Thursday, 28 April 2016

सिद्धरमैया को बर्खास्त करे आलाकमान

       

भ्रष्टाचार के आरोपों से चौतरफा घिरी कांग्रेस की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं हैं.वर्तमान दौर में कांग्रेस की परिस्थिति देखकर ऐसा लग रहा है मानों कांग्रेस के राज्य और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं में भ्रष्टाचार करने की प्रतिस्पर्धा चल रहीं हो.एक तरफ राष्ट्रीय नेतृत्व भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर रहा हैं तो, वहीँ दूसरी तरफ कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक से जो खबर आ रही है.वो किसी भी सूरतेहाल में कांग्रेस के लिए सही नहीं हैं.जाहिर है कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री  सिद्धरमैया की कई मसलों पर पहले भी किरकिरी हो चुकी है.इसबार आरोप है कि मुख्यमंत्री सिद्धरमैया अपने बेटे को सरकारी अस्पताल में लैब और डायग्नोस्टिक सुविधा बनाने का ठेका सभी नियम –कानून को ताक पर रखते हुए दे दिया है.मामला जैसे ही सामने आया एकबार फिर सिद्धरमैया सबके निशानें पर आ गये है. विपक्ष इस पुरे मुद्दे की जाँच सीबीआई से कराने की मांग करने लगा है,बढ़ते दबाव के बीच उनके बेटे यतींद्र सिद्धरमैया ने मैट्रिक्स इमेजिंग सल्यूशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर पद से इस्तीफा दे दिया है.गौरतलब है कि ठेका इसी कंपनी को दिया था हालाँकि यह कंपनी उनके दोस्त की है जिसमें यतींद्र पार्टनर थे.खैर,सिद्धरमैया ने  इस मसले पर दलील देते हुए कहा है कि टेंडर का आवंटन करते वक्त सभी नियमों का पालन किया गया है,फिर सवाल उठता है कि जब ठेके की प्रक्रिया पारदर्शी थी तो यतींद्र का इस्तीफा क्यों ? सवाल की तह में जाएँ तो विपक्षी पार्टियाँ लगातार इस मसले पर मुख्यमंत्री पर भाई –भतीजावाद का आरोप लगा रहीं है,विपक्ष का हमला बढ़ता जा रहा था जिससे मुख्यमंत्री  पूरी तरह से दबाव में आ चुके हैं,वही जब यह प्रकरण कांग्रेस आलाकमान के पास पहुंचा तो उसनें भी इस मुद्दे पर नाखुशी जाहिर की तथा इस मामले के निपटारे के लिए ये  सलाह दिया कि  बेटे यतींद्र का इस्तीफा ले लें बात यहीं समाप्त नहीं होती कर्नाटक प्रभारी और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने तो खुलेआम कह दिया था कि यतींद्र को इस्तीफा दे देना चाहिए.इससे स्पष्ट होता है कि विपक्षी पार्टियों से कहीं ज्यादा हाईकमान के दबाव में आकर यतींद्र ने इस्तीफा दिया ताकि मामले को खत्म किया जा सके.बहरहाल,बेटे का इस्तीफा दिलवाकर सिद्धरमैया ने एक तीर से दो निशानें साधे हैं,पहला ज्यों इस्तीफा हुआ विपक्ष के पास कहने को कुछ खास रहा नहीं और दूसरा इस इस्तीफे से सिद्धरमैया नें अपनी कुर्सी बचानें का दाव खेला है लेकिन, मीडिया में आ रहीं खबरों के मुताबिक सिद्धरमैया ने विपक्षी दलों को तो चुप करा दिया पंरतु कांग्रेस आलाकमान को रिझाने में विफल साबित हुए हैं.कयास लगाएं जा रहें है कि सिद्धरमैया के अड़ियल स्वभाव और काम –करने के तरीको से पार्टी हाईकमान नाराज है और जल्द ही उनके मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन सकती है.हालाँकि सिद्धरमैया इस प्रकार की सभी चर्चाओं को सिरे से ख़ारिज करते हुए कहा है कि उनकी कुर्सी पर कोई खतरा नहीं है. इन सब के बीच नए मुख्यमंत्री के नामों को लेकर भी अटकलें तेज़ हो गई हैं.मुख्यमंत्री के दावेदारी में दो नाम सबसे आगें है.जिसमें पहला नाम राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा का है.जो अभी हालहि में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से मुलाकत कर पार्टी को संकट से उबारने का भरोसा दिलाया है और दूसरा नाम राज्य के गृह मंत्री जी परमेश्वर का है,परमेश्वर ने भी पिछले सप्ताह सोनिया गाँधी से मुलाकात कर राज्य की वर्तमान राजनीतिक हालातों पर चर्चा किये थे.हालाँकि ऐसा माना जा रहा है कि कांग्रेस दलित वोटबैंक को रिझाने के लिए जी परमेश्वर को मुख्यमंत्री न्युक्त कर सकतीं हैं.इन सब मुलाकतों से एक बात तो स्पष्ट है कि कर्नाटक की राजनीति में कोई बड़ा उलटफेर होनें वाला है.दिलचस्प बात यह भी है कि  राज्य के अन्य नेताओं से मिलने का समय कांग्रेस अध्यक्ष के पास है पंरतु मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने जब सोनिया गाँधी से मिलने की इच्छा जाहिर कि तो उन्हें व्यस्त कार्यक्रमों का हवाला देकर टाल दिया गया. बहरहाल,यह पहला मौका नहीं है जब सिद्धरमैया सरकार पर सवाल उठे हो इससे पहले भी कई बार सिद्धरमैया पर भ्रष्टाचार तथा उनके कामकाज के तरीको पर सवाल उठतें रहें हैं.मसलन अभी कुछ महीनों पहले की बात है जब मुख्यमंत्री की करीब सत्तर लाख की घड़ी को लेकर पुरे राज्य की सियासत गर्म हो गई थी,सभी विपक्षी दल ये सवाल उठा रहे थे कि मुख्यमंत्री के पास इतना पैसा कहाँ से आया ? घड़ी को लेकर घिरे सिद्धरमैया ने उस घड़ी उपहार बताया था.बावजूद इसके घड़ी को लेकर कई रोज हंगामा चलता रहा.मुख्यमंत्री की विवादस्पद घड़ी के चलते विपक्षी दलों ने विधानसभा तक नही चलने दिया था.चारो तरफ आलोचना झेलने के बाद घड़ी विवाद उस वक्त थमा जब मुख्यमंत्री ने इस घड़ी को राज्य की संपत्ति घोषित कर दिया.इसीप्रकार मुख्यमंत्री पर एक कमिश्नर को चांटा मारने वाला विडियो सामने आ चुका है, जिसमें सिद्धरमैया गुस्से में आकर एक शख्स को चांटा मारते है वायरल विडियो को जब ठीक दे देखा गया तो पता चला कि ये शख्स बेल्लारी नगर निगम कमिश्नर हैं.मुख्यमंत्री ने इस विडियो को अपने खिलाफ झूठा प्रचार बता कर खारिज कर दिया था.इस प्रकार  सिद्धरमैया के ऊपर लगे आरोपों की एक लंबी फेहरिस्त है जो उनके शासनकाल में बढ़ते भ्रष्टाचार और कुशासन के दावों की पुख्ता करती हैं.अब देखने वाली बात होगी की कई गंभीर आरोपों से घिरे सिद्धरमैया को लेकर जो अफवाहें चल रहीं है,उसमें कितनी सच्चाई है लेकिन अगस्ता वेस्टलैंड मामले में कांग्रेस अध्यक्ष समेत पार्टी के कई आला नेताओं के नाम सामने आने से  कांग्रेस बुरी फंसती दिख रही है ऐसे में इस मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए कांग्रेस सिद्धरमैया को बर्खास्त कर सकती हैं.अगर कांग्रेस ऐसा करती है तो कहीं न कहीं पार्टी के ऊपर जो  भ्रष्टाचार के आरोप लग रहें है उससे निपटने में पार्टी को बल मिलेगा. 

Wednesday, 27 April 2016

लंबित मुकदमों का निस्तारण जरूरी

    




देश के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर बेटे विगत रविवार को मुख्यमंत्रियों एवं उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीशों के सम्मलेन को संबोधित करते हुए भावुक हो गये.दरअसल अदालतों पर बढ़ते काम के बोझ और जजों की घटती संख्या की बात करतें हुए उनका गला भर आया.चीफ जस्टिस ने अपने संबोधन में पुरे तथ्य के साथ देश की अदालतों व न्याय तंत्र की चरमराते हालात से सबको अवगत कराया.भारतीय न्याय व्यवस्था की रफ्तार कितनी धीमी है.ये बात किसी से छिपी नहीं है,आये दिन हम देखतें है कि मुकदमों के फैसले आने में साल ही नहीं अपितु दशक लग जाते हैं.ये हमारी न्याय व्यवस्था का स्याह सच है,जिससे मुंह नही मोड़ा जा सकता.देश के सभी अदालतों में बढ़ते मुकदमों और घटते जजों की संख्या से इस भयावह स्थिति का जन्म हुआ है.गौरतलब है कि 1987 में लॉ कमीशन ने प्रति 10 लाख की आबादी पर जजों की संख्या 50 करनें की अनुशंसा की थी लेकिन आज 29 साल बाद भी हमारे हुक्मरानों ने लॉ कमीशन की सिफारिशों को लागू करने की जहमत नही उठाई.ये हक़ीकत है कि पिछले दो दशकों से अदालतों के बढ़ते कामों पर किसी ने गौर नही किया.जजों के कामों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई.केसों की संख्यां रोज़ बढ़ते चले गए लेकिन जजों की संख्या में कोई इजाफा नही हुआ.इस 29 साल के दरमियान कई मुख्य न्यायाधीश बदले,हुकूमतें बदली परंतु किसी का ध्यान इस गंभीर समस्या की तरफ नही गया.ऐसे में माननीय मुख्य न्यायाधीश द्वारा प्रधानमंत्री की मौजूदगी में इस गंभीर मुद्दे को उठाना इस बात को दर्शाता है कि मुख्य न्यायाधीश लंबित पड़े मामलों के निस्तारण के लिए सजग हैं.चीफ़ जस्टिस का यह कदम स्वागतयोग्य है.गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में लगभग 84 हजार केश लंबित हैं,अकेले हाईकोर्ट में 38 लाख केस पेंडिग में हैं,तो वहीँ निचली अदालतों में लगभग 3,07,05,153 केस आज भी लंबित पड़े है.देश के कोर्ट कचहरियों में फाइलों की संख्या बढ़ती जा रही है,लंबित मुकदमों की फेहरिस्त हर रोज़ बढ़ती जा रही है.फिर भी हमारे लिए गौरव की बात है कि आज भी आमजन का विश्वास न्यायपालिका पर बना हुआ है.अगर उसे शासन से न्याय की उम्मीद नही बचती तब वो न्यायपालिका ने शरण में जाता है.ताकि उसे उसका हक अथवा न्याय मिल सकें.लेकिन न्यायपालिका की सुस्त कार्यशैली एवं इसमें बढ़ते भ्रष्टाचार आदालतों की छवि को धूमिल कर रहें.ग्रामीण क्षेत्रों में आलम ये है कि लोग कोर्ट -कचहरी के नाम पर ही सर पकड़ लेते है,इसका मतलब ये नही कि उनको कोर्ट या न्यायपालिका से भरोसा उठ गया है,वरन जिस प्रकार से वहां की कार्यवाही और न्यायालय की जो सुस्त प्रणाली है,इससे भी लोगो को काफी दिक्कतों का सामना करता पड़ता है.जो अपने आप में न्यायालय की कार्यशैली पर सवालियां निशान लगाता है.सवाल ये कि क्या महज़ जजों की न्युक्ति हो जाने से समस्याएं समाप्त हो जाएँगी ? सवाल की तह में जाएँ तो हमारे लंबित मामलों की सुनवाई न होने की मुख्य वजह जजों की कमी है,मुख्य न्यायाधीश ने भी जजों की संख्या 21000 से बढ़ाकर 40000 हजार करने की वकालत की हैं,सरकार ने भी भरोसा दिया है कि इस मसले पर जल्द बड़ा कदम उठाया जायेगा.देश के लोगों में न्यायपालिका की गरिमा बरकरार रखनें के लिए जरूरी है कि जजों की न्युक्ति जल्दी हो जिससे लंबित पड़े मामलों की सुनवाई जल्द से जल्द किया जा सकें.इसके अतिरिक्त लंबित पड़े मामलों के जल्द निपटारे के लिए समूची अदालती प्रक्रिया को तकनीक से जोड़ा जाना चाहिए.तकनीकी का ज्यादा इस्तेमाल होने से न्याय में भी तेज़ी आएगी और पारदर्शिता भी बनी रहेगी.बहरहाल,न्याय की अवधारणा है कि जनता को न्याय सुलभ और त्वरित मिलें.परन्तुं आज की स्थिति इसके ठीक विपरीत है.आमजन को इंसाफ पाने में एड़ियाँ घिस जा रही,पीढियां खप जा रही है.त्वरित न्याय अब स्वप्न समान हो गया है.लोग कानूनों की पेंच में उलझ कर रह जा रहें हैं,प्रधानमंत्री खुद यह बात बार –बार कहते आयें हैं कि देश के संविधान में कई ऐसे जटिल कानून हैं जिससे आमजन को काफी दिक्कतों को सामना करना पड़ता है,सरकार उन कानूनों को न्यायसंगत ढंग से खत्म करेगी जिससे न्याय प्रक्रिया में तेज़ी आएगी.खैर,मुख्य न्यायाधीश की बात को प्रधानमंत्री ने गंभीरता से लेते हुए इसी मंच से कहा कि अगर संवैधानिक सीमाएं न हों तो सीजेआई की टीम और सरकार के प्रमुख लोग आपस में बैठकर समाधान निकालें.मोदी ने ये भी भरोसा दिया कि सरकार न्यायपालिका के लिए हर कदम उठाने को तैयार है.लेकिन कई ऐसे मसले आयें है जब न्यायपालिका और कार्यपालिका आमने –सामने खड़े दिखे इसका ताज़ा उदाहरण कोलेजियम है,सरकार को न्यायपालिका से टकराव की स्थिति से बचना चाहिए.लोकतंत्र के इन स्तम्भों को इस बात का भान होना चाहिए कि लंबित पड़े मुकदमों से सबसे ज्यादा दिक्कत आम जनमानस को हो रही है.जनता के हीत के लिए सरकार तथा न्यायपालिका एक साथ मिलकर न्याय तंत्र की खामियों को दूर करें ताकि लोगों को अपने न्यायतंत्र पर भरोसा बना रहें.

Friday, 15 April 2016

गुलाम कश्मीर की सच्चाई दुनिया के सामने लाए भारत



जम्मू –कश्मीर ऐसे मसला है जिसका राग समय –समय पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अलापते रहतें हैं,दुनिया के सामने ये झूठ बार-बार परोसते हैं कि जम्मू –कश्मीर में भारत की सेना वहां की आवाम पर जुल्म करती है,लेकिन स्थिति इसके ठीक विपरीत है,सच्चाई यह है कि पाक सरकार अपने अधिकृत कश्मीर के नागरिकों पर अत्याचार करती है,पाकिस्तान के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को बंदूख की सहायता से दबाने का प्रयास करती है,दरअसल बुधवार को गुलाम कश्मीर के मुजफ्फराबाद में बेरोजगारी और गरीबी के विरोध में सैकड़ो युवा सड़क पर उतर आये,युवाओं का आरोप है कि पाकिस्तान सरकार स्थानीय नौकरियों में भी पाकिस्तान के युवकों को तरजीह देती है.ऐसे में इनके पास अपने जीविका का कोई साधन नहीं है.वहां के ज्यादातर युवा बेरोजगार हैं. जाहिर है कि स्थानीय नौकरियों में भी पाक सरकार इनका हक नही देती.इस भेदभाव से तंग आकर कश्मीर नेशनल स्टूडेंट्स फेडरेशन और जम्मू कश्मीर नेशनल आवामी पार्टी के नेतृत्व में युवाओं ने जमकर पाकिस्तान सरकार के खिलाफ नारे लगायें.उनमे से कुछ नारे इसप्रकार से थे -हम कश्मीर बचाने निकलें हैं आओं हमारे साथ चलो, पाकिस्तान मुर्दाबाद ये ऐसे नारें है जो अपने आप में ये बयाँ कर रहें है कि गुलाम कश्मीर के लोग कितने मुस्किल से रहतें है.इन नारों से बौखलाई पाकिस्तानी पुलिस ने छात्रों पर जमकर लाठियां बरसाई और उन्हें हिरासत में ले लिया.ये पहली बार नही है जब गुलाम कश्मीर के लोग पाक सरकार के विरोध में सड़क पर उतरे हैं,पिछले साल ओक्टुबर माह में भी गुलाम कश्मीर के लोग पाकिस्तान से आज़ादी के लिए सड़को पर उतरे थे.गौरतलब है कि वहां के लोग पाकिस्तान सरकार के नीतियों से खुश नहीं है.वहां की आम जनता पाकिस्तान सरकार के दोहरे रवैये और सेना की बर्बरता से तंग आ चुकी है.दरअसल एक और आबादी पाकिस्तान से मुक्ति चाहती है,जो उसके दमन और उत्पीड़न से तंग आ गई है.गुलाम कश्मीर की स्थिति कितनी दर्दनाक है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोग न केवल सरकार के विरुद्ध में नारें लगा रहें है बल्कि गुलाम कश्मीर में लोग चीख –चीख कर भारत में शामिल होने की मांग कर रहें है.ये लोग पाक गुलामी से आज़ादी चाहतें है,लेकिन वहां की सेना ने इनका जीना मुहाल कर रखा है.दुनिया के सामने पाकिस्तान कश्मीर के लिए घड़ियाली आंसू बहाता है,लेकिन अब पाक अधिकृत कश्मीर का सच विश्व के सामने आने लगा है.बहरहाल,सवाल ये उठता है कि पाकिस्तान, भारत अधिकृत कश्मीर की मांग करता है,लेकिन जो उसके अधिकार में है वहां ऐसे हालात क्यों ? वहां के युवाओं के साथ ये भेदभाव क्यों ? सवाल की तह में जाएं तो कई बातें सामने आतीं है,पहली बात पाकिस्तान इन लोगो के साथ हमेशा गुलामों की तरह बर्ताव करता रहा है तथा राजनीतिक वस्तु की तरह इस्तेमाल कर रहा है.नतीजन वहां रत्ती भर विकास नहीं हुआ है.अब लोग इससे त्रस्त आ चुके है.पाकिस्तानी सेना इनकी हर आवाज को दबाने की नाकाम कोशिश करती हैं,लेकिन पाकिस्तान का स्याह सच अब दुनिया के सामने है कि कैसे पाक सरकार वहां की जनता के साथ सौतेला व्यवहार करती है,बात यहीं समाप्त नहीं होती है पाक अधिकृत में कश्मीर में पाकिस्तानी हुकुमत सभी लोकतांत्रिक मूल्यों को ताक पर रख कर तानाशाही रवैया अपनाती है,गौरतलब है कि पिछले साल गिलगिट –बालटिस्तान में हुए चुनाव में लोकतंत्र की धज्जियां उडातें हुए पाकिस्तान सरकार ने यहाँ असंवैधानिक रूप से मतदान कराया, यहाँ तक कि महिलाओं को मतदान नहीं करने दिया गया.वहीँ भारत के कश्मीर में लोकतंत्र है,लोगो को अपने पसंद के प्रत्यासी को वोट देने की पूरी स्वंत्रता रहती है.लोगो को धार्मिक ,समाजिक हर प्रकार की स्वत्रंता हमारे संविधान ने दे रखीं है,हमारें यहाँ सिस्टम है,नियम है,सरकार की नीतियाँ है जो भारतीय कश्मीर के विकास के लिए समर्पित है.आज हमारे कश्मीर में सरकार निवेश करती है, अच्छे –अच्छे संस्थान है. शिक्षा ,पर्यटन,रोजगार आदि के क्षेत्रों में हमारा कश्मीर विकास की ओर अग्रसर है.युवाओं को अच्छी शिक्षा मिले इसके प्रबंध हैं,हमारी सरकार कभी जम्मू-कश्मीर के युवाओं के साथ भेदभाव नही करती,यही सब बातें है जो पाक कश्मीर के लोगों को लुभा रहीं हैं.वहीँ दूसरी तरफ पीओके की हालत दयनीय है.इस घटना के बाद स्पष्ट हो चला है कि इस्लामाबाद में रहने वालें अधिकारी इन्हें उपेक्षित नजरों से देखते है,सरकार इनकी हर मांग को दरकिनार कर देती है.बहरहाल ,दूसरी बात पर गौर करें तो पाक अधिकृत कश्मीर में भारी तादाद में शिया मुसलमान रहतें है,जो बाकी पाकिस्तान में शिया मस्जिदों पर लगातार हो रहें हमलों से डरे हुए है,खेती –बाड़ी, पर्यटन,औधोगिक विकास आदि में मसले में पाक अधिकृत कश्मीर शुरु से ही पिछड़ा रहा है.आज़ादी के बाद से ही पीओके पाकिस्तान का सबसे गरीब और उपेक्षित हिस्सा रहा है,सरकारें बदली,सत्ताधीश बदलें लेकिन किसी ने भी इनकी समस्याओं को दूर करना ,इस क्षेत्र का विकास करना वाजिब नहीं समझा.वहीँ हमारें कश्मीर के विकास में सभी सरकारों ने महती भूमिका निभाई है.हमारी सरकार ने श्रीनगर से रेलवे की सुविधा वहां के नागरिकों के लिए शुरु कर दी है ,तो वहीँ पाक अधिकृत कश्मीर में लोग सड़कों के लिए तरस रहें.इन्ही सब कारणों से तंग आकर आज ये स्थिति पैदा हो गई कि,वहां के लोग बार –बार आज़ादी की मांग करने लगे है .इन लोगो पर पाकिस्तान सरकार और सेना बेरहमी से पेश आ रही है,फिर भी ये आज़ादी का नाराबुलंद किये हुए है.सम्भवतः यह दूसरी बड़ी घटना है जब पाकिस्तान में पाकिस्तान विरोधी नारें लगे है,वो भी भारत के पक्ष में, भारत को चाहिए कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की जो खबरें है तथा वहां के आवाम की जो आवाज़ है.उसे एक रणनीति के तहत दुनिया के सामने रखें ताकि पाकिस्तान जो हमेशा भारत पर संघर्ष विराम उलंघन का झूठे आरोप लगाता है तथा कश्मीर पर जनमत संग्रह की बात करता है,उसका ये दोहरा चरित्र दुनिया के सामने आ सकें.इसके साथ ही ये आंदोलन उनके लिए भी सबक है जो, आएं दिन भारत में पाकिस्तान के झंडे लहराते हैं.जम्मू –कश्मीर में तनाव की हालात पैदा करतें है, यहाँ एक और बात स्पष्ट हो जाता है पाक अधिकृत कश्मीर की हालत पाकिस्तानी हुकूमत के नियंत्रण से बाहर है.अत: इससे यही प्रतीत होता है कि इसको स्वतंत्र किये जाने की मांग जो भारत करता रहा है,वो जायज है.इस पर विश्व समुदाय एवं संयुक्त राष्ट्र को भी गंभीरता से विचार करना होगा.भारत सरकार को चाहिएं कि संयुक्त राष्ट्र का ध्यान पाक अधिकृत कश्मीर की तरफ आकृष्ट करें.जिससे नवाज शरीफ का कश्मीर के प्रति जो ढोंग है,उसे दुनिया देख सकें.इस दुसरे मामले के प्रकाश में आने के बाद भारत अधिकृत कश्मीर पर बात करने के लिए अब पाकिस्तान अपना नैतिक बल भी गावां चुका है.  


Tuesday, 12 April 2016

इस त्रासदी का ज़िम्मेदार कौन ?

          
 केरल के पुत्तिंगल देवी मंदिर में रविवार के तड़के आग  लगने से अबतक लगभग 112 लोग काल की गाल में समा गये है,जबकि 350 से अधिक लोग घायल हो गयें हैं.दरअसल इस मंदिर हर साल की भांति इस साल भी नये साल का उत्सव मनाया जा रहा था.जिसमें आतिशबाजी की प्रतियोगिता रखी गई थी,इसी दौरान पटाखें की एक चिंगारी उस जगह पर जा गिरी जहाँ बड़ी मात्रा में पटाखें रखें हुए थें.इससे इतना भीषण विस्फोट हुआ कि इसकी चपेट में मंदिर सहित आस –पास के मकान कुछ ही देर में मलबे मे तब्दील हो गये .इस आगजनी के बाद मची भगदड़ ने सैकड़ो श्रद्धालुओं को अपनी चपेट में ले लिया .हादसें के बाद राहत व बचाव जोरो पर है.इन सब के बीच राज्य सरकार ने इस पुरे मामले की न्यायिक जाँच कराने के आदेश दे दिए हैं.एक बात तो स्पष्ट है कि यह हादसा मंदिर में आतिशबाजी जैसी कुप्रथा के चलते हुई है,लेकिन इस हादसे के  बाद बुनियादी सवाल यही उठता है कि इस त्रासदी का जिम्मेदार कौन है ? सवाल की तह में जाएँ तो केरल के गृह मंत्री ने अपने बयान में कहा है कि प्रशासन ने मंदिर परिसर में आतिशबाजी की इजाजत नही थी,फिर बगैर इजाजत आतिशबाजी की प्रतियोगिता क्यों रखी गई ?जब आतिशबाजी हो रही थी तो प्रशासन ने क्यों नही रोका ? इन प्रश्नों का जवाब न तो सरकार के पास है तथा न ही मंदिर प्रबंधन के पास.केरल में हुए इस हादसे ने देश की जनमानस को झकझोर कर रख दिया.इस ह्रदय विदारक घटना को सुनकर हर कोई विचलित हो गया,बहरहाल,ये पहला मौका नहीं है.जब इस प्रकार का वीभत्स हादसा हुआ हो.देश में हर साल कोई न कोई बड़ा हादसा होता है.लेकिन, इससे रोकने की कोई ठोस नीति सरकार के पास नहीं है .एक बात तो साफ है कि सरकार तथा प्रशासन ने पिछली घटनाओं से सबक लेना उचित नही समझा.अगर सरकार ने कुछ भी सबक लिया होता तो इस प्रकार की दर्दनाक घटना से बचा जा सकता था. गौरतलब है कि इस उत्सव में  प्रदेश के अलग –अलग जिलों से श्रद्धालु बड़ी तादाद में आये थे.जिसके मद्देनजर प्रशासन तथा सरकार को सुरक्षा के व्यापक इंतजाम के साथ भीड़ नियंत्रण को लेकर ठोस योजना बनाने की जरूरत थी.लेकिन इस मसले पर प्रशासन और सरकार पूरी तरह विफल रहें हैं.एक के बाद हो रहे हादसे सैकड़ो परिवारों को ऐसे घाव दे जातें है,जो आजीवन उन्हें दर्द देते रहतें है.इस हादसे मे भी अबतक सौ से अधिक लोगों की मृत्यु हुई है.जाहिर है कि किसी ने अपना बेटा ,किसी ने अपना पिता ,किसी ने अपनी माँ तो किसी ने अपनी पति को खोया है.किंतु सरकारें और प्रशासन कुछ मुआवजे का मरहम लगा कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जातें है.इस हादसे के बाद भी केंद्र तथा राज्य सरकार ने अपने –अपने स्तर पर घायलों तथा जिनकी मृत्यु हुईं हैं उनके परिजनों को मुआवज़ा देने का ऐलान कर दिया है.बहरहाल,अगर हम भगदड़ के कारणों की बात करें तो कई बातें सामने आती है.प्रथम दृष्टया आयोजकों का प्रशासन के बीच भीड़ नियंत्रण की कोई बड़ी योजना नही होती अगर होती भी है तो, उसे अमल नहीं किया जाता तथा आयोजकों और प्रशासन के  दरमियाँन बेहतर तालमेल नही होता है. जिसका खामियाजा वहां आएं लोगो को भुगतना पड़ता है.सही तालमेल के आभाव में वहां किसी आकस्मिक घटना के होने के बाद लोग इधर –उधर भागने लगते है.जिससे रास्ता जाम हो जाता है.फलस्वरूप इस प्रकार की दुखद घटना हो जाती है.दूसरा सबसे बड़ा कारण यें है कि श्रद्धालु बहुत ज्यादा उतावलें हो जातें है और अपना आपा खो देतें है.श्रद्धालुओं की इस लापरवाही को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता.खैर,इस प्रकार के हादसों को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र तथा राज्य सरकारों को कई मर्तबा फटकार लगाई है कि ऐसे हादसों ने निपटने  के लिए देशव्यापी समान नीति बनाई जाएँ लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फटकार के बाद भी सरकारें मूकदर्शक बनें अगले हादसें का इंतजार करतीं हैं,इसके अलावा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन के दिशानिर्देशों पर गौर करें को प्रबंधन ने भी भीड़ नियंत्रण के लिए कई बातों का व्यापक स्तर पर जिक्र किया है.मसलन, आपात निकासी निर्बाध हों लेकिन आपात स्थिति में काम आएं,पर्याप्त अग्निशामक की व्यवस्था हो तथा आपात स्थिति में चिकित्सा की सुविधाओं के पर्याप्त इंतजाम हों. इस तरह आपात प्रबंधन के सुझावों को भी ध्यान में रखकर प्रशासन काम करें तो किसी भी भगदड़ को रोकने में सहायक साबित होंगी.लेकिन सरकार तथा प्रशासन इन सब हिदायतों को नजरअंदाज करतें हैं.जिसका नतीजा आज हमारे सामने हैं.लोग पूण्य के लिए मंदिर व  तीर्थस्थान पर जातें है ताकि अपने पापों से मुक्त हो सकें लेकिन इस प्रकार के हादसों से लोगो के मन में खौफ पैदा हो जाता हैं.उनके आस्था पर चोट पहुँचती है.इस खौफ को दूर करने का जिम्मा भी प्रशासन और शासन का हैं.ताकि जनता में भीड़ का भय समाप्त हो सके और उनकी आस्था अपने धर्म के प्रति बनीं रहें.  

Sunday, 10 April 2016

दागियों के भरोसे सत्ता वापसी की चाहत

        



सभी कयासों को विराम लगाते हुए भारतीय जनता पार्टी से आख़िरकार पांच राज्यों में अपने नये प्रदेश अध्यक्षों को न्युक्त कर दिया.जिनमें उत्तर प्रदेश ,कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब और अरुणाचल प्रदेश शामिल है.इन पांचो राज्यों में बीजेपी ने बड़ी चतुराई से उन नेताओं के का चयन किया है,या तो जो नाम बड़ी चर्चा में रहें है या जिसका अनुमान किसी को नही था.बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने शिमोगा ने सांसद येदियुरप्पा को कर्नाटक,फूलपुर से सांसद केशव प्रसाद मौर्य को उत्तर प्रदेश,होशियारपुर से सांसद विजय सांपला को पंजाब,तापिर गाओ को अरुणाचल प्रदेश तथा डा.के.लक्ष्मण को तेलंगाना की कमान सौंपी है.गौरतलब है कि 2017 में पंजाब तथा उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं जबकि 2018 में कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होनें हैं.इस घोषणा के होते ही पांच राज्यों के कार्यकर्ताओं को अपना नया छत्रप मिला है,लिहाज़ा उनमें ख़ुशी का माहौल है,किंतु इस सूचि में दो नाम ऐसें है.जो राष्ट्रीय पटल पर सबसे ज्यादा चर्चा मे हैं.जिसमें पहला नाम उत्तर प्रदेश के लिए चुने गये अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य जबकि दुसरा कर्नाटक के लिए चुने गये येदियुरप्पा.गौरतलब है कि मौर्या पर दंगे फैलाने, हत्या, धोखाधड़ी ,सरकारी कर्मचारियों को घमकी देने जैसे गंभीर मुकदमें चल रहें है,जबकि येदियुरप्पा के दामन पर पहले से ही भ्रष्टाचार का दाग लगा हुआ है.ऐसे में अलग साफ –सुथरी और चरित्र की राजनीति करने का दावा करनें वाली बीजेपी ने सिद्ध कर दिया कि राजनीति में ये सब बातें केवल कहने के लिए होतीं है,हक़ीकत इन सब बातों का कोई मतलब नहीं होता.वर्तमान दौर की राजनीति इतनी दूषित हो चुकी है कि सत्ता तक पहुचनें के लिए राजनीतिक दल अपने विचारों,अपने सिद्धांतों को तिलांजलि देने से नही चुकते.मुख्य लक्ष्य तो सत्ता है उसे हथियाने के लिए भले ही  अपने उसूलो ,विचारों को ताक पर रखना पड़े,जम्मू –कश्मीर में पीडीपी –बीजेपी गठबंधन इसका ताज़ा उदाहरण है.बहरहाल, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने उत्तर प्रदेश की कमान पिछड़ी जाति से आने वाले केशव प्रसाद मौर्य को सौंपी है.अगर केसव प्रसाद मौर्य की राजनीतिक पृष्ठभूमि की बात करें तो वर्तमान में फूलपुर से सांसद है,मौर्य काफी समय से विश्व हिन्दू परिषद और राम जन्मभूमि आंदोलन  में सक्रिय रहें है,दिलचस्प बात ये है कि मौर्य ने भी दावा किया है कि प्रधानमंत्री मोदी की तरह उन्होंने बचपन में चाय व अख़बार बेचें हैं .खैर ,केशव मौर्य पिछड़ी समुदाय से आतें है,ऐसे मे बीजेपी की रणनीति साफ दिखाई दे रही है,एक तरफ जातिय समीकरण को साधने की कोशिश तो दूसरी तरफ हिंदुत्ववादी चेहरा.सवाल उठता है कि इन दोनों का समिश्रण क्या बीजेपी को यूपी में वापसी करा पायेगी ? उत्तर प्रदेश का चुनाव अगले साल होना है किंतु सभी दलों ने अभी से सियासी बिसाद बिछाने लगें है,दरअसल देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश का चुनाव बीजेपी तथा मोदी सरकार ने लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा होगी.2017 में होनें वाले यूपी विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की जनता मोदी सरकार को कथित विकास की कसौटी पर कसने से परहेज़ नही करेगी,जाहिर है कि बीजेपी लोकसभा चुनाव में विकास के मुद्दे पर वोट मांगा था और यूपी की जनता ने सभी जातिय समीकरणों को पीछे छोड़ते हुए 80 लोकसभा सीटों में से 73 सीट एनडीए गठबंधन की झोली में डाल दिया.बीजेपी ने पिछले ढेढ़ दशक से यहाँ सत्ता की का स्वाद नही चखा है,दरअसल,उत्तर प्रदेश की राजनीति ने ऐसा करवट लिया है,जिसमें लोगो के मन में ये बात बैठ गई है कि यहाँ क्षेत्रीय दलों का ही प्रभुत्व रहेगा,पिछले दो-तीन चुनावों में हमनें देखा है कि सत्ता बसपा सुप्रीमों मायावती और सपा के हाथों घुमती रही है,ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मौर्य बीजेपी को सत्ता तक पहुंचा पाएंगे ? इस सवाल की तह में जाएँ तो बीजेपी को सत्ता तक पहुंचना टेढ़ी खीर के समान है,यहाँ के जातिय समीकरण विधानसभा चुनाव में पूरी तरह हावी रहतें है,ऐसे में मुलायम और मायावती जैसे सरीखे नेता जातिवाद का झंडा बुलंद किये हुए हैं,मायावती दलितों व पिछड़े समुदाय को अपना वोटबैंक समझती तो मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी यादव,भूमिहार तथा मुसलमान समेत अन्य पिछड़ी जातियों पर अपना वर्चस्व बनाएं हुए है,ऐसे में मौर्य के सामनें इन दोनों पार्टियों के वोटबैंक मे सेंध लगानें की बड़ी चुनौती होगी.भले ही केसव मौर्य पिछड़ी समुदाय ने आतें है लेकिन उनके पास किसी जाति विशेष का कोई बड़ा समर्थन नहीं है,जिसका एक बड़ा कारण यह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में इनकी पहचान तब की गई जब इनका नाम अध्यक्ष पद के लिए नामित किया गया.मौर्य के सामने फिलवक्त दो बड़ी चुनौतियाँ सामनें खड़ी हैं.मौर्य की सबसे बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश की राजनीति में खुद की पहचान बनाना होगा.तथा दूसरी चुनौती की बात करें तो पार्टी की  यूपी इकाई को गुटबाजी से बचाना होगा,सभी नेताओं को एक साथ लेकर सबको चलना होगा.ताकि पार्टी कोई विद्रोह की स्थिति न बनें और सबके सहयोग से आने वालें चुनाव में सत्ता तक पहुँच सकें.बहरहाल,बीजेपी ने जिस एजेंडे के तहत केशव को सेनापति बनाया है,वो एजेंडा कितना सफल होगा ये तो समय ही बताएगा.लेकिन उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने में अभी लगभग एक साल शेष हैं.ऐसे में मौर्य के पास चुनाव की तैयारी करनें का पर्याप्त समय हैं.हालिए में आये एक सर्वेक्षण के मुताबिक यूपी में इस बार हवा मायावती के पक्ष में है.बीजेपी भी इस बात को बखूबी जानती है कि अगर यूपी का किला फतह करना है तो मायावती की काट ढूँढना होगा,मायावती की काट ढूंढे बगैर यूपी में बीजेपी का बनवास खत्म नही होगा.

Tuesday, 5 April 2016

परमाणु सुरक्षा पर आतंक का मंडराता खतरा

      

अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में परमाणु सुरक्षा जैसे गंभीर विषय को लेकर पचास के अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने विचार –विमर्श किया.इस शिखर सम्मलेन के मुख्य उद्देश्य परमाणु सुरक्षा पर मंडराते खतरे को रोकना था.सभी देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने इस विषय पर चिंता जाहिर की कि परमाणु अस्त्र  निर्माण में इस्तेमाल होने वालें युरेनियम और प्लूटोनियम पदार्थ को सुरक्षित कैसे रखा जाए.जाहिर है कि बोको हरम,इस्लामिक स्टेट और अलकायदा जैसे आतंकी संगठन परमाणु हथियार और उसकी तकनीक हासिल करने की फिराक में लगे हैं,ऐसे में परमाणु अस्त्रो को सुरक्षित करना सभी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों का प्रमुख दायित्व है.लेकिन मौजूदा परिस्थितियों कुछ राष्ट्र इस मसले पर गंभीर नही हैं.जिसमें आतंक परस्त पाकिस्तान और उत्तर कोरिया प्रमुख हैं,एक तरफ में चरमपंथी ताकतें मजबूत हो रहीं तो दूसरी उत्तर कोरिया बार –बार अपने परमाणु शक्ति का परीक्षण कर रहा है,ऐसा में स्थिति और गंभीर हो जाती है.बहरहाल,अगर हम परमाणु सुरक्षा शिखर सम्मेलनों की पृष्टभूमि पर नजर डालें तो अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की पहल से पहला परमाणु सुरक्षा सम्मेलन 2010 में वाशिंगटन में आयोजित किया गया,दूसरा परमाणु सुरक्षा सम्मेलन 2012 में दक्षिण कोरिया में आयोजित किया गया था,तीसरे परमाणु सुरक्षा सम्मेलन का आयोजन प्राग में किया गया था.परमाणु सुरक्षा शिखर सम्मेलन के इस छह साल की यात्रा पर गौर करें तो बराक ओबामा के इस पहल ने सभी देशों का ध्यानाकर्षण परमाणु सुरक्षा की तरफ किया.तथा परमाणु हथियार को बानने में लगनें वाले सामग्रियों के तस्करी को रोकने के लिए आगाह किया.गौरतलब है कि इस चौथे शिखर सम्मेलन का आयोजन उस वक्त किया गया है.जब आतंकवाद समूचे दुनिया में अपने पाँव पसार रहा है,आतंकवाद का खतरा सभी देशों पर छाया हुआ है.लेकिन किसी भी देश के पास आतंकवाद से निपटने का कोई ठोस नीति नही है.फलस्वरूप कभी भारत में पठानकोट तो चंद दिनों पहले ब्रसेल्स में हुए आतंकवादी हमले इसके ताज़ा उदारहण हैं.आतंकवादी संगठन सरेआम अपने नापाक मनसूबों को अंजाम दे रहें है.दुनिया आतंकवाद की महामारी से गुजर रहा है.इसे रोकनें में अभी तक कोई देश सफल नही हुआ है.परमाणु सुरक्षा शिखर सम्मेलन में इस बात पर ज्यादा जोर दिया गया कि आतंकवादी संगठन परमाणु बम बनाने की सामग्री हासिल करनें का निरंतर प्रयास कर रहें है.उसे कैसे रोका जाए.जाहिर है कि अगर परमाणु बम बनाने की सामग्री किसी भी आतंकवादी संगठन के हाथों लग गई तो ये पुरे विश्व के लिए विध्वंसकारी होगा.इस बेहद गंभीर मुद्दे पर सभी देशों के प्रतिनिधियों ने चिंता जाहिर की कि परमाणु सुरक्षा को कैसे और पुख्ता किया जाए.ऐसी परिस्थिति में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की ये पहल प्रसंसनीय है.भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में पुनः सभी देशों का ध्यान आतंकवाद की तरफ आकृष्ट किया.प्रधानमंत्री मोदी ने मुख्य रूप से तीन बातों पर विशेष जोर दिया.मोदी ने बेहद शख्त लहजे में कहा कि सारे देश को यह धारणा छोड़ देनी चाहिए कि यह मेरा आतंकी है, और यह तुम्हारा आतंकी है.मोदी ने हाल हि में हुए ब्रसेल्स हमले का हवाला देते हुए कहा कि ये हमले दिखातें है कि परमाणु सुरक्षा पर आतंकवाद के कारण मंडराने वाला खतरा कितना वास्तविक व तात्कालिक है.इसके साथ ही मोदी ने ये कहा कि सभी देशों को इस संदर्भ में अपनी अंतराष्ट्रीय कर्तव्यों का पालन करना चाहिये.दूसरी बात मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा कि हम गुफा में छिपे आदमी की तलाश नही कर रहें है बल्कि हमें उसे आतंकी की तलाश है,जो शहर में है तथा कम्प्यूटर और स्मार्टफोन से लैश है.आखिरी में मोदी ने पाकिस्तान पर निशाना साधने हुए कहा कि परमाणु तस्करों  और आतंकियों के साथ मिलकर काम करने वाले सरकारी तत्व परमाणु सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं.अपने पुरे संबोधन में मोदी ने बगैर नाम लिए पाकिस्तान पर कई दफा हमला बोला ये बात जगजाहिर है कि पाकिस्तान सरकार आतंकवादियों की मदद करने से कोई गुरेज नही करती. और पाक से पनपे आतंकी भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बन रहें है.वर्तमान स्थिति में विश्व के सामने सबसे बड़ा खतरा आतंकवाद से है,प्रधानमंत्री मोदी लगातार इस विध्वंसकारी ,कट्टरपंथी ताकतों से लड़ने के लिए एक साथ आने की अपील कर रहें है.परमाणु सुरक्षा सम्मेलन में भारत की तरफ से दिए गये सुझावों पर सभी राष्ट्रों को गंभीरता से चिंतन करना चाहिए.यदि वक्त की नजाकत को देखतें हुए आतंकवाद के विरूद्ध सभी देश एकजुट नही हुए तो वो दिन दूर नही कि आतंकी संगठन परमाणु सामग्री को अपने चपेट में ले लेंगे और दुनिया को तबाह कर देंगे. बहरहाल,ये देखने वाली बात होगी कि भारत की इस अपील को दुसरे राष्ट्र कितने गंभीरता से लेतें है,अब वो समय आ गया है कि विश्व के सभी अमन पसंद देश आतंक के मसले पर भारत के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलें.परमाणु हथियारों को पूर्णतया तभी सुरक्षित माना जा सकता है जब दुनिया आतंकवाद से निपटने  की कोई ठोस नीति बनाएं.


देर से ही सही लेकिन पीड़ितो को मिला न्याय

    
  भारतीय न्याय व्यवस्था की रफ्तार कितनी धीमी है,इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पीलीभीत में पचीस साल पहले हुए एक फर्जी मुठभेड़ का फैसला अब आया है.दरअसल,उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में आज से तकरीबन पचीस साल पहले पुलिस ने दस सिख युवकों को आतंकवादी बताकर मौत के घाट उतार दिया था.इस मामले की जाँच कर रही सीबीआइ की स्पेशल कोर्ट ने उस मुठभेड़ को फर्जी करार देते हुए,उस एनकाउंटर में संलिप्त सभी दोषी 47 पुलिसकर्मियों को जुर्माना तथा आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई है. इस फैसले के आने के बाद से स्पष्ट हो गया है कि पुलिस ने योजनाबद्ध तरीके से इस मुठभेड़ को अंजाम दिया था,जिसमें हर एक पहलू इस बात की पुष्टि करतें है कि पुलिस इस मुठभेड़ के लिए पहले से पूरी तरह तैयार बैठी थी.इस पुरे प्रकरण की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो 12 जुलाई 1991 को सिख समुदाय के लोग पटना साहिब,नानकमथा,हुजुर साहिब समेत कई और तीर्थ स्थलों से लगभग पचीस सिख तीर्थयात्रियों का जत्था वापस लौट रहा था.सुबह करीब ग्यारह बजे पुलिस ने श्रध्दालुओं से भरी इस बस को पीलीभीत जिले के कछालाघाट पुल के पास बस को घेर लिया और भरी बस में से ग्यारह पुरुष तीर्थयात्रियों को अपने कब्जे में लिया उसके बाद पुलिस ने अपनी सुनयोजित योजना के अनुसार युवकों को दो –तीन समूहों में बाँट दिया फिर अलगअलग थाना क्षेत्रों में मुठभेड़ की आड़ में पुलिसकर्मियों ने इन्हें मार दिया.इस निर्मम हत्या को पुलिस ने मुठभेड़ का रूप देने में कोई –कोर कसर नही छोड़ी.दरअसल ये वह दौर था जब पंजाब में आतंकवाद का अपने पुरे चरम पर था.सरकारें इसे रोकने में विफल साबित हो रहीं थीं.फलस्वरूप उस वक्त की सरकारें आतंकियों को मारने वाले पुलिसकर्मियों को पुरस्कार पदोन्नति का प्रलोभन दिया था,इसी लालच से वशीभूत होकर पुलिसकर्मियों ने इस रोंगटे खड़े करने वाली घटना को अंजाम दिया था.बहरहाल,इस मुठभेड़ के बाद पुलिस ने झूठ की बुनियाद पर तैयार किये गये कागजों के आधार पर ये दावा किया कि उसने दस आतंकवादियों को मार गिराया है.इस मुठभेड़ के बाद पुलिस की खूब वाहवाही हुई,लेकिन आज हक़ीकत सबके सामने है.बहरहाल,हैरान करने वाली बात यह भी है कि उस समय उत्तर प्रदेश की सत्ता पर आसीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने इस पुरे मामले को समझे बगैर इस मुठभेड़ में शामिल सभी पुलिसवालों की खूब तारीफ किया था तथा सम्मानित भी किया.खैर तमाम प्रकार की क़ानूनी दावं-पेंच के बाद 20 जनवरी 2003 को अदालत में सभी दोषियों पर आईपीसी की धारा 302, 364, 365, 218 व सपठित धारा 120 बी के तहत चार्जशीट दायर की थी.गौरतलब है कि इस पुरे प्रकरण की जाँच में कभी लंबा वक्त लगा.पचीस वर्ष तक चले इस न्यायिक प्रक्रिया के दौरान दस दोषी काल के गाल में समा चुके है.खैर,पुलिस का इतना क्रूर चेहरा सबके सामने तब आया जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए इस मामले की जाँच सीबीआई सौंपी.इस पुरे मामले की गहन जाँच के बाद मिले सुबूतों व गवाहों आधार पर सीबीआई ने सभी आरोपियों पर हत्या,अपहरण ,साजिश रचने आदि संगीन धाराओं पर आरोप तय किये गये.इस पुरे मामले की सुनवाई 29 मार्च को पूरी कर ली गई थी तथा सभी दोषियों को सोमवार को सज़ा सुनाई गई.इस प्रकार इस फैसले ने उन सभी पीड़ितों को न्याय दिया जो पिछले पचीस वर्ष से इंसाफ के लिए लड़ रहे थे.बहरहाल,ये पहली बार नही है जब पुलिस ऐसे मामलों में दोषी पाई गई है,एक लंबी फेहरिस्त है जिसमें पुलिस अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर के निर्दोष लोगो को अपनी बर्बरता का शिकार बनाया है.आज से दो दशक पहले और आज की परिस्थिति के अनुसार अगर हम आंकलन करें तो पुलिस के रवैये में बहुत ज्यादा बदलाव हमें देखनें को नही मिला है.जिसकी दरकार है.पुलिस द्वारा किये गये हर मुठभेड़ को शक की निगाह से देखा जाता है.पुलिस के इन्ही सब रवैये के कारण आम जनमानस में पुलिस आज भी भरोसा नही जुटा पाई है.इसका एक कारण यह भी है कि वर्तमान समय में भी पुलिस लोगों को प्रताड़ित करती है यहाँ तक कि अपने आप को जनता का सेवक कहने वाली पुलिस एक मामूली एफआईआर तक के लिए आम जनता को परेसान करती है.मौजूदा समय में भी कई ऐसे मसले आतें हैं जिसमें पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठतें है.बहरहाल, इस फैसले के आने के बाद से एक  बुनियादी प्रश्न खड़ा होता है कि क्या इस फैसले के आने के बाद फर्ज़ी मुठभेड़ रुकेंगे ? सवाल के निहितार्थ को समझे तो पुलिस द्वारा किये गये सभी  मुठभेड़ समूचे पुलिस व्यवस्था को शक के दायरें में खड़े करते है.इस सज़ा के आने के बाद से पुलिस विभाग को अपनी गिरती हुई साख को बचाने की चुनौती होगी.इस आधार पर हम कह सकतें है कि निश्चय ही यह फैसला पुलिस द्वारा किये जा रहे फर्ज़ी मुठभेड़ को रोकने में सहायक सिद्ध होगा बशर्ते पुलिस औपनिवेशिक मानसिकता से बहार निकले.