Monday, 12 January 2015

मेनका गाँधी का पुत्र मोह


क्या गरीबी से बाहर आ सकेंगे गावं


मोदी का काट ढूढे बगैर कांग्रेस का उद्धार नहीं

 मोदी का काट ढूढे बगैर कांग्रेस का उद्धार नहीं 
कांग्रेस आज अपनी विफलताओं  से इस कद्र घिर गई है भाजपा अब इनके राजघरानो के नेताओं में सेंध लगाने की कोशिस कर रही है, ये स्थिति आई क्यों !क्या कांग्रेस इसपर मंथन करेगी !दरअसल, लोकसभा चुनाव से निरंतर कांग्रेस अपनी लोकप्रियता खो रही है. असल मायने कांग्रेस की लोकप्रियता पिछले साल दिसम्बर माह में हुए विधानसभा चुनाव से ही गिर  रही है.उसके बाद लोकसभा चुनाव से कांग्रेस को अभी तक के चुनावों में  लगातार मुह की खानी पड़ रही है.इसका एक बड़ा कारण है कि कांग्रेस कभी ईमानदारी से आत्ममंथन नहीं करती.अभी तक  कांग्रेस हार के बाद कमेटी तो  गठित करती है,लेकिन इसका निर्णय हमेसा की तरह बेईमानी वाला होता है. न की ईमानदारी व निष्पक्,.कांग्रेस के आला नेताओं को अब ये बात समझनी चाहिए कि अगर पार्टी को फिर सफलता के रस्ते पर लाना है.तो उसे हर एक कड़ा फैसला लेना होगा,हर परिवर्तन करना होगा जो  पार्टी के हित में हो.कांग्रेस शुरू से गांधी -नेहरु परिवारवाद से ग्रस्त रही है.अब समय आ गया है जब पार्टी परिवारवाद से मुक्त कर दिया जाए और कांग्रेस के और किसी आला नेता को पार्टी की कमान सौप दी जाए.जो जनता की नब्ज को पहचान सके तथा जमीन से जुडा हुआ व्यक्ति हो,अगर पार्टी ऐसे व्यक्ति को को अध्यक्ष बनाती है तो इससे कांग्रेस  व देश की जनता मेंकांग्रेस के प्रती  कई सकारात्मक भाव पहुचेगा .पहला तो  उनके कार्यकर्ताओं में भी एक नये उर्जा का संचार होगा जो लगातार मिल रही पराजय से शिथिल पड़ गई है.सबसे बड़ा आरोप जो पार्टी पर हमेसा लगता आ रहा है वो है परिवारवाद,इससे कहीं न कहीं पार्टी इस आरोप से भी बच सकती है.लोकसभा चुनाव के बाद भी पार्टी ने कोई बदलाव नहीं किया जिसकी उसे जरूरत थी .अगर उसी समय पार्टी कोई बड़ा बदलाव  को होती तो शायद नतीजे कुछ पक्ष में हो सकते थे, हरियाणा,महाराष्ट्र और अब झारखंड तथा जम्मू कश्मीर में भी पार्टी को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी है,फिर भी अभी तक पार्टी ने कोई बड़े बदलाव के संकेत नहि दिए है,इसका सबसे बड़ा कारण ये भी है कि कांग्रेस के अदद कुछ नेताओं को छोड़ दिया जाए तो पार्टी का एक बड़ा तबका एक परिवार की चापलूसी कर अपना काम निकाल लेना चाहता है. और पार्टी में बने रहना चाहता है.ये एक बड़ा कारण है कांग्रेस की पराजय का .वही दूसरी तरफ अगर विपक्षी दल भाजपा पर गौर करे तो ये पार्टी इन दिनों जीत के विजय रथ पर सवाल है और बडी  बात ये है की इस विजय की निरंतरता भी बरकरार है.अगर इन दोनों दलों की तुलना एक दुसरे से करे तो इनदिनों भारतीय जनता पार्टी को मिल रहे जनसमर्थन व  व मोदी की लोकप्रियता  के आगे कांग्रेस की लोकप्रियता बहुत कम है.कांग्रेस  को खोई हुई लोकप्रियता तथा अपनी खोई हुई जमीन  हासिल करने में अभी कितना वक्त लगेगा अभी ये भी कहना बेईमानी होगी.क्योंकि इन दिनों बीजेपी के मुख्य चेहरा व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और तथा कथित  मोदी लहर अभी बरकार है.कांग्रेस को अगर अपना खोया हुआ जनाधार  वापस पाना है तो इस चेहरा का काट ढूढ़ने की कवायद शुरू कर देनी चाहिए,पार्टी को नये चेहरे की दरकार है ,कांग्रेस के कई आला नेता राहुल को अध्यक्ष बानने की मांग कर रहे है, पर उन्हें ये भी गौर करना चाहिए कि लोकसभा के साथ  और राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में राहुल ही पार्टी के मुख्य चेहरा थे.जिसे जनता से सिरे से ख़ारिज कर दिया.ये कांग्रेस का वही तबका है जो चापलूसी कर पार्टी में अपने ओहदे पर बना रहना चाहता है.अगर अब कांग्रेस परिवारवाद से मुक्ति के साथ कोई बड़ा फैसला नहीं करती तो १३० वर्ष पुरानी पार्टी की अस्मिता खत्म होने तथा भविष्य में सफलता मिलेगी इसकी भी कोई गारंटी नही है.अगर पार्टी अभी कुछ बदलाव करती है तो हालही में होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव में इसका असर देखने को मिल सकता है,बदलाव से पार्टी के कार्यकर्ताओं में उर्जा का संचार होगा तथा जनता भी इसके प्रती सकारत्मक रुख अपना सकती है.जो पार्टी के हित में होगा .