Wednesday, 20 January 2016

व्यवस्था में सुधार की दरकार


    

केंदीय विश्वविद्यालय हैदराबाद से जूनियर रिसर्च फेलोशिप के जरिये पीएचडी कर रहें छात्र रोहित वेमुला ने व्यवस्थाओं से खिन्न होकर खुदकुशी कर लिया.आत्महत्या से पहले रोहित ने जो खत लिखा है.उसमें इस फैसले के लिए किसी व्यक्ति विशेष को दोषी नही बताया है तथा बचपन से अभी- तक भेदभाव की बात कही है.किसी भी छात्र की आत्महत्या इस व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़े करता है.ऐसा पहली बार नही हो रहा है कि कोई छात्र व्यवस्था से खिन्न आकर आत्महत्या जैसा बड़ा कदम उठाया हो,आये दिन छात्र शिक्षण संस्थानों के अड़ियल रवैये से तंग आकर मौत को गले लगा लेते है.इस आत्महत्या के मामले में केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय के खिलाफ एससी –एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की गई है.बहरहाल,इस पुरे प्रकरण को समझें तो कुछ बातें बिल्कुल स्पष्ट हो चुकी है.जैसे कि रोहित दलित समुदाय से आते थे और अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के सदस्य थे.रोहित कई ऐसी गतिविधियों में शामिल थे.जिसकी अनुमति कोई शिक्षण संस्थान नही देता,इसके बावजूद रोहित विश्वविद्यालय प्रशासन की अनदेखी कर के उन सभी आपत्तिजनक गतिविधियों में महती भूमिका निभाई थी,जो निंदनीय थी,विश्वविद्यालय प्रशासन भी उन सभी आपत्तिजनक गतिविधियों पर मौन साधे रहा, मसलन  मुंबई बम धमाके का मास्टर माइंड याकूब मेमन की फांसी के विरोध हो या कैंपस में बीफ पार्टी का आयोजन.इसके बाद भी विश्वविद्यालय प्रशासन मूकदर्शक बने देखता रहा.जब मामला केंद्रीय मंत्री दत्तात्रेय के संज्ञान में आया तो उन्होंने मानव संसाधन मंत्री को पत्र लिख कर विश्वविद्यालय की शिकायत दर्ज कराई,उसके बाद मानव संसाधन मंत्री ने एक कमेटी गठित किया,कमेटी ने रोहित समेत पांच छात्रों के निलंबन का फैसला लिया. निष्कासन  के बाद से विश्वविद्यालय का माहौल पूरी तरह से तनावपूर्ण रहने लगा, रोहित समेत बाकी छात्र काफी समय से धरना –प्रदर्शन कर रहें थे,परन्तु सरकार तथा विश्वविद्यालय प्रशासन ने उसकी समस्या का कोई समाधान नही निकाला.  रोहित की आर्थिक स्थिति खराब थी,फेलोशिप बंद होने के कारण उसने कई मित्रों से कर्ज़ लिया था,लगातार बढ़ते आर्थिक व मानसिक दबाव के कारण उसने से पीड़ादायक कदम उठाया.रोहित के इस कदम से देश एक होनहार छात्र को खो दिया.ये सही है कि ये छात्र किसी खास राजनीतिक मकसद के लिए काम कर रहें थे,जो सरासर गलत था.सवाल उठता है कि क्या छात्रों का निष्कासन ही आखिरी विकल्प था ?बहरहाल, देश के अधिकतर शिक्षण संस्थान क्षेत्रवाद,जातिवाद और राजनीति के गिरफ्त में हैं.अधिकांश विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति पूरी तरह से हावी है,ये बात सही है, कि छात्र राजनीति ने देश को कई बड़े – बड़े राजनेता दिए है.लेकिन अब छात्रों की राजनीति पूरी तरह से दूषित हो चुकी है.अब छात्र बहस के बजाय हिंसा का रुख अख्तियार करने में तनिक भी परहेज़ नही करते,जिसके जिम्मेदार राजनीतिक दल तथा संस्थान प्रशासन है.रोहित के ऊपर भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेता एन.सुशील कुमार पर हमले का आरोप था,बहरहाल विश्वविद्यालय प्रशासन थोड़ी सक्रियता दिखाई होती तो मामला इतना आगे नहीं जाता, लेकिन कुलपति के उदासीन रवैये के कारण आज एक छात्र अपनी उन सभी अरमानों को नजरअंदाज कर मौत को गले लगा लिया.रोहित की आत्महत्या को लेकर सियासत तेज़ हो चली है,हमारी राजनीति आज इतने निम्न स्तर पर आ गई है कि हमारे सियासतदान मौत पर भी राजनीति करते से बाज़ नही आते,रोहित बेशक दलित था लेकिन वो एक छात्र था, आत्महत्या को दलित रंग देकर  खूब सियासत हो रही है.कांग्रेस समेत सभी दलों के निशाने पर मोदी सरकार है राहुल गाँधी ने तो यहाँ तक कह दिया कि एक मंत्री के दबाव के कारण रोहित ने आत्महत्या कर लिया.इन सब सियासी बयानों के बीच मुख्य मुद्दा रोहित के न्याय का  गौण हो गया है,हमारे सियासतदान रोहित  की आत्महत्या को दलित उत्पीड़न बता कर राजनीतिक रोटियां सेकने है.आरोपी केंद्रीय मंत्री दत्रातेय ने सफाई देते हुए कहा है कि हमारी चिट्टी से रोहित के आत्महत्या से कोई लेना –देना नही है. फिर सवाल उठता है कि रोहित की आत्महत्या का दोषी कौन है ? सवाल की तह में जाएँ तो रोहित ने अपनी चिट्टी में सीधे तौर  से व्यस्था को दोषी ठहराया है,हमारी व्यवस्था क्या वाकई इतनी लचर है कि छात्रों की खुदकुशी करने पर मजबूर कर देती है? रोहित को 15 सितंबर को विश्वविद्यालय प्रशासन से निष्कासित कर दिया था तथा 3 जनवरी को निष्कासन पर मुहर लगी थी, इस पांच महीनों के दरमियान अगर हमारी व्यवस्था सही रहती तो कोई हल अवश्य निकला लेती लेकिन ऐसा नही हुआ.जिससे निरास होकर रोहित ना चाहते हुए भी आत्महत्या का रुख अख्तियार किया.सरकार ने इस आत्महत्या की वजहों को जानने के लिए कमेटी गठित कर दिया है.लेकिन ये बात भी किसी से छिपी नही है कि हमारे यहाँ आये दिन कमेटियां गठित होती है लेकिन इसके रिपोर्ट का कुछ पता नही चलता.रोहित चला गया लेकिन हमारे सामने कई सवाल छोड़ गया.जिसपर विचार करते की जरूरत है.व्यवस्था में सुधार की जरूरत है.हमारे यहाँ एक ऐसी व्यवस्था की दरकार है.जो संस्थान और और छात्रों के बीच बेहतर तालमेल बना रहें, अगर ऐसा होता है छात्र हित में रहेगा और संस्थान में चल रही मनमानी रुकेगी अन्यथा रोहित के जैसे कई छात्र अपने जीवन से हार मान कर ऐसे कदम उठते रहेंगे.


किकू शारदा की गिरफ्तारी से उठते सवाल ?

   


कॉमेडी  नाइट्स विद कपिल में पलक की भूमिका निभाने वाले हास्य कलाकार किकू शारदा को हरियाणा पुलिस ने भावनाएं भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया.कुछ देर बाद एक लाख के निजी मुचलके पर जमानत भी मिल गई. दरअसल ये केश डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख, संत राम रहीम सिंह के मजाक उड़ाने के बाद उनके भक्तों ने किकू शारदा समेत नौ लोगो के खिलाफ केश दर्ज करा दिया था.गौरतलब है कि एक शो के दौरान किकू शारदा संत राम रहीम के गेटअप मे थे और लड़कियों के साथ डांस कर रहे थे.ये बात राम रहीम के समर्थको को नागवार गुजरी जिसके फलस्वरूप संत राम रहीम के समर्थको ने उक्त कार्यवाही की.गिरफ्तारी के चंद घंटे बाद ही किकू शारदा को बेल मिल गई.किकू की गिरफ्तारी के मामले को समझे तो इसमें कई बातें सामने आती है,आज कल चंद लोग खुद की भावनाओं को हाथो में लेकर चलने लगें है.कब किसकी भावनाएं आहात हो जाएँ किसी को नही पता है तथा न ही भावनाओं का कोई मानक है,जिसको ध्यान में रखते हुए कोई अभिनेता अपना अभिनय करें.किसी हास्य अभिनेता के साथ इस तरह का व्यवहार करना निहायत ही गलत है.इसकी जितनी भर्त्सना की जाए कम होगी.भारत में हास्य अभिनेता अपने अभिनय के द्वारा जनता को हंसाने का काम करते आएं है.ये पहली बार नही है जब किसी व्यक्ति का मजाक उड़ाया गया हो.हम कई दशकों से देखते आएं है कि हास्य अभिनेता किसी का भी मजाक उड़ाने से हिचकते नही है,परन्तु उनकी मंशा कतई किसी की भावना को ठेस पहुँचाना नही रहता है,वो तो केवल अपनी बातों के द्वारा हंसी पैदा करते है.दरअसल हास्य कलाकार इस देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति समेत कई बड़ी हस्तियों को अपने मजाक के दायरे में लाने से तनिक भी नहीं हिचकिचाते लेकिन हमने ऐसा कभी नही देखा कि उनकी भावना को ठेस पहुंचा हो,जिसका सीधा कारण हमारे देश में विद्यमान उदारता और सहिष्णुता है.मेरा मनाना है कि भावनाएं व्यक्तित्व पर भी निर्भर करती है,जिस व्यक्ति का व्यक्तित्व जितना बड़ा रहेगा उसकी भावनाओं का दायरा भी उतना ही बड़ा होगा. हमे हास्य अभिनय को कदापि कभी भावना से नही जोड़ना चाहिए क्योंकि कोई कलाकार दुर्भावना से किसी व्यक्ति की मिमिक्री नही करता है.जाहिर है कि जनता भी हास्य अभिनय का पूरा लुफ्त उठती है.वर्तमान समय में हास्य अभिनय ने लोगो के दिलों को छुआ है.जिसके कारण हास्य की लोकप्रियता में भारी इजाफा हुआ है.हमने कई हास्य कलाकारों को देखा है.जो हास्य के द्वारा बुलंदियों को छुए है और लोकप्रिय भी रहें है.उनके साथ कभी ऐसा बर्ताव नही हुआ.हास्य के लिए जाँनी लीवर को कौन भूल सकता है.जिन्होंने ने अपने हास्य कला के बल पर फ़िल्म इंडस्ट्रीज में न शिर्फ अपने आप को स्थापित किया बल्कि साथ –साथ खूब लोकप्रियता बटोरी.हमारे पास ऐसे सैकड़ो उदाहरण मौजूद है.जिन्होंने हास्य अभिनय के माध्यम से लोगो को गुदगुदाने का काम किया है.हास्य अभिनय पर केश दर्ज करा के बाबा राम रहीम के भक्तों ने एक निम्न दर्जे की भावना का परिचय दिया है.बहरहाल शिकायत के बाद उस प्रस्तुती को लेकर किकू शारदा ने हाथ जोड़ कर माफी भी मांग ली है.संत राम रहीम ने भी किकू के माफी मांग लेने के बाद से कोई शिकायत न होने की बात कही है. अब शिकायतकर्ता अपनी शिकायत वापस लेते हैं कि नही ये बाद  की बात होगी. गिरफ्तारी के तुरंत बाद किकू शारदा की गिरफ्तारी सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगी.कई फिल्मी कलाकार किकू में समर्थन में ट्विट किये तथा किकू की गिरफ्तारी को गलत बताया.लेकिन तथाकथित सेकुलर लोग इसे अभिव्यक्ति पर हमला बता फिर से असहिष्णुता का राग अलापने लगे है.सनद रहे ये वही लोग है जो कुछ रोज़ पहले मालदा में हुई असहिष्णुता पर इन्हें सांप सूंघ गया था.ये वही लोग है,जो नरेंद्र दालोभकर और गोविंद पानसरे की हत्या के समय मौन धारण किये हुए थे.उस वक्त इन्हें अभिव्यक्ति की चिंता नही थी और ना ही उस वक्त इन लोगो कहीं असहिष्णुता दिखाई दे रही थी.मालदा हिंसा को लेकर कथित धर्मनिरपेक्ष विरादरी ने ममता सरकार से एक भी सवाल पूछना वाजिब नही समझा पर आज हरियाणा सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहें है.अखलाक की हत्या के बाद भी इन लोगो ने राज्य सरकार की बजाय सीधे केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया था.सवाल उठता है कि क्या ये लोग महज एक विचारधारा के विरोधी है ? ये इसलिए क्योंकि अगर किकू शारदा की गिरफ्तारी के लिए हरियाणा सरकार दोषी है तो, एखलाख की हत्या के लिए केंद्र सरकार दोषी कैसे ?ये लोग हमेसा से चयनित विरोध करते आएं है तथा विरोध के लिए दोहरा मापदंड अपनाते आएं है.जो इनके कथित धर्मनिरपेक्षता को बेनकाब कर दिया है.दूसरा सवाल कि क्या किकू शारदा की गिरफ्तारी अभिव्यक्ति पर हमला है ?दूसरे सवाल की तह में जाएँ तो ऐसा बिल्कुल नही है.हमारे लोकतंत्र ने हमे ये आज़ादी दे रखी है कि हम संविधान सम्मत जो करना चाहें कर सकतें है.एक साधारण बात समझना चाहिए कि किकू शारदा ने एक मिमिक्री किया.जिससे किसी व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पहुंचा,उसने मामला दर्ज कराया.इसके पश्चात् किकू शारदा को एक साधारण क़ानूनी प्रक्रिया के तहत उन्हें गिरफ्तार किया गया.इसके बाद जमानत दे दी गई तथा जब- तक शिकायत वापस नही होती उन्हें अदालत के अनुसार आगे भी ऐसी प्रकिया से गुजरना पड़ेगा.इसमें इतना हो –हंगामा क्यों किया जा रहा है ये समझ से परे है. बहरहाल,आज के माहौल में किसी भी कलाकर को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारे अभिनय से सभी मुस्कुराये किसी की भी भावनाएं उनके अभिनय से आहात न हो तथा हमे भी हमेसा हास्य को हास्य की नजर से ही देखना चाहिए न कि उस पर भावनाओं का चश्मा लगा कर.

Sunday, 10 January 2016

मालदा की असहिष्णुता पर मौन क्यों

       मालदा की असहिष्णुता पर मौन क्यों ?
 
उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री आज़म खान के बयान के प्रतिकार में कथित हिन्दू नेता कमलेश तिवारी ने आज से तकरीबन दो महीने पहले फेसबुक पर पैंगम्बर मोहम्मद साहब के प्रति कथित आपत्तिजनक टिप्पणी की थी.इस टिप्पणी ने पुरे देश में तहलका मचा कर रखा दिया है.जगह –जगह मुसलमान प्रदर्शनकारी कमलेश तिवारी को फांसी देने के लिए सड़क पर उतर आये हैं,बात यही समाप्त नही होती है.बिजनौर जामा मस्जिद के इमाम मौलाना अनवारुल हक और नजीबाबाद के एक और मौलाना ने कमलेश तिवारी के सर कलम करने पर इनाम राशी की भी घोषणा कर दी है.आज तकरीबन दो महीने बाद ये भीड़  उत्तर प्रदेश,राजस्थान ,भोपाल ,बिहार के रास्ते पश्चिम बंगाल के मालदा शहर में तांडव मचाये हुए है.गौरतलब है कि कमलेश तिवारी की आपत्तिजनक  टिप्पणी के खिलाफ पश्चिम बंगाल के मालदा में गत रविवार को कालियाचक थाना क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय के लोगो ने हिंसक विरोध जुलुस निकालते हुए थाना पर हमला बोल दिया उसके बाद थाने में आग दिया.मौके पर पहुंची बीएसएफ की गाड़ी पर भी हमला किया गया.प्रदर्शनकारियों ने सरकारी बस,जिप्सी समेत 30 गाड़ियों को आग के हवाले पर दिया.इस हिंसक भीड़ ने उस इलाके में एक समुदाय विशेष के छह घर को भी जला दिया है.जिसके चलते मालदा में इन दिनों साम्प्रदायिक माहौल खराब चल रहा है.इतने बड़े हिंसा के दो दिन बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने अबतक इस हिंसा पर कोई कड़ी कार्यवाही नही की है.जिससे  भीड़ और उन्मादी होती जा रही है.पुलिस ने मंगलवार को दस लोगो को गिरफ्तार कर लिया था लेकिन ये गिफ्तारी प्रदर्शनकारियों को रास नही आई फलस्वरूप गिरफ्तारी से नाराज उत्पातियों ने पुलिस पर गोलियां चलाई और पत्थरबाज़ी की.कमलेश तिवारी की कथित टिप्पणी ने निश्चित ही नफरत और हिंसा फैलाने का काम किया है.एक धर्म विशेष की भावनाओं को आहात किया है.जिसकी आलोचना सभी हिन्दू संगठनों ने भी एक सुर में किया है.लेकिन अब भी बहुत से लोग आग में घी डालने का काम कर रहें है और पूरी आज़ादी से कर रहें है.कमलेश तिवारी को उत्तर प्रदेश सरकार ने 2 दिसम्बर को गिफ्तार कर लिया था.फिलहाल अभी जेल में है.कानून के नजरिये में सभी जाति ,धर्म ,सम्प्रदाय एक समान है.लेकिन हमारे सियासतदानों को ये बात हजम नही होती है.मुस्लिम वोटों की तुष्टिकरण के लिए हमारे राजनेता हमेसा से दोहरा मापदंड अपनाते आएं है.जिसका ताज़ा उदाहरण हमारे सामने है, कमलेश तिवारी को रासुका के तहत गिरफ्तार कर लिया है.लेकिन बड़ा सवाल ये कि कमलेश के सिर को कलम पर इनाम राशी की घोषणा करने वाले मौलवियों को अभी तक गिरफ्तार क्यों नही किया ?.इस सवाल के निहतार्थ को समझे तो एक बड़ा कारण हमे देखने को मिलता है.कोई भी हुकुमत मुसलमानों के खिलाफ बोलने का साहस नही दिखा पाती है.जिसका सीधा कारण मुस्लिम वोट बैंक से है.उत्तर प्रदेश की तथाकथित सेकुलर सरकार पूरी तरह से इमाम और मौलवी के बयान पर चुप्पी साधे उनको संरक्षण दे रही है. जो बेहद ख़तरनाक है.कमलेश तिवारी को कानूनन जो सज़ा का प्रावधान है.उसे दिया गया लेकिन मौलवियों पर कार्यवाही न करना सरकार की मंशा पर सवालिया निशान लगाता है.वहीँ बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी भी मौन है.जिसका नतीजा हमारे सामने है.हिंसा और उग्र होने के साथ –साथ बढ़ती जा रही है.इन सब के बीच एक और बात गौर करने लायक है.सियासतदान ही नही हमारे देश के कथित बुद्धिजीवियों ने भी इस मसले पर मौन धारण कर रखा है.चुकी देश में अभी आभासी असहिष्णुता के विरोध में अपने पुरस्कार वापसी करने वाले तथा इनके समर्थन के नारा लगाने वाले सभी लोग आज चुप है.मालदा में इतनी बड़ी हिंसा फैली है.क्या वहां उन्हें असहिष्णुता नही नजर आ रही है ?गौरतलब है कि ये विवाद सोशल मीडिया से शुरू हुआ था.लोग सोशल मीडिया पर भी इसीप्रकार के सवाल पूछ रहें है.लेकिन अभी तक उन सभी तथाकथित सेकुलर लोगों की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है.पहला कि मालदा की हिंसा पर मौन क्यों है ? इस  सवाल की तह के जाए तो चुकी ये मुद्दा मुसलमानों से जुड़ा हुआ है और अगर ये कुछ बोलेंगे तो इनका सेकुलरिज्म भंग होगा.मालदा की घटना ने इसने सेकुलरिज्म को बेनकाब कर दिया है.एक बात अब स्पष्ट हो गई है कि सेकुलर लोगो की सेकुलरिज्म केवल हिन्दू विरोध तक सिमित रह गया है.मालदा की  घटना ने सेकुलर विरादरी के मुह पर ताला लगा दिया है.हमे याद होगा अभी कुछ महीने पहले दादरी  में गोमांस खाने की अफवाह के कारण एक अखलाख नामक व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी.ये घटना पुरे देश के लिए शर्मनाक था.पुरे देश ने इस घटना की आलोचना की लेकिन कथित सेकुलर लोग इससे संतुष्ट नही दिखे.इस घटना के बाद छद्म सेकुलर विरादरी को भारत कट्टरपंथी देश होने का डर सताने लगा था.लेकिन आज जब कट्टरपंथी ताकते उपद्रव मचा रही है तो इन्हें नजर नही आ रहा है.ये छदम सेकुलर लोग हिंदूवादी संगठनों से लेकर केंद्र सरकार तक को कोश रहें थे,लेकिन उत्तर प्रदेश में हुई घटना में इन्हें उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार से आज- तक एक सवाल भी पूछना मुनासिब नही समझा.दूसरे सवाल पुरस्कार वापसी करने वाले उन तमाम साहित्यकारों ,इतिहासकारों तथा उन फिल्मी हस्तियों से है कि, मालदा में जो हो रहा है उसके प्रति उतना रुख इतना नरम क्यों है ? क्या उन्हें मालदा में असहिष्णुता नही नजर आ रही है ? अब प्रायोजित पुरस्कार वापसी का ढोंग क्यों नही कर रहें है ?मालदा में ढाई लाख मुसमानो के पुरे इलाके में तबाही मचा रखें है.पुलिस,जनता सभी उनके द्वारा फैलाये गये हिंसा के शिकार हुए है.गाड़ियाँ जला दी जा रही है, घरो से लुट –पाट हो रही है.पूरी तरह से अराजकता का माहौल है.ये उपद्रवी मुस्लिम वहां के लोगो का जीना दूभर कर रखा है.इतनी बड़ी घटना पर ये लोग पुरस्कार और सम्मान लौटना तो दूर एक ट्विट या बयान देना भी उचित नही समझ रहें.निश्चय ही इससे एक बात कि पुष्टि तो हो जाती है.इन सभी लोगो को हिंसा, मौत समाजिक समरसता से कोई लेना देना नहीं है.इनका अपना एजेंडा है जिसके अनुसार ये चलते है.बहरहाल ,मालदा में फैली हिंसा बेहद ही अलोकतांत्रिक और असामाजिक है.कोई भी धर्म इसकी इजाजत नही देता कि किसी व्यक्ति की एक गलती के लिए उसे फांसी दे दी जाए.कमलेश तिवारी को संविधान के अनुसार सज़ा मिलने के बाद मुस्लिम समुदाय का हिंसात्मक रुख अख्तियार करना बेहद ही अफसोसजनक है.



Wednesday, 6 January 2016

पठानकोट हमला पाक का रिटर्न गिफ्ट



       दोस्ती के लायक नही पाकिस्तान
आदर्श तिवारी - 

जिसका अनुमान पहले से लगाया जा रहा था वही हुआ.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लाहौर यात्रा के ठीक एक सप्ताह बाद पाकिस्तान का फिर नापाक चेहरा हमारे समाने आया है.भारत बार –बार पाकिस्तान से रिश्तों में मिठास लाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है.लेकिन कहावत है ताली दोनों हाथो से बजती है एक हाथ से नही.पाकिस्तान की तरफ से आये दिन संघर्ष विराम का उल्लंघन ,गोली –बारी को नजरअंदाज करते हुए भारत पाकिस्तान से अच्छे संबध बनाने के लिए तमाम कोशिश कर रहा है.भारत की कोशिश यहीं तक नही रुकी हमने उन सभी पुराने जख्मों को भुला कर पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया लेकिन पाक परस्त आतंकियों ने आज हमे नये जख्म दिए है गौरतलब है कि एक तरफ पाकिस्तान के सेना प्रमुख इस नये साल में पाक को आतंक मुक्त होने का दावा कर रहें है.वही पठानकोट में एयरफोर्स बेस हुए आतंकी हमले ने पाकिस्तान के आतंक विरोधी सभी दावों की पोल खोल दिया.ये पहली बार नही है जब पाकिस्तान की कथनी और करनी में अंतर देखने को मिला हो पाकिस्तान के नापाक मंसूबो की एक लंबी फेहरिस्त है.जिसे याद करने पर दिल दहल जाता है.ऐसे मानवीयता पर हमला करने वाले तथा आतंकियों का पोषण करने वाले पाकिस्तान से हमने वार्ता बहाल किया ताकि दोनों देशों में शांति रहें. प्रधानमंत्री खुद साहसी पाक योजना का परिचय देते हुए नवाज शरीफ के जन्मदिन पर उनके घर गये.जिसका मतलब स्पष्ट था हम मित्रवत संबंध चाहते है लेकिन पाकिस्तान ने हमेसा हमारे पीठ पर खंजर घोपने का काम किया है.शनिवार तड़के करीब 3:30 बजे भारतीय सेना की वर्दी में भारी मात्रा में आरडीएक्स लेकर घुसे आतंकियों ने पठानकोट में एयरफोर्स बेस पर हमला कर दिया.सुरक्षाबल और आतंकियों के बीच 70 घंटो से भी अधिक समय तक चली मुठभेड़ में हमारे जवानों ने आतंकियों को ढेर कर दिया.हलाँकि अभी भी सर्च ऑपरेशन जारी है.इस संघर्ष में हमारे सात जवान शहीद हो गये तथा पांच जवान घायल है.पाकिस्तान की यूनाइटेड जिहाद काउंसिल ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है.बहरहाल ये तो स्पष्ट हो गया है कि आतंकी पाक पोषित ही है.उधर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भी इस घटना की निंदा करने हुए मदद का भरोषा दिलाया है.जो एक तरह से जुमला है.पाक कभी भी आतंक को रोकने के लिए कोई बड़ा कदम नही उठाया है.हमे यह मान लेना चाहिए कि पाकिस्तान एक विफल देश है जहाँ आतंकवाद फलता –फूलता है.पाकिस्तान में बढने आतंकवाद के चलते,उसे हमेसा विश्व मंच पर संदिग्ध नजर से देखा जाता है. लेकिन पाकिस्तान ने अपनी छवि सुधारने में अभी तक कोई कवायद नही की है.नतीजन आज अमेरिका,यूरोप सभी देश पाकिस्तान को कड़े शब्दों में निर्देश दे रहें है कि आतंक को रोकिये लेकिन आतंक के मोर्चे पर नवाज शरीफ पूरी तरह विफल रहें है.पाकिस्तान से पनपे आतंकी सबसे ज्यादा भारत के लिए खतरा उत्पन्न करते है. हमारे यहाँ जब भी कोई आतंकी हमला होता हमारे  पास इस बात की पुख्ता सबूत होता है कि आतंकी पाक पोषित ही है.लेकिन पाकिस्तान कभी इस सच को स्वीकार नही करता.पठानकोट में हुए आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान ने मदद का भरोषा दिया है तो क्या अब पाकिस्तान ये स्वीकार करेगा कि आतंकी पाकिस्तानी है? हमारी जाँच एजेंसियों के हाथ पुख्ता सुबूत हाथ लगे है जिससे साबित हो जाता है कि आतंकी पाक के ही है. इस आतंकी घटना से कई सवाल उठ खड़े होते है.पहला सवाल अलर्ट के बाद भी सरकार और एजेंसियां क्या कर रही थी ? दूसरा सवाल ये कि कब -तक हम पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाते रहेंगे ?आखिरी सवाल 15 जनवरी को दोनों देशों के बीच विदेश सचिवों की वार्ता पर इस आतंकी हमले का क्या प्रभाव पड़ेगा ? पहले सवाल को देखे तो साफ पता चलता है कि सरकार और जाँच एजेंसियों ने चुक किया है अगर अलर्ट था तो आतंकी भारतीय सीमा में कैसे प्रवेश कर गये.इसके अतिरिक्त एयरबेस सुरक्षा घेरे में भी कमी होने की बात सामने आई है.सरकार तथा सेना को यह तक पता नही था कि कितने आतंकी एयरबेस के अंदर मौजूद है.एकतरफ शनिवार को ऑपरेशन खत्म होने की घोषणा की गई थी वही दूसरी तरफ रविवार दोपहर फिर से आतंकवादियों और सैन्य बलों के बीच गोलीबारी शुरू हो गई.ये चुक निश्चित ही हमारे देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवालियां निशान लगा रहें है..दूसरे सवाल की तह में जाए तो भारत कई बार पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा चुका है इसके बावजूद पाकिस्तान के रवैये में कोई सकारात्मक बदलाव देखने को नही मिला है.मोदी पड़ोसियों से संबंध अच्छे बनाने के लिए एक अच्छे कूटनीति का परिचय दिए है लेकिन इसमें पाकिस्तान को लेकर अभी तक उनकी नीति विफल रही है.हमारे लाख कोशिशों के बाद भी पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज़ नही आ रहा है.शपथ ग्रहण समारोह में शरीफ के आमंत्रण से लेकर लाहौर जाने तक मोदी सरकार का एक ही मंत्र था कि दोनों देशों के दरमियान शांति और भाईचारा हो.लेकिन अब ये बर्दास्त की पराकाष्ठा है कि एक के बाद एक आतंकी हमले हो रहें है और हम शांति का राग अलाप रहें है.अब समय आ गया है कि सरकार ऐसे हमलों पर कड़ी कार्यवाही करें न की दोस्ती का राग अलापे.अंतिम सवाल पर गौर करें तो मोदी के लाहौर लौटने के कुछ ही घंटो बाद ये खबर आई कि 15 जनवरी को भारत और पाकिस्तान विदेश सचिव स्तर की वार्ता होनी है.ये सही है कि दोनों देशों के बीच ये वार्ता घोषित तिथि पर हो, लेकिन भारत को अब पाकिस्तान के प्रति अपना कड़ा रुख रखना होगा,बात केवल व केवल आतंक पर हो.पाकिस्तान द्वारा किये गये सारे आतंकी हमलों के सुबूत हमारे पास मौजूद है.इस वार्ता के माध्यम से पाक को ये चेतावनी देने की जरूरत है कि किसी भी सुरत में भारत आतंक व बातचीत एकसाथ जारी नही रख सकता अगर पाक, भारत से अच्छा संबंध रखना चाहता है तो, 26/11 समेत उन सभी आतंकियों के प्रति कड़ी कायवाही करें.अन्यथा हम हाथ पर हाथ धरे नही बैठने वाले.इस वार्ता को रदद् नही करना चाहिए बल्कि इस वार्ता का उद्देश्य एक होना चाहिए कि इस हमले पर पाक सरकार जल्द कार्यवाही करे तथा इसके साथ ये भी हिदायत दी जानी चाहिए कि अब अगर इस प्रकार की कोई घटना होती है तो, हमारे सैनिक युद्ध के लिए तैयार बैठे है.देश अब आतंक से त्रस्त आ चुका है.ये सही है कि सरकार पड़ोसी देशों से अच्छे संबध रखें लेकिन पाकिस्तान के लिए ये संभव नही दिख रहा .