Monday, 15 June 2015

काश यादें भी भूकंप के मलबे. में दब जातीं ..

   
एक दिन बैठा था अपनी तन्हाइयों के साथ खुद से बातें कर रहा था. चारों तरफ शोर –शराबा था, लोग भूकम्प की बातें करते हुए निकल रहें थे साथ ही सभी अपने–अपने तरीके से इससे  हुए नुकसान का आंकलन भी कर रहें थे.  मै चुप बैठा सभी को सुन रहा था. फिर अचानक उसकी यादों ने दस्तक दी और आँखे भर आयीं. आख  से निकले हुए अश्क मेरे गालों को चूमते  हुए मिट्टी में घुल–मिल जा रहें थे मानों ये आसूं उन ओश की बूंदों की तरह हो जो किसी पत्ते को चूमते हुए मिट्टी को गलें लगाकर अपना आस्तित्व मिटा देती हैं. उसी  प्रकार मेरे आंशु भी मिट्टी में अपने वजूद को खत्म कर रहें थे. दरअसल उसकी याद अक्सर मुझे हँसा भी जाती है और रुला भी जाती है. दिल में एक ऐसा भाव जगा जाती है जिससे मै खुद ही अपने बस में नहीं रह पाता, पूरी तरह बेचैन हो उठता. जैसे उनदिनों जब वो  मुझसे मिलने आती तो अक्सर लेट हो जाती,मेरे फोन का भी जबाब नहीं देती, ठीक इसी प्रकार की बेचैनी मेरे अंदर उमड़ जाती थी. परन्तु तब के बेचैनी और अब के बेचैनी में  एक बड़ा फर्क है, तब देर से ही सही  आतें ही उसके होंठों से पहला शब्द सॉरी...ही निकलता था और मेरे अंदर का गुस्सा (जो दिखावें के लिए था ) और ज्यादा उफान पर हो जाता, परन्तु वो अपने हजार कामों का ब्यौरा देकर और एक प्यारी सी मुस्कान के साथ मेरी  तरफ देखकर मुझे अपना गुलाम बना लेती.  मै भी उसकी गुलामी में अपनी आज़ादी ही समझता था और उसको अपने आप को ये कहते हुए समर्पण कर देता कि प्यार समर्पण ही है, मेरा गुस्सा तब उस मोम की तरह हो जाता जो सूर्य  के पास जाना  चाहता  हो, परन्तु सूर्य की  एक किरण मात्र से ही घुल जाए. मै भी वहां उस मोम की तरह ही अपने आप को महसूस करता और पिघल जाता. फिर हम एक दूसरे  की  बातों के खो जाते, उस वक्त समूची दुनिया में यही लगता था हम दोनों के सिवाए कोई नही. कमबख़्त समय भी न...जब वो साथ होती तो कुछ जल्दी ही घड़ी की सुइयां अपनी परिक्रम पूरी कर लेती थी. बहरहाल एक दिन चली गई वो मुझे छोड़ कर बिना बताए. मै पूरी तरह बिखर गया, उसकी यादों में डूबा रहता था. सुबह कब और शाम कब, कुछ पता ही नहीं चलता, इस कदर मदहोशियों का आलम था. मै हारने वाला नही था फिर से अपने कैरियर  और फ्यूचर की ओर मैंने  झांकना शुरु किया और सम्भला, क्योकिं अभी पूरी जिन्दगी मेरे सामने पड़ी है...जिन्दगी  महज़ जज्बातों और बातों से चलना मुस्किल है. अब मैं ये भी  समझ गया हूँ कि हमारा अफसाना अंजाम तक नहीं पहुँच सकता था, और ये अच्छा ही हुआ कि हम अपनी–अपनी राहों में आगे बढ़ गये. पर तुम्हारी याद अब भी नहीं जाती. यादें इंसान को कमजोर बनाती है, पर मैं समय के अनुसार मजबूत होता गया हूँ. वैसे भी तुम्हारा आना और जाना एक सपने की तरह था और सपने को सहेजा नहीं जाता, वो आतें है और दिल के मलबे में दबी यादों को झकझोर के कर चलें जाते हैं.शिकायत तुमसे भी है और इस भूकम्प से भी जिसके आने से बड़ी–बड़ी इमारते और न जाने क्या–क्या मलबे में खो जाता  है. काश! ये कमबख्त याद इस भूकम्प में मलबे में दब जाती।

तहलका में प्रकाशित