Tuesday, 23 February 2016

आरक्षण पर व्यापक विमर्श की जरूरत


राजस्थान ,गुजरात  के बाद आरक्षण के जिन्न ने हरियाणा को अपनी जद में ले लिया है.हरियाणा में आरक्षण की मांग को लेकर जाट समुदाय के लोग सड़को पर उतर आएं हैं.पिछले सात दिनों से जाटों का चल रहा आंदोलन शुक्रवार से हिंसक हो गया है.प्रदर्शनकारी जगह –जगह गाडियों को जला दे रहें है ,रेलवे की पटरियों को उखाड़ दे रहें है, हाइवे को जाम कर दिए है.जिससे आवागमन पूरी तरह से बाधित है.पांच सौ से अधिक ट्रेनों को रदद् कर दिया है,सैकड़ो ट्रेनों के रूट को  बदल दिया गया है.आठ जिलों में फैले इस आंदोलन में रोहतक और भिवानी के हालात सबसे ज्यादा खराब है.उग्र होते प्रदर्शन को देखते हुए सरकार ने रोहतक और भिवानी में इंटरनेट को भी बंद करा दिया है.हिंसा के मध्यनजर राज्य सरकार ने पहले कर्फ्यू लगाया,इसके बावजूद जब स्थिति नियंत्रण में नही दिखी तो देखते ही गोली मारने के आदेश दे दिए.इस आदेश का भी कोई प्रभाव प्रदर्शनकारियों पर होता नही दिख रहा है.स्थिति बेकाबू होती चली जा रही है,प्रदर्शनकारियों और पुलिस की भिंडत में अभी तक आठ लोग अपनी जान गवां चुके है.आंदोलन कितना व्यापक है इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि बाहर से सेना बुलाने के बाद भी स्थिति पर पूरी तरह से काबू नही पाया जा सका है. प्रदर्शनकारियों को हिंसा से रोकने में अभी तक शासन तथा प्रशासन विफल रहें हैं.हंगामे को थमता हुआ नही देख हरियाणा सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े जाटों को आरक्षण देने की बात कही है. वही केंद्र सरकार ने भी भरोसा दिलाया है कि उनकी मांगो पर जल्द ही सरकार सहमती देगी.उनकी मुख्य मांग ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण देने का है,बहरहाल शुक्रवार को हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने इस आपात स्थिति को काबू करने तथा इस मसले का हल निकालने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई,जिसमें उन्होंने जाटों के आरक्षण के मसले पर सबकी सहमती के बाद यह फैसला लिया .राज्य सरकार ने समीक्षा के लिए एक कमेटी का गठन किया है,जो 31 मार्च को रिपोर्ट पेश करेगी.बहरहाल, ये पहली बार नही है जब जाट आरक्षण के लिए सडको पर उतरे हो इनके आंदोलन का एक लंबा इतिहास रहा है,जब कोई चुनाव आता हमारे राजनेता वोटबैंक के लिए जाटो को आरक्षण देने की वकालत करने से नही चुकते परन्तु सत्ता में आने के बाद अपने स्वभाव के अनुकूल अपने वादों को भूल जाते है.जिससे जाट हर बार अपने आप को ठगा हुआ महसूस करता है.इसमें कोई दोराय नही कि जाट हरियाणा में समृद्ध समुदाय है लेकिन उनके आरक्षण की मांग को हवा हमारे सियासतदानों ने ही दिया है.विगत लोकसभा चुनाव के ठीक पहले यूपीए सरकार ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए हरियाणा समेत 9 राज्यों के जाटों को ओबीसी में लाने का फैसला किया जिसका विरोध राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने किया.मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और कोर्ट ने जाटों को पिछड़ा मानने से इनकार कर दिया .17 मार्च 2015 को सरकार के इस फैसले को कोर्ट ने रदद् कर दिया था.फिर सत्ता में आई मोदी सरकार ने कोर्ट के इस फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर की जिसे बीते हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया और अपने पिछले आदेश को सही बताया.बार –बार सुप्रीम कोर्ट के इनकार के बाद जाट समुदाय के द्वारा आरक्षण की मांग करना दुर्भाग्यपूर्ण है.आज हमारे समाज में जातिगत आरक्षण के चलते समाज बट रहें है,एक जाति दूसरे जाती के बीच जातीय टकराव बढ़ रहा है.ऐसे में सवाल उठता है कि इस समस्या का हल क्या है ? वर्तमान परिस्थितियों पर गौर तो कोई भी राजनीतिक दल आरक्षण को समाप्त करने की बात तो दूर उसकी समीक्षा की बात कहने तक से हिचकिचाते है.ऐसे में आरक्षण खत्म करना दूर की कौड़ी है.आरक्षण को खत्म हरगिज़ नहीं किया जा सकता, वंचितों और समाज के सबसे पिछड़े पायदान पर रहने वाले गरीब लोगो को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण सहायक है.लेकिन,इस बात से मुंह नही मोड़ा जा सकता कि  आज आरक्षण का इस्तेमाल वैसाखी के रूप में  हो रहा है.असल में जिन दलित,अल्पसंख्यक या अन्य वंचित जातियों को आरक्षण की जरूरत है,उन्हें ये लाभ अभी तक नहीं मिल पा रहा है.आज पाटीदार,गुर्जर जाट आरक्षण की मांग कर रहें है ,कोर्ट के इनकार के बावजूद सरकार में ये साहस नही है कि इन्हें आरक्षण देने से मना कर दे,दरअसल आरक्षण हमारे राजनीतिक दलों के लिए वोट का साधन बन गया है ,जब चुनाव समीप होता आरक्षण का सहारा लेकर  समाज को लुभाने का प्रयास करते है,भारतीय संविधान में अनुच्छेद 15 व 16 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग को आरक्षण का लाभ दिया जाए बशर्ते ये सिद्ध हो जाए कि वो औरो की अपेक्षा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से कमजोर है.कोर्ट के फैसले के बाद ये सिद्ध होता है कि जाट समुदाय आरक्षण की बेतुकी मांग कर रहें है,जो भारतीय संविधान के अनुरूप नही है.हरियाणा सरकार के लिए जाटों के आरक्षण के लिए जो कमेटी बनाई है,वो क्या रिपोर्ट पेश करती है ये बाद की बात होगी.दरअसल,हमारे राजनीतिक दलों ने आरक्षण के नाम पर समाज को पहले विभाजित किया फिर आरक्षण के बहाने खूब सियासत साधने का काम हमारे हुक्मरानों ने किया और अब भी कर रहे हैं. इनके इस रवैये से देश में व्यापक बहस जो आरक्षण को लेकर होनी चाहिएं थी वो आज तक नही हुई.नतीजन आज आरक्षण के लिए कुछ समुदाय हिंसा पर भी उतारू हो चलें हैं.इस पर भी सरकारें मौन रहती है.बहरहाल,जब आरक्षण को लागू करने के बात आई थी तब संविधान सभा के अध्यक्ष डा.अम्बेडकर ने कहा था कि हर दस साल के बाद सरकार इसकी समीक्षा करेगी कि जिनको आरक्षण दिया जा रहा है उनकी स्थिति में कुछ सुधार हुआ या  नहीं? उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि यदि किसी वर्ग का विकास हो जाता है तो उसके आगे की पीढ़ी को इस व्यवस्था से वंचित रखा जाए.इस समीक्षा का मतलब ये था कि जिन उद्देश्यों के लिए आरक्षण को प्रारम्भ किया गया है.वो कितनी कारगर साबित हुई है.लेकिन आज तक किसी राजनीतिक दल में इतनी शक्ति नहीं हुई की आरक्षण की समीक्षा करवा सकें. आरक्षण खत्म करना समाज के वंचित वर्ग के साथ बेमानी होगी परन्तु अब समय आ गया कि सरकार आरक्षण की समीक्षा करें एवं इसके मानको में बदलाव करें है,क्या किसी राजनीतिक दल ने वोट बैंक से इतर इस बात को कभी सोचा है ? किसी राजनीतिक दल ने आरक्षण की इस खोट को दूर करने का प्रयास किया है ? आरक्षण में सुधार की दरकार है.अगर हम सुधार की बात करें तो हमारे पास आरक्षण के खोट को दूर करनें के कई उपाय है.मसनल सरकार आरक्षण को आर्थिक रूप से लागू करती है तो इसके अनेकानेक लाभ है.गरीब हर वर्ग के लोग है.चाहें वो दलित हो या सवर्ण अगर सभी को आर्थिक आधार मान कर आरक्षण दिया जाएँ तो सभी तबके के गरीब लोगो को इससे मदद मिलेगी और आरक्षण उनके विकास में सहायक सिद्ध होगा.अगर समय रहते आरक्षण की समीक्षा के लिए केंद्र सरकार कोई कमेटी गठित नही करती तो,वो दिन दूर नही जब देश के सभी समुदाय आरक्षण के लिए सड़को पर होंगे.सरकार को आरक्षण के मसले पर व्यापक विचार –विमर्श करने की आवश्यकता है,जिससे आने वाले दिनों में कोई और समुदाय आरक्षण के लिए हिंसक न बने बहरहाल,आरक्षण के नाम पर आज जिसप्रकार कुछ समुदाय हिंसा पर उतारू हो गएँ है,वो दुर्भाग्यपूर्ण है.

यात्री सुरक्षा पर ध्यान दे रेलवे


 जब भी सरकार रेल बजट पेश करती है, तो रेलवे के कायाकल्प बदलने तथा हर प्रकार की बुनियादी सुविधाओं में सुधार के नाम पर लंबे –चौड़े वादे करती  है,लेकिन हर बार की तरह सारे वादें कागजों तक सिमट कर रह जाते हैं.जमीनी स्तर पर रेलवे का कितना विकास होता है,ये बात जगजाहिर है,रेल मंत्री सुरेश प्रभु इसी सप्ताह वित्तीय वर्ष 2016-17 का रेल बजट प्रस्तुत करेंगे,बजट के द्वारा सरकार रेलवे की सुविधाओं को लेकर तमाम प्रकार की योजनाएं लाती है,परन्तु उसका ठीक ढंग से क्रियान्वयन करने की नीति सरकार के पास नही होती,जिसके कारण निर्धारित समयावधि में रेलवे की कोई योजनाएं पूरी नहीं  होती.हर बार बजट के माध्यम से रेल मंत्री जनता को आश्वस्त करते हैं कि ये बजट रेलवे को नई उचाईयों पर ले जायेगा,परन्तु स्थिति इसके विपरीत है,आज रेलवे कई समस्याओं से जूझ रहा है,मसलन रेलवे टिकट में बढ़ते भ्रष्टाचार,ट्रेन में मिलने वाले निम्न दर्जे के खाद्य पदार्थ,इसके अतिरिक्त सबसे बड़ी समस्या यात्री सुरक्षा की है.आएं दिन रेलवे में कई बड़ी दुर्घटनाएं होती हैं.जिसमें हजारों के जान –माल के नुकसान की खबरें मिलती हैं ,मगर रेलवे सुरक्षा के मसले पर कोई बड़ा कदम नहीं उठाती, रेलवे की मुख्य प्राथमिकता यात्रियों को सुरक्षा देना है लेकिन इस मोर्चे पर रेलवे प्रशासन विफल रहा है.हर हादसा रेलवे के सुरक्षा प्रणाली पर सवालिया निशान लगाता है.अमूमन भारतीय रेल में हर दिन कहीं न कहीं छोटी –मोटी दुर्घटना होती रहती है.मगर ऐसे गंभीर विषय पर न तो रेलवे प्रशासन गंभीर है और न ही रेलवे मंत्रालय.नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के मुताबिक 2014 में रेल हादसों के 28,360 मामले दर्ज हुए.इनमें 2013 के मुकाबले 9.2 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.2013 में 31,236 हादसे दर्ज किये गये थे.इसमें ज्यादातर मामलें लगभग 61.6 फिसदी लोगों के ट्रेन से गिरने या रेलवे ट्रैक पर ट्रेन की चपेट में आने के रहे.लेकिन फिर स्थिति विगत वर्ष 2015 में गम्भीर होती दिखी.रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने पिछला बजट पेश करते समय बारह बार सुरक्षा शब्द का इस्तेमाल किया था.लेकिन यात्रियों को कितनी सुरक्षा मिल रही ये बात अब किसी से छिपी नहीं है.भारत में रेल दुर्घटनाओं की एक लंबी फेहरिस्त है.जो रेलवे प्रशासन व शासन की नाकामी को दर्शाता है.अमूमन रेल दुर्घटनाओं के पीछे सिग्नल में खराबी,जर्जर पटरियों,कोहरा व मानवीय गलती प्रमुख होती है,हर बजट में सरकारें तमाम प्रकार की योजनाओं की घोषणा करती हैं.जिसमे रेल यात्रियों की सुख,सुविधा और सुरक्षा को तरजीह दी जाती है. कई परियोजनाओं का शुभारंभ होता है लेकिन योजना को पूरा होने में तय अवधि से अधिक वर्ष लग जाते हैं.जो हमारी रेलवे की विफलता का प्रमुख कारण है.समय से पटरियों की मरम्मत नहीं होती,जिससे पटरिया घिस जाती है और दुर्घटना को दावत देती है.रेल दुर्घटना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर सामने आयी है.इसका समाधान भी इस दिशा में सही योजना का निर्माण कर उसे सही क्रियान्वयन के द्वारा ही किया जा सकता है.पिछले साठ सालों में रेलवे के सुधार के लिए तमाम समितियों का गठन किया गया.देश की सभी सरकारों ने उन समितियों की रिपोर्ट को नजरअंदाज किया.वर्ष 1962 में कांग्रेस ने कुंजरू समिति बनाई पर उसकी रिपोर्ट पर अमल नहीं किया फिर 1968 में बांचू समिति गठित की गई उसकी रिपोर्ट को भी नकार दिया गया फिर 1978 में सिकरी समिति इस प्रकार लगभग कई समितियों का गठन तो किया गया लेकिन उसके रिपोर्ट को कूड़ेदान में फेक दिया गया. वर्ष 2012- 2013 में तात्कालिक रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने एक बजट पेश किया जिसमे रेल आधुनिकीकरण पर जोर दिया गया.इस दूरदर्शी बजट में 5.60 लाख करोड़ रूपये आधुनिकीकरण आदि के नाम पर खर्च का प्रस्ताव दिया गया था.काकोदकर समिति ने अपने रिपोर्ट में कहा था कि आगामी पांच वर्षो में सुरक्षा उपकरणों व सुरक्षा उपायों के लिए एक लाख करोड़ रूपये की आवश्यकता है.वहीँ दूसरी तरफ पित्रोदा समिति ने रेल के आधुनिकीकरण और रेल को भविष्य की रेल बनाने के लिए 8 लाख 39 हजार करोड़ रूपये की आवश्यकता की बात की थी.इस बजट में इन दोनों समितियों की सिफारिशों को लागू करने की योजना बनाई गई थी.सुरक्षा पर गंभीर चिंता व्यक्त करने वाली काकोदकर और पित्रोदा समिति को भी सियासत की भेंट चढना पड़ा.रेलवे में सियासी हस्तक्षेप का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि तत्कालीन रेल मंत्री को भी अपना पद गवाना पड़ा.भारत की लगभग सभी सरकारें रेलवे सुरक्षा जैसे गंभीर विषय को तवज्जो देने,यात्रियों की जान –माल की रक्षा करने के बजाय अपनी सियासत साधने में लगी रहती है.भारतीय रेल दुनिया का चौथा सबसे बड़ा नेटवर्क है.जो प्रतिदिन 19 हजार ट्रेनों का संचालन करता है.जिसमे 12 हजार ट्रेनें यात्री सेवा के लिए तथा 7 हजार ट्रेने माल ढोने का काम करती हैं.भारतीय रेल हर दिन 2.3 करोड़ यात्रियों को उसके गंतव्य तक पहुँचाने का काम करती है.लेकिन यह अत्यंत दुर्भाग्य की बात है कि आज़ादी के इतने वर्षों  के बाद भी रेलवे यात्रियों की सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकी.रेल मंत्री सुरेश प्रभु को चाहिए कि आने वाले बजट में यात्रियों की सुरक्षा के लिए कुछ बड़े कदम उठायें जिससे यात्री सफर करते वक्त अपने आप को सुरक्षित महसूस करें. 


Saturday, 20 February 2016

अमेरिका के आतंक विरोधी मंशा पर सवालिया निशान


  अमेरिका के आतंक विरोधी मंशा पर सवालिया निशान :_


जबसे मोदी सत्ता मे आएं है कई देशों से भारत के संबंध पहले की अपेक्षा बेहतर हुए है,जिसमे अमेरिका सबसे प्रमुख रहा है,कई ऐसे मसले आएं जहाँ अमेरिका भारत के साथ खड़ा दिखा तो भारत ने भी अमेरिका के साथ कंधे से कंधा मिला चलने का वादा किया.आतंकवाद ऐसा मुद्दा है जिसे मोदी वैश्विक स्तर पर उठाते रहें है.आतंकवाद ने हर देश को चोट पहुंचाई है.यही कारण है कि प्रधानमंत्री जब भी किसी देश में जातें है,आतंकवाद के मुद्दे को जोर –शोर से उठाते है,कई देशो ने मोदी के आतंकवाद खात्मे की इस पहल में न सिर्फ भारत का साथ दे रहें है बल्कि भारत की इस मुहीम हो सफल बनाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहें है. ऐसे में अमेरिका का पाकिस्तान से एफ-16 विमान का सौदा करना अमेरिका के आतंक विरोधी मंशा पर सवालियां निशान लगाता है,बहरहाल आतंकवाद एक ऐसा मुद्दा है जिसपर मौजूदा समय में विश्व के सभी देशो को एक मंच पर लाने को विवश कर दिया है,विश्व के अधिकतर देश आतंक की चपेट में है,हर देश में आतंकवाद का कारोबार बड़ी तेज़ी से फैल रहा है,जो सभी देशों के समक्ष बड़ी चुनौती है,खैर भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ता क्या है ये बात जगजाहिर है,जब भी भारत में आतंकी हमला होता उसके पाक परस्त आतंकवादियों की संलिप्तता होती है.इस बात को अमेरिका भी जानता है कि पाकिस्तान कैसे अपने देश में आतंकियों को पोषित कर रहा है.जो  विश्व में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहें है.हालहि में पाक परस्त आतंकवादियो ने  पठानकोट के एयरबेस पर हमला किया,इस बात का पर्याप्त सुबूत भी भारत के पास है.जिसे भारत ने दुनिया के सामने रखा.इसके उपरांत पाकिस्तान का रवैया सभी ने देखा ,अमेरिका ने भी पठानकोट हमले पर सुबूत के आधार पर कार्यवाही करने के लिए पाकिस्तान को फटकार लगाई थी,परन्तु पाकिस्तान ने इससे भी पल्ला झाड़ लिया.बहरहाल,अमेरिका पाकिस्तान को आठ एफ-16 लड़ाकू विमान बेचने जा रहा है,अमेरिका के इस फैसले का भारत ने विरोध किया है मगर भारत के इस विरोध को दरकिनार करते हुए अमेरिका अपने फैसले पर अडिग है.एफ -16 विमान का इस्तेमाल पाकिस्तान किस रूप में करेगा,ये बात तो भविष्य के गर्भ में छिपा है.परन्तु  पाकिस्तान अगर  ये कहे कि हमने ये विमान सौदा आतंकवाद के मुकाबले तथा अपने सुरक्षा के लिए किया है ,तो हमे इस बयान के निहितार्थ को समझने की जरूरत है.कई ऐसे मौके आएं है जहाँ पाकिस्तान भारत पर बेबुनियाद आरोप लगाता है कि भारत पाक की सीमाओं का उल्लंघन करता है.बल्कि हकीकत ये है कि पाकिस्तानी सेना तथा पाकिस्तान के आतंकी भारत की सीमाओं में आये दिन घुसपैठ करते है.अमेरिका भी इस बात को बखूबी जनता है.ये बात भी जगजाहिर है कि पाकिस्तान आतंकवादियों के लिए सबसे सुरक्षित देश है,आतंक के मसले पर पाकिस्तान कई बार बेनकाब हुआ है फिर भी अमेरिका इस सौदे पर मंजूरी दे रहा है.इससे एक बात तो स्पष्ट है कि आतंकवाद के विरूद्ध इस लड़ाई में अमेरिका दोहरा मापदंड अपना रहा है..पाकिस्तान की बढ़ती शक्ति न केवल भारत के लिए बल्कि विश्व के लिए भी खतरा है.ये पहली दफा नही है जब अमेरिका पाकिस्तान पर स्नेह लुटाया हो,अमेरिका 1950 से ही पाक को सह देता आया है.अमेरिका की नीति पाकिस्तान से न केवल सामरिक रिश्तों को तरजीह देना रहा है बल्कि समय –समय पर पाक का सहयोगी भी बनता रहा है.अमेरिका पाकिस्तान को सैन्य दृष्टि से मजबूत करने का प्रयास हो या कश्मीर जैसे संवेदनशील मसले पर परोक्ष रूप से पाक को समर्थन ,इन सब तथ्यों से स्पष्ट होता है कि अमेरिका भविष्य में भी पाकिस्तान के साथ ही खड़ा रहेगा.ऐसे में वक्त की मांग यही है कि भारत अपने आप को सामरिक दृष्टि से और मजबूत करे.एक सच ये भी है कि अमेरिका जब –जब पाकिस्तान को हथियार दिया है.पाकिस्तान ने उसका इस्तेमाल भारत के खिलाफ ही किया है.यही मुख्य वजह है जिससे भारत इस रक्षा सौदे का विरोध कर रहा है.सवाल उठता है कि क्या ये रक्षा सौदा भारत के लिए घातक है? इस सवाल की पृष्ठभूमि को समझने के साथ –साथ  हमें एफ-16 की शक्तियों को भी जानना होगा.एफ-16 भारत के लिए कोई बड़ा खतरा नही है.क्योंकि ये विमान दशकों पुरानी तकनीक पर आधारित है,जो आज के अन्य विमानों की अपेक्षा शक्तिहीन है.हमारे पास इससे ज्यादा शक्तिशाली लड़ाकू विमान सुखोई पहले से मौजूद है.जो पलक झपकते ही दुश्मनों को परास्त करने की क्षमता रखता है.इस सौदे से भारत पर कोई बड़ा असर नही पड़ेगा,हमारी सेना पाकिस्तान की अपेक्षा काफी शक्तिशाली है.हमारी फौज हर दृष्टि से पाकिस्तान से मुकाबला करने में सक्षम है.परन्तु इस सौदे में अमेरिका की भारत विरोधी नीति निश्चय ही चिंताजनक है,विश्व के समक्ष भारत शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभर रहा है,ऐसे में अमेरिका पाकिस्तान को ढाल बनाकर भारत को कमजोर करने की साजिस कर रहा है,जिसे भारत को समझने की जरूरत है.क्योंकि पाकिस्तान हमेसा से भारत विरोधी रहा है,और अमेरिका उसे मजबूत करने के प्रयास कर रहा है.ऐसे में सरकार को अमेरिका के प्रति अपनी रणनीति बदलनी होगी, सोचना होगा कि जब अमेरिका हमारे विरोधियों को मजबूत करने का प्रयास कर रहा हो,तो उससे कैसे संबंध रखने है.                     

Tuesday, 16 February 2016

गिरफ्तारी का विरोध कर राष्ट्रद्रोह पर सहमती दे रहे वामपंथी !

   युवा किसी भी देश का भविष्य होता है,आने वाले समय में उसे देश की कमान संभलनी होती है.युवाओं में हर परिस्थितियों से निपटने का सामर्थ्य होता है,देश का कर्णधार होता है.परन्तु आज ये शब्द लिखते हुए वो उत्साह नहीं आ रहा,जो पहले आता था.समय के साथ इन सब शब्दों के मायने बदल गये हैं.किसी ने भी इस बात की परिकल्पना भी नहीं की होगी कि हमारे ही देश के शिक्षित युवा अपने ही देश के खिलाफ ऐसे जहर उगलेंगे जिसको सुनकर सीना ठिठुर जा रहा है.देश में जब भी कोई क्रांति हुई है.उसमे युवाओं की महती भूमिका रही है.लेकिन आज की परिस्थिति बिल्कुल विपरीत है,ये वक्त विरोध का है का है.परन्तु विरोध पर नकारात्मकता हावी है ,विरोध पहले भी होता था,किंतु वो सकारात्मक विरोध सियासत की कुर्शी को उसकी शक्ति के एहसास कराने के लिए होता था.ये नकारात्मक विरोध विक्राल रूप धारण कर राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में खड़ा है.इसके जिम्मेदार कौन है? आज शिक्षण संस्थानों में नक्सली व अलगाववादी विचारधारा पाँव पसार रही है, जो राष्ट्र विरोधी कदम उठाने के लिए छात्रों को उकसा रही है.इसे पोषित करने वाले विश्वविद्यालयों में सबसे ऊपर जेएनयू खड़ा है.इसमें कोई दोराय नही कि छात्र राजनीति ने देश को कई राजनेता दिए है,जो आज देश के कई राज्यों में सत्ता पर आसीन है.मगर अब छात्र राजनीति सियासत के हथकंडे के रूप में कार्य करने लगी है,जिससे स्थिति भयावह हो गई है.वर्तमान समय में छात्र राजनीति ने पूरी तरह से अपने कलेवर को बदल लिया है.देश के युवा राजनीति तो कर रहें हैं लेकिन, राजनीतिक विमर्श करने में इनकी रूचि नहीं है,जिससे ये स्थिति उत्पन्न हुई है.हर विचारधारा के छात्र सगठन अपने झंडाबरदार को आगे रखने की चेष्टा कर रहें हैं,उनकी चेष्टा का ये रास्ता हिंसा से होकर गुजर रहा है,वैचारिक द्वन्द के इस युग में देश पीछे छुटता जा रहा है,राजनीति कर रहे छात्रों का इस्तेमाल हमारे सियासतदान अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए कर रहें हैं,इसका एक सच ये भी है कि अब छात्र राजनीति से अब कोई बड़ा नेता निकल कर नहीं आ रहा है,जो समाज से सरोकार रखता हो,छात्र राजनीति का मुख्य केंद्र छात्रों की समस्याओं के लिए संघर्ष करना होता है. हुकुमत तथा संस्थान प्रशासन से छात्र हितों की पूर्ति के लिए तथा अपनी मांगो को लेकर संघर्ष करना होता है.परन्तु आज छात्र संगठन अपने मुख्य उद्देश्य से भटक गये हैं.उनकी राजनीतिक स्थिति आज क्या है ये बात भी जगजाहिर है.ये इसलिए क्योंकि छात्रो का अपने मूल उद्देश्य से भटकना देश के भविष्य के लिए किसी बड़े खतरे से कम नहीं हैं.बीते सप्ताह ऐसी घटनाएँ सामने आई जो देश की एकता व अखंडता के लिए घातक है.देश के नामचीन विश्वविद्यालयों में से एक जेएनयू में वामपंथी छात्र संघठनो  द्वारा हमारे लोकतंत्र के मंदिर ससंद पर हमला करने वाले आतंकी अफजल गुरु की बरसी पर कार्यक्रम आयोजित करता है तथा भारत विरोधी नारें लगाता है.इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकता है.जिसे देश की सबसे बड़ी अदालत ने आतंकी घोषित कर फांसी की सज़ा सुनाई हो उसकी याद में किसी शिक्षण संस्थान में कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा हो,खैर इस घटना की जितनी निंदा की जाए कम है. केंद्र सरकार के दखल के बाद प्रशासन ने सक्रियता दिखाते हुए जेएनयू अध्यक्ष समेत कई छात्रों को गिरफ्तार किया है.परन्तु महज गिरफ्तारियों से कुछ नही होने वाला ,देशद्रोह की बात करने वाले हर व्यक्ति को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाए.देश में रहकर देश विरोधी नारे लगाने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नही जाना चाहिए.पुलिस ने अनाम छात्रो के ऊपर मुकदमा किया है.किंतु,देश विरोधी नारे लगाने वालें छात्रों की पहचान प्राप्त वीडियो में स्पष्ट रूप से की जा सकती है.छात्र अध्यक्ष की गिरफ्तारी के बाद वामपंथी नेताओं ने जो रुख अख्तियार किया है.उससे एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि इस विचारधारा से देश प्रेम की उम्मीद करना बेमानी होगी. गिरफ्तारी का विरोध करने वालें वामपंथी तथा कथित सेकुलरों को ये समझना चाहिएं कि सवाल किसी विचारधारा का नही बल्कि देश का है.इसके बावजूद वामपंथी नेता देश विरोधी नारे लागने वालों के पक्ष में खड़े दिख रहें है.गिरफ्तारी का विरोध कर रहें है.ऐसे में सवाल उठता है कि क्या देश के कथित बौद्धिक वामपंथियो ने ऐसे कार्यक्रमों पर अपनी सहमती दे रहें है ? ऐसे आयोजन देश की एकता अखंडता के लिए किसी भी सूरतेहाल में सही नहीं है.इस प्रकार के कार्यक्रम देश की आत्मा पर चोट पहुंचाते है. आखिर इन छात्रो की मंशा क्या है? कैसी आज़ादी चाहतें है ये छात्र ? दरअसल ये लोग जिस विचारधारा से ताल्लुक रखते हैं.वो हमेशा से भारत विरोधी रही है,ये पहली बार नहीं है जब ये इस प्रकार से राष्ट्र विरोधी कार्यों में बढ़चढ़ के हिस्सा लिया हो.समय-समय पर ये राष्ट्र को कमजोर करने वाले,देश की संप्रभुता को चोट पहुँचाने वाले कार्यक्रम करते रहते हैं.समूचे देश में  अभिव्यक्ति की स्वंत्रता को लेकर बहस छिड़ी हुई है. सबसे ज्यादा वामपंथी विचारधारा के लोग अपना विरोध दर्ज कराते हुए सरकार पर बेजा आरोप लगा रहें हैं कि जब से मोदी सरकार आई है,आपातकाल जैसे हालात देश के हो गये हैं,यहाँ बोलने की आज़ादी नहीं है,विरोध करने की आज़ादी नहीं है.एक स्थिति यह भी है कि ये उसी विचारधारा के पैरोकार है,जो देश में लगे आपातकाल के समय मौन थे.अभिव्यक्ति की आज़ादी का कवच पहन देशद्रोह का नारा लगाना अराजकता की पराकाष्ठा है.इसकी जितनी भर्त्सना की जाए कम है.बहरहाल,देश के संविधान ने सभी को सरकार का  विरोध करने का हक दिया है,राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ बोलने की आज़ादी हमारे संविधान ने दी है.लेकिन देश के प्रति जहर उगलने की आज़ादी भारतीय संविधान नही देता .विरोध का तरीका न्यायसंगत होना चाहिएं ,सरकार किसी की भी हो आप उसकी नीतियों, उसके कार्यशैली का विरोध करने के लिए स्वतंत्र है.परन्तु जब बात भारत के विरोध की आयेगी तो यह मामला देश द्रोह का होता है.वामपंथियों ने ये करतूत करते हुए अपनी लज्जा किस ताख पर रख दी थी कि हम उसी देश के खिलाफ आवाज उठा रहें हैं ,जो देश हमारे आवश्यकताओं की पूर्ति करता है,इसी देश की सरकार हमें सुरक्षा की गारंटी देती है.बहरहाल,देश हित के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले हर उस आस्तीन के सापों का फन कुचल देना चाहिएं,भारत जैसे लोकतांत्रिक और सहिष्णु देश में देश के प्रति नफरत का भाव रखने वाली किसी भी व्याक्ति या विचारधारा के लिए कोई जगह नही है.सरकार को भी ऐसे मसलो पर शख्त व त्वरित कार्यवाही करनी चाहिएं जिससे आने वाले दिनों में कोई भी व्यक्ति देश के विरोध में बोलने की  हिम्मत न कर सकें.  

Thursday, 4 February 2016

चुनौतियों से पार पाना आसान नही


 सभी कयासों को विराम लागते हुए भारतीय जनता पार्टी ने अमित शाह को दुबारा पार्टी अध्यक्ष चुना.बीते रविवार को अमित शाह दुबारा पार्टी अध्यक्ष के रूप में निर्विरोध चुने गये. राजनाथ सिंह का कार्यकाल पूरा करने  के बाद उन्हें पहली बार पूर्ण कालिक अध्यक्ष बनाया गया है.अमित शाह भारतीय राजनीति में ऐसा नाम है, जिसकी छवि एक कद्दावर नेता के तौर पर होती है.विगत लोकसभा चुनाव में इनकी रणनीति और चुनाव प्रबंधन का सबने लोहा माना था.जिसके परिणामस्वरूप राजनाथ सिंह को अध्यक्ष पद से मुक्त कर शाह को पार्टी अध्यक्ष बनाया गया था.लोकसभा चुनाव के बाद से महाराष्ट्र ,हरियाणा समेत कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अपने विजय रथ को जारी रखा,गौरतलब है कि इन चुनावों में पार्टी अध्यक्ष से कहीं ज्यादा प्रधानमंत्री मोदी ने खुद चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी,नतीजा पार्टी इन राज्यों में अपनी सरकार बनाने में सफल रही,लेकिन एक बात पर गौर करें तो जैसे ही मोदी का लहर में कमी आई,पार्टी को पराजय का सामना करना पड़ा.पहले दिल्ली में पार्टी को करारी शिकस्त मिली.उसके कुछ महीनों  बाद बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में भी पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा.इसके साथ कई राज्यों ,में हुए नगर निकाय चुनाव के नतीजे भी पार्टी के लिए चिंता का विषय है.बहरहाल ,अमित शाह बीजेपी के शाह तो बन गयें लेकिन उनके सामने कई ऐसी चुनौतियाँ है जिससे पार पाना अमित शाह के लिए आसान नही होगा.शाह की पहली चुनौती अपनो को मनाने की होगी,अपनों का सीधा मतलब  मार्गदर्शक  मंडल से है.ये बात जगजाहिर है कि अमित शाह भले ही  निर्विरोध अध्यक्ष चुने गयें हो पर, इस फैसले से मार्गदर्शक मंडल खुश नही है.इस बात का जिक्र करना इसलिए जरूरी हो जाता है.क्योकिं पार्टी ने मार्गदर्शक मंडल बनाया तो है,लेकिन कभी भी उनके साथ पार्टी की कोई बैठक नही होती तथा न ही किसी मसले पर पार्टी के इन वरिष्ठ नेताओं का सुझाव माँगा जाता है.नतीजा मार्गदर्शक मंडल अपने आप को अलग –थलग पाता है.बीजेपी भले ये दावा करें कि शाह सबकी सहमती से अध्यक्ष चुने गयें है.लेकिन अमित शाह की ताजपोशी में आडवाणी,जोशी समेत मार्गदर्शक मंडल का कोई भी सदस्य मौजूद नही था.जो बीजेपी के इस दावे पर सवालियां निशान लगाता है.अमित शाह पार्टी के इन वरिष्ठ सदस्यों को मनाने में सफल हो जाते है तो, ये शाह की बड़ी जीत होगी.इस जीत के मायने को समझें तो दो बातें सामने आतीं है.पहली बात जबसे अमित शाह पार्टी की कमान संभालें है पार्टी पर मार्गदर्शक मंडल की अनदेखी करने का आरोप लगता आया है.अगर अमित शाह इनकों अपने पक्ष में कर लेते है तो, इस आरोप से बच जायेंगे.दूसरी बात पर गौर करें तो कुछ महीनों से बीजेपी में आंतरिक कलह की बात सामने आई है,जिसमे मार्गदर्शक मंडल के साथ पार्टी के कई बड़े नेता अमित शाह और मोदी के विरोध में खड़ें दिखे रहें है.जो किसी भी संगठन के लिए सुखद संकेत नही है.अमित शाह को इस चुनौती से जल्द से जल्द पार पाना होगा.अमित शाह की दूसरी सबसे बड़ी चुनौती आगामी कई राज्यों के होने वाले विधानसभा चुनाव है,क्योकिं अब मोदी का वो जादू नही रहा जिसपर सवार होकर बीजेपी आसानी से जीत तक पहुँच जायेगी,अमित शाह को एक ऐसी चुनावी बिसात विछानी होगी.जिसपर चल कर पार्टी जीत तक पहुँच सके.अमित शाह का निर्वाचन ऐसे वक्त में हुआ है,जब कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है.मसलन पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुद्दुचेरी ये ऐसे राज्य है.जहाँ चुनाव कुछ ही महीनों में होने वालें है.इन राज्यों में होने वालें चुनाव अमित शाह के नेतृत्व के लिए पार्टी को जीत दिलाने की बड़ी चुनौती होगी.असम को छोड़ दे तो बाकी  राज्यों में बीजेपी को सहयोगी दल की तलाश होगी.गठबंधन के लिए पार्टी का चयन करने मे अमित शाह परिपक्व नही है.जिसके कई उदाहरण हमारे सामने है ,महाराष्ट्र में बीजेपी ,शिवसेना के साथ ताल –मेल बैठाने में कारगर नही हुई है,शिवसेना और बीजेपी के रिश्तों में इतनी तल्खी कभी देखने को नही मिली लेकिन, अब आएं दिन महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना की तकरार हमारे सामने आती है,दूसरा उदाहरण जम्मू –कश्मीर में भाजपा ने पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई लेकिन आज वो गठबंधन पार्टी के उम्मीदों पर खरा नही उतर पाई,सईद के मृत्यु के बाद से अभी तक वहां नई सरकार का गठन नही हुआ है ,जो बीजेपी –पीडीपी के संबंधो में खटास बताने के लिए काफी है.बहरहाल, अमित शाह के समाने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी में अनुशासन कायम करने की है.पार्टी में कई ऐसे मंत्री और नेता है.जिनके बड़बोले बयानों ने पार्टी की खूब किरकरी कराई है,अमित शाह के निर्देश के बावजूद कई ऐसे मौके आएं जहाँ पार्टी बेकाबू होते हुए नजर आई,आज भी कई नेता पार्टी लाइन से हटकर बयानबाज़ी कर रहें है,इन सबको अनुशासन का पाठ पढ़ाना अमित शाह की जिम्मेदारी है,अब देखने वाली बात होगी कि अमित शाह कैसे ये जिम्मेदारी निभातें है. अमित शाह के लिए ये कार्यकाल चुनौतियों भरा रहेगा, अगर इन चुनौतियों पार पाने में शाह सफल हो गये तो इससे न सिर्फ पार्टी जीत के रास्ते पर  वापस आएगी बल्कि शाह पार्टी के सबसे सफल अध्यक्ष के रूप में अपने आप को साबित कर सकेंगे.