Tuesday, 13 December 2016

‘वरदा’ चक्रवात को लेकर दिखी कुशल तैयारी



तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में चक्रवात वरदा के आने से जनजीवन पूरी तरह से अस्त –व्यस्त हो गया है.मौसम विभाग ने इस बात की पहले ही जानकारी दी थी कि वरदा नाम का तूफान सोमवार को तमिलनाडु में प्रवेश करेगा. मौसम विभाग की जानकारी के अनुसार तैयारी भी पूरी कर ली गई थी. गौरतलब है कि चक्रवात वरदा सोमवार की दोपहर दो से चार बजे के बीच में चेन्नई के उतरी तट से टकराया. उस समय उसका वेग काफी ज्यादा था किन्तु धीरे –धीरे यह तूफान कमजोर पड़ता गया. बावजूद इसके अभी तक लगभग सात लोग काल के गाल में समा चुके हैं, घर तबाह हो गये हैं, बिजली काट दी गई है, पेड़ उखड़ गये हैं, बिजली के खम्भे धाराशाई हो गये हैं तथा रेल, सड़क व वायु यातायात अवरुद्ध हो गया है. तमिलनाडु में आठ हजार तथा आंध्रप्रदेश में नौ हजार से ज्यादा लोगों को राहत शिविरों में तूफान के अंदेशे के साथ ही पहुंचा दिया गया था. चेन्नई, तिरुवल्लुर, कांचीपुरम और विल्लीपुरम में वरदा का व्यापक असर देखने को मिला. मौसम विभाग ने इस तूफान की गति पहले 140 किलोमीटर प्रति घंटे से दर्ज की किन्तु कुछ देर बाद इसकी रफ्तार कम होती गई जो सौ किलोमीटर प्रति घंटा के आस –पास रही किन्तु यह रफ़्तार भी आम जनजीवन को तहस–नहस करने के लिए काफी थी. कई जगहों पर कारें पटल गई, झोपड़ियाँ एवं टीन-टप्पर उड़ गये. एहतियात के तौर पर स्कूल ,कॉलेज में अवकाश घोषित कर दिया गया है तथा प्रशासन ने अपील की है कि लोग अपने घरों से बाहर न निकले. तमिलनाडु के साथ ही आंध्र प्रदेश में भी अलर्ट जारी किया गया है, मछुआरों को अगले 48 घंटों तक समुंद्र में नहीं जाने की सलाह दी गई है. अलर्ट के बावजूद आंध्रप्रदेश के काकीनाडा में दो मछुआरे समुद्र तट के पास से लापता हो गये हैं. तटरक्षक ने उनके तलाश व बचाव करने के लिए पहले से जहाजों को तैयार रखा है. यह सुखद बात है कि आंध्रप्रदेश में अभी तक चक्रवात वरदा से कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ है. लेकिन भारी बारिश के चलते सामान्य जनजीवन पर बुरा असर पड़ा है. वैसे तो तमिलनाडु पिछले दो दशक से चक्रवाती तूफान वरदा की चपेट में आता रहा है, मगर इसबार इसकी रफ्तार हरबार से ज्यादा रहने का अनुमान लगाया गया था जिसके मद्देनजर राहत व बचाव की तमाम तैयारियां पहले से की जा चुकी थी. जिसके परिणामस्वरूप स्थिति उतनी कठिन नहीं हुई जिसका अंदाजा लगाया गया था. मौसम विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक तमिलनाडु में 1994 के बाद से चेन्नई तट की ओर से कुंच करने वाला यह पहला बहुत जोरदार चक्रवाती तूफ़ान है. तूफान के बाद से राहत व बचाव कार्यों में प्रशासन जुट गया है. गिरे पेड़ों, बिजली के खम्भों और तहस–नहस को दुरुस्त करने के लिए एनडीआरएफ के छह दल और एसडीआरएफ के चार दल राहत कार्यों में लगे हुए हैं. उम्मीद जताई जा रही है कि मंगलवार की शाम अथवा बुधवार तक जनजीवन पूर्णतया सामान्य पटरी पर लौट आएगा. बहरहाल, इस कठिन घड़ी में केंद्र तथा राज्य सरकारों की सुझबुझ और आपसी तालमेल के चलते हर स्थिति से निपटने की भरपूर तैयारी कर ली गई थी. इसी का नतीजा है लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया गया, सेना के जवान, कोस्टगार्ड के चार बड़े व छह पेट्रोलिंग जहाज, नेवी के 11 युद्धपोत समेत पुलिस प्रशासन, नगर निगम, फायर बिग्रेड सभी को तैयार रखा गया था ताकि किसी बड़े हादसे से आसानी से निपटा जा सके. वहीँ कांचीपुरम स्थित परमाणु संयंत्र की भी वरदा तूफान के मद्देनजर चौकसी बढ़ा दी गई है. मौसम विभाग के मुताबिक वरदा अब कमजोर पड़ चुका है गोवा पहुंचते –पहुंचते यह पूरी तरह कमजोर पड़ जाएगा. खैर, इतने एहतियात के बावजूद केंदीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने तमिलनाडु में मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम व आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चद्रबाबू नायडू से फोन पर हालात का जायजा लिया और वरदा चक्रवात को देखते हुए हरसंभव सहयोग करने का आश्वासन दिया. गौरतलब है कि इससे पहले भी देश में भिन्न –भिन्न नाम से चक्रवाती तूफान आते रहे हैं. एक भयंकर आपदा के रूप में 2013 में फैलिन आया था. इसीप्रकार ‘हुदहुद’ लगभग दौ सौ किलोमीटर से अधिक की रफ़्तार से अक्टूबर 2014 में आंध्र प्रदेश के तटीय शहर विशाखापत्तनम से टकराया था. तूफान प्रभावित क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन और बुनियादी सुविधाओं को सुनिश्चित करना सदैव चुनौतीपूर्ण रहा है. समुद्री चक्रवात एक ऐसी विपदा है जिससे निपटने के लिए योजनाबद्ध ढंग से रणनीति बनाकर समय रहते कम किया जा सकता है. तकनीकी के बढ़ते चलन व मौसम वैज्ञानिकों की दक्षता, आपदा प्रबंधन अधिकारियों के समय रहते कार्यवाही के चलते प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने में देश पहले की तुलना में अधिक सक्षम हुआ है. उपग्रह के जरिये मौसम के पूर्वानुमान की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध होने से जब भी कोई बड़ा चक्रवात अथवा तूफान आने वाला होता है इसकी सटीक जानकरी हमें प्राप्त हो जाती है. जिससे प्रशासन, आपदा प्रबंधन आमजनता की सहायता तथा  राहत व बचाव कार्य की तैयारी पूरी कर ली जाती है. ऐसे समय में प्रायः यह भी देखने को मिलता है कि प्रशासन द्वारा अल्टीमेटम के बावजूद लोग घरों से निकल जाते हैं अथवा एहतियात के लिए जो अपील सरकार द्वारा की जाती है उसे दरकिनार करने का दुस्साहस करते हैं. परिणामस्वरूप किसी अप्रिय घटना की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. जनता को भी इन आपदाओं के कठिन समय में धैर्य का परिचय देना चाहिए तथा प्राप्त निर्देशों का पालन करना चाहिए. बहरहाल, मौसम विभाग की सटीक भविष्यवाणी और प्रशासन की चुस्ती की वजह से चक्रवात वरदा से एक बड़ा संकट आसानी से टल गया. वरदा को लेकर शुरू से यह अंदाज़ा लगाया गया था इसके आने के पश्चात् जानमाल को भारी नुकसान होगा तथा इसके दुष्परिणाम दूरगामी होंगे. किन्तु कुशल रणनीति और आपदा प्रबंधन की सुझबुझ के चलते हम प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में अब सक्षम होते जा रहे हैं.    

संसद की प्रतिष्ठा को धूमिल करते सियासतदान



संसद  के शीतकालीन सत्र समाप्त होने में चंद दिन शेष बचे हैं और यह पूरा सत्र हंगामे की भेंट चढ़ता दिखाई दे रहा है. नोटबंदी को लेकर विपक्षी दल लोकतंत्र के मंदिर मे जो अराजकता का माहौल बनाए हुए हैं वह शर्मनाक है. गौरतलब है कि नोटबंदी एक ऐसा फैसला है जिसका प्रभाव देश के हर व्यक्ति पर पड़ा है और आमजनता कतार में खड़ी है. उसे तमाम प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. नोटबंदी के फैसले के बाद आमजनता के जहन में भी कई सवाल खड़े हुए हैं जिसके जवाब के लिए वह संसद की तरफ देख रही है. किन्तु हमारे द्वारा चुनकर भेजे गये प्रतिनिधि इन सवालों के जवाब तथा इस समस्या का हल निकालने की बजाय अपनी राजनीतिक शक्ति और झूठी प्रतिष्ठा की लड़ाई लड़ने में मशगूल हैं. ऐसे कठिन समय में और इतने गंभीर मुद्दे पर भी हमारे सियासतदान अपनी ओछी राजनीति से बाज़ नहीं आ रहे हैं. नोटबंदी के बाद जनता में अफरातफरी का जो महौल बना है उससे जनता को कैसे निकाला जाए, कैश को लेकर जो समस्याएँ आमजनता के समक्ष आ रही हैं, उस समस्या से निजात जनता को कैसे मिले? इसपर बात करने की बजाय हमारे राजनीतिक दल अपने अनुसार राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं. टकराव की ऐसी स्थिति बनी है कि समस्याओं को लेकर जो व्यापक बहस दिखनी चाहिए वो महज हुल्लड़बाजी तक सिमित होकर रह गई है. सदन को ठप्प हुए दो सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है तथा सत्र भी अब समाप्त होने वाला है, लेकिन संसद में कामकाज न के बराबर हुआ है. इस गतिरोध को देखते हुए वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सत्ता पक्ष तथा विपक्ष दोनों पक्षों पर नाराजगी जताई है. यही नहीं आडवाणी ने संसदीय कार्यमंत्री व लोकसभाध्यक्ष को भी कठघरे में खड़ा किया है. आडवाणी का यह कहना वाजिब ही है कि सदन में हल्ला मचाने वाले सांसदों को सदन से बाहर कर उनके वेतन में कटौती की जानी चाहिए. आडवाणी की फटकार के अगले ही दिन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी सांसदों से अपील की कि संसद में गतिरोध समाप्त कर काम शुरू किया जाए. लेकिन महामहिम के अपील का भी कोई असर हमारे माननीयों पर होता हुआ नहीं दिख रहा है. इस व्यर्थ के हंगामे को देखकर लगता है कि विपक्ष यह तय कर बैठा है कि हम संसद में काम नहीं होने देगें, वहीं सत्तापक्ष भी अपनी शर्तों पर सदन चलाने पर अड़ा हुआ है. बहरहाल, संसद बहस का मंच हैं जहाँ जनता से जुड़े मुद्दों पर हमारे द्वारा चुनकर भेजे गये प्रतिनिधि सकारात्मक चर्चा करते हैं. लेकिन अब हमारी संसद से सकारात्मकता विलुप्त होती चली जा रही है, हर मुद्दे पर बहस की जगह हंगामे ने ले लिया है. विपक्षी दलों को लगता है कि विरोध करने का सबसे सही तरीका यही है कि संसद के कार्यवाही को रोक दिया जाये, विपक्ष को इस तरीके को बदलना होगा. उसे आमजनता से जुड़ी समस्याओं को लेकर विरोध करने का हक है, उसे समस्याओं को लेकर सरकार को घेरने का अधिकार है किन्तु सदन की कार्यवाही को रोकना किसी भी स्थिति में सही नहीं है. नोटबंदी का फैसला जैसे ही सामने आया विपक्ष के रुख को देखकर ही अंदाज़ा हो गया था कि संसद तो चलने से रही और हुआ भी यही. सत्र शुरू होने के साथ ही विपक्ष ने नोटबंदी पर चर्चा की मांग की, सरकार ने विपक्ष की इस मांग को स्वीकार करते हुए विमुद्रीकरण पर चर्चा को राजी हो गई थी. किन्तु विपक्ष हर रोज़ नई शर्तों के साथ चर्चा चाहता है. पहले विपक्ष ने कहा प्रधानमंत्री की उपस्थिति होना जरूरी है, उसके बाद मतदान के नियमानुसार चर्चा की जिद पकड़ कर बैठ गया. सत्ता पक्ष ने विपक्ष की इस मांग को खारिज कर दिया. जिससे दोनों पक्ष अपनी –अपनी जिद पर अड़े हुए हैं.सरकार के सामने चुनौती होती है कि वह किसी भी तरह संसद को चलाने में सफल रहे. वहीँ विपक्ष का मिजाज़ होता है कि वे मुद्दे जिनका जनता से सीधा सरोकार हो और यदि सरकार जनता की उस परेशानी पर ध्यान नहीं दे रही हो तो विपक्ष सरकार को उन मुद्दों के सहारे घेरता है तथा संसद में व्यापक विचार–विमर्श की मांग करता है. किन्तु अब हमारे संसद प्रणाली में स्वस्थ बहस की गुंजाइश नहीं बची है. संसद अखाड़ा बन चुका है बहस की भाषा तीखी हो गई है, सवाल तो यह भी है स्वस्थ बहस चाहता कौन है ? यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि विपक्ष भी बहस के नियम और उसके स्वरूप को लेकर संशय में है. विमुद्रीकरण के फैसले के बाद संसद में जो अराजकता का माहौल बना हुआ है आखिर उसका जिम्मेदार कौन है ? जाहिर है कि विमुद्रीकरण के बाद से आम जनता को परेशानी हुई है. संसद से लेकर सड़क तक चल रहे गैरवाजिब हंगामे को देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि विपक्ष की आम जनता की परेशानीयों को दूर करने में कोई दिलचस्पी नहीं है. बल्कि विपक्ष इसपर अपना राजनीतिक नफा–नुकसान ढूंढने में लगा हुआ है, राजनीतिक लाभ के लिए संसद की गरिमा को ठेस पहुंचाना कतई उचित नहीं है. देश हित के लिए जरूरी है सत्तापक्ष तथा विपक्ष दोनों मिलकर संसद में एक सार्थक चर्चा करें जिससे समस्याओं का हल ढूंढा जा सकें.

Wednesday, 7 December 2016

बैकफूट पर पाकिस्तान

अमृतसर में आयोजित 7वें  हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन कई मायने में अहम रहा अफगानिस्तान के पुनर्गठन,सुरक्षा व आर्थिक विकास के साथ –साथ  आतंकवाद तथा नशीले पदार्थों की तस्करी रोकने जैसे गंभीर विषय चर्चा के केंद्र में रहे सम्मेलन के एजेंडे में आतंकवाद का मुद्दा प्रमुख था.जाहिर है कि जिस मंच पर पाकिस्तान के प्रतिनिधि मौजूद हों और बात आतंकवाद को उखाड़ फेकने की हो वहां पाक प्रतिनिधि का असहज होना स्वाभाविक है.भारत के प्रधानमंत्री और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति ने आतंकवाद के मसले को पाक को कटघरे में खड़ा किया तो वहीँ इस सम्मेलन में संयुक्त रूप से आतंकवाद के खिलाफ तैयार घोषणा पत्र में लश्करे-ए- तैयबा और जैश –ए –मोहम्मद समेत कई आतंकी संगठनों को रेखांकित किया गया है.यह भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक सफलता है जाहिर है कि ये आतंकी संगठन पाकिस्तान द्वारा पोषक हैं तथा पाकिस्तान इनके सहयोग से भारत के साथ –साथ अफगानिस्तान में अशांति और हिंसा के लिए इनका इस्तेमाल करता रहता है. एक बात जगजाहिर है कि पाकिस्तान आतंकियों को पनाह देता है और उसका इस्तेमाल भारत ,अफगानिस्तान जैसे देश में अस्थिरता उत्पन्न करने के लिए करता है.भारत पाकिस्तान को हर वैश्विक मंच से अलग –थलग करने में कुटनीतिक कामयाबी तो हासिल कर ले रहा है लेकिन आतंकवाद के मसले पर घुसपैठ के मसले पर पाकिस्तान का अड़ियल रवैये में जरा भी परिवर्तन देखने को नहीं मिल रहा है.हार्ट ऑफ़ एशिया सम्मेलन में भी पाकिस्तान ब्रिक्स और दक्षेश की तरह अलग –थलग पड़ गया और उसके प्रतिनिधि सरताज अजीज बचाव करते रह गये.बहरहाल,पाकिस्तान को हर मंच पर घेरने की रणनीति तो सही है भारत इसमें सफल भी दिख रहा है लेकिन सवाल यह खड़ा होता है क्या इससे आतंकवाद और घुसपैठ में रोकने में भारत को कामयाबी मिल रही है या नही ? इस सवाल की तह में जाएँ तो दो बातें स्पष्ट होती हैं.पाक को हर मंच से अलग –थलग करने की भारत की रणनीति के चलते पाकिस्तान अब बैकफूट पर  आ गया है तथा हर मंच से पाकिस्तान खुद का बचाव करने में ही अपनी भलाई समझ रहा है.आतंक को पनाह देने की बात भारत ने हर मंच से उठाई है और इसके पुख्ते सुबूत भी वैश्विक मंचो पर रखा है जिससे पाकिस्तान की फजीहत हर वैश्विक मंच पर हो रही है.दूसरी बात पर गौर करें तो यह भारत के दृष्टिकोण के कतई सही नहीं है भारत की नीति स्पष्ट है आतंक का खात्मा व सीमा पर शांति लेकिन पाकिस्तान इसके विपरीत काम कर रहा है यही कारण है कि भारतपाक को हर मंच से धुल चटा रहा है.आतंकवाद पाकिस्तान की कमजोड कड़ी है खुद पाकिस्तान भी आतंकवाद से पीड़ित है बावजूद इसके पाकिस्तान के रुख में कोई परिवर्तन देखने को नहीं मिल रहा है.उड़ी हमले व सर्जिकल स्ट्राइक के बाद आतंकी गतिविधियों और  घुसपैठ के मामले बढ़े है.आतंकवाद की इस लड़ाई में भारत के साथ अन्य देश जो भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहें है उनसब को भी यह मुल्यांकन करने की आवश्यकता है कि इस लड़ाई में अभीतक कितने सफल हुए हैं ? कहीं यह लड़ाई महज फाइलों तक तो नहीं सिमट रही ? हर वैश्विक मंच से भारत आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेकने की बात कर रहा है अमेरिका समेत कई राष्ट्र्मित्र देश इसका समर्थन तो कर रहें है लेकिन कार्यवाही करने में पीछे है.आतंकवाद पर बात तो समूचा विश्व कर रहा है लेकिन आतंक पर प्रहार कितने देश कर रहे हैं इस बात पर भी गौर करना चाहिए.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में संकेतों के जरिये पाक को खूब खरी –खोटी सुनाई हार्ट ऑफ़ एशिया सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते  महुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सीमा पार चल रहे आतंक की पहचान करनी होगी  और इससे मिलकर लड़ना होगा आतंकवाद से अफगानिस्तान की शांति को खतरा है प्रधानमंत्री ने सिर्फ आतंकवादियों की नहीं बल्कि आतंकवाद को आर्थिक मदद देने वालों के खिलाफ की कड़ी कार्यवाही करनी की बात कहीं वहीँ दूसरी तरफ अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को जम के लताड़ा उन्होंने पाकिस्तान को सीधे तौर पर निशाना साधते हुए कहा कि पाकिस्तान की मदद के बगैर तालिबान उसकी धरती पर एक दिन भी नहीं टिक सकता.मौके का फायदा उठाते हुए गनी ने यह भी कहा कि तालिबान के स्वीकार किया है कि उसे पाकिस्तान का सपोर्ट मिल रहा है गौरतलब है कि अफगानिस्तान में पिछले साल हिंसा और आतंकी हमलों से सबसे ज्यादा मौतें हुई है अफगानिस्तान की पीड़ा जायज भी है.पिछले दो सालों में तालिबान के हमलों से  अफगानिस्तान के लोगों का जीना मुहाल कर रखा है. अफगान आर्मी तालिबान लड़ाकों के आगे कमजोर दिखाई दे रही है किन्तु बड़ी बिडम्बना है कि अफगानिस्तान में स्थिरता और इसके पुर्निर्माण के मकसद से हुए इस सम्मेलन  में पाकिस्तान को भी शामिल किया गया है जो अफगानिस्तान में हिंसा और आतंक को फ़ैलाने के लिए जिम्मेदार है.गनी में इन सब को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान पर जमकर प्रहार किया वहीँ पाकिस्तान से 50 करोड़ डॉलर अफगानिस्तान के पुनर्निमाण के लिए देने की बात कही है ;लेकिन अफगान के राष्ट्रपति ने इसे यह कहते हुए इंकार कर दिया कि बेहतर होगा कि इन पैसों का इस्तेमाल पाकिस्तान आतंकवाद को रोकने के लिए करे.अफगानिस्तान के राष्ट्रपति ने पाकिस्तान के गालों पर करार तमाचा जड़ा है वहीँ भारत भी पाकिस्तान को लेकर अपने कड़े रुख पर कायम है.इन सब के बावजूद पाकिस्तान के रुख में कोई बदलाव देखने को मिलेगा ऐसा नही लगता. लेकिन पाकिस्तान को अलग-थलग करने की रणनीति भी तभी सफल होगी जब पाकिस्तान आतंकवाद और घुसपैठ जैसी हरकतों से बाज़ आ जायेगा.

Sunday, 20 November 2016

बैंक डिफाल्टरों पर सुप्रीमकोर्ट का रुख सही

   
    

बैंक डिफाल्टरों का मुद्दा समय –समय संसद से सड़क तक चर्चा का विषय बना रहता है.चुकी बैंको पर एनपीए का बढ़ता दबाव देश की आर्थिक स्थिति को दीमक की तरह चाट रहा है बावजूद इसके हमारे बैंक खुद के पैसे वसूलने में असहाय दिख रहें है. सर्वोच्च न्यायालय भी इस विकराल समस्या पर अपनी नजर गढाये हुए है. न्यायपालिका लोन डिफाल्टर में मामले पर कई दफा सरकार आरबीआई समेत कई बैंको को आड़े हाथों लेता रहा है.वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि डिफाल्टरों के नाम खुलासा अब कोई बड़ा मसला नहीं रह गया है.जाहिर है कि सुप्रीमकोर्ट ने अपनी पिछली सुनवाई के दौरान आरबीआई और सरकार से पूछा था कि क्यों न 500 करोड़ के अधिक बैंक डिफाल्टरों के नाम सार्वजनिक कर दिए जाएँ.लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट इस मसले पर और सख्ती दिखाते हुए सरकार और आरबीआई को इस मामले का निवारण ढूंढने को कहा है.कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि डिफाल्टरों से कर्ज वसूली के लिए क्या प्लान है ?माननीय कोर्ट से सरकार से यह भी पूछा है कि सरकार ने अभी तक इसके लिए क्या –क्या कदम उठायें हैं ? कोर्ट ने केंद्र सरकार ने तीन सप्ताह के भीतर रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है.कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी कहा है कि हमें यह देखना है कि इस समस्या की जड़ आखिर है कहाँ और इससे कैसे निपटा जाए. मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर,जस्टिस एएम कंविल्कर और डीवाई चंद्रचुड की तीन सदस्यीय बैंच ने कहा कि केंद्र की विशेषज्ञ समिति जो इस पर विचार कर रही है उसे अपनी रिपोर्ट को जल्द पेश करना चाहिए कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि कमेटी की रिपोर्ट आने के उपरांत ही अगला कदम उठाया जायेगा तथा अगली सुनवाई 12 अगस्त को होगी.गौरतलब है कि देशभर के कई बैंको से 500 करोड़ और उससे ज्यादा लोन लेकर डिफाल्टर होने वाले 57 लोंगो पर करीब 85 हजार करोड़ रूपये की देनदारी है यदि 500 करोड़ के कम के डिफाल्टरों की बात करें तो यह एक लाख करोड़ होगा जो एक बहुत बड़ी राशि है.जिसे कोर्ट ने भी स्वीकार किया है. लगातार यह बड़ी राशि बैंको के लिए सरदर्द बना हुआ है यह पैसा कबतक बैंक को वापस मिलेगा या बैंक इस रकम को वसूल पायेगा की नहीं ये खुद बैंक को नहीं पता .ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बैंक व सरकार डिफाल्टरों से अपने पैसे वापस कैसे ले ? यह एक यक्ष प्रश्न की तरह है जिसका जवाब न तो सरकार के पास है और न तो बैंक के पास. गौरतलब है कि एनपीए को लेकर सरकार भी कुछ महत्वपूर्ण कदम उठायें है जिसे दरकिनार नहीं किया जा सकता मसलन केंद्र सरकार ने बैंकों की एनपीए के खिलाफ एक महत्वपूर्ण और सार्थक कानून मानसून सत्र में पास करवाया था.द इंफोर्समेंट ऑफ़ सिक्यूरिटी इंटरेस्ट एंड रिकवरी ऑफ़ डेब्ट्स लॉस एंड मिसलेनियस प्रोविजन्स नाम का विधेयक सरकार ने संसद के दोनों सदनों द्वारा पास करवाया था.बैंक एनपीए को लेकर  सरकार का यह एक महत्वपूर्ण कदम था.जिसमें ना सिर्फ सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों को और अधिकार प्रदान किये गए हैं बल्कि इस महत्वपूर्ण संशोधन की बदौलत  एनपीए के मामलो में निपटारा भी जल्द से जल्द हो सके.बहरहाल,आरबीआई के अनुसार सरकारी बैंकों के चार लाख करोड़ से ज्यादा की राशि एनपीए के तौर पर फंसी हुई है. जिसके मिलने की आस न के बराबर है. ऐसे वक्त में सुप्रीम कोर्ट ने समस्या की जड़ की तरफ सरकार का ध्यान आकृष्ट किया है.सनद रहे कि सरकारी बैंकों के एनपीए का मुद्दा लगातार काफी गर्म रहा है. ऑल इंडिया बैंक एम्पलॉय एसोसिएशन (एआईबीईए) ने बैंकों से कर्ज़ लेकर साफ़ हजम कर जाने वाले 5610 कथित उद्यमियों की जो लिस्ट उजागर की थी. उससे पता चलता है कि हमारे देश में कर्जखोरी की बीमारी ने अब महामारी का रूप धारण कर लिया है. खासकर उद्योगपति विजय माल्या की कंपनी किंगफ़िशर पर बकाये कर्ज़ का मुद्दा आज भी चर्चा का विषय बना हुआ है.अकेले विजय माल्या बैंकों का करीब 9,000 करोड़ लेकर चंपत हो गये हैं. ऐसे बकायदारों की एक लंबी फेहरिस्त है जो बैंकों का कर्ज देने में टालमटोली कर रहें हैं. खैर,हमें एनपीए की मुख्य जड़ो की तरफ भी ध्यान देना होगा जहाँ से यह समस्या विकराल रूप धारण करने लगी. हमारे देश में एनपीए की समस्या ने मुख्य रूप से अपनी जड़ो को यूपीए शासन के समय से जमानाव विस्तार करना शुरू कर दिया था.जिसने अब विकराल रूप धारण कर लिया है. 2009 से ही बैंकों में कर्जदारों की संख्या लगातार बढती चली गई. खासकर बड़े उद्योगपति जिन्होंने अपने उद्योग के लिए बैंक से बड़ी रकम लेना शुरू किया. 2008 में जब वैश्विक मंदी छाई हुई थी, उस समय भारत की जीडीपी भी निचले स्तर पर थी. लेकिन भारत में मंदी का असर विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा कम था. इसका लाभ लेते हुए उस समय कांग्रेस नेतृत्व ने जिस तरह से अपने करीबी उद्योगपतियों को दिलखोलकर ऋण दिए. जिसमें विजय माल्या, जिंदल, जेपी आदि प्रमुख थे. आज भी यह समझना मुश्किल है कि जब विश्व मंदी के चपेट में था, आर्थिक त्रासदी से गुजर रहा था. ऐसी विकट परिस्थिति में इतने कर्ज़ क्यों बांटे गये? यही नहीं यूपीए सरकार ने बढ़ते एनपीए पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जिससे बैंक एनपीए की बोझ तले दब गये. आज सरकारी बैंकों की एनपीए इतनी बढ़ चुकी है.समूचे देश का अर्थ विकास इसके गिरफ्त में है.अब समय आ चुका है बैंको को इससे मुक्ति दिलाये जाए जो बड़े डिफाल्टर हैं उनपर कड़ी कार्यवाही कर राशि को वसूली जाए.सुप्रीम कोर्ट की बात पर गौर करें तो इसमें कोई दोराय नहीं कि सरकार इस समस्या का दीर्घकालीन निवारण ढूंढने में कभी पूर्णतया सफल नहीं रहीं है.बैंक डिफाल्टरों की समस्या धीरे –धीरे आज आर्थिक त्रासदी का रूप धारण करने मुहाने पर खड़ा है.जिससे देश की आर्थिक स्थिति पर असर तो पड़ता ही है आम जनता के मन भी यह धारण पैदा हो जाती है कि हमारे बैंक बड़े व्यापारियों को सहूलियत प्रदान करती है किन्तु गरीब किसान को मामूली राशि के लिए परेशान किया जाता है.देश की इस विकराल समस्या को लेकर कोर्ट समय समय पर सरकारों को फटकार लगाता रहा है लेकिन सरकारें इस मुद्दे पर कोई ठोस रणनीति के तहत कार्यवाही करने से बचती रहीं है जिससे बैंको पर बढ़ता एनपीए आर्थिक स्थिति को खोखला करता जा रहा है.सरकार व बैंको को जल्द ही इससे मुक्ति का कोई ठोस रास्ता ढूँढना होना जिससे लोन रिकवर हो सके.

Wednesday, 2 November 2016

वर्चस्व की लड़ाई में सपा खो रही राजनीतिक जमीन

  
 


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जैसे –जैसे करीब आ रहें है सियासत हर रोज़ नए करवट लेती नजर आ रही है.हर रोज़ ऐसी खबरें सामने आ रहीं हैं जो प्रदेश की सियासत में बड़ा उलट फेर करने का माद्दा रखतीं है.सत्तारूढ़ दल समाजवादी पार्टी की आंतरिक कलह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है, चुकी यहाँ मामला जटिल इसलिए भी हो जाता है कि एक तरफ पार्टी में दरार तो आ ही रही है वहीँ दूसरी तरफ मुलायम परिवार में बिखराव भी हो रहा है.इन दोनों को बिखरने से रोकने में अभी तक पार्टी व परिवार मुखिया मुलायम सिंह भी सफल नहीं हुए हैं. गत जून माह से ही चाचा शिवपाल और भतीजे अखिलेश में बीच शुरू हुई तल्खी लागतार बढती जा रही है. अगर गौर करें तो चुनाव में अब ज्यादा समय शेष नहीं रह गया है सभी दल चुनावी बिसात बिछाने में लगें हुए ऐसे में सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी दो खेमे में बंटी हुई नजर आ रही  है.जिसकी बानगी हम कई बार पहले भी देख चुके हैं एक तरफ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तो दूसरी तरफ शिवपाल यादव खड़ें हैं.ताज़ा मामला पोस्टर वार को लेकर सामने आया है आगामी तीन नवम्बर को जहाँ अखिलेश यादव “ रथ यात्रा” शुरू करने जा रहें है.वहीँ पञ्च तारीख को पार्टी के पचीस साल पूरे होने पर भव्य आयोजन की तैयारी की जा रही है जिसके कर्ता-धर्ता शिवपाल यादव हैं. पहले दिन अखिलेश अपने रथ की लेकर उन्नाव जायेंगें उसके बाद पार्टी के रजत जयंती समारोह में शिरकत करने के लिए लखनऊ लौट आयेंगें. जिससे यह सन्देश दिया जा सके कि तमाम मतभेद के बावजूद समाजवादी पार्टी एक है.गौरतलब है कि शिवपाल और अखिलेश के बीच घमासान थमने का नाम नही ले रहा है.इस बार कड़वाहट पोस्टरों में माध्यम से सामने आई है मुख्यमंत्री अखिलेश की रथ यात्रा “विकास से विजय की ओर” के लिए लगे पोस्टरों में शिवपाल यादव नदारद हैं जाहिर है कि शिवपाल यादव पार्टी प्रदेश अध्यक्ष भी हैं सत्ताधारी दल के प्रदेश अध्यक्ष होकर भी मुख्यमंत्री के एक अहम रथ यात्रा के लिए लगे पोस्टर से गायब कर दिया जाना कोई छोटी घटना नही हैं, खबर तो यह भी है कि नेता जी को भी पहले जितना तवज्जो नही दी गई है उनके पोस्टर भी एकाध जगह ही दिख रहें है.इन सब के बीच बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या अखिलेश अलग रास्ता चुनकर सत्ता तक पहुंचना चाहतें हैं ? इस सवाल की तह में जाएँ तो समझ में आता है कि अखिलेश की छवि एक युवा और गंभीर मुख्यमंत्री के रूप में बनी हुई है.वहीँ दूसरी तरफ सपा के कई आला नेता मसलन मुलायम सिंह यादव ,आजम खांन हो अथवा शिवपाल यादव समय –समय पर विवादास्पद बयानों के चलते पार्टी के साथ –साथ  सरकार की छवि को घूमिल करने का काम करतें है.बल्कि अखिलेश अपने बयानों के जरिये चर्चा के केंद्र बनने से बचतें रहें हैं.बहरहाल ,शिवपाल और अखिलेश में जबसे रार सामने आई हैं मुखिया मुलायम सिंह ने भी कई ऐसे बयान दिए हैं जिससे अखिलेश अलग रुख रखने को विवश हुए हैं. इस पुरे प्रकरण में एक और प्रमुख वजह पर ध्यान दें तो  गायत्री प्रजापति का रोल भी कम नहीं है.भ्रष्टाचार और कई मामलों से घिरे गायत्री को अखिलेश ने अपने मंत्रीमंडल से बर्खास्त तो कर दिया लेकिन मुलायम और शिवपाल के राजनीतिक वर्चस्व के आगे  अखिलेश का मुख्यमंत्री पद  बौना और लाचार दिखाई  दिया.इन सब से खिन्न आकर पिछले कुछ समय से पिछले कुछ समय से अखिलेश की कार्यशैली को देखकर यही प्रतीत होता है कि अगर अखिलेश अकेले भी चुनाव में जाने से गुरेज नहीं करने वालें हैं.खैर, अखिलेश की रथयात्रा से शिवपाल की तस्वीर का गायब होना इस बात को साबित करता है कि लाख समाजवादी कुनबे और उसके मुखिया मुलायम सिंह यादव ये रट लगातें रहें कि पार्टी और परिवार एक है लेकिन इसकी सच्चाई जगजाहिर है इस पूरे प्रकरण एक बात तो स्पष्ट है  कि अंतर्कलह से सबसे ज्यादा नुकसान आगामी चुनाव में पार्टी को होने वाला है.शायद इसका अंजादा पार्टी नेताओं को भी हो गया है.इसके बावजूद समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह और अखिलेश खेमे के कार्यकर्ता यह  मुगालता पाले बैठें हैं कि इस कलह के उपरांत उनके अखिलेश की एक मजबूत छवि जनता के बीच बनी हैं.उस मजबूत छवि का आधार क्या है ? इस सवाल का जवाब शायद किसी के पास मौजूं नहीं है खैर, पार्टी के रजत जयंती समारोह और अखिलेश की रथयात्रा की  दोनों ऐसे वक्त में हो रही है जब सपा दो धड़ों में बटी हुई हैं पार्टी के अधिकतर कार्यकर्ता मुख्यमंत्री के साथ खड़े दिखाई दे रहें है.कुछ कार्यकर्ता इस असमंजस की स्थिति में हैं कि ऐसे नाज़ुक दौर में वह मुख्यमंत्री के साथ खड़ें दिखाई दे या शिवपाल को बल दें अथवा सपा मुखिया की बात सुने यह पूरी स्थिति में सपा को आगामी चुनाव में भारी नुकसान होना तय है. इसमें कोई दोराय नहीं है कि यह वर्चस्व की लड़ाई है इस लड़ाई में एक तरफ अखिलेश तो दूसरी तरफ शिवपाल यादव हैं.पार्टी में मुलायम सिंह के बाद संगठन के स्तर पर तथा राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में शिवपाल यादव शुरू से जाने जाते रहें हैं किन्तु अखिलेश के बढ़ते राजनीतिक कद ने जहाँ उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया वहीँ अखिलेश के मंत्रीमंडल से शिवपाल की मंत्रिमंडल से बर्खास्तगी शिवपाल के राजनीतिक वजूद पर ही सवाल खड़े कर दिए.अखिलेश और शिवपाल की बर्चस्व की इस लड़ाई में सपा की राजनीतिक जमीन खोती हुई दिखाई दे रही है.इन सब के बीच शिवपाल यादव ने एक ऐसी चाल चली है जो अखीलेश की रथयात्रा के सफलता को सीधे तौर पर प्रभावित करने वालें हैं.तीन नवम्बर को जहाँ अखिलेश यादव “रथ यात्रा निकालने जा रहें है वहीँ उनके प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखे जा रहे चाचा पञ्च नवम्बर को पार्टी रजत जयंती उत्सव मनाएगी यह कार्यक्रम शिवपाल सिंह की अगुआई में हो रहें है.इससे एक और बात निकलकर सामने आ रही है वह है खुद को शक्तिशाली दिखाने का एक तरफ जहाँ अखिलेश रथ यात्रा के जरिये अपनी शक्ति का आभास करायेंगें वहीँ शिवपाल यादव भी रजत जयंती के बहाने सभी समाजवादी कुनबे को जुटा अपने राजनीतिक शक्ति को दिखाने का प्रयास करेंगें.इस भारी खेमेबाज़ी और वर्चस्ववादी रवैये से एक बात तो तय है कि इसबार सपा की सत्ता तक पहुचने वाली डगर कठिन होने वाली  है. हालिये में आये चुनावी सर्वेक्षण भी इस बात के तस्दीक कर चुकें हैं ऐसे में अगर पार्टी में और बिखराव होता है तो यह समाजवादी पार्टी के लिए ऐसा घाव होगा जिसेसे उभरने में पार्टी को कितना समय लगेगा यह कहना मुश्किल होगा.

Monday, 3 October 2016

स्वच्छता को लेकर लोगो में आई है जागरूकता





आगामी 2 अक्टूबर गाँधी जयंती के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना “स्वच्छ भारत अभियान” अपने सफलता के दो वर्ष पूरा करने जा रहा है.जैसा कि हमें पता है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने “स्वच्छ भारत” का सपना देखा था जो अब तक अधुरा है इसे पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री ने इस योजना को शुरू किया.गौरतलब है की जबसे नरेंद्र मोदी सत्ता की कमान संभालें हैं.एक के बाद एक ऐसी योजनाओं का शुभारम्भ किया है,जो जनता से सीधे तौर पर सरोकार रखतीं हैं.उनमे से सबसे प्रमुख स्वच्छ भारत अभियान है.प्रधानमंत्री मोदी ने 2 अक्टूबर 2014 को गाँधी जयंती के अवसर पर इस योजना को आरंभ किया था.जाहिर है कि इस योजना को 2019 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है.योजना को आरम्भ करने से पहले 15 अगस्त 2014 को स्वतंत्रता दिवस के दिन जब प्रधानमंत्री ने स्वच्छता और शौचालय की बात कहीं थी तो आलोचकों ने उनपर जमकर निशाना साधा की लाल किले के प्राचीर से किसी प्रधानमंत्री को शौचालय का जिक्र करना शोभा नही देता,किंतु आलोचना से परे मोदी ने इस अभियान को एक मिशन बनाने का संकल्प लिया और इसमें काफी हद तक सफल भी हुए हैं. दरअसल स्वच्छ भारत अभियान एक ऐसी योजना है.जिसनें लोगो को सफाई संबंधी आदतों को बेहतर बनाना लोगो को गंदगी से होने वाले दुष्प्रभावों के बारें में बताना है.प्रधानमंत्री इस बात को बखूबी जानतें है कि अगर भारत को स्वच्छ बनाना है तो, इसके लिए सबसे जरूरी बात है यह कि इस योजना को जन –जन तक पहुँचाया जाए बगैर जन-जागरूकता के इस मिशन को पूरा नही किया जा सकता. इसको ध्यान के रखतें हुए सरकार ने कई सेलिब्रिटियों को स्वच्छ भारत अभियान का ब्रांडअंबेसडर बनाया ताकि ये लोग जनता को स्वच्छता अभियान के प्रति जागरूक कर सके.समय –समय पर से सेलिब्रेटी सोशल मीडिया अपनी सफाई करते हुए तस्वीर साझा करते हुए लोगो को स्वच्छता के प्रति जागरूक करतें है,इन सब के बीच प्रधानमंत्री मोदी इस अभियान को लेकर जिसप्रकार की इच्छाशक्ति दिखाई है.वो वाकई काबिलेतारीफ है,कई बार प्रधानमंत्री सफाई के लिए खुद झाड़ू उठा लेतें है और इस बात पर विशेष जोर देतें है कि सफाई के लिए पद की गरिमा कोई मायने नही रखती आप अपनी सफाई लिए लिए स्वय प्रतिबद्ध हो.खैर जब इस योजना की शुरुआत हुई थी तो लोगों ने तमाम प्रकार के सवाल उठायें थे.उसमे प्रमुख सवाल स्वच्छ अभियान पर खर्च होने वाले बजट को लेकर था कि इतना पैसा कहाँ से आएगा ? बता दें कि सरकार ने इस योजना के लिए 62,009 करोड़ का बज़ट रखा है.जिसमें केंद्र सरकार की तरफ से 14623 करोड़ रूपये उपलब्ध कराएँ जायेंगे जबकि 5,000 करोड़ रूपये का योगदान राज्यों को देना होगा.इसके बाद शेष राशि की व्यवस्था पीपीपी व स्वच्छ भारत कोष आदि से प्रबंध किया जायेगा,गौरतलब है कि इस अभियान की सफलता का मुख्य पहलु ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रो में सभी घरों में शौचालय उपलब्ध कराना है.भारत की 75 करोड़ आबादी गावों में रहती है लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि आज़ादी के छह दशक बाद भी इनमें से 50 करोड़ के पास आज भी शौचालय नही है.वर्तमान सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान के तहत सबको शौचालय बनवाने की बात कहीं है तथा इसको लेकर सरकार बेहद सक्रिय है.इसका  अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछली सरकार द्वारा शौचालय के लिए  मिलने वाले प्रोत्साहन राशि को भाजपा सरकार ने 9000 हज़ार रूपये से बढ़ाकर 12000 रूपये कर दिया ताकि लोगों पर शौचालय बनाने में पड़ने वाले आर्थिक बोझ से निजात मिल सके.इस प्रकार खुले में शौच से फैल रही गंदगी को रोकने के लिए सरकार हर संभव प्रयास कर रही है.जाहिर है कि स्वच्छता के आभाव में तमाम प्रकार की बीमारीयाँ जन्म ले रहीं है और इसकी जद में आकर लोग काल के गाल में समा जा रहें है.आम-जनमानस के लिए ये गौरव की बात है कि विगत साठ सालों से  हम लगातार बीमारियों को जन्म दे रहें थे परंतु उसके सबसे प्रमुख और सबसे छोटे कारण की तरफ ध्यान नही दे पा रहें थे,अमूमन हम अपने घर के कचरे को कहीं दूर न ले जाकर कहीं आस –पास ही फेक देते है,जिससे उस क्षेत्र मे कचरा इकट्टा होने के कारण मख्खियाँ तथा स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने वालें विषैले कीटाणु जन्म लेतें है.जो स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है किंतु, प्रधानमंत्री मोदी ने सबका ध्यान उस तरफ आकृष्ट किया और लोगो को बताया कि सबसे ज्यादा जरूरी अपने गली ,गावं, घर तथा दफ्तर को साफ रखना है, इस योजना के आने के पश्चात् स्वच्छता को लेकर लोगों में भारी जागरूकता आई है,लोग और स्वच्छता को लेकर सजग है,उससे भी बड़ी बात ये निकल कर सामने आई है कि लोग दूसरों को भी इस विषय पर जागरूक कर रहें है.स्वच्छता के लाभ को अपने दोस्तों,मित्रों के साथ साझा कर रहें है.सार्वजनिक जगहों पर गंदगी फैलाने से बच रहें है.इन सब बातों से स्पष्ट होता है कि जिन उद्देश्यों के साथ सरकार ने इस योजना को शुरू किया था वो अभीतक सही दिशा की ओर बढ़ रहा है,बहरहाल इस योजना को राजनीतिकरण करनें से विपक्ष बाज़ नही आ रहा है,बार –बार इस योजना को लेकर तमाम प्रकार की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कर रहा है.जिसमें कुछ स्थानों पर गंदगी है,उन तस्वीरों के जरिये विपक्ष द्वारा ये बताया जा रहा है कि स्वच्छ भारत अभियान महज़ एक दिखावा है.इसे विपक्ष की छुद्र मानसिकता ही कहेंगे क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी कई बार स्वच्छ भारत अभियान को राजनीति से या सरकार से नही जोड़ने की बात कही है.लेकिन सरकार की एक के बाद एक सफल होती योजनाओं से हताश विपक्ष इसमें सहभागिता के बजाय राजनीति करने पर तूला हुआ है.बहरहाल,जबसे इस योजना की शुरुआत हुई है,स्वच्छता को लेकर व्यापक स्तर पर सुधार हुए है,मसलन आज रेलवे स्टेशनों पर साफ –सफाई का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है,ट्रेनों में शौचालय की सफाई नियमित रूप से होती है.अस्पतालों,बस अड्डो शिक्षण संस्थानों समेत सभी क्षेत्रों में इस अभियान का व्यापक असर देखने को मिल रहा है.इस प्रकार  सब जगह पर चर्चा के केंद्र में स्वच्छ भारत अभियान है.हर्ष की बात ये है कि यह योजना फाइलों तक सिमटने की बजाय धरातल पर दिख रही है.लेकिन 2019 तक इस अभियान को पूरा तभी किया जा सकता है.जब स्वच्छता के प्रति लोगो को और जागरूक किया जा सके,केंद्र सरकार इस इस अभियान को लेकर काफी गंभीर है किंतु राज्य सरकारों और नगर निगमों की उदासीनता चिंतनीय है.  


Wednesday, 28 September 2016

निष्पक्ष चुनाव कराने की चुनौती


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जैसे –जैसे करीब आता जा रहा है सभी राजनीतिक दलों के साथ चुनाव आयोग भी चुस्त होता जा रहा है.दरअसल,  देश के सबसे बड़े सूबे में चुनाव के दरमियान अनियमितताओं को लेकर भारी मात्रा में शिकायत सुनने को मिलती रहती है. जिसके मद्देनजर चुनाव आयोग ने अभी से कमर कस ली है जिससे आने वाले विधानसभा चुनाव को सही ढंग से कराया जा सके. इसको ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग पूरी तरह से सक्रिय हो गया है. मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपनी पूरी टीम के साथ लखनऊ में पुलिस के आला अधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की. जिसमें चुनाव की तैयारियों का जायजा लिया गया तथा आगे की रणनीति पर चर्चा हुई, चुनाव आयुक्त ने स्पष्ट किया है कि चुनाव से पहले सभी चिन्हित अपराधियों को जेल में डाला जाए इसके उपरांत ही भयमुक्त चुनाव कराए जा सकते हैं. इसके साथ ही मुख्य चुनाव आयुक्त ने पुलिस अधिकारियों को सख्त लहजे में कह दिया है कि चुनाव के दौरान किसी भी प्रकार की लापरवाही क्षम्य नहीं होगी. इस तरह यूपी चुनाव में जैसे राजनीतिक दल अपनी–अपनी तैयारियों में लगे हुए हैं, वैसे ही चुनाव आयोग ने भी अपनी तैयारियों में तेज़ी लाई है. उत्तर प्रदेश चुनाव कब तक होगा इसको लेकर संशय अभी बना हुआ है, लेकिन चुनाव आयोग की चुस्ती यह दर्शाती है कि अब चुनाव में बहुत लंबा वक्त नहीं बचा है. दरअसल यह चुनाव सभी राजनीतिक दलों के लिए जितना कठिन है उससे कहीं ज्यादा चुनाव आयोग को पारदर्शी चुनाव कराने की चुनौती भी है. अगर हम चुनाव आयोग की चुनौतियों की बात करें तो सबसे पहली चुनौती भय मुक्त मतदान कराने की है. जाहिर है कि प्रदेश में कुछ बाहुबली नेता चुनाव के दौरान मतदाताओं को डरा, धमकाकर अपने पक्ष में वोट करा लेते हैं. यह भारत जैसे स्वस्थ लोकतन्त्र पर कुठाराघात से कम नहीं है, मतदाता अपने प्रतिनिधि को चुनने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि वर्तमान परिवेश में यह संभव नहीं हो पा रहा है. जहाँ–तहां से ऐसी खबरें आये दिन पढ़ने को मिल जाती हैं जिसमें मतदाताओं को डराया–धमकाया जाता है, जिसके फलस्वरूप मतदाता अपनी इच्छा के विपरीत जाकर मतदान करने को विवश हो जाता है. यह स्थिति लोकतन्त्र के लिए घातक है. चुनाव आयोग ने इस मामले पर गंभीरता बरतनी शुरू कर दी है, उत्तर प्रदेश में निष्पक्ष चुनाव कराने में दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है थानों पर एक ही जाति विशेष के थानाध्यक्ष का होना. गौरतलब है कि अखिलेश सरकार की तुष्टीकरण की नीति की वजह से प्रदेश के कई अहम पदों पर एक खास जाति के लोगों का वर्चस्व बना हुआ है. पचास प्रतिशत थानों पर यादव जाति के प्रभारियों की तैनाती की गई है, ऐसे में चुनाव के समय पुलिस से निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त को यह शिकायत पहले से ही मिली हुई है इसलिए उन्होंने पुलिस प्रशासन पर पैनी निगाह रखने की बात कही है. ज्ञातव्य हो कि चुनाव के समय निर्वाचन आयोग अपनी नीतियों के अनुसार पुलिस बलों की तैनाती करेगा. जिसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिन थानों में इंस्पेक्टर स्तर की तैनाती होनी चाहिए वहां दरोगा स्तर के प्रभारी को तैनात किया गया है जो अपने पक्षपातपूर्ण से बाज़ नहीं आने वाले है. ऐसे में चुनाव आयोग ने इंस्पेक्टर स्तर के थानों की कमान उसी स्तर के अधिकारी की तैनाती के आदेश दिए हैं. चुनाव आयोग पूरी तरह सख्ती से पेश आ रहा है. कड़े लहजे में दोषी अधिकारियों को फटकार भी लगाई जा रही है. ऐसे में चुनाव से ठीक पहले मुख्य चुनाव आयुक्त का अपनी टीम के साथ यूपी दौरा यह बताने के लिए काफी है कि चुनाव आयोग अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रहा है और निष्पक्ष एवं भयमुक्त मतदान कराने के लिए प्रतिबद्ध है. बहरहाल, उत्तर प्रदेश में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 14.04 करोड़ है. चुनाव आयोग साथ ही युवाओं तथा जिनका नाम मतदाता सूची के बाहर है उसे दुरुस्त करने का काम भी कर रही है. जगह–जगह कैंपेन के जरिये मतदाता पहचान पत्र के कामों में तेज़ी आई है इसका कारण यह भी है चुनाव आयोग को अपना लक्ष्य हासिल करना है. गौरतलब है कि आगामी विधानसभा चुनाव में निर्वाचन आयोग ने 75 फीसद मतदान का लक्ष्य रखा है, यह तभी संभव है जब प्रदेश की जनता को मतदान के लिए जागरूक किया जाये, उन्हें भयमुक्त किया जाये. इसके लिए अभी से निर्वाचन आयोग ने इन सभी चुनौतियों पर चर्चा शुरू कर दी है. यहाँ तक कि मतदाताओं को मतदान के लिए कहीं दूर न जाना पड़े, इसको ध्यान में रखते हुए बूथों की संख्या पिछली बार की अपेक्षा बढ़ाए जाने पर भी बात बनती दिख रही है. खैर, उत्तर प्रदेश का चुनाव निर्वाचन आयोग के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की चुनौती तो है ही, साथ ही साथ मतदान फीसद बढ़ाने की भी चुनौती है.
 

Tuesday, 27 September 2016

कैराना का स्याह सच आया सामने


लगभग साढ़े तीन महीने पहले उत्तर प्रदेश के कैराना में हिन्दू समुदाय की पलायन की खबरें सामने आई थीं. यह पलायन चर्चा के केंद्र बिंदु में लंबे समय तक रहा किसी ने इस पलायन को सही बताया तो किसी ने इसे खारिज कर दिया, यहाँ तक की मीडिया के एक हिस्से ने भी पलायन की खबरों को नकार दिया था.जाहिर है कि उनदिनों कैराना में सब कुछ ठीक नहीं था,वहां के हिन्दूओं का जीना दूभर हो गया था, एक धर्म विशेष की उग्रता के कारण हिंदू परिवार पलायन कर रहे थे,प्रशासन मौन खड़े तमाशाबीन बनी हुई थी.स्थिति कितनी दयनीय थी इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि लोग अपने घरों को बेच वहां से निकलना चाहते थे.सवाल यह उठता है कि इन सच पर पर्दा डालने की कोशिश क्यों हुई ? उस समय जो सुबूत  हमारे सामने आये उससे ही स्पष्ट हो गया था कि पलायन की घटना कैराना का काला सच है जिसे स्वीकार करना ही होगा. गौरतलब है कि हिन्दूओं में दहशत का माहौल था, लोग किसी भी तरह कैराना को छोड़ना चाहते थे ,एक समुदाय विशेष द्वारा बनाएं गय भय से मुक्ति चाहते थे इसके लिए उनके पास पलायन के अलावा कोइ चारा नही था,मकानों को बेचने के पोस्टर अपनी जन्मभूमि से बिछड़ने की पीड़ा लोगो सता रही थी उसवक्त भी लोगों ने अपनी पीड़ा कैराना में मौजूद गुंडाराज पर प्रशासन की चुप्पी पर जम कर वार किया था लेकिन सियासत के नुमाइंदों ने उनकी हक की लड़ाई हो राजनीति के कसौटी पर उतार दिया था.चूंकी उत्तर प्रदेश में हालही में चुनाव है इसके मद्देनजर कांग्रेस,सपा आदि तथाकथित सेकुलर राजनीतिक पार्टियों  ने भी अपने –अपने लोंगो को कैराना भेजकर अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए सच्चाई को कहना वाजिब नहीं समझा था. हालांकि बीजेपी इस बात को शुरू से कहती आ रही है कि कैराना का पलायन एक कठोर सत्य है जिसे सबको स्वीकार करना पड़ेगा. लेकिन सपा ,कांग्रेस आदि कथित सेकुलर दलों को यह रास नहीं आया इन दलों को केवल  अपने  वोटबैंक की चिंता सता रही थी. ऐसे में उन्होंने इस सच्चाई को स्वीकार करने की जहमत नहीं उठाई. इस तरह राजनीति से लेकर मीडिया तक सेकुलर कबीले के सभी लोगों ने इस खबर को झूठा बताया था. दरअसल यह मामला बीजेपी सांसद हुकुम सिंह ने उठाया था जाहिर है कि वोटबैंक की राजनीति करने वाले राजनेता, सेकुलरिज्म का दंभ भरने वाले बुद्दिजीवियों को यह नागवार गुजरा था. उन्होंने इस सच पर पर्दा डालने के हर संभव प्रयास किये लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी जाँच में कैराना का काला सच सामने रख दिया है. रिपोर्ट में हिन्दू परिवारों के पलायन को सही पाया गया है पलायन की मुख्य वजह भी एक समुदाय विशेष की गुंडागर्दी और भय को बताया गया है. जाहिर है कि इस सच को नकारने का खूब कुत्सित प्रयास किया गया जिसमें यूपी की तथाकथित सेकुलर सरकार ने भी यह दावा किया कि पलायन की वजह मुस्लिम नहीं हैं और न वहां भय का माहौल है. लेकिन अब पलायन का स्याह सच सामने आ चुका है. मानवाधिकार आयोग  ने स्पष्ट किया है कि हिन्दूओं के पलायन की मुख्य वजह वहां पर व्याप्त गुंडाराज ही है. कैराना का मुद्दा जब प्रकाश में आया तभी से तथाकथित बुद्धिजीवियों ने यह राग अलापना शुरू कर दिया था कि यह प्रदेश में चुनाव के मद्देनजर बीजेपी वोटों का धुर्विकरण करने की कोशिश कर रही है. इस आड़ में कथित सेकुलर ब्रिगेड ने इस मामले को अफवाह बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. लेकिन आज यथार्त सबके सामने है, सवाल यह उठता है कि सेकुलरिज्म के झंडाबरदार इस सच को क्यों नही स्वीकार कर रहे थे ? सवाल की तह में जाएँ तो सेकुलर कबीले के लोग हमेशा से प्रो-इस्लाम रहे हैं. उनकी धर्मनिरपेक्षता का वास्ता केवल और केवल हिन्दू विरोध तक सीमित हो कर रह गया है, अखलाख के मामले में छाती कूटने वाले सेकुलरों ने मालदा की हिंसा पर चूं तक नहीं किया. ध्यान दें तो उस समय भी कटघरे में मुस्लिम समाज की उग्रता थी और कैराना में भी, क्या यह सेकुलरिज्म का ढोंग नहीं है ? ऐसे अनेकों मामलें  सामने आते हैं जब इनकी धर्मनिरपेक्षता का दोहरा चरित्र देखने को मिलता है. झूठ फरेब, अफवाहों पर टीका सेकुलरिज्म अपनी बुनियाद में कितना  ढोंग और दोमुँहापन भरा हुआ है,यह  सबके सामने आ गया है.ऐसा नहीं है कि उनकी इस तरह से भद्द पहली मर्तबा पिटी हो,याद करें तो इससे पहले जेएनयू में हुए देश विरोधी नारों के वीडियो को छेड़छाड़ की अफवाह इस गैंग ने उड़ाई लेकिन लैब रिपोर्ट ने इनको करारा तमाचा जड़ा, अख़लाक़ के घर बीफ नहीं था यह भ्रम इसी छद्म सेकुलरवादीयों के फैलाया लेकिन वहां जांच हुई तो सामने आया कि  अखलाख के घर बीफ ही था तब भी इनकी बोलती बंद हो गई थी.अब कैराना की रिपोर्ट भी इनकी गाल पर करार तमाचा जड़ा है.पलायन  की घटना को सिरे से खारिज करने वाले सेकुलर लोग रिपोर्ट के आने के बाद बगले झाँकने लगें है.

Thursday, 8 September 2016

पुलिस महकमे में सुधार की आस

 

   देश में समयसमय पर पुलिस की कार्य प्रणाली में सुधार की मांग उठती रही है. जाहिर है कि पुलिस महकमे में आज भी तमाम प्रकार की खामियां मौजूद हैं, पुलिस के ऊपर भ्रष्टाचार , दुरव्यवहार, एफआईआर न लिखने सहित कई आरोप आये दिन लगते रहते हैं. यही नहीं आरोप यह भी लगते रहे हैं कि पुलिस एफआईआर में छेड़छाड़ कर मुकदमे को कमजोर करने की कोशिश भी कई दफा करती है. ऐसे गंभीर मसले पर शीर्ष अदालत ने संज्ञान लेते हुए एक अहम आदेश जारी किया है. यूथ लॉयर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि देशभर के थानों में दर्ज एफआईआर को 24 घंटे के भीतर राज्य सरकार या पुलिस की वेबसाइट पर अपलोड किया जाये. न्यायाधीश दीपक मिश्रा और सी नगाप्प्न की बेंच ने याचिका की सुनवाई करते हुए यह आदेश देश के सभी राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों के लिए दिए हैं. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि जिन स्थानों पर नेट्वर्किंग की सुविधा नहीं है या जिन दुर्गम इलाकों में इंटरनेट स्लो है वहां समयावधि 24 की बजाय 72 घंटे के अंदर प्राथमिकी को वेबसाइट पर अपलोड करना जरूरी होगा. वहीँ कोर्ट ने संवेदनशील मामले मसलन महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन उत्पीड़न, छापेमारी, आतंकवाद, विद्रोह आदि मामलों में वेबसाइट पर एफआईआर अपलोड करने में छुट प्रदान की है. बशर्ते संवेदनशील मसले की श्रेणी जिला क्लेक्टर या डीएसपी मामले को समझने के उपरांत करेगा. सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश पुलिस सुधार की दृष्टि से काफी अहम माना जा रहा है, कोर्ट ने बुधवार को इस मामले पर फैसला सुनाया है. मुख्य अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर किसी कारणवश एफआईआर वेबसाइट पर अपलोड नहीं हुई है फिर भी आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं दी जाएगी. बहरहाल यह फैसला आम जनता के लिए राहत देने वाला फैसला है. जाहिर है कि एफआईआर की कॉपी आम जनता को थाने से प्राप्त करना आसान काम नहीं होता है. पुलिस प्रशासन इसकी कॉपी देने में आनाकानी करती है, जिसके कारण दोनों पक्षों को विधि परामर्श लेने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. कभी–कभी तो ऐसे मामले भी प्रकाश में आये हैं जहाँ एफआईआर के दौरान मामला कुछ अलग रहता था किन्तु कोर्ट में केस को कमजोर करने के लिए तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कर दिया जाता था. लेकिन इस आदेश के बाद से आम नागरिक इन परेशानियों से मुक्ति पा सकेगा. एफआईआर की इस प्रक्रिया में शुरू से ही पारदर्शिता का आभाव रहा है किन्तु अब कॉपी ऑनलाइन उपलब्ध रहेगी जिससे इस प्रक्रिया में पारदर्शिता  देखने को मिलेगी. कोर्ट के आदेश उपरांत एफआईआर पुलिस वेब पर उपलब्ध होने की वजह से आम जनता को इसकी कॉपी को हासिल करने की प्रक्रिया सुगम हो जाएगी और वेबसाइट पर आसानी से इसकी प्रति उपलब्ध रहेगी. गौरतलब है कि इससे पहले भी दिल्ली हाईकोर्ट ने 2010 में तथा इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले साल ही एफआईआर की कॉपी वेबसाइट पर डालने के निर्देश जारी कर चुके हैं. किन्तु अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे समूचे देश में लागू करने का आदेश किया है.गौर करें तो पुलिस कार्यप्रणाली में व्यापक सुधार की जरूरत है,जाहिर है कि कई बार पुलिस सुधार के लिए हमारे नीति –नियंताओं ने कमेटीयों का गठन किया किन्तु उसकी सिफारिशों को कूड़ेदान में फेक दिया. देश की आम जनता आज भी पुलिस महकमे से भयभीत रहती है. ग्रामीण क्षेत्रों का आलम यह है कि लोग अपने हक के लिए भी थाने जाने से कतराते हैं. हमें इस समस्या की जड़ को समझना होगा कि आखिर क्यों आम जनता पुलिस से मित्रवत संबधं नहीं रखती है? प्राथमिकी दर्ज कराने में एक साधारण व्यक्ति को कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं यह बात जगजाहिर है. सुप्रीम कोर्ट के इस सार्थक पहल के बाद पुलिस सुधार में एक आशा की किरण नजर आती है. ध्यान दें तो वर्तमान समय में पुलिस तंत्र में भ्रष्टाचार आम बात हो गई है एक प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए पीड़ित व्यक्ति को थाने के दस चक्कर लगाने पड़ते हैं. उसके उपरांत भी उसे तमाम प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. लेकिन बदलते समय के साथ तकनीकी ने आम जनता को जो शक्ति दी है उसी की नतीजा है कि आज व्यक्ति किसी भी काम को आसानी से घर बैठे कर सकता है. जाहिर है कि किसी भी मामले की बुनियाद एफआईआर ही होती है. अगर उसमें पिछले कुछ समय से भारी अनियमितता देखने को मिल रही है तो इसके सुधार के लिए सबसे पहले एफआईआर को तकनीकी से जोड़ते हुए ऑनलाइन किया गया. मगर यह भी स्याह सच है कि ऑनलाइन एफआईआर को कुछेक स्थानों पर ही शुरू किया जा सका हैं अधिकतर जगहों पर तो ऑनलाइन शिकायत मंजूर कर दी जा रही है किन्तु इसे एफआईआर के दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार नही किया जा रहा है. ऐसे में सवाल यह भी खड़ा होता है कि एफआईआर प्रक्रिया को पूर्णतया तकनीकी से क्यों नही जोड़ा जा रहा है ? सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को 13 सप्ताह के अंदर सभी राज्यों को  अमल करने के निर्देश दिए हैं लेकिन अब यह देखते वाली बात होगी कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को राज्य सरकार व पुलिस प्रशासन कितनी गंभीरता से लेती  हैं.
      

Wednesday, 24 August 2016

अधिकारों की इस लड़ाई में आम जनता कहां?

 

लोकतांत्रिक प्रणाली को सहज रूप से चलाने के लिए जरूरी है कि लोकतंत्र के सभी स्तंभ एक दुसरे से समंजस्य बना कर चलें. सभी स्तंभों के बेहतर तालमेल से ही एक स्वस्थ लोकतंत्र का वातावरण बना रहता है. किन्तु भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में पिछले कुछ महीनों से देश के चारों स्तंभ की स्थिति किसी से छुपी नहीं है.इनदिनों जजों की नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार और न्यायपालिका में जो गतिरोध खुलकर सामने आ रहा है वो लोकतन्त्र के लिए किसी भी सूरतेहाल में सही नहीं है. सीधे तौर पर हम कहें तो न्यायपालिका और सरकार में अधिकारों की लड़ाई अब खुलकर लड़ी जा रही है. दरअसल जजों की नियुक्ति के लिए सरकार ने राष्ट्रीय न्यायायिक नियुक्ति आयोग विधेयक को संसद के दोनों सदनों में पास कराया था. जिसमें सरकार ने दावा किया था कि एनजेएसी प्रकिया लागू होने के पश्चात जजों की न्युक्ति कॉलेजियम की अपेक्षा पारदर्शिता आएगी.लेकिन इस विधेयक को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इस आयोग के आने से न्यायपालिका में सरकार का दखल बढ़ जायेगा. वहीँ, जजों की नियुक्ति जिस कॉलेजियम प्रणाली के तहत हो रही थी उसे ही जारी रखा गया. गौर करें तो अपने फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को स्वीकारा था कि कॉलेजियम में जो कमियां हैं उसे जल्द ही दूर किया जायेगा. अब सवाल ये उठता है कि न्यायपालिका ने कॉलेजियम को लेकर सुधार की दिशा में क्या कदम उठाये हैं? जाहिर है कि कॉलेजियम व्यवस्था में भारी खामियां सामने आई हैं. मसलन इस प्रणाली में पारदर्शिता का आभाव देखने को मिलता रहा है. बंद कमरों में जजों की न्युक्ति की जाती रही है, व्यक्तिगत और प्रोफेशनल प्रोफाइल जांचने की कोई नियामक आज तक तय नहीं हो पायी है. जिसके चलते इसके पारदर्शिता को लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं. कुछ लोगों ने तो कॉलेजियम प्रणाली पर आपत्ति जताते हुए भाई–भतीजावाद एवं अपने चहेतों की नियुक्ति करने का आरोप भी लगाया. जो हमें आएं दिन खबरों के माध्यम से देखने को मिलता है. बहरहाल, देश के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रधानमंत्री के संबोधन में न्यायपालिका का जिक्र नहीं होने पर निराशा जाहिर की. इससे पहले भी मुख्य न्यायाधीश अदालतों पर मुकदमों की बढ़ती संख्या को लेकर कई बार अपनी चिंता जता चुके हैं.जाहिर है कि इस टकराव के बाद से सुप्रीम कोर्ट ने जजों की न्युक्ति के लिए जो मसौदा सरकार के पास भेजा है सरकार ने इस मसौदे पर कोई सक्रियता नहीं दिखाई है.उन्होंने सरकार से अपील की, कि सरकार जल्द से जल्द न्यायाधीशों की नियुक्ति को हरी झंडी दे, ताकि लंबित मुकदमों का निपटारा जल्द से जल्द हो सके. गौरतलब है कि भारतीय न्याय तंत्र मुकदमों के बढ़ते ढेर तले कराह रही है. किन्तु न तो सरकार इसकी सूद ले रही है और न ही न्यायपालिका उन समस्त खामियों पर नजर रख पा रही है. इन सब के बीच इसकी मार आम आदमी झेल रहा है.न्याय प्रकिया में आम जनता उलझ कर रह जाती है.एक मुकदमें के निपटाने में पीढियां खप जा रही फिर न्यायपालिका से लोगों को विश्वास भी कम होनें लगा है जिसके कारणों की एक लम्बी फेहरिस्त है.आज जनता के हितों को ध्यान रखते हुए यह जरूरी है कि दोनों स्तंभों को इस गतिरोध को समाप्त करना होगा इस दिशा में साथ मिलकर काम करना होगा.सरकार को न्यायपालिका के साथ परस्पर सम्मान का भाव रखना होगा तो वहीँ न्यायपालिका को भी सरकार से समन्वय बनानें की जरूरत है.निश्चित तौर पर इस गतिरोध जिनके मुकदमें लंबित हैं उनके लिए दिन –ब –दिन उसके निपटारे की अवधि बढती जा रही है न्यायपालिका और कार्यपालिका को यह भूलना नहीं चाहिए कि इन दोनों के टकराव के चलतें आम जनता पीस रही है. न्यायिक सुधार की आस सभी लगाएं बैठे है इस दिशा में बड़े सुधार की दरकार है.केवल जजों की न्युक्ति भर से लंबित मामलें अपने समयावधि में निपट जायेंगें हमें इस गफलत से बाहर आना होगा क्योंकि न्यायालय की जटिल प्रक्रियाओं से हम सब अवगत हैं. इसीलिए जरुरी हो जाता है कि महज जजों की न्युक्ति ही नहीं वरन हमें न्यायपालिका की उन खामियों की जड़ो की तरफ ध्यान आकृष्ट करना होगा जहाँ से मुकदमें शुरू होतें हैं जाहिर है कि मुकदमें की शुरुआत जिला न्यायालय से होती है वहां की स्थिति और दयनीय हैं आयें दिन हमें भ्रष्टाचार सहित कई मामलें सामने आतें हैं.दीवानी व फौजदारी के मुकदमों में तो फर्जी दस्तेवेजों तक की बात सामने आती है.भारतीय न्याय व्यवस्था की रफ्तार कितनी धीमी है.ये बात किसी से छिपी नहीं है,आये दिन हम देखतें है कि मुकदमों के फैसले आने में साल ही नहीं अपितु दशक लग जाते हैं.ये हमारी न्याय व्यवस्था का स्याह सच है,जिससे मुंह नही मोड़ा जा सकता.देश के सभी अदालतों में बढ़ते मुकदमों और घटते जजों की संख्या न्याय की अवधारणा पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाती है.गौरतलब है कि 1987 में लॉ कमीशन ने प्रति 10 लाख की आबादी पर जजों की संख्या 50 करनें की अनुशंसा की थी लेकिन आज 29 साल बाद भी हमारे हुक्मरानों ने लॉ कमीशन की सिफारिशों को लागू करने की जहमत नही उठाई.ये हक़ीकत है कि पिछले दो दशकों से अदालतों के बढ़ते कामों पर किसी ने गौर नही किया.जजों के कामों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई.केसों की संख्यां रोज़ बढ़ते चले गए लेकिन जजों की संख्या में कोई इजाफा नही हुआ.इस 29 साल के दरमियान कई मुख्य न्यायाधीश बदले,हुकूमतें बदली परंतु किसी का ध्यान इस गंभीर समस्या की तरफ नही गया लिहाजा आज 10 लाख की आबादी पर  जजों की संख्या महज 15 रह गई है.जिससे स्थिति और भयावह होती चली जा रही है.गौरतलब है कि देश लगभग 39 लाख केस उच्च न्यायालयों में लंबित हैं तो देश के अन्य न्यायालयों में साढ़े तीन करोड़ से अधिक मुकदमों की फाइलों पर धुल जम रहें है.देश के कोर्ट कचहरियों में फाइलों की संख्या बढ़ती जा रही है,लंबित मुकदमों की संख्या में हर रोज  इजाफ़ा हो रहा है.न्याय की अवधारणा है कि जनता को न्याय सुलभ और त्वरित मिलें.परन्तुं आज की स्थिति इसके ठीक विपरीत है.आमजन को इंसाफ पाने में एड़ियाँ घिस जा रही,पीढियां खप जा रही है.त्वरित न्याय अब स्वप्न समान हो गया है.लोग कानूनों के मकड़जाल में उलझ कर रह जा रहें हैं.आम जनमानस को इस मकड़जाल से मुक्ति मिले.जनता के हितों की पूर्ति के लिए न्यायपालिका और सरकार दोनों को साथ काम करना होगा इस टकराव को समाप्त करने के लिए बीच का कोई रास्ता निकलना होगा.

Thursday, 18 August 2016

कश्मीर की उलझन

 

कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान में वाक् युद्ध चलता रहा है लेकिन अब मामला गंभीर हो गया है.भारत सरकार ने भी कश्मीर को साधने की नई नीति की घोषणा की जिससे पाक बौखला उठा है.यूँ तो पाकिस्तान अपनी आदतों से बाज़ नहीं आता. जब भी उसे किसी वैश्विक मंच पर कुछ बोलने का अवसर मिलता है तो वह कश्मीर का राग अलापकर मानवाधिकारों की दुहाई देते हुए भारत को बेज़ा कटघरे में खड़ा करने का कुत्सित प्रयास करता है. परंतु अब स्थितयां बदल रहीं हैं,कश्मीर पर भारत सरकार ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए गुलाम कश्मीर में पाक सेना द्वारा किये जा रहे जुर्म पर कड़ा रुख अख्तियार किया है. साथ ही गुलाम कश्मीर की सच्चाई सबके सामने लाने की बात कही है. गौरतलब है कि पहले संसद में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि कश्मीर पर बात होगी लेकिन गुलाम कश्मीर पर, इसके बाद सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर को लेकर ऐतिहासिक बात कही है. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पाक अधिकृत कश्मीर भी भारत का अभिन्न हिस्सा है. जब हम जम्मू–कश्मीर की बात करते हैं तो राज्य के चारों भागों जम्मू ,कश्मीर ,लद्दाख और गुलाम कश्मीर की बात करते हैं. प्रधानमंत्री के इस बयान के गहरे निहितार्थ हैं. एक समय तक हम बलूचिस्तान ,मुज्जफराबाद समेत गुलाम कश्मीर के कई हिस्सों में पाक सेना के द्वारा वहां के स्थानीय नागरिकों के दमन उत्पीडन को मानवाधिकार हनन तक सीमित कर मौन हो जाते थे. जिससे वैश्विक मंच पर संकेत यह जाता था कि स्थिति भारतीय कश्मीर की ही खराब है गुलाम कश्मीर की नहीं, किंतु अब सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि गुलाम कश्मीर की सच्चाई समूचे विश्व के सामने लायी जानी चाहिए. कश्मीर को लेकर पाकिस्तान घड़ियाली आंसू बहाता रहा है लेकिन अब वो पूरी तरह से बेनकाब हो चुका है. आतंकवाद और कश्मीर दोनों पर पाकिस्तान की कथनी और करनी का अंतर हम समझ चुके हैं. प्रधानमंत्री मोदी के बयान के बाद बौखलाए पाकिस्तान ने सीमा पर गोलीबारी की तो इधर पाक उच्चायुक्त के बोल भी बिगड़ गये. इन सब के बीच इयू और मानवाधिकार आयोग में बलूचिस्तान के प्रतिनिधि ने इलाके में मानवाधिकार का मसला उठाते हुआ कहा है कि जबसे नवाज शरीफ की सरकार आई है बलूच के लोगों पर पाक सेना ने लगातार जुल्म किये हैं, इसके अलावा अपहरण और अन्य ज्यादतियों का जिक्र किया है. दरअसल बलूचिस्तान 1948 से पाक के कब्जे में है और तभी से ही वहां आज़ादी की मांग समय –समय उठती रही है इस विद्रोह को दबाने के लिए पाकिस्तान सैन्य अभियान भी चलाता रहा हैं. बहरहाल इनदिनों पाक अधिकृत कश्मीर से  खबरें आ रही है कि वहां के लोग पाकिस्तान सरकार के नीतियों से खुश नहीं है.वहां की आम जनता पाकिस्तान सरकार और सेना के विरोध में सड़क पर उतर आई है.दरअसल एक और आबादी पाकिस्तान से मुक्ति चाहती है,जो उसके दमन और उत्पीड़न से तंग आ गई है.यहाँ तक कि लोग न केवल सरकार के विरुद्ध में नारें लगा रहें बल्कि गुलाम कश्मीर में लोग चीख –चीख कर भारत में शामिल होने की मांग कर रहें है.मोदी के बयान के बाद से पाक परस्त कश्मीर के लोगों में एक नई आस जगी है. गौरतलब है कि मोदी के बयान के अगले ही दिन गुलाम कश्मीर के लोगों ने पाक सरकार के विरुद्ध पुन: आवाज उठाई और राजनीतिक अधिकारों की मांग करते हुए पाकिस्तान के विरोध में जमकर नारेबाजी की. विरोध कर रहे लोगों ने सेना को गिलगित से बाहर करने की मांग की है. पाकिस्तानी सेना किस प्रकार से जुल्म कर रही है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि महज एक विरोध के चलते पांच सौ से अधिक लोगों को पाक सेना ने अपनी गिरफ्त में लिया ये लोग पाक गुलामी से आज़ादी चाहते हैं. लेकिन वहां की सेना ने उनका जीना मुहाल कर रखा है गुलाम कश्मीर में पाक सेना द्वारा जो क्रूरता की जा रही है उसपर चुप्पी साध लेता है. बहरहाल, सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान भारत अधिकृत कश्मीर की मांग करता है, लेकिन जिसपर उसने नाजायज अधिकार जमा रखा है वहां ऐसी बर्बरता क्यों ?सवाल की तह में जाएं तो कई बातें सामने आती हैं, पहली बात पाकिस्तान इन लोगों के साथ हमेशा गुलामों की तरह बर्ताव करता रहा है तथा राजनीतिक वस्तु की तरह इनका इस्तेमाल करता आया है. नतीजन वहां रत्ती भर विकास नहीं हुआ है, अब लोग इससे त्रस्त आ चुके हैं. पिछले बार की तरह ही इस साल भी चुनावों में लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाते हुए पाकिस्तान सरकार ने यहाँ असंवैधानिक रूप से मतदान करवाए. वहीँ हमारे कश्मीर में लोकतंत्र है, लोगों को अपने पसंद के प्रत्याशी को वोट देने की पूरी स्वंत्रता है. लोगों को धार्मिक, समाजिक हर प्रकार की स्वत्रंता हमारे संविधान ने दे रखी है, हमारे यहाँ सिस्टम है, नियम है, सरकार की नीतियाँ हैं जो भारतीय कश्मीर के विकास के लिए समर्पित है. आज हमारे कश्मीर में सरकार निवेश करती है, अच्छे –अच्छे संस्थान है, शिक्षा, पर्यटन आदि के क्षेत्रों में हमारा कश्मीर विकास की ओर अग्रसर है. जो पाक कश्मीर के लोगों को लुभा रही है. वहीँ दूसरी तरफ पीओके की हालत दयनीय है. इस्लामाबाद में रहने वाले अधिकारी इन्हें उपेक्षित नजरों से देखते हैं, सरकार इनकी हर मांग को दरकिनार कर देती है. बहरहाल, दूसरी बात पर गौर करें तो पाक अधिकृत कश्मीर में भारी तादाद में शिया मुसलमान रहते हैं, जो बाकी पाकिस्तान में शिया मस्जिदों पर लगातार हो रहे हमलों से डरे हुए हैं, खेती–बाड़ी, पर्यटन,औधोगिक विकास आदि के मसलों पर पाक अधिकृत कश्मीर शुरू से ही पिछड़ा रहा है. आज़ादी के बाद से ही पीओके पाकिस्तान का सबसे गरीब और उपेक्षित हिस्सा रहा है, सरकारें बदली, सत्ताधीश बदले, लेकिन किसी ने भी इनकी समस्याओं को दूर करना, इस क्षेत्र का विकास करना वाजिब नहीं समझा. वहीँ हमारे कश्मीर के विकास में सभी सरकारों ने महती भूमिका निभाई है. हमारी सरकार ने श्रीनगर से रेलवे की सुविधा वहां के नागरिकों के लिए शुरु कर दी है ,तो वहीँ पाक अधिकृत कश्मीर में लोग सड़कों के लिए तरस रहें हैं. इन्हीं सब कारणों से तंग आकर आज ये स्थिति पैदा हो गई है कि ये लोग आज़ादी की मांग कर रहें हैं. इन लोगों से पाकिस्तान सरकार और सेना बेरहमी से पेश आ रही है, फिर भी ये आज़ादी का नाराबुलंद किये हुए हैं. भारत को चाहिए कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की जो खबरें हैं तथा वहां के आवाम की जो आवाज़ है. उसे एक रणनीति के तहत दुनिया के सामने रखे ताकि पाकिस्तान जो हमेशा कश्मीर पर जनमत संग्रह की बात करता है, उसका ये दोहरा चरित्र दुनिया के सामने आ सके. इसके साथ ही ये आंदोलन उनके गालों पर भी करारा तमाचा है जो आए दिन भारत में पाकिस्तान के झंडे लहराते हैं. पाक अधिकृत कश्मीर की हालत पाकिस्तानी हुकूमत के नियंत्रण से बाहर है. अत: इससे यही प्रतीत होता है कि इसको स्वतंत्र किये जाने की मांग जो भारत करता रहा है, वह निश्चित रूप से जायज है. इस पर विश्व समुदाय एवं संयुक्त राष्ट्र को भी गंभीरता से विचार करना होगा. भारत सरकार को भी चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र का ध्यान पाक अधिकृत कश्मीर की तरफ आकृष्ट करे. जिससे नवाज शरीफ का कश्मीर के प्रति जो ढोंग है, उसे दुनिया देख सके.




Thursday, 11 August 2016

देश की उर्जा आपूर्ति में होगा इजाफा

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुडनकुलम परमाणु उर्जा संयंत्र की पहली यूनिट देश को समर्पित किया.गौरतलब है कि यह देश का सबसे बड़ा उर्जा संयंत्र है.1000 मेगावाट की क्षमता वाले इस परमाणु बिजली संयंत्र को दुनिया की सबसे सुरक्षित परमाणु संयंत्रो में से एक बताया गया है कुडनकुलम की पहली यूनिट भारतीय परमाणु उर्जा निगम और रूस के रोसाटॉम ने संयुक्त रूप से बनाया है.यूनिट एक और दो के निर्माण में 20,962 करोड़ रूपये का खर्च आया है.जिसका 85% का आर्थिक सहयोग रूस ने दिया है.इस परमाणु संयंत्र में  संवर्धित युरेनियम आधारित आधारित रुसी वीवीइआर टाइप के रियेक्टरों का इस्तेमाल किया गया है.इसकी दूसरी यूनिट इसी साल के अंत का शुरू होने की उम्मीद है. कुडनकुलम परियोजना का शुरू होना उर्जा के क्षेत्र में भारत के लिए ऐतिहासिक क्षण था.इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये एक साथ इस परियोजना को राष्ट्र के लिए लाभकारी बताया. गौरतलब है कि इस परियोजना के साथ एक लंबा इतिहास जुड़ा है अगर हम कुडनकुलम परियोजना के घटनाक्रमों पर सरसरी तौर पर निगाह डालें तो पायेंगे कि अगर हमारे हुक्मरानों में इच्छाशक्ति दिखाती है तो कोई भी परियोजना अधर में नहीं जा सकती.इस परियोजना की कल्पना पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने किया था भारत और सवियत रूस के बीच 1988 में हुए समझौते के तहत दोनों देशों ने परमाणु संयंत्र बनाने के लिए हाथ मिलाया था.इस समझौते के तहत एक हजार मेगावाट की क्षमता वाले दो परमाणु संयंत्रों का निर्माण होना था.किंतु सेवियत रूस के विघटन के बाद इस परियोजना में तकरीबन एक दशक से अधिक समय तक खतरे के बादल मंडराते रहें.खैर, लंबे इंतजार के बाद 1999 में इस परियोजना की शुरुआत की गई. जाहिर है कि लगातार हो रहे स्थानीय विरोध के बावजूद सरकार ने इस परियोजना को लेकर लगातार जनता से संवाद कायम रखा और जनता को ये भरोसा दिलाया कि इस परियोजना से तमिलनाडु ही नहीं अपितु देश को उर्जा के क्षेत्र में नया आयाम मिलेगा. स्थानीय नागरिकों को डर था कि इस परमाणु संयंत्र के शुरू होने के कई खतरें उत्पन्न होंगें .मसलन रुसी तकनीकी सुरक्षित नहीं है यह एक जिंदा बम की तरह है,इससे निकलने वाली गैस उनके स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध होगी.डर यह भी था कि उस क्षेत्र की मछलियाँ मर जाएंगी जिसके चलते उन्हें रोजगार में समस्या आएगी. खैर,प्रेसराइज्ड वाटर रिएक्टर’ (पीडब्यूआर) वीवीईआर-1000 ने जुलाई, 2014 में बिजली की आपूर्ति की स्थिति प्राप्त कर ली थी और वाणिज्यि परिचालन उसी साल 31 दिसंबर से आरंभ हो गया था.वाणिज्यिक परिचालन की तिथि के बाद से यूनिट-1 का संचयी उत्पादन 6,4980 लाख यूनिट है तथा इस साल जून में इसकी क्षमता 100 फीसदी तक पहुंच गई. बरहाल, यह परियोजना भारत और रूस के संबंधो की प्रगाढ़ता को दर्शता है.रूस के लगातार आर्थिक, तकनीकी वैज्ञानिकों के सहयोग से ही तमाम प्रकार की बाधाओं के बावजूद हमने केवल इस परियोजना को शुरू किया बल्कि इसके और भी यूनिटों को जल्द शुरू करने की दिशा में लगे हुए हैं, भारत के लिए उर्जा के क्षेत्र में  में कुडनकुलम परियोजना में बड़ी उपलब्धी है.,इस मौके पर प्रधानमंत्री ने  भारत में स्वच्छ उर्जा का उत्पादन बढ़ाने के प्रयास में एक हजार मेगावाट के इस यूनिट को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इसी क्षमता वाले पांच और यूनिटे लगाए जाने की  योजना है.वहीँ मोदी ने रूस  के सहयोग का उल्लेख करते हुए कहा कि कुडनकुलम परिमाणु संयंत्र -1 देश को समर्पित करना भारत और रूस संबंधो में एक और एहितासिक कदम है वहीँ रूस के राष्ट्रपति ने भी परमाणु उर्जा साझदारी को भारत के रणनीतिक साझदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया.जाहिर है कि रूस परमाणु प्रोधोगिकी के मामले में विश्व के अगुवा देशों में से एक है.ऐसे में रूस का परमाणु उर्जा के क्षेत्र में केवल तकनीकी के मामले में बल्कि आर्थिक रूप से भी सहयोग देना भारत और रूस के संबंधो की ऊचाई को बतलाता है.इस मौके पर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने अपने संबोधन में बताया कि राज्य सरकार इस परियोजना को लेकर सजग रही है और स्थानीय लोगों के भरोसे को जीता है.अपने दस साल के कार्यकाल में हमेशा इस परियोजना के लिए अपना समर्थन दिया है. कुडनकुलम परियोजना के शुरू होना भारत के लिए एक सुखद स्थिति यह भी है कि भारत उर्जा की कमी से जूझता रहा है.जल और कोयला की कमी के कारण भारत में उर्जा का उत्पादन उस पैमाने पर नहीं हो पाता था, फलस्वरूप देश में बिजली की कमी होती थी किंतु यह परियोजना उर्जा के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी है.निश्चित तौर पर इस उर्जा संयंत्र के शुरूहोने  के बाद देश की उर्जा आपूर्ति में भारी इजाफा होगा.