Sunday, 26 June 2016

एनएसजी पर वैश्विक कूटनीति की जंग

      परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह देशों में भारत को शामिल होने की उम्मीदों को करारा झटका लगा है. एनएसजी की सियोल बैठक में भारत को शामिल करने को लेकर चल रही जद्दोजहद में भारत को निराशा हाथ लगी है. भारत की आशाएं को धक्का लगा है जिसमें मुख्य किरदार पड़ोसी देश चीन ने निभाया है. 48 देशों के समूह में भारत को एनएसजी का सदस्य बनाने को लेकर चली चर्चा में भारत के लिए सबसे बड़े विरोधी के रूप में चीन ने आवाज़ बुलंद की है.चीन के साथ –साथ ब्राजील,टर्की, आस्ट्रिया समेत दस देशों ने भारत के खिलाफ मतदान किया.चीन अपनी पूरी शक्ति लगाकर न केवल खुद भारत का विरोध किया बल्कि जिन देशों पर उसका वर्चस्व है उसका लाभ लेते हुए उनको भी भारत के खिलाफ लामबंध करने में सफलता अर्जित की. स्वीटजरलैंड जो पहले भारत के पक्ष में था अचानक वो भी भारत के विरोध में खड़ा दिखा .भारत को लेकर इन देशों का रवैया अब वैश्विक स्तर पर सबने देख लिया है.भारत, चीन से साथ रिश्तों को लेकर नरम रुख अख्तियार करता रहा है,चीन से साथ भारत की कूटनीति हमेसा से उदारवाद जैसे रही हैं.जिसमें छल-कपट के लिए कोई जगह नहीं होती हैं. लेकिन चीन इसके ठीक विपरीत व्यहवार भारत से करता रहा है. जब भी मौका मिला चीन से हमारे पीठ पर खंजर घोपने का काम किया हैं. हम पाकिस्तान की तरह चीन की नीति को लेकर भी काफी हद तक सफल नहीं हो पायें, हमारे कूटनीति के रणनीतिकारों ने शुरू से ही इस मामले में विफल रहें हैं. भारत के प्रधानमंत्री मोदी सत्ता संभालने के बाद एक के बाद कई देशों का दौरा किया,जिससे भारत की साख वैश्विक स्तर पर न केवल मजबूत हुई बल्कि अमेरिका जैसे देश हमारे साथ खुलकर कंधा से कंधा मिलाकर चलने की किये बात यहीं समाप्त नहीं होती अमेरिका ने और भी देशों से भारत से साथ आने की अपील भी की. अब इस मसले को कुटनीतिक परिदृश्य को समझें तो एक बात सामने आती है कि हमारी कूटनीति में सामंजस्यता की कमी हैं हम जिसके करीब जाने की कोशिश करते उससे बहुत करीब चले हाते तथा जिससे हमारे संबंधो  में दरार है हम उस दरार को पाटने की बजाय खाई तैयार कर लेतें हैं. गौरतलब है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनएसजी के लिए भारत की दावेदारी को गति प्रदान किया किंतु लाख प्रयासों के बावजूद भारत हाथ मलता रह गया. बहरहाल ,ये समूचे भारत के लिए एक तगड़ा झटका था.कितनी विकट स्थिति है जब देश कूटनीतिक मामले में वैश्विक स्तर पर बड़ा झटका लगा हो और कुछ राजनीतिक दल व कथित बुद्धिजीवियों ने इसे मोदी सरकार की विफलता बता फुले नही समा रहें हैं. ये हमारे देश का दुर्योग है कि ऐसे समय पर भी हम राष्ट्रीय एका दिखाने की बजाय तू-तू , मैं –मैं ,आरोप –प्रत्यारोप  की राजनीति करने में व्यस्त हैं  इसके कोई दोराय नही कि वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति पहले की अपेक्षा मजबूत हुई  है,हमें इस बात को स्वीकारना होगा कि अन्य प्रधानमंत्रियो ने जो काम अधुरा छोड़ा था वर्तमान प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी उस काम को बखूबी आगे बढ़ा रहें हैं. अगर हम भारत की एनएसजी में सदस्यता नहीं मिलने के ठोस कारण पर चर्चा करें अधिकांश देशों ने भारत ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं कियें है,इसका हवाला देते हुए भारत को एनएसजी में शामिल होने का विरोध किया.इनका विरोध में समझ में आता है कि इन देशों की अपनी –अपनी विरोध की वजह होंगी लेकिन हमारे देश में जो लोग ख़ुशी से इतरा कर यह बोल रहें कि मोदी की विफलता है उनका क्या ? ये लोग कब इस मुगालते से बाहर निकलेंगे कि एनएसजी में भारत को सदस्यता मिलनी थी संघ या बीजेपी को नही !.जाहिर सी बात है हर सरकार राष्ट्र को प्रगति पर ले जाने तथा वैश्विक स्तर  पर देश साख मजबूत करने की हर संभव कोशिश करती है किंतु मोदी विरोध करने के लिए कुछ लोग ऐसे अंधे हो गएँ हैं कि सरकार की  नीतियों तथा योजनाओं में कमियां निकालने की बजाय व्यक्ति विशेष की निंदा करते हुए सभी मर्यादाओं को तार –तार कर रहे. हमसब ने देखा कि जैसे ही ये बात सामने आई कि भारत को एनएसजी में सदस्यता को लेकर दस देशों ने विरोध किया है.ठीक उसी समय राष्ट्रीय एका को ताक पर रखते हुए ये कथित बुद्धिजीवियों व क्षुद्र मानसिकता वाले नेताओं  ने प्रधानमंत्री को कटघरे  में खड़ा कर दिया. ये लोग भूल गये हैं कि जब भी देश में इस प्रकार की स्थिति आये हमे एक साथ मिलकर  देश का जयघोष  करना चाहिए स्थिति पर अपने उचित सुझाव देने चाहिए किंतु स्थिति इसके ठीक विपरीत है .बहरहाल, इसबार एनएसजी पर भारत की बात नहीं बन पाई हैं लेकिन भविष्य के लिए भारत के मार्ग खुले हुए हैं हमारे लिए अब ये आवश्यक है कि जिन 38 देशों से हमारा समर्थन किया  हैं हम उनके साथ अपने संबध और प्रगाढ़ करें यहीं नही हमने बाकी इन दस देशों से भी कूटनीतिक स्तर पर जवाब देना चाहिए.

आरोपी विधायक की गिरफ्तारी आपातकाल कैसे ?

दिल्ली में एक ऐसा मुख्यमंत्री बैठा है जो केवल अपने नाटकीय कार्यों  के लिए चर्चा में रहता है,एक नाटक खत्म नही हुआ कि दूसरा नाटक तैयार हो जाता है. जबसे दिल्ली के मुख्यमंत्री का पदभार केजरीवाल संभाले है, हर रोज कुछ न कुछ बवाल केंद्र सरकार पर बेजा आरोप लगा कर खड़ा कर देते हैं. दिल्ली की जनता ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि हम जिस व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद की कमान सौंप रहे हैं, वो व्यक्ति अपना समय दिल्ली के विकास में न देकर व्यर्थ के मुद्दों पर देगा. दरअसल, शनिवार को दिल्ली के विधायक दिनेश मोहनिया को पुलिस ने प्रेस कांफ्रेंस के दौरान ही गिरफ्तार कर लिया. उनके ऊपर एक महिला से बदसलूकी का आरोप है,पुलिस द्वारा दो बार नोटिस देने के बावजूद मोहनिया इस नोटिस का कोई जवाब नही दिया. उसके बाद पुलिस ने मोहनिया पर उक्त कार्यवाही की. गिरफ्तारी की जैसे ही खबर आई केजरीवाल बौखला गये और एक के बाद एक ट्विट कर इस गिरफ्तारी की तुलना आपातकाल से कर दिया.  सवाल खड़ा होता है कि महिला से बदसलूकी के  मामले में गिरफ्तारी आपातकाल है ? सवाल की तह में जाने से पहले हमें थोड़ा उस कालखंड में जाना होगा जब केजरीवाल चुनाव प्रचार  में लगे थे, तब महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर लंबी–लंबी बातें किया करते थे.परंतु आज केजरीवाल महिला के साथ बदसलूकी करने वाले विधायक से समर्थन में खड़ें हैं .ये पहला ऐसा मुद्दा नही हैं जहाँ केजरीवाल ने हंगामा किया हो उनके हंगामे की एक लंबी फेहरिस्त है.खैर, इससे पहले जब सोमनाथ भारती पर महिला उत्पीड़न का केस दर्ज हुआ था, तब भी केजरीवाल समेत आम आदमी पार्टी  अंत तक सोमनाथ के समर्थन में आवाज़ बुलंद करती रही.बाद में हक़ीकत सामने आने के बाद औंधे मुंह गिरे, अब मोहनिया पर जब एक महिला से बदसलूकी जैसे गंभीर आरोप लगें है, ऐसे में आपातकाल का जिक्र कर अपने विधायक का बचाव करना न केवल केजरीवाल के महिला सुरक्षा के वादों और दावों पर गंभीर सवाल खड़े करता है बल्कि उनकी अलग तरह की राजनीति के पाखंड को भी सामने लाता है. अभी ये मामला शांत भी नहीं हुआ था कि दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के ऊपर भी एक व्यापारी को धमकाने का आरोप लगा है लेकिन अभी कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई है फिर भी उतावलेपन में मनीष सिसोदिया अपने विधायकों को इकट्टा कर प्रधानमंत्री आवास की तरफ गिरफ्तारी देने के लिए जाने लगे,कितनी हास्यास्पद स्थिति हैं जिसके ऊपर केस दर्ज हुआ है उस विधायक को समूची पार्टी बचा रही है और जिसपर कोई केस दर्ज नहीं वो थाने की बजाय प्रधानमंत्री आवास गिरफ्तारी देने जा रहा.इस प्रकार से ढोंग के जरिये केजरीवाल जनता को मुख्य मुद्दे से भटकाने का प्रयास कर रहें हैं.एक अलग तरह की राजनीति का दावा कर राजनीति में आने वाली इस पार्टी को लेकर कभी कल्पना भी नही की गई होगी कि ये पार्टी इस तरह की विचित्र राजनीति करेगी जिसमें खुद को सही साबित किया जाए बाकि जो उनके खिलाफ में आए उनकी विश्वसनीयता को भंग करने का प्रयास किया जाए.देश में और भी मुख्यमंत्री हैं जिनका राजनीतिक विरोध अपनी जगह है किंतु संघीय ढाचें का सम्मान करते हैं उसकी मर्यादाओं मे रहते हैं पंरतु केजरीवाल ने इनसब मर्यादाओं को ताक पर छोड़ दिया है.राजनीतिक लोभ और ईर्ष्या से ग्रस्त केजरीवाल को अपने मुख्य मुद्दों पर भी ध्यान देने चाहिए उन सपनों को भी याद रखना चाहिए जो उन्होंने दिल्ली की जनता को दिखाए हैं.कब तक ये रोना रोते रहेंगे कि  मोदी जी काम नहीं करने दे रहे सवाल यह भी कि आप कर क्या रहे ? 

Sunday, 19 June 2016

कांग्रेस में बदलाव से पहले बिखराव

      
भारतीय राजनीति में सबसे पुरानी और सबसे अनुभवी पार्टी कांग्रेस आज सबसे बुरे  हालत में है,विगत लोकसभा चुनाव के बाद इस विरासत का पतन निरंतर देखने को मिल रहा है,पार्टी को एक के बाद एक चुनावों में मुंह की खानी पड़ रही है.हर चुनाव के बाद कांग्रेस हार के कारणों की समीक्षा करने के लिए कमेटी का गठन करती हैं लेकिन उसकी रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल देती है.परंतु लगातार मिल रही पराजयों से सबक लेते हुए कांग्रेस ने बड़े उलटफेर का मन बना लिया हैं. जिसका जिक्र अभी कुछ दिनों पहले पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह ने किया था.अटकलें लगाई जा रहीं हैं कि इसी माह के अंत में होने वाले कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी की कमान राहुल गाँधी के हाथों सौपं दी जाएगी.राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनना अब तय माना जा रहा हैं. परंतु अध्यक्ष पद संभालने से ठीक पहले जो खबरें आ रहीं हैं वो कांग्रेस में राहुल गाँधी की स्वीकार्यता पर सवालियां निशान लगा रहीं हैं.वर्तमान दौर में कांग्रेस के सामने कई चुनौतियाँ मुंह बाए खड़ी हैं  जिससे निपटना पार्टी के लिए आसान नही होगा.हाल ही  में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को फिर से करारी शिकस्त झेलनी पड़ी. इस विधानसभा चुनाव के बाद से दो बातें निकल कर सामने आई हैं जो कांग्रेस की खराब दशा और भटकती दिशा को बयाँ करने के लिए काफी हैं. पहला कांग्रेस का जनाधार सिकुड़ता जा रहा है तथा उससे भी चिंताजनक बात यह है कि.बगावत के सुर दिन-ब- दिन बढ़ते जा रहें हैं और कांग्रेस बिखर रही है, लेकिन दुर्योग  यह है कि  कांग्रेस आलाकमान ने इसपर मौन साध रखा है जो कि कांग्रेस के भविष्य के लिए कतई अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता. पार्टी छोड़ने वालों की एक लंबी फेहरिस्त है, जिसमें सबसे पहले असम में पार्टी के मुख्य कप्तान हेमंत बिस्व शर्मा उसके बाद छत्तीसगढ़ में पार्टी के वरिष्ठ नेता व पहले मुख्यमंत्री अजित जोगी अब महाराष्ट्र के कद्दावर नेता गुरुदास कामत ने कांग्रेस पार्टी से दूरी बना ली है. पार्टी छोड़ने का सिलसिला यहीं समाप्त नही होता, त्रिपुरा से भी कांग्रेस के लिए बुरी खबर आ रही है. वहां पार्टी के छह विधायकों के तृणमूल का दामन थाम लिया है. कुल मिलाकर हम कह सकतें है कि पार्टी इस वक्त विश्वसनीयता के संकट से गुजर रही है. जनता के साथ-साथ कांग्रेस के नेताओं का भी पार्टी से मोहभंग होता जा रहा हैं. जो किसी भी संगठन के लिए चिंता का विषय है. कांग्रेस के बिखरने की वजहों को समझा जाए तो सबसे बड़ी वजह पार्टी नेतृत्व की उदासीनता हैं. लगातार मिल रही पराजय से कांग्रेस हाशिए पर है. पार्टी के कार्यकताओं और नेताओं को इस बात का अंदाज़ा हो गया है कि पार्टी अब अप्रासंगिक होती जा रही है, जिसको लेकर शीर्ष नेतृत्व गंभीर नही है. दूसरी वजह है कि अभी भी कांग्रेस जमीन से नहीं जुड़ रही आज भी पार्टी के कई नेता जनता से जुड़ने के बजाय वातानुकूलित कमरों में रहना पसंद कर रहे हैं. कांग्रेस के इन आला नेताओं को समझना होगा कि अगर पार्टी को फिर से सफलता के रास्ते पर लाना है, तो उसे कई कड़े फैसले लेने होंगे जो पार्टी के हित में हो. कांग्रेस शुरू से ही परिवारवाद से ग्रस्त रही है फिर से कमान परिवार के युवराज सँभालने जा रहें हैं. कुछ नेताओं की माने तो राहुल गाँधी के अध्यक्ष बनतें ही पार्टी की दिशा और दशा बदल जाएगी अर्थात पार्टी फिर से खड़ी हो जाएगी किंतु ये नेता मुगालता में हैं, उन्हें अपनी स्मरण शक्ति मजबूत करते हुए इस बात पर गौर करना चाहिए कि लोकसभा तथा उसके बाद कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में राहुल ही पार्टी का मुख्य चेहरा थे. जिसे जनता ने सिरे से खारिज कर दिया. कांग्रेस बदलाव के  मूड में है तो इस बात का स्वागत होना चाहिए किंतु कांग्रेस की कमान राहुल गाँधी की बजाय ऐसे व्यक्ति को सौंपने पर विचार किया जाना चाहिए जो जनता तथा संगठन दोनों को साथ लेकर चल सके. इस मामले में राहुल गाँधी पूर्णतया विफल रहें हैं. कांग्रेस ये प्रयोग करे तो इससे पार्टी ही नहीं वरन देश की जनता में कांग्रेस के प्रति एक सकारात्मक संदेश पहुंचेगा. साथ ही, उसके  कार्यकर्ताओं में एक नई उर्जा का संचार भी होगा जो लगातार मिल रही पराजयों से शिथिल पड़ गई है. नए अध्यक्ष के साथ काम करने की ललक कार्यकर्ताओं में आएगी. इसके साथ ही पार्टी परिवारवाद जैसे गंभीर आरोपों से भी बच जाएगी. दरअसल कांग्रेस को लोकसभा चुनाव के बाद ही कुछ बड़े बदलाव करने चाहिए थे लेकिन कांग्रेस ने अभी तक नहीं किया. इसका एक कारण ये भी है कि  कांग्रेस के कुछ अदद नेताओं को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस का एक बड़ा तबका नेहरु-गांधी परिवार की चापलूसी कर अपना काम निकाल लेना चाहता है और पार्टी में बने रहना चाहता है. कांग्रेस को अगर अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाना है तो एक नया चेहरा ढूढने की कवायद शुरू कर देनी चाहिए, जिसकी पार्टी को दरकार है. जो पार्टी देश में सबसे ज्यादा सत्ता पर काबिज़ रही हो, आज उसी पार्टी की लोकप्रियता हाशिए  पर है, उस खोई हुई लोकप्रियता को हासिल करना आसान नही होगा इसके लिए कांग्रेस के उन कुछ वरिष्ठ नेताओं जो उसकी वर्तमान दशा-दिशा को लेकर वास्तव में चिंतित हैं और जब-तब अपनी चिंता जताते भी रहे हैं, द्वारा संगठन को परिवारवाद की रक्तपिपासु जकड़न से आज़ाद करवाकर जमीनी स्तर पर फिर से  मजबूत बनाने के लिए ठोस प्रयास करने होंगे. संगठन को जनता से संवाद करना होगा और इसके लिए आवश्यक है कि संगठन को सुदृढ़ किया जाय. और संगठन की सुदृढ़ता पार्टी नेताओं की एकजुटता पर निर्भर करती है. बहरहाल, पार्टी हाईकमान में बदलाव को लेकर जो अटकलें तेज़ हुई हैं, उसपर सभी की नजरें टिकी हुई  हैं. पार्टी किस तरह से बदलाव करती है, ये तो देखने वाली बात होगी किंतु राहुल गाँधी के अध्यक्ष बनने से पहले ही संगठन से जो आवाज राहुल गाँधी के विरोध में आ रहीं है उसे हाईकमान को बिलकुल भी दरकिनार नहीं करना चाहिए.
राहुल गाँधी की राजनीतिक समझ को लेकर भी सवाल उठते रहें है. एक बात तो स्पष्ट है कि राहुल गाँधी अभी भी राजनीतिक तौर पर पूरी तरह से परिपक्व नहीं हुए है. राजनीतिक गंभीरता के अभाव में राहुल गाँधी को अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी देना कांग्रेस के भविष्य को और खतरे में डाल सकता है. फिलहाल स्थिति ये है कि राहुल गांधी के पास राजनीतिक तौर पर विफलताओं की फेहरिस्त के कुछ नहीं है. ऐसे में उन्हें और उनके समर्थकों को यह समझना चाहिए कि जनता किस आधार पर और क्यों उन्हें स्वीकृति देगी ? अगर राहुल गांधी वाकई में राजनीति में रहकर देश और समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं तो उन्हें स्वयं को सिद्ध करने के लिए कोई भी छोटी-बड़ी ज़िम्मेदारी लेकर उसे पूरी ईमानदारी और निष्ठा से निभाना चाहिए. पर फिलहाल राहुल गांधी ऐसा कुछ भी करते तो नहीं ही दिख रहे. ऐसे में, उचित होगा कि कांग्रेस एक ईमानदार तथा कुशल संगठनकर्ता के हाथो में पार्टी की कमान सौंपे जो पार्टी की दिशा और दशा को सही रास्ते पर ला सके. कांग्रेस को अपने ही अतीत से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है. जिस प्रकार से 1977 में कांग्रेस को दुबारा खड़ा करने के लिए इंदिरा गाँधी ने संघर्ष किया और पार्टी को पुनर्जीवित किया था, वही दोहराने का ये समय है. इंदिरा गाँधी की उस रणनीति को कांग्रेस को समझना होगा जिससे पार्टी को नई दिशा मिली थी. अगर कांग्रेस अब भी ऐसा करती है तो अगले साल  कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी को सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं तथा कांग्रेस जनता के दिल में फिर से जगह बना सकती है.   

Sunday, 12 June 2016

जीवन स्तर की चिंताजनक तस्वीर

    ब्रिटेन के हेनली एंड पार्टनर्स द्वारा दुनिया के तमाम एशियाई और योरोपीय आदि देशों के नागरिकों के  जीवन स्तर और सुविधाओं के आधार पर एक सर्वेक्षण किया गया है. सर्वेक्षण  में आये परिणाम के मुताबिक बेहतर जीवन स्तर के मामले में जर्मनी सबसे आगे है जबकि कांगो के लोगों का जीवन स्तर दुनिया के सभी देशों से बदतर है. इस सूची में भारत को टॉप सौ देशों में भी जगह नही दी गई है. भारत इस सूची में 102वें पायदान पर है,  दरअसल इस सर्वे के लिए हेनली एंड पार्टनर्स ने जो मानक तैयार किये थे, वो सभी देशों के लिए एक समान न होकर भिन्न–भिन्न थे. मुख्य रूप से जिस आधार पर रैंकिंग दी गई उसमें स्वास्थ्य नीति, शिक्षा, अर्थव्यवस्था तथा शांति और स्थिरता मुख्य थे. इन सभी मानकों पर जर्मनी अव्वल रहा और पहली रैंक पर कब्जा जमाया. इस सर्वेक्षण में शीर्ष 20 देशों में यूरोपीय देशों का दबदबा है. कुल मिलाकर समूचे सर्वेक्षण के आधार की बात करें तो दुनिया के तमाम देशों के नागरिकों को प्राप्त   बुनियादी सुविधाओं को केंद्र में रखते हुए यह सर्वे किया गया है. इस सर्वेक्षण को अगर भारत के परिदृश्य में समझें तो हमें इसे स्वीकारना में कोई गुरेज नही होना चाहिए. हालांकि सर्वेक्षण के उन आधारों में से कुछ ऐसे भी हैं, जिनके संदर्भ में भारत की स्थिति का मूल्यांकन बहुत न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता. वैसे, मुख्यतः अगर शिक्षा, स्वास्थ्य, शांति आदि आधारों की बात करें तो इन स्तरों पर भारत की स्थिति को निश्चित ही हम उसमें यूरोपीय देशों के मुकाबले काफी पीछे हैं. हालांकि शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के हालात को सुधारने व मजबूत करने के लिए भारत की सरकारों द्वारा तमाम योजनाएं, कार्यक्रम एवं नीतियां बनाई एवं संचालित की जाती रही हैं. ऐसे में, अगर हम भारत को योजनाओं का देश कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. आज़ादी के बाद से अबतक स्वास्थ्य, शिक्षा और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए हजारों योजनायें हमारे सत्ताधीशों ने चलाई लेकिन योजनाओं को धरातल पर ठीक से उतारने का काम किसी सरकार ने नहीं किया. ये स्थिति अभी तक ऐसी  ही चली आ रही है हमारी सरकारें योजनायें तो ला रहीं हैं किंतु उस योजना का लाभ व्यक्ति तक पहुँचाने में पूरी तरह से सफल नहीं रही हैं. हैरान करने वाली बात है कि किसी भी सरकार ने योजनाओं की विफलता पर कभी ध्यान नहीं दिया. आज भारत में शिक्षा को लेकर तमाम प्रकार की योजनाएं चल रहीं हैं. मसलन वर्ष 2001 में सर्व शिक्षा अभियान, उसके बाद अधिकाधिक बच्चों को स्कूल से जोड़ने के लिए संचालित मिड-डे-मिल योजना तथा वर्ष 2009 में संसद द्वारा ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ आदि योजनाएं हैं जिन्हें देश में शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए सरकार द्वारा चलाया जा रहा है. शिक्षा का अधिकार के तहत 6 से 14 साल की उम्र के बीच हे बच्चे को मुफ्त  और अनिवार्य शिक्षा देने की बात कही गई. बावजूद  इन सबके हम अन्य विकसित देशों की अपेक्षा शिक्षा के  मामले में पिछड़े हैं. उच्च शिक्षा में भी हमारें पास प्रकार के शिक्षण संस्थान व टेक्नोलॉजी उपलब्ध नहीं हैं, जो यूरोपीय देशों में प्राथमिक शिक्षा के लिए उपलब्ध हैं. इसका एक दुष्परिणाम हम देख सकतें हैं कि हमारे युवा बड़ी संख्या में शिक्षा के लिए विदेशों का रुख कर रहे हैं. इसी तरह अगर हम स्वास्थ्य व चिकित्सा से क्षेत्र में देखें तो यहाँ स्थिति और बदतर है. चिकित्सा के नाम सरकार सौ से अधिक योजनाओं की घोषणा एक साथ करती हैं किंतु इन योजनाओं का क्रियान्वयन ठीक से नही पर पाती. सरकार ने ग्रामीण भारत के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए अप्रेल 2005 में  राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत की जिसका उद्देश्य महिलाओं ,बच्चों के साथ–साथ वंचित वर्गों की स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करना था किंतु यह योजना भी जमीनी स्तर पर बहुत ज्यादा कारगर नही हुई. इस सर्वे में हमारा पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण हमारे सरकार द्वारा चलाई गई योजनाओं की विफलता है,यूरोपीय देशों में किसी भी योजना का सीधा लाभ जनता को मिलता है जनता भी उसमें सरकार का पूरा सहयोग करती हैं परंतु, हमारे यहाँ  स्थिति इसके विपरीत है यहाँ किसी भी योजना को पारदर्शिता के साथ लागू करना सबसे बड़ी चुनौती रहती है उसके बाद जनता को सरकार की ढेर सारी योजनाओं को लेकर जानकारी नहीं होती.इस सर्वे में एक बिंदु शांति और स्थिरता भी है, इस बिंदु पर तो भारत की स्थिति काफी हद तक अच्छी है. चूंकि दक्षिण एशिया में तो कम से कम भारत को काफी शांतिपूर्ण देश ही कहा जा सकता है. ऐसे में सर्वे एजंसी ने शांति और स्थिरता के आधार पर भारत की स्थिति को बहुत अच्छा क्यों नहीं माना है, ये समझ से परे है. यहाँ तक अमेरिका को भी शांति व स्थिरता बनाएं रखने के मामले में उसे 30वें नंबर पर रखा गया है. वैसे गौर करें तो दक्षिण एशिया में तो भारत उक्त  मुलभुत सुविधाओं के मामले में  अन्य एशियाई देशों की अपेक्षा एक हद तक बेहतर स्थिति में हैं, ये बात संतोषजनक है किंतु इस सर्वेक्षण में भारत का दुनिया के सौ देशों में अपनी जगह न बनाना एक चिंताजनक स्थिति को दिखता है. अब ऐसी स्थिति में तो भारत का वैश्विक महाशक्ति या विश्वगुरु बनने का स्वप्न बहुत दूर की कौड़ी ही नज़र आता है.