Thursday, 17 March 2016

भारत माता की जय के नारे लगाना गर्व की बात

     भारत माता की जय के नारे लगाना गर्व की बात -:  
अपने घृणित बयानों से सुर्खियों में रहने वाले हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी इनदिनों फिर से चर्चा में हैं.बहुसंख्यकों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए ओवैसी बंधु आए दिन घटिया बयान देते रहतें है.लेकिन इस बार तो ओवैसी ने सारी हदें पार कर दी.दरअसल एक सभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने कहा कि हमारे संविधान में कहीं नहीं लिखा की भारत माता की जय बोलना जरूरी है,चाहें तो मेरे गले पर चाकू लगा दीजिये,पर मै भारत माता की जय नही बोलूँगा.ऐसे शर्मनाक बयानों की जितनी निंदा की जाए कम है .इसप्रकार के बयानों से ने केवल देश की एकता व अखंडता को चोट पहुँचती है बल्कि देश की आज़ादी के लिए अपने होंठों पर भारत माँ की जय बोलते हुए शहीद हुए उन सभी शूरवीरों का भी अपमान है,भारत माता की जय कहना अपने आप में गर्व की बात है.इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है कि जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधि अपने सियासी हितो की पूर्ति के लिए इस हद तक गिर जाएँ कि देशभक्ति की परिभाषा अपने अनुसार तय करने लगें.इस पुरे मसले पर गौर करें तो कुछ दिनों पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने एक बयान दिया था जिसमें कहा था कि नई पीढ़ी को देशभक्ति की बातें सिखाई जानी चाहिए.जाहिर है कि यह बयान भागवत ने जेएनयू में हुए देश विरोधी गतिविधियों को लेकर दिया था,संघ प्रमुख के बयान के विरोध के लिए ओवैसी ने विरोध की सारी सीमायें लांघते हुए भारत माता की जय कहनें से इनकार कर दिया.वहीँ दूसरी ओर महाराष्ट्र में ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के  विधायक युसुफ पठान भी अपने आकां के पद चिन्हों पर चलनें की कोशिश की इसके बाद सभी दलों ने मिलकर स्पीकर से निलंबन की मांग की नतीजा उन्हें विधानसभा के मौजूदा सत्र से निलंबित कर दिया गया.बहरहाल,ओवैसी के इस बयान के बाद से राजनीतिक गलियारों समेत समाज के हर तबके से तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गईं हैं,राज्य सभा में जावेद अख्तर ने ओवैसी पर जोरदार हमला करते हुए कहा कि ओवैसी एक मुहल्ले के नेता है,अगर संविधान में भारत माता की जय कहना नही लिखा है तो, टोपी और शेरवानी पहनना भी नही लिखा है,जावेद अख्तर ने ओवैसी को नसीहत देते हुए कहा कि भारत माता की जय बोलना मेरा कर्तव्य नही बल्कि यह मेरा अधिकार है.सरकार ने भी इस बयान को दुर्भाग्यपूर्ण बताया.इन सब बीच सवाल उठता है कि ओवैसी इस बयान के द्वारा देश को क्या संदेश देना चाहतें हैं ?भारत जैसे लोकतांत्रिक देश की राजनीति आज देशद्रोह और देशभक्ति में उलझ कर रह गई है.एक तरफ देशभक्ति का प्रमाणपत्र दिया जा रहा है,तो दूसरी तरफ देशद्रोही कहलाने का फैशन चल पड़ा है.इसमें कोई दोराय नहीं कि,भारत माता की जय कहने से कोई देश प्रेमी हो जायेगा या भारत माता की जय नही बोलने वाला कोई देशविरोधी लेकिन, जिस देश की आज़ादी के लिए लाखों –करोड़ो लोग भारत माता की जय के उद्घोष के साथ अंग्रेजो की बर्बता को झेला है उस नारे की मुखालफत करना कतई उचित नहीं है.ऐसे बयानों के द्वारा ओवैसी किस समुदाय को खुश करना चाहतें हैं ? जाहिर है कि भारत के किसी भी समुदाय का नागरिक ओवैसी के इस बयान से इस्तेफांक नही रखते,आमजन को पता है कि इसी नारें ने हमें स्वतंत्र कराया. उस नारे का विरोध करना ओवैसी की मंशा पर सवालिया निशान खड़ें करतें है.एक बुनियादी सवाल उठता है कि भारत माता की जय नारे से ओवैसी को आपत्ति क्यों है ? इस सवाल की तह में जाएँ तो यह नारा किसी धर्म विशेष से भी ताल्लुक नही रखता है.यह भारतीयता का प्रतीक है हर भारतीय को भारत माता की जय कहने में गर्व की अनुभूति होती है,अब इस नारे पर बेतुकी बातें करना एक ओछी मानसिकता का परिचायक है.भारत माता की जय के नारे हर समुदाय के लोग लगातें है,इसमें किसी को कोई आपत्ति नही होती है.ओवैसी इस बयान के द्वारा मुस्लिमों को रिझाने का कुत्सित प्रयास कर रहें है तो कहीं न कहीं वो गफलत में हैं,ऐसे बयानों से हमारे देश का कोई  समुदाय अपनी स्वीकार्यता प्रदान नही करेगा.हमारे सामने कई ऐसे मामले आयें है.जब मुस्लिम झंडाबरदारों ने देश के राष्ट्रगीत से लेकर राष्ट्रगान तक पर सवाल उठायें है लेकिन मुस्लिम समुदाय ने उसका पुरजोर विरोध किया है जाहिर है कि ओवैसी के इस बयान के बाद से कई मुस्लिम संगठनों से इस बयान की भर्त्सना की है,जो काबिलेतारीफ़ है.बहरहाल,हमें उन सभी बयानों का बहिष्कार करना चाहिए जो देश की एकता अखंडता तथा समाज को बाटनें का काम करें,देश के प्रति सबकी आस्था है.उसके प्रदर्शन का तरीका सबका अलग-अलग हो सकता है.किसी के देशभक्ति पर सवाल खड़ें करना भी अनुचित होगा.बहरहाल,इस प्रकार के घटिया बयान के जरिये ओवैसी सस्ती लोकप्रियता बटोरने की नाकाम कोशिश कर रहें है,  

Wednesday, 9 March 2016

विवादों के घेरे में विश्व संस्कृति महोत्सव

      

 श्री श्री रविशंकर की संस्था आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित तीन दिवसीय विश्व संस्कृति महोत्सव विवादों में घिर गया है.इस कार्यक्रम की तैयारी लगभग पूरी कर ली गई है,किंतु अब इस कार्यक्रम पर संशय के बादल मंडराने लगें हैं.आर्ट ऑफ़ लिविंग के 35 साल पूरा होने के अवसर पर दिल्ली में यमुना किनारे 11 से 13 मार्च तक अंतराष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव का आयोजन होना है.लेकिन यमुना जियो अभियान एनजीओ के संयोजक समेत कुछ और पर्यावरणविदों ने कार्यक्रम को रदद् कराने के लिए एक याचिका दायर की है.याचिका में यमुना जिए अभियान का आरोप है कि आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था ने एनजीटी के नियमों को दरकिनार करते हुए,यमुना किनारे निर्माण कार्य किया है.आरोप ये भी है कि यमुना किनारे की हरियाली को जलाकर उसपर मलबा डाल कर समतल किया गया है,जिससे यमुना को हमेशा के लिए नुकसान पंहुचा है.एनजीटी ने याचिका की सुनवाई करते हुए सभी विभागो को कड़ी फटकार लगाई है.नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सरकार से पूछा है कि आयोजन के लिए पर्यावरण मंजूरी की जरूरत क्यों नही है ? एनजीटी के चेयरमैन स्वतंत्र कुमार ने वन  एवं पर्यावरण मंत्रालय से जवाब माँगा है.जाहिर है कि इतने बड़े आयोजन को लेकर सभी पक्षों ने लापरवाही बरती है,किसी ने भी इस कार्यक्रम को लेकर यमुना तथा पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव पर ध्यान नही दिया है.यहाँ तक की सुरक्षा ,पार्किंग,पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर आर्ट ऑफ़ लिविंग नेविशेष ध्यान नही दिया है.किसी भी बड़े आयोजन के लिए इस प्रकार की चुक करना निश्चित ही दुर्भाग्यपूर्ण है.बहरहाल ,ट्रिब्यूनल ने सेना द्वारा बनाएं गये पंटून पुल पर भी सवाल खड़े किए हैं. एनजीटी ने दिल्ली विकास प्राधिकरण के पूछा है कि क्या आयोजन में नियमों की अनदेखी तो नही हुई ? क्या डीडीए ने अनुमति देने के बाद देखा की नदी में कोई मलबा तो नही डाला गया ? इसके जवाब में डीडीए ने कहा है कि आयोजन की मंजूरी नियमों के मुताबिक ही दी गई है.डीडीए ने दलील दी है कि वहां कोई मलबा नही था.वहीँ एनजीटी ने आर्ट ऑफ़ लिविंग से भी सवाल पूछा कि इतने बड़े आयोजन की पूरी जानकारी डीडीए को क्यों नही दी गई ? इसके जवाब में श्री श्री रविशंकर ने कहा कि हमने सारी जरूरी मंजूरी ली है,कार्यक्रम के बाद इस जगह को कतई बर्बाद नही किया जायेगा.सबकी दलीलें सुनने के बाद एनजीटी ने मंत्रालयों के जवाब आने तक सुनवाई को टाल दिया है.गौरतलब है कि विवाद को बढ़ता देख राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने इस कार्यक्रम में शामिल होने में असमर्थता जताई है तो वहीँ प्रधानमंत्री के नही आने की भी अटकलें तेज़ हो गई हैं.इसमें कोई दोराय नहीं है कि श्री श्री रविशंकर लगातार मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ करने का काम किया है तथा शन्ति दूत के रूप में विश्व भर में अपने आप को स्थापित किया है. श्री श्री रविशंकर खुद पर्यावरण को लेकर बहुत सजग रहें है,समय –समय पर उनकी संस्था नदियों को साफ करने के लिए तथा बढ़ते प्रदुषण को कम करने के लिए लोगो को जागरूक करने का काम करती रहती है.चुकी यह कार्यक्रम अध्यात्मिक गुरु का है जिसके अनुयायी पुरे विश्व भर में फैले हुए है,इसलिए इस कार्यक्रम का भविष्य क्या होगा इसपर सबकी नजरें टिकी हुई है.बहरहाल ,अब इस कार्यक्रम को लेकर सियासत भी तेज़ हो चली है, कांग्रेस समेत कई दल श्री श्री रविशंकर के बहाने सरकार पर निशाना साधने से नही चुक हैं.सभी  विपक्षी दल इस कार्यक्रम के आयोजन को लेकर सरकार पर सवाल खड़े कर रहें हैं,विरोधियों का आरोप है कि श्री श्री रविशंकर बीजेपी के करीबी हैं इसलिए सरकार सभी नियमों को ताक पर रखकर कार्यक्रम कराने की अनुमति दे रही है.वहीँ श्री श्री रविशंकर ने अपने बयान में कहा है कि आर्ट ऑफ़ लिविंग ने सभी नियमों व कायदों  को ध्यान में रखतें हुए इस कार्यक्रम की तैयारी की है.श्री श्री पूरी तरह आश्वस्त हैं कि फैसला उनके पक्ष में आ जायेगा,वहीँ इस बात को दरकिनार नहीं किया जा सकता कि आर्ट ऑफ़ लिविंग ने जो दलीलें दी हैं उसमें विरोधाभास हैं,एनजीटी में दी गई दलील के अनुसार कार्यक्रम में दो से तीन लाख लोगों के आने की बात कही गई है लेकिन,आर्ट ऑफ़ लिविंग की वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से पढ़ा जा सकता है कि इस कार्यक्रम में देश-दुनिया से तकरीबन पैंतीस लाख लोगों के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है.आर्ट  ऑफ़ लिविंग को यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि कहीं न कहीं चुक हुई है,जिसके कारण बवाल इतना बढ़ा है.बहरहाल एनजीटी का फैसला जो आएं परन्तु ऐसे अंतराष्ट्रीय कार्यक्रमों में आयोजकों को सभी नियमों और प्रावधानों का ठीक ढंग से अनुसरण कर लेना चाहिए ताकि आयोजन पर सवाल उठने की गुंजाइश ही न हो,खुदा न खास्ता अगर एनजीटी का फैसला आर्ट ऑफ लिविंग के पक्ष में नहीं आया तो इससे 155 देशों के आने वाले प्रतिनिधियों के मन में  भारत के प्रति क्या संदेश जायेगा ?विश्व में भारत की पहचान एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में होती है.ये कार्यक्रम भी सांस्कृतिक है.इस दृष्टि से इस कार्यक्रम को रदद् करने से भारत की छवि पर बुरा असर पड़ेगा,अगर कार्यक्रम को लेकर आर्ट ऑफ़ लिविंग ने नियमों व प्रावधानों का उल्लंघन किया है.इसके बावजूद इस कार्यक्रम के आयोजन की अनुमति राष्ट्रीय हरित अधिकरण को दे देनी चाहिए,कार्यक्रम को निरस्त करने से देश की छवि के बुरा असर पड़ेगा.जाहिर है कि ऐसे अन्तराष्ट्रीय कार्यक्रम राष्ट्र की अस्मिता से जुड़ जाते हैं,आर्ट ऑफ़ लिविंग के कुछ गलतियों के चलते देश की छवि को नुकसान पहुँचाना कतई उचित नहीं होगा,एनजीटी को इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए अपना फैसला सुनाना चाहिए.अलबत्ता अगर आर्ट ऑफ़ लिविंग का ये कार्यक्रम एनजीटी के मानकों पर खरा नहीं उतरी है तो संस्था पर कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए.  

Tuesday, 8 March 2016

पांचो राज्यों में बीजेपी की जीत होगी क्योंकि ...

    


चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बिगुल बजा दिया है.असम,पश्चिम बंगाल,तमिलनाडु,केरल और केंद्र शासित राज्य पुडुचेरी में होने जा रहे चुनावों की तारीखों का ऐलान होते ही सभी राजनीतिक दलों में हलचल तेज़ हो गई है.सभी पार्टियाँ अपनी –अपनी सियासी बिसाद बिछाने को तैयार दिख रहीं हैं.दरअसल इस चुनाव में परिणाम चाहें जो आएं किंतु इस बात से नकारा नही जा सकता की ये चुनाव सभी दलों के लिए वर्चस्व की लड़ाई है.4 अप्रेल से शुरू हो रहा चुनावी समर 16 मई तक चलेगा. सभी राज्यों के परिणाम एक साथ 19 मई को आयेंगे.गौरतलब है कि केंन्द्र में सत्तारूढ़ दल बीजेपी के पास इस चुनाव खोने के लिए कुछ नही है,अगर बीजेपी अच्छा प्रदर्शन करती है तो,ये बीजेपी के लिए बोनस होगा.वहीँ दूसरी तरफ कांग्रेस तथा वामदलों की सियासत दाव पर रहेगी.वामदलों को अपने सिकुड़ते जनाधार को बढ़ाने की बड़ी चुनौती होगी तो वहीँ कांग्रेस के लिए ये चुनाव अग्निपरीक्षा से कम नही होगा. केरल तथा असम दोनों जगह कांग्रेस पार्टी सत्ता में है.कांग्रेस के लिए यह चुनाव बेहद कठिन होनें जा रहा क्योंकि दोनों जगहो पर कांग्रेस की स्थिति बहुत अच्छी नही दिखाई दे रही है.पश्चिम बंगाल में ममता बेनर्जी सत्ता में बने रहना लगभग तय दिख रहा क्योंकि वामदलों को वहां की जनता सिरे से खारिज कर चुकीं है,लेफ्ट को बंगाल में वापसी की राह आसान नही होगी,अगर वामदल कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़तें है, हालांकि इसकी संभावना कम नजर आ रही क्योंकि केरल में दोनों आमने –सामने हैं,परन्तु भारतीय राजनीति में इस बात से मुंह नही मोड़ा जा सकता की सत्ता में आने के लिए राजनीतिक दल अपनी सुविधानुसार गठबंधन कर लेते हैं,बिहार चुनाव इसका ताजातरीन उदाहरण हैं,जहाँ दो राजनीतिक ध्रुव सत्ता के लिए एक होकर चुनाव लड़ें और जीतें भी हैं.बहरहाल,इसके बावजूद सत्ता तक पहुंचना लेफ्ट के लिए दूर की कौड़ी है,पश्चिम बंगाल के पिछले चुनाव के समीकरणों को समझे तो,कुल 294 विधानसभा सीटें है,जिसमें 184 सीटें ममता की अगुवाई वाले तृणमूल कांग्रेस के कब्जे में हैं,वामदलों के पास 62 सीटें तो वहीँ कांग्रेस के पास महज 42 सीटें मिली थी,इस चुनाव में भी हवा ममता के पक्ष में है,अगर वामदल और कांग्रेस एक साथ भी चुनाव लड़तें हैं तो ममता को सत्ता से बाहर करना आसान नही होगा.बीजेपी अगर बंगाल में अपना खाता भी खोल लेती है तो उसके लिए यही बड़ी बात होगी.केरल में फिलहाल कांग्रेस की सरकार है,यहाँ की परिपाटी रही है कि हर चुनाव में सत्ता बदलती है,इस आधार पर हम कह सकतें है कि वामदलों की फिर से वापसी हो सकती है,यहाँ भी कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ सकता है,इस पराजय से सीधा सवाल कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी की राजनीतिक क्षमता पर उठेने तय हैं. खैर ,तमिलनाडु  में जयललिता अपनी सरकार की उपलब्धियों को लेकर जनता के बीच जाएँगी तो वही करुणानिधि कांग्रेस के साथ मिलकर इस बार सत्ता में वापसी के ताल ठोंक रहें है,देखना दिलचस्प होगा कि जयललिता अपनी सरकार बचा लेती है अथवा करुणानिधि की वापसी होगी.पुडुचेरी की राजनीति से दोनों राष्ट्रीय दलों का कोई खास लगाव नही रहा है.बहरहाल,असम को छोड़ बीजेपी की सियासत किसी भी राज्य में दावं पर नही होगी.पहले दिल्ली तथा उसके बाद बिहार में मिली बीजेपी की करारी शिकस्त को विरोधियों ने केंद्र सरकार की विफलता के रूप में प्रसारित किया,विपक्ष संसद से सड़क तक मोदी के खिलाफ माहौल बनाने में सफल रहा.अब बीजेपी के सामने चुनौती है कि इन राज्यों में विगत चुनाव की अपेक्षा बढिया प्रदर्शन करे ताकि सरकार की साख पर सवाल उठाने का मौका फिर से विरोधियों को न मिले,इन सब के बीच महत्वपूर्ण बात ये है कि इन सभी राज्यों में से खासकर असम व केरल में कांग्रेस सत्ता में है.असम में माहौल मुख्यमंत्री तरुण गंगोई के खिलाफ है,स्पष्ट है कि कांग्रेस की सियासी जमीन असम में खिसक रही हैं.जिसका फायदा बीजेपी को मिलना तय है.अगर असम में बीजेपी सत्ता पर काबिज़ होती है तो ये बीजेपी के लिए दो राज्यों में मिली हार का डैमेज कंट्रोल होगा तथा इस जीत असर भी दूरगामी होगा.इसमें कोई दोराय नही है कि पांचो राज्यों में बीजेपी अपनी पूरी ताकत से चुनाव मैदान में उतरेगी.जाहिर है कि इस चुनाव को 2017 में होनें वाले यूपी तथा पंजाब चुनाव के सेमीफाइनल के रूप में देखा जा रहा है.इन सब के बीच बीजेपी को चाहिए कि इस चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे को आगे करने की बजाय पार्टी खुद अपने दम पर ये चुनाव लड़े.  
  

Sunday, 6 March 2016

कामरेड कन्हैया आपने बोला तो बहुत कुछ मगर कहा क्या !


देशद्रोह जैसे संगीन आरोपो से घिरे जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को दिल्ली हाईकोर्ट ने छह माह की अंतरिम जमानत पर रिहा कर दिया.इसके साथ ही कोर्ट ने जेएनयू में हुए देश विरोधी घटनाओं पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए अपने तेईस पेज के फैसले में कोर्ट ने कन्हैया समेत जेएनयू के प्रोफ़ेसरों को कड़ी फटकार लगाई है.अपने फैसले में कोर्ट ने कई बातों का जिक्र किया है,जिसपर गौर करने के बजाय वामपंथियों ने कन्हैया का महिमामंडन करना शुरू कर दिया है.कोर्ट ने अपने फैसले में देश विरोधी नारे लगाने वालों के लिए कहा कि, एक तरह से इंफेक्शन छात्रों में फैल रहा है.इसे बीमारी बनने से पहले रोकना होगा.एंटी बायोटिक से इंफेक्शन कंट्रोल न हो तो, दूसरे चरण का इलाज शुरू किया जाता है.ऑपरेशन की भी जरूरत पड़ती है.उम्मीद है न्यायिक हिरासत में कन्हैया ने ये सोचा होगा कि आखिर ऐसी घटनाएँ हुई क्यों ? कोर्ट के द्वारा कही गई इन बातों से स्पष्ट होता है कि, कोर्ट इस मसले पर गंभीर एवं सजग है.इस संयमित निर्णय में कोर्ट ने कन्हैया के घर की माली हालत का भी जिक्र किया तो वहीँ एक छात्रसंघ अध्यक्ष के रूप में भी कन्हैया को उसकी जिम्मेदारीयों से भी अवगत कराया .भारतीय लोकतंत्र एक उदार लोकतंत्र है,यही हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती भी है.हमे इस उदारता का सम्मान करना चाहिए.पंरतु, जमानत के बाद से इस उदारता का अनुचित लाभ उठाने में वामपंथियो ने तनिक भी देर नहीं लगाई.खैर,शर्तों के साथ मिली जमानत पर जश्न और कन्हैया की जीत के नारे लगाने वाले ये भूल रहें हैं कि कोर्ट ने कन्हैया को अभी क्लीनचिट नहीं दी है,तथा न ही कन्हैया को देशद्रोह के आरोपों से मुक्त किया है.कोर्ट के फैसले पर आत्ममंथन करने के बजाय कन्हैया कुमार को हीरो बनाने का ठेका हमारे वामपंथी बुद्दिजीवियों ने लिया है,वो अपने आप में दर्शता है कि इस विचारधारा के लोग अंतरिम जमानत के मायने को समझने में असमर्थ हैं अथवा अपने बौद्धिक अहंकार के आगे संविधान को दरकिनार कर रहें हैं.इसमें मीडिया के लोग तथा तथाकथित बुद्दिजीवी वर्ग कन्हैया को नायक बनाने की नाकाम कोशिश करने में लगे हुए है,दरअसल विमर्श को मुद्दा ये होना चाहिए कि छात्रों को संक्रमण से कैसे बचाना है ? मगर लाल सलामी वाले इस विमर्श में दिलचस्पी दिखाने के बजाय कन्हैया में तमाम प्रकार की संभावनाओं को तलाश रहें हैं.गौरतलब है कि जेल से रिहा होने के बाद जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष ने जिस लहजे में अपना भाषण दिया आज पुरे देश में चर्चा का विषय बन गया है.इसमें कोई दोराय नहीं है कि,आज भी देश में असमानता है ,गरीबी है तथा महंगाई भी है,भ्रष्टाचार रूपी दानव अपना विक्राल रूप लिए आपको हर मोड़ पर खड़ा मिलेगा,इन सब बातों का जिक्र कन्हैया ने अपने भाषण के दौरान किया और खूब लोकप्रियता बटोरने का चतुर प्रयास किया.काफी हद तक कन्हैया अपने इस एजेंडे में सफल भी रहा लेकिन,लगभग चालीस मिनट के भाषण में कन्हैया ने उन सब बातों का जिक्र करना भी मुनासिब नहीं समझा जिसके कारण आज इतना बड़ा बवाल हुआ है.अगर स्पष्ट शब्दों में कहें तो कन्हैया ने अपना भाषण एक राजनेता के तौर पर तैयार किया था,न कि एक छात्र नेता के तौर पर,यही कारण है कि देश के कुछ राजनेता कन्हैया की तारीफ करने का मौका गवाना नहीं चाहते हैं.सवाल खड़ा होता है कि कन्हैया ने ऐसा क्या कह दिया कि कुछ राजनेताओं को ये भाषण इतना प्रिय लगा.दरअसल कन्हैया ने अभिव्यक्ति की आज़ादी का भरपूर इस्तेमाल करते हुए अपने पुरे भाषण में सरकार तथा आरएसएस पर तीखा हमला किया.जिससे सरकार भी असहज स्थिति में दिख रही है.कन्हैया द्वारा कही गई बातें समूचे विपक्ष को बहुत पंसद आई है,शायद ऐसा तार्किक हमला हमारे सियासतदान भूल चुके थे,कन्हैया ने सत्ता पक्ष को तो असमंजस में डाला ही है,इसके साथ ही विपक्ष को भी सकारात्मक व जनसरोकारी मुद्दों का पाठ पढ़ाया है.बहरहाल कामरेड कन्हैया के भाषण को गौर पूर्वक सुनने के पश्चात् कुछ सवाल खड़े होते हैं.कन्हैया ने बोला तो बहुत कुछ मगर कहा क्या ? ये बात इसलिए क्योंकि पुरे जेएनयू कांड पर कन्हैया ने एक शब्द भी नहीं बोला,पुरे भाषण में उसने अपनी राजनीति चमकाने का भरपूर प्रयास किया,जिसमे अभी तक सफल भी दिख रहा है.लेकिन इन सब के बीच मुख्य मुद्दे को कन्हैया ने बड़ी चतुराई से गौण करने का कुटिल प्रयास किया है.कन्हैया को इसी मंच से ये कहना उचित क्यों नही लगा कि जिस इन्फेक्शन की बात कोर्ट ने कही है.हमें जेएनयू के कैम्पस में इस देशद्रोह जैसे इन्फेक्सन से आज़ादी चाहिए,संघ से आज़ादी ,मोदी सरकार से आज़ादी इस वैचारिक विरोध के अतिरिक्त कन्हैया ने देश को क्यों नही आश्वस्त किया कि आगे से जेएनयू में अफजल या किसी भी आतंकवादियों की बरसी पर अगर कोई कार्यक्रम होता है तो जेएनयू छात्र संघ विरोध करेगा ? कन्हैया ने क्यों नही इस बात पर जोर दिया कि कोर्ट ने जिस संक्रमण की बात कही है,उस संक्रमण को रोकने के लिए जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष होने के नाते मैं इस इंफेक्शन को रोकने का हर संभव प्रयास करूंगा,इन सब बातों का जिक्र न कर के कन्हैया ने गरीबी,भ्रष्टाचार की आड़ में देश को गुमराह करने की नाकाम कोशिश की है.दूसरी बात कन्हैया के अनुसार ये पूरा मामला जेएनयू को बदनाम करने की साजिश है,जो सरकार तथा आरएसएस के इशारे पर हो रहा है.परंतु कन्हैया ये भूल रहा है कि जेएनयू को किसी ने सबसे ज्यादा बदनाम किया है, तो वो वामपंथी विचारधारा ने किया है.क्यों वहां ऐसे कार्यक्रम होते हैं जिससे देश का अपमान होता है.जब भी हमारे सैनिक नक्सलियों की गोली का शिकार होते हैं तो जेएनयू में जश्न क्यों मनाया जाता है.क्यों वहां देश के बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को आहात करने के लिए दुर्गा का अपमान तथा महिषासुर का महिमामंडन किया जाता है? ये वो बातें हैं जिसने जेएनयू की छवि को खराब किया है,जिसके सीधे तौर पर जिम्मेदार वामपंथी विचारधारा के छात्र है.रिहाई के बाद जीत के नशे में डूबे कन्हैया एंड कंपनी को कोर्ट के तेईस पेज के फैसले को ध्यानपूर्वक पढना चाहिए ताकि अभिव्यक्ति की आज़ादी के मायने तथा अपनी जिम्मेदारी को ठीक ढंग से समझ सकें.