Tuesday, 31 March 2015

कभी दिल की भी सुन लिया करो,साहब !


कभी दिल की भी सुन लिया करो, साहब !

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ६वें  ‘मन की बात’ कार्यक्रम किसानों से किया लेकिन, बात किसानों  की मन की नहीं बल्कि अगर हम ये कहें कि मोदी अपने सरकार पर लग रहे भूमि अधिग्रहण बिल के आरोपो का  स्पष्टीकरण देकर किसानों का भरोसा जीतने की कवायद की तो ये तनिक भी  अतिशयोक्ति नहीं होगी.बेमौसम हुए बारिस से किसान के फसल बर्बाद हो गए है.किसानों की हालत दिन ब दिन दयनीय होती जा रही है.परन्तु हमारे प्रधानमंत्री के पास केवल संवेदना के अलावा और कुछ नहीं हैं.अपने तीस मिनट के बात के दरमियान प्रधानमंत्री अपनी सरकार के द्वारा लाए गए भूमि अधिग्रहण विधेयक  पर २६ मिनट  बोले.इससे एक बात तो स्पष्ट होती है कि सरकार कहीं न कहीं विपक्ष की सक्रियता से घबराई हुई है.सभी विपक्षी पार्टियाँ इस विधेयक के विरोध के लिए लामबंध है.संसद से लेकर सड़क तक सरकार की घेराबंदी की जा रही है.अब ‘मन की बात’के जरिये प्रधानमंत्री खुद अपनी सरकार के  बचाव में अपना पक्ष रखते हुए किसानों को आश्वासन देते हुए बोलते है कि आप भ्रम में न पड़ें ,निश्चिन्त रहें हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे किसानों का अहित हो, इसके साथ मोदी ने ये भी स्पष्ट किया कि हम उन सभी कानूनों का खत्म कर देना चाहते हैं जो किसी भी प्रक्रिया को जटिल बना रहे है किसानों से बात के दौरान मोदी ने उनकी सरकार पर भरोसा करने की बात कहीं जो अब हास्यास्पद लगता है. चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री ने किसानों को लागत का ५० प्रतिशत मुनाफा दिलाने  की बात कहीं जो अब तक अमल नहीं कर पाए अब ये एक और बात मन में आता है  कि कहीं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह इसे भी जुमला न करार दे दे .बहरहाल,किसानो से बात करते हुए मोदी ने एक किसान की उस हर पीड़ा का जिक्र किया जो एक किसान को झेलनी पड़ती है ,मोदी ने सरकार की सक्रियता को भी सराहते हुए बताया कि हमारे मंत्री हर राज्य तथा जिलों में जाकर किसानों की बदहाली को देख रहे है और  हर सम्भव मदद के लिए भरोसा दिला रहें है .कृषि प्रधान देश में कृषि और किसान कितने मुश्किलों से गुज़र रहा है.किसानों की बदहाली का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले १७ वर्षो में लगभग तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके  हैं फिर भी सरकार मौन रहती हैं,जो अन्नदाता दुसरो के पेट को भरता है आज उसी अन्नदाता की सुध लेने वाला कोई नहीं,किसान  उर्वरक के बढने दामों से परेसान है तो, कभी नहर में पानी न आने से परेसान है और अब तो मौसम भी किसानों पर बेरहम हो गई बेमौसम बरसात ने किसानों को तबाह कर दिया.आखिर गरीब किसान किसपे भरोसा करे.प्रधानमंत्री को यह एहसास होना चाहिए की इनके द्वारा चलाई गई योंजना भी किसानों तक ठीक से नहीं पहुँच रही. इस ‘मन की बात’ कार्यक्रम से भी  ये बात तो निकल कर सामने आई है कि सरकार की योजनाएं ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले गरीब किसान,मजदूर को केवल सुनाई देती है उनतक पहुँचती नहीं.मसलन भारतीय राजनीति में अमूमन ये देखने को मिलता है कि सत्ता पर  काबिज़ नेता बोलते कुछ है और करते कुछ और अगर बात किसी भी मुद्दे की कि जाए तो हर जगह केवल सरकार ही नहीं वरन विपक्ष की पार्टिया भी उतनी ही जिम्मेदार होती है जितनी की सरकार.सरकार तो योजनाओं की प्रसंसा करने में होती है तो वही दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियाँ इसके विरोध करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती.किसी के पास ये देखने की फुर्सत नहीं होती की योजना कितनी कारगर साबित हुई है,योजना धरातल पर उतरी की नहीं,जो इसके लाभार्थी है,उन्हें योजना का लाभ मिला की नही.ये सब तमाम बाते है जो आज के दौर  में हर किसी को परेसान कर रही है.सरकार योजना तो चलाती है पर वास्तव में उस योजना का लाभ क्या लाभार्थियों तक आसानी से मिल पाता है ? जबाब सीधा है नही.अगर हम ये कहें की भारत एक योजनाओं का देश है तो इसमें तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योकि आज़ादी के बात अब तक भारत केवल योजनाओं के मकड़जाल में उलझ के रह गया है.कोई भी योजना पुरे सही ढंग से जमीन पर नहीं उतरी,बस सरकार उसे अपने चुनावी भाषण एवं सरकारी फाइलों में इसका बेहतर ढंग से उपयोग करती चली आ रही.प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के माध्यम से इस बात को जाना परन्तु इस कार्यक्रम को किसान व जनहित  तभी माना जायेगा जब मोदी गरीब किसानों तक उसके मिलने वाले योजनाओं को पहुँचाने के लिए कोई बड़ा फैसला लेंगे. ‘मन की बात’ तो ठीक है अगर प्रधानमंत्री किसानों के दिल की  बात  सुने तो सोने पर सुहागा होगा .मोदी की इस ‘मन की बात’ मे जमाखोरी का भी जिक्र किया.खेत से मंडी के बीच बिचौलियों की भूमिका बढ़ी है, तो वहीँ मंडी से गोदामों तक के बीच जमाखोरों की तादाद भी बढ़ी है किसान पूरी तरह त्रस्त है अगर  एनएसएसओ के आकड़ो पर गौर करे तो ४२ फीसद किसान खेती हमेशा के लिए छोड़ने को तैयार लेकिन विकल्प न होने के कारण वे खेती करने के लिए मजबूर हैं. अब ये देखने वाली बात होगी कि मोदी किसानों की बदहाली से उबारने के लिए क्या करते है.



आदर्श तिवारी 

पाकिस्तान पर अपना रुख स्पष्ट करें मोदी


    
पाकिस्तान दिवस के मौके पर भारत  सरकार के विदेश राज्य  मंत्री वीके सिंह के शिरकत से मोदी सरकार फिर सवालों के घेरे में आई गई है.वीके सिंह को इस आयोजन में जाने की घटना को कमतर नही आकां जा सकता,इससे पहले भी पाकिस्तान उच्चायोग  ये आयोजन करता आया है इसमें  हुर्रियत नेताओं का आना तो आम बात है पर, मोदी सरकार  के मंत्री का पहुंचना कहीं न कहीं पाकिस्तान के प्रति मोदी सरकार के दोहरे रवैये को दर्शाता है.इससे पहले एक घटना याद आती है जब यही मोदी सरकार विगत वर्ष १८ अगस्त को ये साफ कर दिया था कि अगर पाकिस्तान हुर्रियत नेताओं से बात करना चाहता है तो ,उन्हीं से करे और भारत सरकार ने अपनी तरफ से बातचीत  के दरवाजे बंद कर दिए. मोदी सरकार  को पाकिस्तान के प्रति अपने रवैये को स्पष्ट करना चाहिए.क्योकिं पाकिस्तान अपने दगाबाजी से बाज़ नहीं आने वाला.जिस मंच पर भारत सरकार के मंत्री मौजूद थे.उसी मंच पर अलगाववादी संगठनों ने नेताओं का भी भव्य स्वागत हो रहा था.भारत सरकार के मंत्री जो सेनाध्यक्ष भी रहा हो उसे इस मंच पर जाना शोभा नहीं देता,ध्यान देने वाली बात ये भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पाकिस्तान के वजीरे आलम नवाज़ शरीफ को फोन पर पाकिस्तान दिवस की बधाई दी.अब ये सवाल मन में आता हैं कि मोदी सरकार की पाकिस्तान के प्रति कोई नीति है भी या नहीं, एक तरफ सरकार आतंकवाद और बातचीत एक साथ न होने का दावा की करती हैं तो वहीँ मोदी की पाकिस्तान के प्रति सहृदयता का ये पुख्ता प्रमाण है कि जब केंद्र में मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार बनी तभी से मोदी लगातार भारत –पाक संबंधो में मधुरता लाने की बात कर रहे है चाहें को शपथ ग्रहण समारोह में  नवाज़ शरीफ बुलाना हो या पाकिस्तान उच्चायोग को अलगाववादीयों से मिलने की छुट.परन्तु मोदी को ये भी ध्यान रखना होगा कि पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतों से कभी बाज़ नहीं आ रहा हैं. जम्मू –कश्मीर में लगातार आतंकवादी हमले हो चुके है यहाँ तक कि पाकिस्तान ने इसकी निंदा तक नहीं की फिर भी मोदी सरकार के मंत्री का जाना कहीं न कहीं मोदी सरकार के दोहरे रवैये को बताता है.सरकार ने इस मसले पर अपना तर्क रखते हुए इसे राजनयिक शिष्टाचार बताया पर ध्यान देना होगा कि पाकिस्तान ने कभी कोई शिष्टाचार नहीं निभाया है. पाकिस्तान के प्रति  ये मोदी सरकार कि  ये नरमी किस कारण आई है,गौरतलब है कि  चुनाव के समय मोदी पाकिस्तान पर खुलकर हमले कर रहे थे और इस मसले पर कांग्रेस से सवाल कर रहे थे,अब मोदी की ये नीति मनमोहन सिंह से नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की तरह है .लेकिन मोदी हमेशा अपनी सरकार को हर सरकार से अलग होने का दावा करती है.बहरहाल, दशको बाद भारत –पाक नीति से परेसान लोगो को एक उम्मीद की किरण नजर आई थी लोग ये मानने लगे थे कि अब पाकिस्तान को  अब उसी की भाषा में ये सरकार जबाब देगी मगर ऐसा होता अब नहीं दिख रहा. अगर ये भारत सरकार की कुटनीति का कोई नया अध्याय है तो इसे सरकार को जनता के समक्ष रखना चाहिए.



आदर्श तिवारी