Monday, 26 October 2015

दलहन पर आत्मनिर्भर बनें भारत

                     
एक कहावत है कि दाल –रोटी से ही गुज़ारा हो रहा है.लेकिन अब ये कहावत  कहने में भी लोग डरने लगें हैं,दालों के दाम आसमान छू रहे है.खास कर तुवर जिसे हम अरहर की दाल भी कहतें है.गत एक वर्षो में अरहर की दाल की कीमतों में बेतहासा वृद्धि हुई है.पिछले साल अरहर  के दाल की कीमत महज 70 रूपये किलों थी.लेकिन अब इसके दाम दोगुने से भी अधिक हो गए है.आज अरहर की दाल 200 रूपये के करीब पहुंच गई है.जिसके कारण गरीब और माध्यम वर्ग परिवार की थालियों से दाल गायब होती जा रही है.दाल आवश्यक प्रोटीन उपलब्ध करती है,जाहिर है कि आम जनमानस दाल का इस्तेमाल संतुलित आहार के लिए करता है.अन्य दालों की अपेक्षा अरहर की दाल में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है.इसके महंगे होने से न केवल थाली से दाल गायब है.वरन हम ये कह सकतें है कि आज गरीब तथा माध्यम वर्ग की थाली से पोषण गायब हो रहा है.इस साल बेमौसम बारिश और मानसून में आई कमी के कारण किसानों के फसल बर्बाद हो गए है.मौसम विभाग ने पहले ही इस बात की पुष्टि कर दिया था कि फसल के बर्बाद होने से खास कर दलहन और सब्जियों के उत्पाद में भारी कमी आएगी.गौरतलब है कि दालों की उत्पाद में पहले की तुलना में औसतन वृद्धि दर्ज की गई.दलहन का उपयोग दिन –ब दिन बढ़ता गया लेकिन उत्पाद में कोई भारी अंतर देखने को नही मिला.जिससे ये विषम परिस्थिति उत्पन्न हुई है.1960 -1961 में दालों की पैदावार 130 लाख टन थी,उस समय के उपयोग अनुसार ये उत्पाद पर्याप्त थे और तब दाल सबको आसानी से उपलब्ध हो जाती थी.लेकिन आज पांच दशक के बाद भी हम दालों के उत्पाद को औसतन उपयोग के आधार पर बढ़ाने में विफल रहें है. 2007 -08 के दौरान दालों के उत्पाद में पहले की तुलना में थोड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी.2007 में देश में दाल का उत्पाद लगभग 148 लाख टन हुआ था.जो 2013-14 में बढकर 198 लाख टन पहुँच गया.लेकिन 2014 -15 में दाल की उत्पाद में भारी गिरावट देखने को मिली.खरीफ फसल के दौरान कम हुई बारिश का असर दालों की उत्पाद को सीधे तौर पर प्रभावित किया.जिससे उत्पादन घट कर 174 लाख टन ही रह गया.इस साल सरकार ने दाल उत्पादन का लक्ष्य 200 लाख टन रखा था,लेकिन नतीजा आज हमारे सामने है.कृषि मंत्रालय की एक रिपोर्ट में मुताबिक इस साल दाल का उत्पादन लगभग 182 -185 लाख टन रह सकता है.भारत में दाल की खपत, उत्पादन के मुकाबले कहीं ज्यादा है.जिससे हर साल भारत को दाल का आयात विदेशों से करना पड़ता है.भारत में दाल की खपत 220 से 230 लाख टन सालाना है.जिसके कारण हर वर्ष तकरीबन 30 लाख टन दालों का आयात करना पड़ता है.लेकिन इस साल आयात के सभी आकड़ो को पीछे छोड़ते हुए सरकार अभी तक 46 लाख टन दाल का आयात कर लिया है.अभी आयात की मात्रा में बढ़ोतरी के लिए भी सरकार तैयार बैठी है.पिछले कुछ समय से हम देखतें आ रहें है कि जब भी किसी वस्तु की कमी से उसकी महंगाई बढ़ती है तो सरकार कोई दीर्घकालीन उपाय करने के बजाय सीधे तौर पर उसके आयात को बढ़ा देती है और जैसे –तैसे उसके बढ़ी कीमतों पर काबू पा जाती है.जिसके फलस्वरूप हम उसके अन्य उपाय ढूढ़ने के बजाय आयात पर ही निर्भर हो जातें है.बहरहाल,जब आयात होने के बाद हमारे पास दाल की उपलब्धता हमारे जरूरत के हिसाब से हो गई तब भी दाल के दाम आसमान क्यों छू रहें है ?अगर बढ़े दामों के कारणों की तलाश करें तो कई बातें हमारे सामने आती है.पहला कालाबाजारी और जमाखोरी ये एक ऐसा कारण है जिसका हल अभी तक किसी भी सरकार ने नहीं निकाला.किसी की भी सरकार हो जमाखोरो की बल्ले-बल्ले ही रही.जब भी हमारे रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम बढ़ते है तो सरकार जमाखोरी और कालाबाजारी का हवाला देकर अपनी पीठ थपथपा लेती है तथा अपनी जवाबदेही को यही तक सीमित कर देती है.बहरहाल,इन सब के बीच खबर आ रही है कि केंद्र के साथ कई राज्यों की सरकारों ने अधिकतम स्टाक सीमा फिक्स कर जगह –जगह जमाखोरों के यहाँ छापेमारी की कार्यवाही शुरू कर दी है.सरकारों के इस सक्रियता के परिणामस्वरूप 13 राज्यों में 6,077 जगहों पर छापेमारी के दौरान अभी तक 75,000 टन के करीब  दाल जब्त की गई है.जिसमें महाराष्ट्र सरकार ने सबसे ज्यादा 46,397 टन दाल जमाखोरों से जब्त किया गया है.अब ये क़यास लगाएं जा रहें है कि आने वाले कुछ ही दिनों बाद दाल के दामों में कमी देखने को मिल सकती है.इसके लिए इन सभी राज्य एवं केंद्र सरकार की सराहना करनी चाहिएं लेकिन सवाल ये खड़ा होता है कि जब केंद्र तथा राज्य दोनों सरकारों को मालूम था कि दालों के कम उत्पाद होने से जमाखोरों एव बिचौलियों की नजर दाल पर है तो कार्यवाही करने में इतनी देरी क्यों ?अगर सरकारें यही छापेमारी कुछ माह पहले ही कर देतीं तो आज दालों के दाम स्थिर रहतें.जनता को प्याज के बाद दाल की महंगाई की से तो कम से कम बचाया जा सकता था.लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया.सरकार के इस सुस्त रवैये के कारण दाल की आयात भी बढ़ाना पड़ा इसके साथ ही जनता को महंगाई की दोहरी मार भी झेलनी पड़ी.दूसरा सवाल ये कि सरकार दलहन के लिए कोई ठोस योजना क्यों नही बना रही ?सरकार को चाहिएं कि देश में ही दालों की पैदावार बढ़ाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करें.जिस प्रकार आज हम गेहूं और चावल में आत्मनिर्भर हुए है,ठीक उसी प्रकार हमें दलहन पर भी आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता है.इसके लिए सरकार की ये जिम्मेदारी बनाती है कि किसानों को दलहन के अच्छे किस्म के बीज,सस्ती कीटनाशक दवाइयों  का प्रबंध करें.जिससे किसानों को प्रोत्साहन मिलें और दलहन के लिए किसान  अन्य फसलों के साथ –साथ इसका रकबा भी बढ़ाएं.मगर इसके लिए जरूरी है कि सरकार पहले किसानों के फसल बर्बाद होने पर उचित मुआवज़ा तथा पैदावार की सही लागत मूल्य देने की घोषणा करें.

Sunday, 18 October 2015

लोकतांत्रिक स्तंभों में टकराव

  


सुप्रीम कोर्ट नेशुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए सरकार द्वारा गठित राष्ट्रीय न्यायिक न्युक्ति आयोग को असंवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया है तथा इससे संबंधित अधिनियम को भी रदद् कर दिया.केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की न्युक्ति और तबादले के लिए राष्ट्रीय न्यायिक न्युक्ति आयोग एक्ट का गठन किया था.जिसके अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ जज,केंद्रीय कानून मंत्री तथा दो हस्तियों को शामिल किया गया था,लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने इसे संविधान की अवधारणा के खिलाफ बताते हुए खारिज़ कर दिया है.सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस संशोधन  से संविधान के मूल ढांचे का उलंघन होता,इसके साथ ही उच्चतम न्यायलय ने एनजेएसी को लाने के लिए 99वें संशोधन को भी निरस्त कर दिया है.सुप्रीम कोर्ट ने ये स्पष्ट किया है कि, जजों की न्युक्ति पुराने काँलेजियम प्रणाली के तहत ही होगी.हलाँकि कोर्ट के इस फैसले से सरकार को करारा झटका लगा है,टेलिकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इस फैसले को संसदीय संप्रभुता के लिए झटका करार दिया है.गौरतलब है कि संविधान समीक्षा आयोग,प्रशासनिक सुधार आयोग और संसदीय स्थाई समितियों ने अपनी तीन रिपोर्ट्स में ऐसे कानून की सिफारिश की थी.जिसको सरकार संज्ञान में लेते हुए एनजेएसी को ससंद के दोनों सदनों से पारित करवाया था.सरकार को ये विश्वास था कि न्युक्ति आयोग के आने से न्यायधीशों की न्युक्तियों में कॉलेजियम प्रणाली की अपेक्षा ज्यादा पारदर्शिता रहेगी लेकिन कोर्ट ने इसे दरकिनार कर दिया है.अब सवाल ये उठता है कि एनजेएसी पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर क्यों नहीं लगाई ? अगर सवाल की तह में जाएं तो कई बातें सामने आती हैं,प्रथम दृष्टया एनजेएसी  में बतौर सदस्य केंदीय कानून मंत्री को शामिल किया गया है.जिससे कोर्ट को डर था कि इसके चलते न्यायपालिका पर सरकार का सीधा हस्तक्षेप हो जायेगा और सरकारें अपने राजनीतिक फायदे के लिए इसका इस्तेमाल कर सकती है.जो भारतीय न्याय व्यवस्था के विरुद्ध है,इस कारण न्यायपालिका का वजूद भी खतरे में पड़ सकता था.जाहिर है कि कोर्ट के पास सरकार के खिलाफ सबसे ज्यादा मुकदमें है, मसलन कोल ब्लॉक में हुई धांधली,2जी समेत ऐसे कई बड़े मामले अभी तक कोर्ट में चल रहें है.जिसका निस्तारण कोर्ट को ही करना है,इस अवस्था में कार्यपालिका का न्यायपालिका में दखल तर्कसंगत नहीं होता.कहीं न कहीं इन मामलों पर सरकार का हस्तक्षेप जरुर देखने को मिलता साथ ही आयोग की निष्पक्षता भी खतरे में रहती.दूसरा ये कि इस आयोग में दो हस्तियों को सरकार ने शामिल करने की बात की है परन्तु ,उनकी योग्यता को लेकर कोई पैमाना सरकार ने नही बताया है और ना ही वो व्यक्ति किस क्षेत्र से रहेंगे इस मसलें पर भी सरकार का रवैया संदिग्ध नजर आता है.ये दो मुख्य कारण है,जिसको ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये एतिहासिक फैसला सुनाया.ऐसा नही है कि काँलेजियम प्रणाली में खामियां नहीं है,कोर्ट ने खुद स्वीकार किया है कि तीन नवंबर को कॉलेजियम प्रणाली में सुधार में मुद्दे पर सुनवाई करेगा.1993 में जब इस प्रणाली को लागू किया गया था तो, इसका उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में न्यायधीशों की न्युक्तियों पर कार्यपालिका के बढ़ते दखल को रोकना था तथा न्यायपालिका की स्वत्रंता को बरकार रखना था,सुप्रीम कोर्ट शुरू से ही इस बात का हिमायती रहा है कि जजों की न्युक्ति न्यायपालिका का आंतरिक मामला है.इसमें सरकार की कोई भूमिका नही रहनी चाहिएं.इसमें उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायधीश और सुप्रीम कोर्ट के चार अन्य वरिष्ठ न्यायधीश, जजों की न्युक्ति व स्थानांतरण की सिफारिश करतें है लेकिन इस प्रणाली में पारदर्शिता का आभाव देखने को मिलता रहा है.बंद कमरों में जजों की न्युक्ति की जाती रही है.व्यक्तिगत और प्रोफेसनल प्रोफाइल जांचने की कोई नियामक आज तक तय नहीं हो पाया है.जिसके चलतें इसके पारदर्शिता को लेकर हमेसा से सवाल उठतें रहें है.कुछ लोगो ने तो कॉलेजियम प्रणाली पर आपत्ति जताते हुए भाई –भतीजावाद एवं अपने चहेतों को न्युक्ति देने का आरोप भी लगाया.जो हमें आएं दिन खबरों के माध्यम से देखने को मिलता है.बहरहाल,कॉलेजियम बनाम एनजेएसी के विवाद में सबसे ज्यादा दिक्कत आम जनमानस को हो रही है.देश की अदालतों में लगभग 3,07,05,153 केस आज भी लंबित पड़े है.देश के कोर्ट कचहरियों में फाइलों की संख्या बढ़ती जा रही है,लंबित मुकदमों की फेहरिस्त हर रोज़ बढ़ती जा रही है.आदालतों में भ्रष्टाचार के मामलें आए दिन सामने आ रहें है .फिर भी हमारे लिए गौरव की बात है कि आज भी आमजन का विश्वास न्यायपालिका पर बना हुआ है.अगर उसे शासन से न्याय की उम्मीद नही बचती तब वो न्यायपालिका ने शरण में जाता है.ताकि उसे उसका हक अथवा न्याय मिल सकें.लेकिन न्यायपालिका की सुस्त कार्यशैली एवं इसमें बढ़ते भ्रष्टाचार आदालतों की छवि को धूमिल कर रहें.जिसे बचाने की चुनौती कोर्ट के सामने है.ग्रामीण क्षेत्रों में आलम ये है कि लोग कोर्ट -कचहरी के नाम पर ही सर पकड़ लेते है, इसका मतलब ये नही कि उनको कोर्ट या न्यायपालिका से भरोसा उठ गया है,वरन जिस प्रकार से वहां की कार्यवाही और न्यायालय की जो सुस्त प्रणाली है,इससे भी लोगो को काफी दिक्कतों का सामना करता पड़ता है.जो अपने आप में न्यायालय की कार्यशैली पर सवालियां निशान लगाता है.सवाल ये कि क्या महज़ जजों की न्युक्ति का रास्ता साफ होने से ये समस्याएं समाप्त हो जाएँगी ?न्याय की अवधारणा है कि जनता को न्याय सुलभ और त्वरित मिलें.परन्तुं आज आमजन को इंसाफ पाने में एड़ियाँ घिस जा रही,पीढियां खप जा रही है.माननीय कोर्ट को इस पर भी विचार करने की आवश्यता है.जिससे लोगो को न्यायपालिका में प्रति सम्मान बना रहें. इस फैसले के आने के बाद अब लगभग 400 जजों की न्युक्ति का रास्ता साफ हो गया है.अब देखने वाली बात होगी कि आगामी तीन नवंबर को सुप्रीम कोर्ट इस प्रणाली में इन सब सुधारों के साथ त्वरित न्याय दिलाने के लिए क्या कदम उठाता है.कोर्ट के इस फैसलें के आतें ही न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव होने की स्तिथि नजर आ रही है.खबर आ रही है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसलें पर पुनर्विचार के लिए बड़ी बेंच जा सकती है तथा एनजेएसी के गठन संबंधी कानून में संशोधन के लिए विधेयक लाने पर भी विचार कर रही है .लेकिन सरकार को उन बातों पर भी गौर करना चाहिए,जिसके कारण कोर्ट ने इस विधेयक को निरस्त किया है.सरकार का तर्क है कि कॉलेजियम प्रणाली में खामियां है,परन्तु सरकार को ये भी जानना चाहिएं कि माननीय कोर्ट ने उन कमियों को दूर करने की बात की है.फिर भी अगर आगे न्यायपालिका और सरकार का गतिरोध बढ़ता है तो, ये भारत के लोकतंत्र के लिए अच्छा नही होगा

Sunday, 4 October 2015

कश्मीर पर बेनक़ाब होता पाकिस्तान


संयुक्त राष्ट्र के मंच से भारत ने पाकिस्तान को एक मर्तबा फिर करारा जवाब दिया है.विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा को संबोधित करतें हुए पाकिस्तान को कड़े शब्दों में जवाब देते हुए कहा कि वार्ता और आतंकवाद दोनों एक साथ नहीं चल सकतें.जाहिर है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से कश्मीर का मसला उठाया था तथा भारत से बातचीत बहाल करने के लिए चार सूत्रीय प्रस्ताव रखा था.भारत ने इन सभी प्रस्ताओं को ठुकरा दिया.भारत, पाकिस्तान के दोहरे चरित्र से अब तंग आ चुका है.संयुक्त राष्ट्र सभा में कश्मीर राग अलापने वालें पाकिस्तान को भारत ने उसी की भाषा में जवाब दिया है.नवाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र को भ्रमित करतें हुए एनएसए स्तर की वार्ता विफल होनें के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया था लेकिन हकीकत पूरी दुनिया को पता है कि पाकिस्तान,आधिकारिक वार्ता से पहलें हुर्रियत नेताओं से बातचीत करना चाहता था.फलस्वरूप भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार करते हुए वार्ता को रदद् कर दिया था.भारत द्वारा उस वार्ता को रदद् करते हुए स्पष्ट संकेत दिया था कि भारत अब किसी भी कीमत पर आतंक को बर्दास्त नहीं करेगा.अगर पाकिस्तान, भारत से बातचीत बहाल करना चाहता है तो, उसे आतंक, सीजफायर जैसी ओछी हरकतों पर विराम लगाना होगा.मोदी ने अपने शपथ ग्रहण कार्यक्रम में सभी पड़ोसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को बुलाकर अपनी मधुर व्यवहार का परिचय दे दिया था.फिर भी पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आया है.अभी हालहि में भारत ने एक पाकिस्तानी आतंकवादी को जिंदा पकड़ा है.जो नवाज शरीफ के आतंक विरोधी सभी दावों की पोल खोल रहा,दुनिया के सामने आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान फिर से बेनकाब हुआ है.बहरहाल इनदिनों पाक अधिकृत कश्मीर से खबरें आ रही है कि वहां के लोग पाकिस्तान सरकार के नीतियों से खुश नहीं है.वहां की आम जनता पाकिस्तान सरकार और सेना के विरोध में सड़क पर उतर आई है.दरअसल एक और आबादी पाकिस्तान से मुक्ति चाहती है,जो उसके दमन और उत्पीड़न से तंग आ गई है.यहाँ तक कि लोग न केवल सरकार के विरुद्ध में नारें लगा रहें बल्कि गुलाम कश्मीर में लोग चीख –चीख कर भारत में शामिल होने की मांग कर रहें है.पाक परस्त कश्मीर से एक वीडियो सार्वजनिक हुआ है.जिसमें पाकिस्तानी फौजं और हुकूमत की ज्यादतियां सामने आई है,तस्वीरों से ये साफ हो गया है कि ये मासूम इंसान कैसे पाक सेना की बर्बरता को झेल रहें है.हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इस वीडियो को फर्जी बता रही है.जो मुल्क अपने सैनिकों को स्वीकारने से इनकार कर दें उससे वीडियो स्वीकारने की बात करना बेमानी होगी.गौरतलब है कि गिलगिट, बालिस्टान में पाकिस्तानी सेना किस प्रकार से जुल्म कर रही है.ये लोग पाक गुलामी से आज़ादी चाहतें है,लेकिन वहां की सेना ने उनका जीना मुहाल कर रखा है.दुनिया के सामने पाकिस्तान कश्मीर के लिए घड़ियाली आंसू बहाता है,लेकिन अब पाक अधिकृत कश्मीर का सच विश्व के सामने आने लगा है.बहरहाल,सवाल ये उठता है कि पाकिस्तान भारत अधिकृत कश्मीर की मांग करता है,लेकिन जो उसके अधिकार में है वहां ऐसे हालात,ऐसी बर्बरता क्यों ?सवाल की तह में जाएं तो कई बातें सामने आतीं है,पहली बात पाकिस्तान इन लोगो के साथ हमेशा गुलामों की तरह बर्ताव करता रहा है तथा राजनीतिक वस्तु की तरह इस्तेमाल कर रहा है.नतीजन वहां रत्ती भर विकास नहीं हुआ है.अब लोग इससे त्रस्त आ चुंके है,इसी साल गिलगिट –बालटिस्तान में हुए चुनाव में लोकतंत्र की धज्जियां उडातें हुए पाकिस्तान सरकार ने यहाँ असंवैधानिक रूप से मतदान कराया, यहाँ तक कि महिलाओं को मतदान नहीं करने दिया गया.वहीँ हमारे कश्मीर में लोकतंत्र है,लोगो को अपने पसंद के प्रत्यासी को वोट देने की पूरी स्वंत्रता रहती है.लोगो को धार्मिक ,समाजिक हर प्रकार की स्वत्रंता हमारे संविधान ने दे रखीं है,हमारें यहाँ सिस्टम है,नियम है,सरकार की नीतियाँ है जो भारतीय कश्मीर के विकास के लिए समर्पित है.आज हमारे कश्मीर में सरकार निवेश करती है, अच्छे –अच्छे संस्थान है. शिक्षा ,पर्यटन आदि के क्षेत्रों में हमारा कश्मीर विकास की ओर अग्रसर है.जो पाक कश्मीर के लोगों को लुभा रहीं हैं.वहीँ दूसरी तरफ पीओके की हालत दयनीय है.इस्लामाबाद में रहने वालें अधिकारी इन्हें उपेक्षित नजरों से देखते है,सरकार इनकी हर मांग को दरकिनार कर देती है.बहरहाल ,दूसरी बात पर गौर करें तो पाक अधिकृत कश्मीर में भारी तादाद में शिया मुसलमान रहतें है,जो बाकी पाकिस्तान में शिया मस्जिदों पर लगातार हो रहें हमलों से डरे हुए है,खेती –बाड़ी, पर्यटन,औधोगिक विकास आदि में मसले में पाक अधिकृत कश्मीर सुरु से ही पिछड़ा रहा है.आज़ादी के बाद से ही पीओके पाकिस्तान का सबसे गरीब और उपेक्षित हिस्सा रहा है,सरकारें बदली,सत्ताधीश बदलें लेकिन किसी ने भी इनकी समस्याओं को दूर करना ,इस क्षेत्र का विकास करना वाजिब नहीं समझा.वहीँ हमारें कश्मीर के विकास में सभी सरकारों ने महती भूमिका निभाई है.हमारी सरकार ने श्रीनगर से रेलवे की सुविधा वहां के नागरिकों के लिए सुरु कर दी है ,तो वहीँ पाक अधिकृत कश्मीर में लोग सड़कों के लिए तरस रहें.इन्ही सब कारणों से तंग आकर आज ये स्थिति पैदा हो गई कि,ये लोग आज़ादी की मांग करने लगे.इन लोगो पर पाकिस्तान सरकार और सेना बेरहमी से पेश आ रही है,फिर भी ये आज़ादी का नाराबुलंद किये हुए है.सम्भवतः यह पहली बार हुआ है जब पाकिस्तान में पाकिस्तान विरोधी नारें लगे है,वो भी भारत के पक्ष में, भारत को चाहिए कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की जो खबरें है तथा वहां के आवाम की जो आवाज़ है.उसे एक रणनीति के तहत दुनिया के सामने रखें ताकि पाकिस्तान जो हमेशा भारत पर संघर्ष विराम उलंघन का झूठे आरोप लगाता है तथा कश्मीर पर जनमत संग्रह की बात करता है,उसका ये दोहरा चरित्र दुनिया के सामने आ सकें.इसके साथ ही ये आंदोलन उनके लिए भी सबक है जो, आएं दिन भारत में पाकिस्तान के झंडे लहराते हैं.पाक अधिकृत कश्मीर की हालत पाकिस्तानी हुकूमत के नियंत्रण से बाहर है.अत: इससे यही प्रतीत होता है कि इसको स्वतंत्र किये जाने की मांग जो भारत करता रहा है,वो जायज है.इस पर विश्व समुदाय एवं संयुक्त राष्ट्र को भी गंभीरता से विचार करना होगा.भारत सरकार को चाहिएं कि संयुक्त राष्ट्र का ध्यान पाक अधिकृत कश्मीर की तरफ आकृष्ट करें.जिससे नवाज शरीफ का कश्मीर के प्रति जो ढोंग है,उसे दुनिया देख सकें.इस मामले के प्रकाश में आने के बाद भारत अधिकृत कश्मीर पर बात करने के लिए अब पाकिस्तान अपना नैतिक बल भी गावां चुका है.   


Thursday, 1 October 2015

डिजिटल इंडिया को लेकर सरकार गंभीर

   



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी महत्वकांक्षी योजना डिजिटल इंडिया को साकार करने के लिए सिलिकाँन वैली में तकनीक क्षेत्र की सभी दिग्गज कंपनियों के प्रमुखों से मुलाकात की.प्रधानमंत्री मोदी ने डिजिटल इंडिया के उद्दश्यों व लक्ष्यों के बारें इन सभी को बताया.तकनीक जगत सभी शीर्षस्थ कंपनियां मसलन गूगल,माइक्रोसॉफ्ट तथा एप्पल के सीईओ ने भारत सरकार की इस योजना का स्वागत करते हुए, भारत में निवेश को लेकर अपने –अपने प्लानों के दुनिया के सामने रखतें हुए भारत को भविष्य की महाशक्ति बताया है. इन सभी कंपनियों को बखूबी मालूम है कि भारत आज सभी क्षेत्रों  नए- नए आयाम गढ़ रहा है. इसको ध्यान में रखतें हुए गूगल के सीईओ सुंदर पिचई ने भारत के 500 रेलवे स्टेशनों को वाई -फाई से लैस करवाने के साथ 8 भारतीय भाषाओं में इंटरनेट की सुविधा देने की घोषणा की तो वहीँ माइक्रोसॉफ्ट ने भी भारत में जल्द ही पांच लाख गावों को कम लागत में ब्रोडबैंड तकनीकी पहुँचाने की बात कही है.इस प्रकार सभी कंपनियों के सीईओ ने भारत को डिजिटल बनाने के लिए हर संभव मदद के साथ इस अभियान के लिए प्रधानमंत्री मोदी से कंधा से कंधा मिलाकर चलने की बात कर रहें है. वहीँ दूसरी तरफ  विश्व की सबसे बड़ी सोशल साइट्स फसबुक के सीईओ मार्क जुकरवर्ग ने तो प्रधानमंत्री के इस योजना के लिए एक विशेष प्रकार की फोटो को सबके सामने प्रस्तुत किया जो भारत के तिरंगे के जैसी है ,जैसे ही मार्क ने इसको अपने फेसबुक वाल पर लगाया, कुछ ही समय बाद ऐसा लग रहा था ,मानों आज कोई राष्ट्रीय पर्व है.हर तरफ तिरंगा की रंग के फोटो से फेसबुक सराबोर हो गया.फेसबुक के इस प्रयोग से डिजिटल इंडिया कहीं न कहीं जन –जन तक पहुंचा और लोगो ने इसके प्रति सकारात्मक रवैया अख्तियार किया.इन कंपनियों के द्वारा किये गये घोषणा से कुछ बडा बदलाव देखने को मिल सकता है.उल्लेखनीय है कि गूगल ने 500 रेलवे स्टेशनों को फ्री में वाई –फाई की सुविधा देने की बात की है. इस पर सरकार को भी इसके सदुपयोग के लिए एक मैप तैयार करना चाहिएं जिससे इसका ज्यादा से ज्यादा लाभ यात्रियों को मिल सकें. इसके लिए सरकार को चाहिएं कि रेलवे के साधारण टिकट की ऑनलाइन बिक्री शुरू कर दे, जिससे यात्रियों को लंबें समय तक कतार में खड़े रहने की समस्या से निजात मिल सकेगा तथा समय की बचत होगी.इस प्रकार कई छोटी –छोटी खामियां रेलवें के अंदर है,अगर सरकार इस पर गौर करें तो इंटरनेट के माध्यम से जोड़कर इसका निवारण आसानी से कर सकती है.इसके बाद माइक्रोसॉफ्ट का योगदान भारत के ग्रामीण जीवन में कई  प्रकार के बदलाव ला सकता है.5 लाख गावं को ई –गावं बनाने की माइक्रोसॉफ्ट की योजना ग्रामीणों के लिए नई दिशा एवं दशा प्रदान कर सकती है.ये हकीकत है कि, आज भी गावों में इंटरनेट की व्यवस्था नदारद है.अगर किसी क्षेत्र में इंटरनेट है भी, तो उसकी गति काफी कम है तथा अपेक्षाकृत  महंगा भी, लेकिन फिर भी कुछ लोग इसी के इस्तेमाल से अपनी उपस्थिति इंटरनेट पर दर्ज करा रहें है.माइक्रोसॉफ्ट वाई-फाई के माध्यम से गावों में इंटरनेट उपलब्ध कराती है तो इससे अनेकानेक लाभ है मसलन आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार की कोई  योजना समय पर नहीं पहुँचती,ऐसे वक्त में माइक्रोसॉफ्ट की ये पहल वाकई काबिलेतारीफ़ है.इस योजना की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि लोग इंटरनेट का इस्तेमाल किस लिए कर रहें. इसका प्रबंध सरकार को करना चाहिएं इसके लिए तमाम प्रकार के विकल्प हमारे सामने नजर आतें है.मसलन सरकार को गावों में  ई –लाइब्रेरी बनाने की बात पर बल देना चाहिएं.जिससे ग्रामीण क्षेत्र के युवा, जो  महंगी किताबें पैसों के आभाव में नहीं खरीद पातें, वों आसानी से ई-लाइब्रेरी के  माध्यम से अपनी मन चाहीं पुस्तक पढ़ सकेंगे.इसके साथ ही बैंको को इंटरनेट से जोड़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ बदलाव के आसार नजर आतें है.अगर सरकार भविष्य में ऐसा करने की योजना बनाती है, तो केंद्र सरकार के लिए यह बड़ी उपलब्धी होगी.भारत सरकार के इस अभियान का सीधा मकसद नागरिकों को तकनीकी दृष्टि से सक्षम बनाने की है.सरकार ने भी 2017 तक 2.5 लाख गावों तक ब्राडबैंड इंटरनेट उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा है.डिजिटल इंडिया के संबंध में अनेक चुनौतियाँ है.पहला साक्षरता की कमी .भारत की 68 प्रतिशत आबादी गावों में रहती है.ग्रामीण इलाके के लोग शिक्षा के मामलें में काफी पीछे है. गावं,कस्बो में आज भी कम्प्यूटर की भारी मात्रा में कमी है, जिसका मुख्य कारण अशिक्षा है, हमारे ग्रामीण क्षेत्र में आज भी 37 फीसदी लोग पढ़े लिखें नहीं है. जिनके लिए डिजिटल इंडिया का कोई मतलब नहीं होता.सरकारी आकड़ो के मुताबिक देश के ग्रामीण इलाकों में रह रहें 88.4 करोड़ लोगो में से 37 फीसदी लोग अशिक्षित है.इसके साथ आज भी हमारे देश का एक बड़ा तबका इंटरनेट से दूर है आकड़ो की माने तो लगभग लगभग 90 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करतें जिसको ध्यान में रखते हुए सरकार ने डिजिटल साक्षरता अभियान की शुरुआत की है.जिसके तहत सरकार लोगों को आईटी साक्षर बनानें,कम्प्यूटर एव डिजिटल उपकरण चलाने, ईमेल भेजने और उसे ग्रहण करने तथा इंटरनेट आदि का प्रशिक्षण लोगों को दिया जा रहा है .दूसरी बड़ी चुनौती हमारे देश में नेटवर्किंग की है.आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लोग नेट्वर्क के लिए अपने छतों आदि पर जाते है, नेटवर्किंग के क्षेत्र में भारत 115वें स्थान पर है किंतु इन सब सुविधाओं के आभाव में हम सम्भावनाओं  को दरकिनार नहीं कर सकतें.जिस प्रकार से प्रधानमंत्री इस योजना के सही  क्रियान्वयन के लिए तकनीक जगत की हस्तियों से मिलकर इन सभी समस्याओं का निदान ढूढ़ रहें इससे यही प्रतीत होता है कि सरकार डिजिटल इंडिया के प्रति काफी गंभीर है. मोदी जानतें है कि अगर योजना सफल हुई तो गावों में सरकार आसानी से पहुँच पाएगी तथा जनता भी सीधे तौर पर सरकार की योजनाओं का लाभ ले सकेंगी.डिजिटल इंडिया के जरिये अगर सरकार  गावों को इंटरनेट से जोड़ देती है तो दुनिया हमारे तरफ ध्यान देने को मजबूर हो जाएगी तथा भारत और मजबूत शक्ति के रूप में विश्व के सामने उभरेगा.