Tuesday, 25 August 2015

कांग्रेस में बड़े बदलाव की जरूरत

   

भारतीय राजनीति में सबसे पुरानी और सबसे अनुभवी पार्टी कांग्रेस आज सबसे बुरी हालत में है,विगत लोकसभा चुनाव के बाद इस विरासत का पतन निरंतर देखने को मिल रहा है,पार्टी को एक के बाद एक चुनावों में मुंह की खानी पड़ रही है, फिर भी अभी तक कांग्रेस अध्यक्षा ने पार्टी में कोई बड़ा अमूलचूल बदलाव नहीं किया है और न ही इसके संकेत अभी तक दिए हैं.130 वर्ष पुरानी पार्टी जिसने आज़ादी के आन्दोलन से लेकर देश के सतत विकास में प्रमुख भूमिका निभाई .आज वही पार्टी हर चुनावों में सबसे ज्यादा निराशाजनक प्रदर्शन कर रही है. हाल ही में हुए मध्यप्रदेश और राजस्थान नगर निकाय चुनाव में फिर सत्ताधारी दल बीजेपी को भरी बढ़त देखने को मिली तथा कांग्रेस को फिर एक मर्तबा करारी शिकस्त झेलनी पड़ी,ये बात दीगर है कि नगर निकाय चुनाव और विधानसभा चुनाव दोनों अलग –अलग मुद्दों पर लड़ा जाता है और जनता भी दोनों चुनावों को भिन्न –भिन्न नजरिये से देखती है.बीजेपी के लिए इस जीत के मायने भले ही कम हो लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं कि कांग्रेस के लिए ये एक बड़ी हार है क्योंकि ये उन्हीं राज्यों की जनता का मत है जिस राज्य में व्यापमं और ललित गेट हुए हैं, जिस मसले पर अभी कुछ ही दिनों पहले संसद के मानसून सत्र में कांग्रेस ने संसद में हंगामा किया और संसद को एक दिन भी सुचारू रूप से नहीं  चलने दिया था. मध्यप्रदेश में व्यापमं, राजस्थान में ललित गेट इन दोनों मुद्दों को लेकर कांग्रेस इन राज्यों के मुख्यमंत्री सहित विदेश मंत्री तक के इस्तीफे की मांग कर रही है.वहीँ दूसरी तरफ उसी राज्य की जनता ने बीजेपी को अपना मत देकर कांग्रेस के सभी आरोपों को खारिज कर दिया .कांग्रेस ललित गेट,व्यापमं और चावल घोटाले को लेकर भले ही संसद से लेकर सड़क तक विरोध कर रही हो लेकिन इस विरोध को जनता से जोड़ पाने में कांग्रेस पूर्णतया विफल रही है. कांग्रेस एक नकारात्मक विपक्ष की भूमिका का निर्वहन कर रही है.जिस प्रकार से मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ा पूरा देश अपने द्वारा चुन कर भेजे गए प्रतिनिधियों को देखा की किस प्रकार से वे लोकतंत्र की मर्यादा को धूमिल कर रहे है.बहरहाल, सवाल ये उठता है कि तमाम सरकार विरोधी मुद्दे होने के बावजूद कांग्रेस को जनता स्वीकार क्यों नहीं कर रही ?अगर सवाल की तह में जाए तो एक बात तो साफ नजर आती है,वो है कांग्रेस आज भी जनता से दुरी बनाए हुए है जिसका परिणाम ये है कि जनता के बीच से अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है.कांग्रेस अभी भी जमीन से नहीं जुड़ी.आज भी पार्टी के कई नेता जनता से जुड़ने के बजाय एयर कंडीसन कमरों में रहना पसंद कर रहे हैं.कांग्रेस के इन आला नेताओं को समझना होगा कि अगर पार्टी को फिर से सफलता के रास्ते पर लाना है तो,उसे कई कड़े फैसले लेने होंगे जो पार्टी के हित में हो .कांग्रेस शुरू से ही गाँधी – नेहरु परिवारवाद से ग्रस्त रही है.अब समय आ गया है,जब पार्टी को परिवारवाद से मुक्त कर दिया जाए और कांग्रेस के किसी आला नेता को पार्टी की कमान सौप दी जाए जो जमीन से जुड़ा हुआ व्यक्ति हो ,जनता की नब्ज को टटोलना जानता हो अगर कांग्रेस ऐसे व्यक्ति को अध्यक्ष बनाती है तो, इससे पार्टी ही नहीं वरन देश की जनता में कांग्रेस के प्रति एक सकारात्मक भाव पहुंचेगा.पहला तो उनके कार्यकर्ताओं में एक नई उर्जा का संचार होगा जो लगातार मिल रही पराजयों से शिथिल पड़ गई है तथा सबसे बड़ा आरोप जो पार्टी पर लगता रहा है वो है वंशवाद, इससे कहीं न कहीं पार्टी इन आरोपों से भी बच सकती है.कांग्रेस को लोकसभा चुनाव के बाद ही कुछ बड़े बदलाव करने चाहिए थे लेकिन कांग्रेस ने अभी तक नहीं किया इसका एक कारण ये भी है की कांग्रेस के अदद कुछ नेताओं को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस का एक बड़ा तबका एक परिवार की चापलूसी कर अपना काम निकाल लेना चाहता है और पार्टी में बने रहना चाहता है.वहीँ दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी को मिल रहें जनसमर्थन और मोदी की लोकप्रियता के आगे कांग्रेस की लोकप्रियता बहुत ही कम है. अगर कांग्रेस ऐसा नहीं करती है तो कांग्रेस को खोई हुई लोकप्रियता तथा खोई हुई जमीन को हासिल करने में अभी कितना वक्त लगेगा ये कहना बेमानी होगी.क्योकि अभी भी मोदी की लोकप्रियता जनता के बीच बनी हुई है.कांग्रेस को अगर अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाना है तो एक नया चेहरा ढूढने की कवायद शुरू कर देनी चाहिए, जिसकी पार्टी को दरकार है. कांग्रेस के कई बड़े नेता राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनाने की मांग कर रहें हैं,पर उन्हें ये भी गौर करना चाहिए कि लोकसभा तथा उसके बाद कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में राहुल ही पार्टी का मुख्य चेहरा थे.जिसे जनता ने सिरे से खारिज कर दिया.ये कांग्रेस का वही तबका है जो चापलूसी कर पार्टी में अपने ओहदे पर बना रहना चाहता है.अगर बात कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी की करें तो वो किसानों से मिलना ,गरीबों से मिलना तथा जनता से जुड़ने में अपना समय तो दे रहे है.परन्तु जनता के दिल में अपनी पार्टी की छवि सुधारने में विफल साबित हो रहे हैं.जो पार्टी देश में सबसे ज्यादा सत्ता पर काबिज़ रही हो, आज उसी पार्टी की लोकप्रियता हासिए पर है, गौरतलब है कि उस खोए हुए जनाधार को वापस पाने की बड़ी चुनौती आज राहुल गाँधी के सामने खड़ी है.कांग्रेस की सियासी जमीन खिसक रही है, उस खिसकती हुई जमीन को बचाने का प्रयास राहुल गाँधी कर रहें हैं.पार्टी को ये समझना होगा कि अब समय संगठन को सुदृढ़ करने का है, राहुल गाँधी हर मसले पर आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए सीधा निशाना प्रधानमंत्री पर साधते है समय आने पर प्रधानमंत्री उन्ही सवालों से ही उनको जबाब दे देते है. यहाँ राहुल गाँधी की राजनीतिक नासमझी देखने को मिलती है एक बात तो स्पष्ट है कि राहुल गाँधी अभी भी राजनीति में पूरी तरह से परिपक्व नहीं है उन्हें कांग्रेस के इतिहास से ही बहुत कुछ सीखने की जरूरत है.जिस प्रकार से 1977 में कांग्रेस को दुबारा खड़ा करने के लिए इंदिरा गाँधी ने संघर्ष किया और पार्टी को पुनर्जीवित किया था. इंदिरा गाँधी की उस रणनीति को कांग्रेस को समझना होगा जिससे पार्टी को नई दिशा मिली थी,अगर कांग्रेस ऐसा करती है तो आगामी कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी को सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं तथा कांग्रेस जनता के दिल में फिर से जगह बना सकती है.

Thursday, 13 August 2015

आत्महत्या की राह पर बदहाल किसान।



उत्तर प्रदेश के मथुरा में पिछले 17 साल से भटक रहे लगभग पच्चीस हजार किसानों ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को पत्र लिखकर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सामूहिक आत्महत्या करने की अनुमति मांगी है.मथुरा गोकुल बैराज पीड़ित किसान लगभग 17 साल से मुआवज़े के लिए भटक रहे हैं.पिछले वर्ष नवंबर  में किसानों ने अपने हक के लिए धरना भी दिया था, उसके बदले किसानों पर पुलिस ने बर्बरतापूर्वक गोलीबारी और लाठियां बरसाई थीं औरउनके आंदोलन को कुचलने की कोशिश की गई थी.हद तो तब हो गई जब गरीब किसानों पर प्रशासन ने लूट, डकैती और हत्या जैसे संगीन आरोप लगाकरअन्यायपूर्ण तरिके से 526 किसानों को जेल में डाल दिया था.गोकुल बैराज बाँध में 11 गावं के किसानों की तकरीबन 700 एकड़ जमीन जलमग्न हो गई है, जिससे 943 परिवारों के पच्चीस हजार सदस्य भूमिहीन हो गए हैं.इससे पहले भी इनके परिवारों के लोग पैसे की कमी के कारण बीमारी और भूखमरी के शिकार होकर काल के गाल में समाते रहे हैं. प्रशासन के आकलन के अनुसार किसानों की मुआवजा राशि 800 करोड़ है लेकिन इन किसानों की सुध न तो प्रशासन ले रहा और न ही शासन.17 साल से यह समस्या नौकरशाही और सियासत के मकड़जाल में फंसकर विकराल रूप धारण कर लिया है.फलस्वरूप किसानों ने ये घातक कदम उठाने का फैसला लिया है.किसानों की आत्महत्या की फेहरिस्त हर रोज़ बढती जा रही है,फिर भी सरकार इस मसले पर गंभीरता नहीं दिखा रही है. नैशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आकड़े को देखें तो हमारे देश में अन्नदाताओं की हालत का पता चलता है.31 मार्च 2013 तक के आकड़े बताते है कि 1995 से अब तक 2,96 438किसानों ने ये घातक कदम मजबूरन उठाया है, इन 18 सालों के दरमियान  यूपीए के हाथ में भी सत्ता रही तो वहीँ कुछ साल एनडीए ने भी सत्ता का स्वाद चखा, हुकुमत बदली लेकिन किसानों के हालात में सुधार नहीं हुआ.इस कृषि प्रधान देश में कृषि और किसान कितने मुश्किलों से गुज़र रहे हैं.किसानों की बदहाली का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 18 वर्षो में लगभग तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं फिर भी सरकार मौन रहती हैं,जो अन्नदाता दुसरों के पेट को भरता है आज उसी अन्नदाता की सुध लेने वाला कोई नहीं,किसान उर्वरक के बढ़ते दामों से परेशान है तो, कभी नहर में पानी न आने से परेशान है और अब तो मौसम भी किसानों पर बेरहम हो गयी है, बेमौसम बरसात और बाढ़ ने किसानों को तबाह कर दिया है .आखिर गरीब किसान किस पर भरोसा करे. सरकार किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए ऋण माफी,बिजली बिल माफी समेत कई राहत पैकेज आदि तो देती रहती है,परन्तु ये भी उन्हें समय पर नहीं मिलता ,न कि उनकी समस्याओं का स्थानीय समाधान. भारत सरकार किसानों की समस्या का स्थानीय समाधान क्यों नहीं ढूढ़ती इस यक्ष प्रश्न का सटीक जबाब सरकार के पास नहीं है.भारत वह देश है जहां की दो-तिहाई आबादी विशुद्ध रूप से खेती पर निर्भर है.लेकिन इन विकट समस्याओं से किसान इस कदर तंग आ गया है कि वो खेती छोड़ना चाहता है ,एनएसएसओ के आकड़े पर गौर करे तो 42  फीसदी  किसान खेती हमेशा के लिए छोड़ने को तैयार हैं लेकिन विकल्प न होने के कारण वे खेती करने के लिए मजबूर हैं.एक कृषि प्रधान देश में कृषि मजबूरी बस की जा रही है इससे बड़ा दुर्भाग्य देश के लिए और क्या हो सकता है .आज़ादी के इतने सालों के बाद भी किसान अपनी किस्मत सहारे अपनी जिन्दगी जीने को मजबूर है.समय से वर्षा नहीं हुई तो फसल चौपट होने का डर तथा बेमौसम बरसात का डर बाढ़ से फसल डूब जाने की चिंता आज भी किसानों को सोने नहीं देती .देश में चाहे कितने बांध और नहरें क्यों ना बनी हों लेकिन तीन-चौथाई किसान आज भी इंद्र देवता की मेहरबानी को ही अपना नसीब मानते हैं.प्रधानमंत्री को यह एहसास भी होना चाहिए कि उनके द्वारा चलाई गई योजनायें भी किसानों तक ठीक से नहीं पहुंच रही हैं.सरकार की योजनाएं ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले गरीब किसानों, मजदूरों को केवल सुनाई देती हैं, उन तक पहुंचती नहीं.प्रधानमंत्री मोदी अपनी सरकार को हर सरकार से अलग रखते है अब ये देखने वाली बात होगी की मोदी योजनाओं के सही क्रियान्वयन के लिए क्या करते है.उल्लेखनीय है कि  सरकार मुआवजे की घोषणा तो कर देती है लेकिन किसानों तक मुआवज़ा पहुंचते–पहुंचते काफी लंबा वक्त गुज़र जाता है और किसान सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काट के थक जाता है और हार मान लेता है.फलस्वरूप आत्महत्या जैसा कड़ा कदम उठाने को मजबूर हो जाता है.बहरहाल,सरकार ने भले ही जनधन योजना के जरिये 13 करोड़ से अधिक खाते खोल दिए हों और आधर कार्ड के जरिये किसानों से सीधे सम्पर्क साधने की बात कह रही हो पर,जमीनी हकीकत इससे परे है.किसानों के लिए वही पुरानी लंबी और लचर व्यवथाबनी हुई है.क्या मोदी कुछ ऐसा बड़ा फैसला लेंगे जिससे किसान आत्महत्या जैसे कदम न उठाये.क्या मोदी कुछ ऐसा करेंगे जिससे किसानों तक सीधे सरकार द्वारा दिया गया मुआवजा या योजना का लाभ आसानी से मिल सके ताकि किसान आत्महत्या जैसा निर्णय लेने को मजबूर न हो.प्रधानमंत्री हर रोज़ एक- एक कानून खत्म करने की बात तो करते हैं,अच्छा होगा की मोदी कानून के साथ कृषि के क्षेत्र में जो किसानों की जटिलता है उसे खत्म करें .राजनेताओं के लम्बे –चौड़े वादे सुन –सुन कर किसान त्रस्त आ चुके हैं.हर एक राजनीतिक दल सत्ता को पाने के लिए किसानों के हित में बात करते हैं परन्तु  चुनाव जीतने के बाद भूल जाते हैं. मोदी ने भी किसानों के लिए बड़े –बड़े वायदें किये हैं,इस सरकार से किसानों को बहुत उम्मीदें हैं.अबसमय आ गया है कि मोदी किसानों की उम्मीदों पर खरा उतरें .किसानों को आत्महत्याओं से बचाने के लिए सरकार को गंभीर होने की जरूरत है उन समस्याओं का निवारण करना सरकार की पूर्णतया जिम्मेदारी है,जिसके चलते किसान आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं ,ऐसे गंभीर विषय पर सरकार को जल्द से जल्द कोई बड़ा फैसला लेने की जरूरत है साथ ही सरकार को इन बातों का ख्याल भी रखना चाहिए कि किसानों को बिजली, खाद,पानी के साथ – साथ सरकार द्वारा मिल रहे मुआवज़े  तथा योजनाओं का लाभ समय पर मिल सके.

Friday, 7 August 2015

Thursday, 6 August 2015

पिछली दुर्घटनाओं से सबक ले रेलवे

िछली दुर्घटनाओं से सबक ले रेलवे

मध्य प्रदेश के हरदा से तक़रीबन पच्चीस किलोमीटर दूर खिड़किया और भिंगरी के बीच मंगलवार देर रात करीब 11:30 बजे भयंकर रेल हादसा हो गया.भारी बारिश के चलते माचक नदी का पानी कई फूट बढ़ गया जिससे नदी पर बना रेलवे पुल धस गया जिसके चलते मुंबई से वाराणसी जा रही कमायनी एक्सप्रेस और पटना से मुंबई जा रही जनता एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हो गई.पुल के धसने से जनता एक्सप्रेस के पांच डिब्बे व इंजन और कमायनी एक्सप्रेस के ग्यारह डिब्बे नदी में गिर गये.इस भीषण हादसे में लगभग 31 यात्रियों की मौत हो गई है, अभी मृतको की संख्या बढने की आशंका है और 100 से अधिक लोग घायल हैं. ये हादसा एकबार फिर रेलवे के सुरक्षा प्रणाली पर सवालिया निशान लगा रहा है तथा रेल हादसों को रोकने की रेलवे के उन सभी दावों की पोल खोल रहा है जो दावे वो हर रेल हादसा होने के पश्चात् करते हैं. हर बजट में यात्रियों के सुरक्षा व सुविधा के नाम पर लम्बें –चौड़े वादें किए जाते हैं. परन्तु, इस पर कोई सरकार अमल नहीं करती है.बहरहाल,फिर वही पुरानी परम्परा जो भारत में चलती आई है उसी को दोहराते हुए रेल मंत्रालय ने मुआवज़े की घोषणा तथा जाँच के आदेश दे दिये हैं. हर घटना की जाँच के लिए समिति का गठन होता है, जाँच होती है मगर रिपोर्ट को ईमानदारी से पेश नहीं किया  जाता.अमूमन भारतीय रेल में हर दिन कहीं न कहीं छोटी –मोटी दुर्घटना होती रहती है मगर ऐसे गंभीर विषय पर न तो रेलवे प्रशासन गंभीर है और न ही रेलवे मंत्रालय. नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के मुताबिक 2014 में रेल हादसों के 28,360 मामले दर्ज हुए.इनमें 2013 के मुकाबले 9.2 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.2013 में 31,236 हादसे दर्ज किये गये थे.इसमें ज्यादातर मामलें लगभग 61.6 फिसदी लोगों के ट्रेन से गिरने या रेलवे ट्रैक पर ट्रेन की चपेट में आने के रहे.लेकिन फिर स्थिति इस वर्ष गम्भीर होती दिख रही. जब रेल मंत्री सुरेश प्रभु बजट पेश कर रहे थे उस वक्त बारह बार सुरक्षा शब्द का इस्तेमाल किया था.लेकिन यात्रियों को कितनी सुरक्षा मिल रही ये बात अब किसी से छिपी नहीं है.जब से राजग सरकार ने सत्ता की कमान संभाली है भारतीय रेल ने बुरा प्रदर्शन किया है. रेलवे सुरक्षा के मोर्चे पर अब तक पूरी तरह विफल रही है. अभी कुछ ही महीनों पहले असम के कोकराझार में चंपावती नदी में सिफुंग पैसेंजर के डिब्बे गिरे थे जिसमे 38 लोग घायल हो गए थे.वहीँ उत्तर प्रदेश में रायबरेली के पास देहरादून से वाराणसी जा रही जनता एक्सप्रेस भी दुर्घटनाग्रस्त हुई थी जिसमे तकरीबन 37 यात्रियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था तो लगभग 200 से अधिक लोग घायल हुए थे.इस प्रकार भारत में रेल दुर्घटनाओं की एक लंबी फेहरिस्त है जो रेलवे प्रशासन व शासन की नाकामी को दर्शाता है.आखिर रेलवे पुरानी घटनाओं से सबक क्यों नहीं लेती. अमूमन रेल दुर्घटनाओं के पीछे सिग्नल में खराबी,जर्जर पटरियों,कोहरा व मानवीय गलती प्रमुख होती है, हर बजट में सरकारें तमाम प्रकार की योजनाओं की घोषणा करती हैं जिसमे रेल यात्रियों की सुख,सुविधा और सुरक्षा को तरजीह दी जाती है. कई परियोजनाओं का शुभारंभ होता है लेकिन योजना को पूरा होने में तय अवधि से अधिक वर्ष लग जाते हैं जो हमारी रेलवे की विफलता का प्रमुख कारण है.समय से पटरियों की मरम्मत नहीं होती जिससे पटरिया घिस जाती है और दुर्घटना को दावत देती है.इस दुर्घटना पर हम गौर करे तो रेलवे की बड़ी नाकामी हमारे सामने निकल कर आती है.जब भारी बारिश से पुल पर पानी भरा आया था उस समय रेलवे प्रशासन ने इसके प्रति गंभीरता क्यों नहीं बरती ? रेल दुर्घटना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर सामने आयी है इसका समाधान भी इस दिशा में सही योजना का निर्माण कर उसे सही  क्रियान्वयन के द्वारा ही किया जा सकता है.पिछले साठ सालों में रेलवे के सुधार के लिए तमाम समितियों का गठन किया गया .देश की सभी सरकारों ने  उन समितियों की रिपोर्ट को नजरअंदाज किया.वर्ष 1962 में कांग्रेस ने कुंजरू समिति बनाई पर उसकी रिपोर्ट पर अमल नहीं किया फिर 1968 में बांचू समिति गठित की गई उसकी रिपोर्ट को भी नकार दिया गया फिर 1978 में सिकरी समिति इस प्रकार लगभग कई समितियों का गठन तो किया गया लेकिन उसके रिपोर्ट को कूड़ेदान में फेक दिया गया. वर्ष 2012- 2013 में तात्कालिक रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने एक बजट पेश किया जिसमे रेल आधुनिकीकरण पर जोर दिया गया.इस दूरदर्शी बजट में 5.60 लाख करोड़ रूपये आधुनिकीकरण आदि के नाम पर खर्च का प्रस्ताव दिया गया था.काकोदकर समिति ने अपने रिपोर्ट में कहा था कि आगामी पांच वर्षो में सुरक्षा उपकरणों व सुरक्षा उपायों के लिए एक लाख करोड़ रूपये की आवश्यकता है वहीँ दूसरी तरफ पित्रोदा समिति ने रेल के आधुनिकीकरण और रेल को भविष्य की रेल बनाने के लिए 8 लाख 39 हजार करोड़ रूपये की आवश्यकता की बात की थी इस बजट में इन दोनों समितियों की सिफारिशों को लागू करने की योजना बनाई गई थी.सुरक्षा पर गंभीर चिंता व्यक्त करने वाली काकोदकर और पित्रोदा समिति को भी सियासत की भेंट चढना पड़ा. रेलवे में सियासी हस्तक्षेप का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि तत्कालीन रेल मंत्री को भी अपना पद गवाना पड़ा.भारत की लगभग सभी सरकारें रेलवे सुरक्षा जैसे गंभीर विषय को तवज्जो देने,यात्रियों की जान –माल की रक्षा करने के बजाय अपनी सियासत साधने में लगी रहती हैं.भारतीय रेल दुनिया का चौथा सबसे बड़ा नेटवर्क है जो प्रतिदिन 19 हजार ट्रेनों का संचालन करता है.जिसमे 12 हजार ट्रेनें यात्री सेवा के लिए तथा 7 हजार ट्रेने माल ढोने का काम करती हैं.भारतीय रेल हर दिन 2.3 करोड़ यात्रियों को उसके गंतव्य तक पहुँचाने का काम करती है लेकिन यह अत्यंत दुर्भाग्य की बात है कि आज़ादी के इतने वर्षो के बाद भी रेलवे यात्रियों की सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकी.एक तरफ सरकार बुलेट ट्रेन की बात करती है तो वहीं दूसरी तरफ एक्सप्रेस ट्रेन भी विलंब से चलती है. अभी फिलहाल में वक्त की मांग यही है कि सरकार पहले रेलवे की पटरियों का नवीनीकरण करे और ऐसी दुर्घटनाओं से सबक ले जिससे आने वाले दिनों में इस प्रकार के हादसों की पुनरावृत्ती न हो.