Thursday, 12 May 2016

कॉल ड्राप पर दीर्घकालिक उपाय जरूरी

   

कॉल ड्राप को लेकर मुआवजे की आस लगाएं उपभोक्ताओं को सुप्रीम कोर्ट ने करारा झटका दिया है.बुधवार को कॉल ड्राप मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने  टेलीकॉम कंपनियों को राहत देते हुए भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के उस फैसले को गैरसंवैधानिक करार दिया जिसमें ट्राई ने कॉल ड्राप होने पर ग्राहकों को मुआवजा देने की बात कहीं थी.माननीय कोर्ट ने इस फैसले को सुनाते हुए कहा कि कॉल ड्रॉप के लिए टेलिकॉम कंपनियों द्वारा ग्राहकों को क्षतिपूर्ति करने वाला ट्राई का आदेश अनुचित और गैर-पारदर्शी हैं.कोर्ट के इस फैसले के बाद टेलिकॉम कंपनियों ने राहत की साँस ली हैं,इस मामले में ट्राई  ने दलील देते हुए कहा कि मोबाईल कंपनियों को उपभोक्ताओं की कोई चिंता नहीं है.करोड़ो उपभोक्ताओं के देश में चार –पांच कंपनियों ने कब्जा कर रखा है जो कार्टेल की तरह काम कर रहीं हैं.कई बार ये तथ्य भी सामने आयें है कि बड़ी कंपनियां जान –बुझ कर कॉल ड्राप कर देतीं हैं जिससे उनको लाखों –करोड़ो का लाभ होता हैं.इनका रोज़ाना 250 करोड़ का राजस्व है लेकिन निवेश नाम मात्र का है,ट्राई के इस मसले पर कोर्ट को ये भी बताया कि फिलहाल उपभोक्ताओं को कंपनियां कॉल ड्राप होने की स्थिति में मुआवज़ा दे अगर इससे कंपनियों को ज्यादा नुकसान होता है तो ट्राई छह माह के बाद हर्जाने की समीक्षा करेगी.ट्राई के इन सब दलीलों सिरे से खारिज़ करते हुए कोर्ट ने अपना फैसला कंपनियों के हीत में सुनाया.बहरहाल,ट्राई शुरू से ही कॉल ड्राप की बढती समस्या को लेकर चिंतित रहा हैं सेवाओं की गुणवत्ता को लेकर भी ट्राई टेलीकॉम कंपनियों को आड़े हाथो लेता रहा है.गौरतलब है कि कॉल ड्राप होने से नुकसान उपभोक्ता का होता हैं,बात करते समय अचानक से कॉल ड्राप होने से टेलीकॉम कंपनिया पुरे मिनट का पैसा मनमाने ढंग से ग्राहकों से ऐंठ लेती हैं,जिससे ग्राहकों का समय के साथ आर्थिक नुकसान भी झेलना पड़ता हैं. इसी के मद्देनजर ट्राई ने कंपनियों को एक दिन में अधिकतम तीन रूपये और एक कॉल ड्राप होने पर एक रूपये ग्राहकों को वापस करने का फैसला सुनाया था लेकिन कंपनियों के दलील के आगे ट्राई का यह फैसला कोर्ट के सामने धराशायी हो गया.कोर्ट के सामने कंपनियों ने भारी नुकसान का हवाला देते हुए ट्राई के आदेश को मनमाना तथा गैरकानूनी बताते हुए रद्द करने की मांग की जिसे कोर्ट ने बड़ी सहजता से स्वीकार भी कर लिया.इन सब के बीच मुख्य मुद्दा कॉल ड्राप रोकने का गौण हो चला हैं.अगर हम ट्राई और कंपनियों के दलीलों का मुल्यांकन करें तो एक बात को साफ तौर पर जाहिर होता है कि ट्राई बदले की भावना से काम कर रहा था,ट्राई के पास सिमित अधिकार हैं लेकिन कई दफा ट्राई ने अपने अधिकार सीमाओं का उलंघन किया.जिससे उसका पक्ष कोर्ट में कमजोर हो गया.खैर,सवाल ये उठता है कि फिर ग्राहकों को कॉल ड्राप से मुक्ति कैसे मिले ? सवाल की तह में जाएँ तो कॉल ड्राप आज एक बड़ी समस्या के रूप में खड़ा है,संचार क्षेत्र में विकास तो दिनों दिन हो रहा लेकिन सेवाओं की गुणवत्ता चरमराती जा रही हैं.मोबाईल ग्राहकों की संख्या में पहले अपेक्षा बहुत बढोत्तरी हुई हैं,किंतु मोबाईल टावरों की संख्या कम होने की वजह से कॉल ड्राप की समस्या का जन्म हुआ हैं,इसके अलावा तकनीकी कारण भी हैं जससे नेटवर्क की समस्या बनी रहती हैं,इसके निवारण के लिए अभी तक ट्राई ने भी कोई दीर्घकालिक उपाय नहीं सुझाएँ हैं.एकबारगी ये मान भी लिया जाए कि कंपनियां उपभोक्ताओं को कॉल ड्राप होने पर मुआवजा देने को तैयार हो जाएँ तो क्या इससे कॉल ड्राप की समस्या खत्म हो जाएगी ?जाहिर है कि मुआवजा का कॉल ड्राप का कोई सरोकार नहीं हैं,उपभोक्ताओं को उसके आर्थिक नुकसान की भरपाई करा देने भर से उसकी समस्या हल नही होता वरन समस्या के मूल जड़ तक पहुँच कर उसका हल निकालना होता हैं, ट्राई का यह आदेश  एक प्रतीकात्मक आदेश था जिसे कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया, उपभोक्ताओं को उनके पैसे भले मिल जाते लेकिन कॉल ड्राप की समस्या जस की तस बनीं रहती.ट्राई का यह फैसला निश्चित तौर पर मनमाने ढंग से लिया गया था.अगर ट्राई कॉल ड्राप की समस्या के निवारण के लिए वाकई प्रतिबद्ध हैं तो उसे सभी कंपनियों को ऐसे निर्देश देने चाहिए जिसमें नेटवर्किंग का विस्तार हो,लोगों तक सभी कंपनियों के नेटवर्क आसानी से उपलब्ध हो सकें,आज एक आम ग्राहक से लेकर प्रधानमंत्री तक को अमूमन बात करतें समय नेटवर्क की दिक्कत आने से काल ड्राप की समस्या से गुजरना पड़ता हैं . कोर्ट का ये फैसला भले ही कंपनियों के पक्ष में हो लेकिन टेलीकॉम कम्पनियों को ये नही भूलना चाहिए कि उनका मुख्य दायित्व ग्राहकों को अच्छी सेवा देना हैं,लेकिन वर्तमन समय में मोबाईल कंपनियां में अपने दायित्वों का निर्वहन ठीक ढंग से नहीं कर रहीं,जिससे कॉल ड्राप जैसे गंभीर समस्या का जन्म हुआ हैं,जो सीधे तौर पर आम जनता को परेशानी में डाल रखा हैं.अत; इन सब बातों को ध्यान के रखते हुए ट्राई को उपभोक्ताओं को फौरी राहत देने की बजाय कॉल ड्राप की समस्या का दीर्घकालिक उपाय बानने की जरूरत हैं जिसमें टेलीकॉम कंपनियों को भी किसी दिक्कत का सामना न करना पड़े और उपभोक्ताओं को भी कॉल ड्राप से मुक्ति मिल सकें.

Tuesday, 10 May 2016

सस्ती लोकप्रियता पाने की कवायद


  देश में कई ऐसे ज्वलंत मुद्दे है जिसपर व्यापक चर्चा तथा विचार –विमर्श बहुत जरूरी है.मसलन किसानों का हालात दिन –ब-दिन  दयनीय होती जा रही है,देश के अधिकतर राज्य जल संकट से जूझ रहें हैं,देश की शिक्षा व्यस्वथा में सुधार की जरूरत हैं,देश में गरीबों,मजदूरों की हालात खराब होती जा रहीं हैं.बढ़ते महंगाई से आमजन त्रस्त है,ऐसे हमारे पास सैकड़ो मुद्दे है जिसपर हमारे सियासतदान बोलने की जहमत नहीं उठाते.यदि जहमत भी उठाते हैं तो चुनाव के मौके पर,उसके बाद भूल जाते हैं.चाहें वो दल सत्ता पक्ष हो या विपक्ष में,ये आज की राजनीति का गिरता स्तर ही हैं कि हमारे राजनेता आरोप –प्रत्यारोप के इस दौर में निजता पर भी हमला करने से नहीं चुकते.बहरहाल जबसे मोदी सत्ता की कमान संभालें हैं उनके आलोचकों ने हर मुद्दे पर उनकी आलोचना की हैं.लोकतंत्र के मूल्यों को समझे तो सरकार की आलोचना होनी भी चाहिए किंतु आलोचना में तर्क और तथ्य हो,सरकार की नीतियों और योजनाओं की आलोचना होनी चाहिए किंतु मोदी सरकार के दौरान कई ऐसे मामले सामने आयें जहाँ उनके आलोचकों ने विरोध की सारी हदों को पार कर दिया.इस समय दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल मोदी की डिग्री पर सवालिययां निशान लगा रहें हैं,आम आदमी पार्टी का आरोप है की प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री फर्ज़ी हैं,वैसे तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समय –समय पर अपने उतावलेपन के कारण मुंह की खातें रहें हैं,कभी जेटली पर मनगढंत आरोप तो कभी केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर केजरीवाल कई दफा अपनी किरकिरी करा चुंके हैं.ताज़ा मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठाकर केजरीवाल फिर से इनदिनों चर्चा में हैं.ध्यान देने योग्य बात है कि जब समूचा देश अगस्ता वेस्टलेंड डील में हुए घोटालों का सच जानना चाह रहा है ठीक उसी वक्त केजरीवाल ने ये मुद्दा उठाकर इस मसले से लोगो का ध्यान हटाने का भरसक प्रयास किया लेकिन हर बार की अपेक्षा केजरीवाल को अबकी कम सफलता मिली पंरतु हर रोज़ सोशल मीडिया पर केजरीवाल प्रधानमंत्री की डिग्री को लेकर नए –नए सवाल खड़े करते रहें. केजरीवाल शुरू से ही आरोपों के बिसाद पर अपनी राजनीति करतें आयें हैं आयें दिन केजरीवाल प्रधानमंत्री से लगाए किसी भी राजनेता पर ऊल –जुलूल आरोप लगा कर मीडिया में बनें रहतें हैं लेकिन ये आरोप केवल दो-चार दिन के लिए होता हैं फिर केजरीवाल नये बवाल के साथ हाजिर हो जातें हैं,दरअसल यह वो दौर हैं जिसमें राजनीतिक सुचिता,मर्यादा हमारे राजनेता ताक पर रख चुंके हैं.जिसमें बतौर मुख्यमंत्री केजरीवाल सबसे ऊपर हैं.किसी भी मुख्यमंत्री द्वारा प्रधानमंत्री की डिग्री को लेकर सवाल उठाना शोभा देता है ? यह ठीक है कि प्रधानमंत्री की  डिग्री के बारे में लोगों को पता होना चाहिए परंतु केजरीवाल को इस बात को समझना चाहिए कि  प्रधानमंत्री की डिग्री कोई राजनीति का विषय नहीं हैं लेकिन आम आदमी पार्टी ने प्रधानमंत्री की डिग्री को लेकर जो रुख अख्तियार किया हैं वो बेहद शर्मनाक हैं.आम जनता किसी नेता की डिग्री को देखकर अपना मत उसे नहीं देती वरन उसकी योग्यता की पहचान उसकी उपलब्धियों से करती है खैर,आरोप लगाना सबसे सरल काम हैं लेकिन उन आरोपों को सही साबित करता उतना ही कठिन.इस मामूली सी बात को दिल्ली के मुख्यमंत्री नहीं समझ पा रहें हैं.याद होगा दिल्ली विधानसभा चुनाव में जब पहली दफा केजरीवाल चुनाव मैदान में थे तब उसवक्त की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ तमाम प्रकार के आरोप लगाएं और पर्याप्त सुबूत होनें के दावा किया.आरोपों की सियासत कर के केजरीवाल दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो गयें लेकिन शीला दीक्षित पर लगाएं गये सभी आरोप और उनके कथित  भ्रष्टाचार से जुडे सुबूत वाली फाइलें इस वक्त कहाँ हैं.स्थिति जगजाहिर हैं.अत; यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि शीला दीक्षित के ऊपर भी केजरीवाल द्वारा लगाए गये सभी आरोप हवाहवाई थे.उस समय की परिस्थिति और अब की परिस्थिति में बहुत अंतर हैं अब केजरीवाल एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं उन्हें अपने पद की मर्यादा के साथ प्रधानमंत्री पद की गरिमा का भी ख्याल रखना चाहियें.जहाँ तक मोदी की डिग्री का सवाल हैं मोदी ने 2014 के आम चुनाव के दौरान बतौर उम्मीदवार जो हलफनामा दाखिल किया है उसमें जानकारी दी थी कि उन्होंने साल 1983 में गुजरात विश्वविद्यालय,अहमदाबाद से मास्टर्स ऑफ आर्ट्स की डिग्री ली थी तथा 1978 में दिल्ली विश्वविद्यालय से बैचेलर ऑफ़ आर्ट्स की डिग्री हासिल की थी.इस पुरे विवाद की जड़ की बात करें तो एक दिन प्रधानमंत्री की वेबसाइट से डिग्री संबंधी दस्तावेजों को हटा लिया गया उसके बाद से दिल्ली के मुख्यमंत्री ने इस पुरे प्रकरण को लेकर बीजेपी और मोदी पर आरोपों की झड़ी लगा दी और प्रधानमंत्री की समूची डिग्रीयों को सार्वजनिक करने की मांग करनें लगें.जब यह मामला केंद्रीय सुचना आयोग के पास आया तो उसनें बिना देर किये प्रधानमंत्री की डिग्री की जानकारी देने के निर्देश दिए.केंदीय सुचना आयोग के निर्देश के बाद गुजरात विश्वविद्यालय ने नरेंद्र मोदी की मास्टर्स की डिग्री को सार्वजनिक कर दिया. प्रधानमंत्री  के डिग्री को लेकर केजरीवाल के आरोपों से तिलमिलाई बीजेपी ने प्रेस कांफ्रेंस कर के नरेंद्र मोदी की स्नातक तथा परास्नातक की डिग्री को सार्वजनिक किया और केजरीवाल पर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया.डिग्री सार्वजनिक होने के बाद  भी आम आदमी पार्टी का रुख में कोई बदलाव नहीं हैं.अब भी केजरीवाल मोदी की डिग्री को फर्जी बतानें के बाज़ नहीं आ रहें हैं.एक के बाद एक मुद्दों पर आम आदमी पार्टी की हठधर्मिता इस बात तो दर्शाता है कि जो केजरीवाल कहें वही सत्य हैं बाकी सब झूठ.स्वयंभू ईमानदार केजरीवाल की इन ओछी हरकतों से कहीं न कहीं ये बात सिद्ध होती है कि केजरीवाल सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए आला पदों पर बैठे लोगों पर बेबुनियाद आरोप लगातें रहतें हैं.जाहिर है कि केजरीवाल सबसे ज्यादा आरोप प्रधानमंत्री मोदी पर लगातें रहतें है बीते कुछ महीनों से हर मसलें पर मोदी की आलोचना करना केजरीवाल का शगल बन गया हैं.परंतु यह विरोध की पराकाष्ठा है कि एक प्रधानमंत्री को अपनी शैक्षणिक योग्यता होते हुए भी प्रमाण देने की आवश्यकता पड़ रहीं हैं.ऐसे निराधार आरोपों से बीजेपी का नहीं अपितु केजरीवाल का ही नुकसान हैं ,अगर केजरीवाल अपनी इन हरकतों से बाज़ नहीं आये तो, वो दिन दूर नहीं जब वो जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता खो बैठेंगे.