सभी दलों के नेताओं को ऐसे अमर्यादित भाषा से परहेज करना चाहिए. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी वक्त हैं लेकिन आगे की सियासत किनती गर्माहट वाली होगी इसका अंदाज़ा इस प्रकरण से लगाया जा सकता है. अभी चुनाव की घोषणा भी नहीं हुई राजनीतिक दल अपनी बिसाद बिछाने में लगे हैं किंतु यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि राजनीति यह खेल सभी मर्यादाओं को तार –तार कर रहा भाषा अमर्यादित होती जा रही है, हर मसले पर मानवीयता का चश्मा हटा राजनीति के चश्में से देखा जा रहा हैं सही मायने में यह गाली – गलौज का मसला उस वक्त ही समाप्त हो जाना चाहिए था जब दयाशंकर सिंह ने माफ़ी मांगी और मामला कानून के हाथो चला गया किंतु बसपा ने दयाशंकर के बयान  को ढाल बनाकर राजनीति करने का प्रयास किया फ़िलहाल में बसपा नेताओं ने गाली के बदले गाली देकर खुद को कटघरे में खड़ा कर लिया है.

              

Monday, 4 July 2016

मझधार में मांझी की राजनीति


 बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के प्रमुख जीतनराम मांझी अपने विचित्र बयानों से आये दिन चर्चा में बने रहतें हैं.गौरतलब है कि बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद से जीतम राम मांझी ने एक के बाद एक ऐसे बयान दिए थे जो चौकानें वाले थे तथा  मुख्यमंत्री पद की गरिमा खिलाफ थे. अगर हम कहें कि ये विवादित बोल ही मांझी को भारत की  सियासत में पहचान दिलाए तो ये अतिशयोक्ति नहीं होगी. उनके बिगड़े बोल ही थे कि  उन्हें मुख्यमंत्री पद से हाथ धोना पड़ा था. यहाँ तक कि जनता दल यूनाइटेड से भी उनकी छुट्टी कर दी गई. बिहार की राजनीति में हम देख चुकें हैं कि कैसे एक दुसरे के धुर विरोधी रहे लालू  और नीतीश गठबंधन कर बिहार में सत्ता पर काबिज़ हुए.उसके बाद से ही मांझी के सितारे गरदिश में चल रहें है. मुख्यमंत्री का पद जाने के बाद से मांझी बिहार की राजनीति में हाशिये पर चले गये. बिहार की राजनीति में जीतन राम मांझी की वर्तमान   स्थिति  क्या है यह बात किसी से छिपी  नहीं हैं.जाहिर है कि मांझी विधानसभा चुनाव में जैसे-तैसे दो सीटों पर चुनाव लड़ एक सीट जीत पाए थे. उनकीं पार्टी अन्य सीटों पर  बुरी तरह से हारी थी. अपनी चार दिन के लिए चमकी सियासत के भरोसे बड़े पद पर आसीन होने का मुगालते पाले मांझी को  हर तरफ से निराशा हाथ लग रही है. इसी बीच मांझी ने एक ताज़ा बयान देकर पुनः सबको चौका दिया. अपने हर बयान में नीतीश पर  तानाशाही और तरह–तरह के आरोप लगाने वाले मांझी के तेवर अब ढीले पड़ गयें हैं. अपने एक हालिया बयान में मांझी ने कहा है कि नीतीश मेरे राजनीतिक जन्मदाता हैं. राजनीति में उन्हें मंत्री से मुख्यमंत्री बनाने वाले नीतीश ही हैं, मांझी ने स्पष्ट कहा कि राजनीति संभावनाओं का खेल है, कुछ भी हो सकता है, जब लालू-नीतीश एक हो सकते हैं तो मेरा तो दोनों के साथ वैसा कोई मतभेद भी नहीं रहा है. मांझी के इस बयान के निहतार्थ  को समझें तो इसमें कई बातें निकलकर सामने आतीं हैं. मांझी फिलहाल एनडीए का हिस्सा हैं और इस समय केंद्रीय मंत्रीमंडल का विस्तार होना है, जिसकी चर्चा राजनीतिक हलकों में ज्यादा है. राजनीति में हर कोई सत्तासीन होना चाहता हैं, हरेक की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा होती है जीतन राम मांझी के ताज़ा बयान भी राजनीतिक लोभ से प्रेरित हैं, मांझी की सियासी नैया अब मझधार में है, जिसे पार लगाने के लिए लगता है मांझी अब नीतीश और लालू का सहारा लेने का मन बना चुके हैं. खैर, अभी जो खबर आ रही है. उसमें केंदीय मंत्रीमंडल में मांझी को शामिल करने की चर्चा दूर-दूर तक कहीं नहीं है ऐसे में इस बयान के जरिये  मांझी ने कहीं न कहीं यह संकेत दिया है कि अगर उन्हें केंद्रीय मंत्रीमंडल में जगह नहीं दी गई तो उनके पास और भी विकल्प हैं. अब उनके इस बयान को  बीजेपी और मोदी सरकार कितनी गंभीरता से लेती है ये तो बाद की बात होगी किंतु देर से ही सही मांझी ने इस सच को स्वीकार तो किया है कि उनके राजनीतिक जन्मदाता नीतीश कुमार ही हैं. दरअसल इस बयान के कई पहलु हैं. एक बात जगजाहिर है कि मांझी को एनडीए सरकार में कोई ओहदा नही मिला है और न ही सियासी गलियारे में उनकी कोई पूछ ही है .इस वक्त राजनीति में नया छत तलाश रहें मांझी की मुश्किले अभी कम होती नजर नहीं आ रही है.अगले एक दो दिनों मंत्रीमंडल में किसको क्या मिला है यह स्पष्ट हो जायेगा. बहरहाल, इस बयान के बाद से अटकलें लगाई जा रहीं है कि मांझी एनडीए का साथ छोड़ पुनः नीतीश के साथ चले जाएं. ऐसा होता भी है तो ये ताज्जुब की बात नही होगी.
अगर विचार करें तो इस बात की कोई संभावना नज़र नहीं आती कि मांझी की इस गीदड़ भभकी से घबराकर मोदी सरकार द्वारा उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह दे दी जाएगी. ऐसा होने का कोई तुक नज़र नहीं आता. गौर करें तो पहली बात ये कि इस वक़्त एनडीए के पास तो पूर्ण बहुमत है ही, अकेले भाजपा भी पूर्ण बहुमत में है. इसलिए स्थिति ऐसी नहीं है कि उसे कोई साथ छोड़ने की बात कहकर ब्लैकमेल कर सके. दूसरी चीज कि माझी की स्थिति ऐसी भी नहीं है कि उनके जाने से सरकार को कोई दिक्कत लगे. माझी भाजपा के लिए केवल बिहार चुनाव तक महत्वपूर्ण थे. वो चुनाव बीत गया और उसमे भी माझी भाजपा को कोई विशेष लाभ नहीं दे सके. ऐसे में भाजपा के लिए उनका महत्व कुछ नहीं है, फिर वो अभी उनके नखरे क्यों सहेगी ? मगर एक पहलू यह भी है कि माझी ऐसा कुछ करने वाले ही नहीं है. ये सब सिर्फ दिखावा है और उनका ताजा बयान गीदड़ भभकी से अधिक कुछ नहीं है. ऐसे भभकियों से उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने वाली क्योंकि भाजपा के पास मंत्रिमंडल में बिठाने के लिए माझी से कहीं अधिक जरूरी और महत्वपूर्ण चेहरे कतार लगाए हुए हैं. इसलिए अच्छा होगा कि माझी अपना ये रुख बदल लें, अन्यथा राजनीतिक तौर पर भारी फजीहत के लिए तैयार रहें.