Wednesday, 23 December 2015

संसद सत्र : नकारात्मक विपक्ष

 नकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस.

लोकतंत्र में मंदिर संसद में जो हो रहा है उसे देख हमारे मन में कई सवाल उत्पन्न हो रहे हैं.जिसका जवाब मिलना बहुत मुश्किल है.शीतकालीन सत्र भी मानसून सत्र की तरह हंगामे की भेंट चढ़ गया. लोकतांत्रिक धर्म के विरुद्ध, अपने शपथ को ताख पर रख कर हमारे राजनेता इन दिनों संसद में जो कर रहे हैं.वो देश के लोकतंत्र के लिए कुठाराघात से कम नहीं है.लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा चुन कर संसद में पहुंचे इन सांसदों का आचरण देश के लोकतंत्र को शर्मशार कर रहा है. संसद विकास के द्वार खोलती है और विकास तभी संभव है,जब इसका दरवाज़ा खुलेगा, इसके अंदर विकास को लेकर, देश की जनमानस को लेकर चिंतन होगा.परन्तु मौजूदा वक्त में इन बातों का कोई औचित्य नहीं रह गया है.जनता मूकदर्शक बने इस तमासे को कब-तक देखती रहेंगी ? इस सवाल का जवाब भी मिलना कठिन है.आज विपक्षी दल सदन में जो कर रहे हैं वो हमारे लोकतंत्र की गरिमा के विपरीत है.सत्र के शुरुआत में ही सरकार ने विपक्ष को विश्वास में लेने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.हम ये भी कह सकते हैं कि सत्ताधारी दल इस बार नरम है तथा काम कराने को आतुर है बशर्ते विपक्ष बार –बार बेजा हंगामा ना करे लेकिन सरकार के लाखों प्रयास के बाद भी विपक्ष सदन को बाधित करने का काम कर रही है,शीतकालीन सत्र के दरमियान विपक्ष ने जो कहा सरकार ने उसको गंभीरता से लिया.आज हमारे देश में कई ऐसे मुद्दे है.जो जन-सरोकार के है लेकिन, संसद में इसके चर्चा के बजाय विपक्ष उन मुद्दे को ज्यादा तरजीह देने में लगा हुआ है जिसका आम जनमानस से कोई लेना –देना नहीं है.मसलन विपक्ष असहिष्णुता को सबसे गंभीर मसला मानता है तथा चर्चा की मांग करता है.उल्लेखनीय है कि सरकार इस बार विपक्ष के प्रति उदार है.नतीजन देश की संसद में असहिष्णुता पर चर्चा होती है.सरकार ने असहनशीलता पर चर्चा कराया.बहस के दौरान कई दफा सदन बाधित हुआ.इससे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति क्या हो सकती है कि असहिष्णुता  पर बहस के दौरान विपक्ष खुद असहिष्णु हो गया.दरअसल, असहिष्णुता ऐसा मुद्दा है जो एक वर्ग विशेष से जुड़ा हुआ है.इसके विसाद पर हमारे राजनीतिक दल सड़क से ससंद तक इस मुद्दे को भुनाने में लगे हैं और उस वर्ग विशेष के हिमायती बन अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में लगे हुए हैं.यद्यपि सवाल हुकुमत से भी है और विपक्ष से भी,असहिष्णुता पर हुए मंथन से निकला क्या ?यकीनन इस चर्चा से केवल ससंद का समय जाया किया गया इसके अतिरिक्त कुछ नही.बहरहाल,सरकार का भी लक्ष्य था कि इस सत्र में किसी भी तरह से वस्तु सेवा कर विधेयक पास हो जाएँ.लेकिन इस सत्र में भी जीएसटी सियासत की भेंट चढ़ गया.मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस रोज़ नये नुस्के के साथ संसद में हंगामा करती रही .अभी कुछ रोज़ पहले वीके सिंह के द्वारा दलितों पर दिए गये आपतिजनक टिप्पणी  को लेकर हंगामा चल ही रहा था फिर पाकिस्तान से बातचीत को लेकर भी हंगामा करना शुरू कर दिया.उसके बाद नेशनल हेराल्ड,रेलवे की जमीन अतिक्रमण का मुद्दा अभी चल ही रहा था कि दिल्ली के मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव के दफ्तर में हुई छापेमारी का मुद्दा आ गया है.इस प्रकार एक लंबी फेहरिस्त है.नकारात्मक मुद्दों की जिसके वजह से हंगामा हो रहा है.इसी कड़ी में एक और मुद्दा कांग्रेस के युवराज़ राहुल गाँधी ने उठाया कि आरएसएस वालें हमे मंदिर में प्रवेश नहीं करने दे रहे .अब ये सोचनीय विषय है कि इसका संसद से क्या लेना –देना ? और रही बात मंदिर जाने की तो मंदिर के तरफ आएं बयान में इसका खंडन किया गया है कि किसी के प्रवेश पर रोक लगाई गई हो.ठीक इसीप्रकार हेराल्ड के मसले पर संसद के दोनों सदनों में कांग्रेस ने खूब हंगामा किया जिससे संसद से कोई सरोकार ही नही था.लेकिन जबरन ऐसे छोटे –छोटे निराधार व मनगढंत मुद्दों पर विपक्ष संसद को बाधित करने का काम क्यों कर रहा है? दरअसल फिलवक्त में लगता यही है कि कांग्रेस कि एक सूत्रीय रणनीति है कि किसी भी कीमत पर संसद को चलने न दिया जाए. कांग्रेस हर एक मुद्दे पर नकारात्मक विपक्ष की भूमिका अदा कर रही है.जिसका खामियाजा उसे आने वाले चुनावों में भुगतना पड़ सकता है.देश में आज मुद्दों की कमी नहीं है.अगर कांग्रेस ये मान के चल रही है कि विरोध कर के मीडिया की हेडलाइन में रहेंगे और जनता से इसी माध्यम से जुड़ जायेंगे तो, ये कांग्रेस की विकृत मानसिकता का परिचायक है.अगर कांग्रेस जनता से जुड़ता चाहती है तो उसे  किसी भी मुद्दे पर वाजिब विरोध करना चाहिए जिससे जनता में उसके के प्रति सकारात्मकता का भाव पहुंचे और आपके विरोध को गंभीरता से ले, किंतु कांग्रेस उलुल –जुलूल मुद्दे के आधार पर हंगामा कर जनता से छल करने के साथ –साथ  हमारे लोकतंत्र का अपमान कांग्रेसी सांसद कर रहे हैं.देश की जनता भी बखूबी देख रही है कि हमारे द्वारा चुने गये प्रतिनिधि किस प्रकार से लोकतंत्र की धज्जियां उड़ा रहे हैं.देश में मुद्दों की कमी नहीं है,जो सीधे तौर पर आमजन से जुड़े हो मसलन किसान,गरीब ,महंगाई ये ऐसे मुद्दे है जिससे जनता सीधे तौर पर जुडी हुई है लेकिन अब ये सत्र भी समाप्त होने को है,ये सभी जो मुख्य मुद्दे होने चाहिए कांग्रेस के अड़ियल रवैये के कारण आज ये मुद्दे गौण है.विपक्ष का मुख्य कार्य होता है जनता के उस मुद्दे को उठाना जिस पर सरकार ध्यान नहीं दे रही हो परन्तु विपक्ष ने इन सब मुद्दों पर बात करना  मुनासिब नहीं समझा.सरकार भी किसान और महंगाई जैसे मुद्दों पर खामोश रही.आज देश के किसानों की हालात कितनी दयनीय है ये बात किसी से छुपी नहीं है.हम देख रहे हैं कि किसान हर रोज़ आत्महत्या कर रहे हैं,महंगाई चरम पर है.ऐसे जन सरोकारी मुद्दों पर हंगामा और चर्चा करने की बजाय विपक्ष ऐसे मुद्दों पर हंगामा कर रहा है जिसमें उसके राजनीतिक स्वार्थ छिपे हुए हैं.इस अलोकतांत्रिक शोर –शराबे के चलते कांग्रेस की छवि और धूमिल हुई है.विपक्ष किसानों की आत्महत्या और महंगाई का मुद्दा उठाता तो जनता का भी उसे समर्थन हासिल होता लेकिन कांग्रेस ने इन सब मुद्दों को भूनाने के बदले अपने पैरो पर खुद कुल्हाड़ी मार लिया है तथा ये साबित कर दिया कि हमारे निजी स्वार्थ से बढ़ कर कुछ नहीं है.

Monday, 21 December 2015

जश्न-ए- भ्रष्टाचार



        जश्न-ए- भ्रष्टाचार


सोनिया और राहुल को बेल मिल गई.कांग्रेसियों के जश्न को  देखकर  लग रहा कि सोनिया और राहुल को नोबेल मिल गया है.अगर नो –बेल मिलता तो स्थिति कुछ और होती.आज-तक आपने जन्मदिन का जश्न, शादी का जश्न और तमाम प्रकार के जश्न का नाम सुना होगा लेकिन कल एक नएं जश्न का जन्म हुआ.बताते है.कांग्रेस जश्न मना रही है मगर किसका ? मैंने एक कांग्रेसी मित्र से पूछा, दोस्त ये अचानक जश्न क्यों मना रहें हो. उसने बताया कि कांग्रेस अध्यक्ष और हमारे युवराज़ को हेराल्ड पर जमानत मिल गई है. मुझे अजीब लगा कि जमानत तो सबको मिल जाती है इस पर जश्न कैसा !जब अदालत ने फिर निमंत्रण दिया ही है,और मुद्दा भी भ्रष्टाचार का है.हमने भी बोल दिया मित्रवर ये जश्न भ्रष्टाचार का तो जश्न नही है फिर क्या था. चिढ बैठे हमारे ऊपर,फिर आगे की रणनीति पर बात होने लगी.उन्होंने कहा कि जैसा अध्यक्ष जी ने कहा है कि हम लड़ेंगे, डरेंगे नही.पूरी कांग्रेस सोनिया –राहुल के साथ खड़ी है. अब देखिये न अजीबोगरीब स्थिति है भ्रष्टाचार इन दोनों ने किया है लेकिन कांग्रेस में किसी को ये कहना उचित नही लग रहा कि “जैसी करनी वैसी भरनी” क्या कहा जा सकता है.अगर कांग्रेस में ओहदा चाहिए तो भक्त बनना ही पड़ेगा फजूल में लोग बीजेपी को बदनाम किये हुए है.अब इससे बड़ी भक्ति क्या होगी चोरी और ऊपर से सीनाजोरी.मीडिया से कह रहें है हम कानून का सम्मान करते है आम आदमी की तरह कोर्ट में पेश हुए.अब मुझे किसी रोज़ पटियाला हाउस कोर्ट जाना पड़ेगा.ये देखने कि रोज़ ऐसे ही मीडिया वहां जमी रहती और सुरक्षा कड़ी रहती  है क्या? फिर ध्यान आया कि पेशी के साथ –साथ  शक्तिप्रदर्शन भी था.बहुत दिनों से कांग्रेसी सड़क पर उतरे नही थे लेकिन हे! हेराल्ड धन्य हो तुम, सड़क पर ला दिए.दरअसल हमारें गावं  में बूढ़े- बुजुर्ग कहा करते है कि चोरी किये हो तो मुंह छिपा के चलों लेकिन  अपने सियासतदानों को देखकर उनकी बात गलत लगती. अब चलन उल्टा ही हो गया है.चोरी किये हो तो प्रेस कांफ्रेंस करो.विरोधी होते किस काम के लिए है.उनको भी बतावो उन्होंने क्या किया अर्थात हमने तो भ्रष्टाचार किया ही है, वो कौन से दूध के धुले है.छोड़ो भईया ये  राजनीति है सभी आपस में मिले है.चाचा नेहरु कभी सोचे नही होंगे कि हमारी ही विरासत एक दूसरे को खत्म करने पर तुल जायेंगे दरअसल ये बात इसलिए क्योकि सोनिया और उनके सुपुत्र राहुल भी उन्ही की विरासत है और हेराल्ड भी.अब दोनों में ठन गई है पहले इन्होने हेराल्ड को बंद किया अब खुदा-न खस्ता हेराल्ड पर स्वामी ने जो कर दिखाया है हेराल्ड आज छाती चौड़ी कर बोल रहा होगा हमारे दफ्तर में ताला लगवाया अब इनकी बारी है.आखिर समय सबका आता है. कुछ भी हो हमने तो पूछ दिया ये जश्न क्यों हो रहा अकबर रोड पर आप ना पूछियेगा क्योकि आपका भी भ्रष्टाचार उजागर हो सकता है.फिलहाल कांग्रेस को जश्न-ए-भ्रष्टाचार की बधाई.

Wednesday, 9 December 2015

पाकिस्तान को लेकर अपना रुख स्पष्ट करें मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पैरिस में हुई एक अनौपचारिक मुलाकात को लेकर अभी बहस चल ही रही थी कि इसी बीच रविवार को भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों ने थाईलैंड की राजधानी बैंकाक में मुलाकात किया.लगभग चार घंटें तक चली इस बैठक में आतंकवाद और जम्मू –कश्मीर सहित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई.भारत के एनएसए अजीत डोभाल और पाकिस्तान के एनएसए नसीर खान जंजुआ की मुलाकात के बाद एक संक्षिप्त साझा बयान जारी किया गया.जिसके मुताबिक चर्चा सौहार्दपूर्ण और रचनात्मक माहौल में हुई साथ ही रचनात्मक सम्पर्क को आगे बढ़ाने पर भी सहमती बनी.इस बैठक को संयुक्त राष्ट्र समेत कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने सराहा है.लेकिन भारत में इस वार्ता की कड़ी आलोचना हो रही है. .कांग्रेस ने इस बैठक को देश के साथ धोखा करार दिया है तो वही एनडीए में  शमिल शिवसेना और बीजेपी के वरिष्ठ नेता यसवंत सिन्हा ने भी इस मुलाकात पर सवाल उठाएं है.बहरहाल,आखिर पाकिस्तान से भारत सरकार को बातचीत की आवश्यकता क्यों पड़ी.ये समझ से परे है.अगर पाकिस्तान कुछ आतंक विरोधी कदम उठाये होतें या फिर सीजफायर के उल्लंघन पर रोक लगाया होता  तब वार्ता बहाल करना समझ में आता.परन्तु, भारत सरकार बातचीत को लेकर इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई यह एक यक्ष प्रश्न की तरह है.जब पिछली बार अगस्त में बातचीत बंद हुआ तब से लेकर तभी तक पाकिस्तान ने अपनी  नीति में कोई बदलाव नही है.आज भी पाकिस्तान झूठ बोलने से बाज़ नहीं आता.हमें आज भी संयुक्त राष्ट्र की सभा में नवाज शरीफ द्वारा दिया गया भाषण याद है जिसमें नवाज़ ने संयुक्त राष्ट्र को भ्रमित करतें हुए एनएसए स्तर की वार्ता विफल होनें का ठीकरा भारत से सर फोड़ा था.लेकिन हकीकत पूरी दुनिया को पता है, कि पाकिस्तान,आधिकारिक वार्ता से पहलें हुर्रियत नेताओं से बातचीत करना चाहता था.फलस्वरूप भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार करते हुए वार्ता को रदद् कर दिया था.भारत  उस वार्ता को रदद् करते हुए स्पष्ट संकेत दिया था कि,भारत अब किसी भी कीमत पर आतंक को बर्दास्त नहीं करेगा.नवाज शरीफ के इस सफेद झूठ के बाद भी  हमने सीख नही लिया.जो देश वैश्विक मंच पर भारत के ऊपर झूठे आरोप लगाता हो उस देश के आगे हम बार –बार दोस्ती का हाथ बढ़ाएं निश्चित ही ये हमारी निम्न स्तर की कूटनीति का परिचय हैं.भारत की नीति साफ रही है आतंकवाद और वार्ता एक साथ नहीं हो सकती लेकिन, आज सरकार इस नीति से समझौता कर रही है.जो आने वालें दिनों में घातक सिद्ध हो सकती है.गौरतलब है कि पाकिस्तान ऐसा देश है, जिसकी पहचान आतंक को बढ़ावा देने तथा आतंकियों को अपना हीरो मानने की रही है.ऐसे देश से हम उम्मीद लगायें की ये आतंकवाद पर चर्चा करेगा तथा आतंक के खात्मे के लिए हर संभव मदद करेगा तो ये बेमानी होगी.पाकिस्तान हमेसा से आतंकवाद का हिमायती रहा है.जिसके हजारों साक्ष्य दुनिया के सामने है.दरअसल जब भी भारत में आतंकवादी हमला होता उसमे पाक के नापाक मंसुबें दुनिया देखती है. लेकिन उस पीड़ा को सहते हम है.मोदी द्वारा दोस्ती का हाथ बढ़ाने और नवाज शरीफ का बीना शर्त बातचीत के बयान की दुनिया में भलें ही तारीफ हो रही है परन्तु हकीकत यही है कि पाक कायराना हरकत करने से बाज़ कभी नहीं आता .एक तरफ भारत-पाकिस्तान एनएसए की मुलाकात में सौहार्द बनाने की बात करने वाले पाकिस्तान की पोल चंद घंटो बाद ही खुल गई.जब कश्मीर में सीआरपीएफ के काफिले पर पाक परस्त आतंकियों ने हमला किया ,जिसमे हमारे 6 जवान घायल हो गये.ऐसा में हम कैसे मान लें कि पाकिस्तान अपने पोषित आतंकियों पर रोक लगाएगा.आतंक को लेकर भारत का रुख बिल्कुल स्पष्ट है.भारतीय प्रधानमंत्री आतंकवाद का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र से लगाए हर मंच से इसका विरोध करतें रहें है तथा आतंकवाद के खात्मे के लिए समूचे विश्व को एक साथ खड़े होने की बात करते रहें है.ऐसे में मोदी को ये सोचना होगा कि पाकिस्तान आतंकवाद जैसे मुद्दे पर भारत का साथ देगा? एनएसए स्तर की बातचीत से कुछ दिन पहले पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा था कि पाकिस्तान बीना शर्त के भारत से वार्ता करने को तैयार है.ये बात किसी से छिपी नही है कि पाक के कथनी और करनी में जमींन-आसमान का फर्क होता है .महज इस बयान को आधार मान कर अगर हम बातचीत शुरू किये है तो जगह बैंकाक क्यों ?प्रधानमंत्री दोनों देशों के बीच जमीं बर्फ पिघलाने के लिए इतनी उत्सुक थे तो, ये वार्ता नई दिल्ली या इस्लामाबाद में क्यों नही किया गया ? इसका मतलब सीधा है कि अगर ये बैठक दिल्ली में होती तो पाकिस्तान से अलगाववादी नेता रूठ जाते.पाकिस्तान ने चालाकी दिखाते हुए बैंकाक को बैठक के लिए उपयुक्त स्थान समझा.ये बात जगजाहिर है कि भारत सबसे ज्यादा पाकिस्तान में पोषित आतंकी संगठनों के निशाने पर रहा है.इसके लिए नवाज़ शरीफ ने अभी तक कोई बड़ा कदम नही उठाया है.ये सब मामलें सरकार के संज्ञान में है फिर भी अगर भारत सरकार पाकिस्तान के प्रति नरम रुख अपनाएगी तो इसके कोई दोराय नही कि पाकिस्तान के हौसलें में और मजबूती आएगी और पाक इन हरकतों पर लगाम नही लगाएगा.पाक को कड़े संदेश देने की जरूरत है लेकिन हम और नरम होतें जा रहें है.पाकिस्तान से हमने कई दफा दोस्ती के हाथ बढ़ा चुके है अगर नवाज शरीफ को संबंध को सुधारने की थोड़ी भी इच्छा रहती तो मोदी के शपथ ग्रहण समारोह के बाद सीजफायर और आतंकी वारदातों पर लगाम लगायें होते,लेकिन बार –बार भारत सरकार की कोशिश यही रही है कि पाक से संबंध सुधर जाएँ लेकिन पाकिस्तान ने कभी इस पर सकारात्मक सोच नही रखा.बहरहाल,इस मुलाकात के बाद दोनों देशों के बीच जमी बर्फ कितना पिघला है.ये तो आने वाला वक्त बतायेगा. परन्तु पाकिस्तान से जो संकेत मिल रहें है उससे पता चलता है कि न तो उसकी नियत बदली है और न नीति.दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की मुकालात के बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज दो दिवसीय यात्रा पर पाकिस्तान पहुंची है.इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य अफगानिस्तान पर हो रहें बहुपक्षीय सम्मेलन शिरकत करना है लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि सुषमा स्वराज, नवाज शरीफ से भी मिल सकती है.एनएसए की मुलाकात के बाद विदेश मंत्री की यात्रा दोनों देशों के संबंधो तथा बातचीत को नई उचांई मिल सकती है.हमारी भावना शुरू से यही रही है कि दोनों देश आपस में मिलकर रहें लेकिन पाकिस्तान की नीति और नियत दोनों में भारत के प्रति खोट रहा है.फिर भी हम रूठने –मानने की नीति पर चलते आ रहें है. अब समय आ गया है सरकार को एक स्थाई नीति के तहत पाकिस्तान से वार्ता करनी चाहिए.जिससे पाकिस्तान को कड़ा संदेश मिल सकें..