Wednesday, 23 December 2015

संसद सत्र : नकारात्मक विपक्ष

 नकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस.

लोकतंत्र में मंदिर संसद में जो हो रहा है उसे देख हमारे मन में कई सवाल उत्पन्न हो रहे हैं.जिसका जवाब मिलना बहुत मुश्किल है.शीतकालीन सत्र भी मानसून सत्र की तरह हंगामे की भेंट चढ़ गया. लोकतांत्रिक धर्म के विरुद्ध, अपने शपथ को ताख पर रख कर हमारे राजनेता इन दिनों संसद में जो कर रहे हैं.वो देश के लोकतंत्र के लिए कुठाराघात से कम नहीं है.लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा चुन कर संसद में पहुंचे इन सांसदों का आचरण देश के लोकतंत्र को शर्मशार कर रहा है. संसद विकास के द्वार खोलती है और विकास तभी संभव है,जब इसका दरवाज़ा खुलेगा, इसके अंदर विकास को लेकर, देश की जनमानस को लेकर चिंतन होगा.परन्तु मौजूदा वक्त में इन बातों का कोई औचित्य नहीं रह गया है.जनता मूकदर्शक बने इस तमासे को कब-तक देखती रहेंगी ? इस सवाल का जवाब भी मिलना कठिन है.आज विपक्षी दल सदन में जो कर रहे हैं वो हमारे लोकतंत्र की गरिमा के विपरीत है.सत्र के शुरुआत में ही सरकार ने विपक्ष को विश्वास में लेने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.हम ये भी कह सकते हैं कि सत्ताधारी दल इस बार नरम है तथा काम कराने को आतुर है बशर्ते विपक्ष बार –बार बेजा हंगामा ना करे लेकिन सरकार के लाखों प्रयास के बाद भी विपक्ष सदन को बाधित करने का काम कर रही है,शीतकालीन सत्र के दरमियान विपक्ष ने जो कहा सरकार ने उसको गंभीरता से लिया.आज हमारे देश में कई ऐसे मुद्दे है.जो जन-सरोकार के है लेकिन, संसद में इसके चर्चा के बजाय विपक्ष उन मुद्दे को ज्यादा तरजीह देने में लगा हुआ है जिसका आम जनमानस से कोई लेना –देना नहीं है.मसलन विपक्ष असहिष्णुता को सबसे गंभीर मसला मानता है तथा चर्चा की मांग करता है.उल्लेखनीय है कि सरकार इस बार विपक्ष के प्रति उदार है.नतीजन देश की संसद में असहिष्णुता पर चर्चा होती है.सरकार ने असहनशीलता पर चर्चा कराया.बहस के दौरान कई दफा सदन बाधित हुआ.इससे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति क्या हो सकती है कि असहिष्णुता  पर बहस के दौरान विपक्ष खुद असहिष्णु हो गया.दरअसल, असहिष्णुता ऐसा मुद्दा है जो एक वर्ग विशेष से जुड़ा हुआ है.इसके विसाद पर हमारे राजनीतिक दल सड़क से ससंद तक इस मुद्दे को भुनाने में लगे हैं और उस वर्ग विशेष के हिमायती बन अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में लगे हुए हैं.यद्यपि सवाल हुकुमत से भी है और विपक्ष से भी,असहिष्णुता पर हुए मंथन से निकला क्या ?यकीनन इस चर्चा से केवल ससंद का समय जाया किया गया इसके अतिरिक्त कुछ नही.बहरहाल,सरकार का भी लक्ष्य था कि इस सत्र में किसी भी तरह से वस्तु सेवा कर विधेयक पास हो जाएँ.लेकिन इस सत्र में भी जीएसटी सियासत की भेंट चढ़ गया.मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस रोज़ नये नुस्के के साथ संसद में हंगामा करती रही .अभी कुछ रोज़ पहले वीके सिंह के द्वारा दलितों पर दिए गये आपतिजनक टिप्पणी  को लेकर हंगामा चल ही रहा था फिर पाकिस्तान से बातचीत को लेकर भी हंगामा करना शुरू कर दिया.उसके बाद नेशनल हेराल्ड,रेलवे की जमीन अतिक्रमण का मुद्दा अभी चल ही रहा था कि दिल्ली के मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव के दफ्तर में हुई छापेमारी का मुद्दा आ गया है.इस प्रकार एक लंबी फेहरिस्त है.नकारात्मक मुद्दों की जिसके वजह से हंगामा हो रहा है.इसी कड़ी में एक और मुद्दा कांग्रेस के युवराज़ राहुल गाँधी ने उठाया कि आरएसएस वालें हमे मंदिर में प्रवेश नहीं करने दे रहे .अब ये सोचनीय विषय है कि इसका संसद से क्या लेना –देना ? और रही बात मंदिर जाने की तो मंदिर के तरफ आएं बयान में इसका खंडन किया गया है कि किसी के प्रवेश पर रोक लगाई गई हो.ठीक इसीप्रकार हेराल्ड के मसले पर संसद के दोनों सदनों में कांग्रेस ने खूब हंगामा किया जिससे संसद से कोई सरोकार ही नही था.लेकिन जबरन ऐसे छोटे –छोटे निराधार व मनगढंत मुद्दों पर विपक्ष संसद को बाधित करने का काम क्यों कर रहा है? दरअसल फिलवक्त में लगता यही है कि कांग्रेस कि एक सूत्रीय रणनीति है कि किसी भी कीमत पर संसद को चलने न दिया जाए. कांग्रेस हर एक मुद्दे पर नकारात्मक विपक्ष की भूमिका अदा कर रही है.जिसका खामियाजा उसे आने वाले चुनावों में भुगतना पड़ सकता है.देश में आज मुद्दों की कमी नहीं है.अगर कांग्रेस ये मान के चल रही है कि विरोध कर के मीडिया की हेडलाइन में रहेंगे और जनता से इसी माध्यम से जुड़ जायेंगे तो, ये कांग्रेस की विकृत मानसिकता का परिचायक है.अगर कांग्रेस जनता से जुड़ता चाहती है तो उसे  किसी भी मुद्दे पर वाजिब विरोध करना चाहिए जिससे जनता में उसके के प्रति सकारात्मकता का भाव पहुंचे और आपके विरोध को गंभीरता से ले, किंतु कांग्रेस उलुल –जुलूल मुद्दे के आधार पर हंगामा कर जनता से छल करने के साथ –साथ  हमारे लोकतंत्र का अपमान कांग्रेसी सांसद कर रहे हैं.देश की जनता भी बखूबी देख रही है कि हमारे द्वारा चुने गये प्रतिनिधि किस प्रकार से लोकतंत्र की धज्जियां उड़ा रहे हैं.देश में मुद्दों की कमी नहीं है,जो सीधे तौर पर आमजन से जुड़े हो मसलन किसान,गरीब ,महंगाई ये ऐसे मुद्दे है जिससे जनता सीधे तौर पर जुडी हुई है लेकिन अब ये सत्र भी समाप्त होने को है,ये सभी जो मुख्य मुद्दे होने चाहिए कांग्रेस के अड़ियल रवैये के कारण आज ये मुद्दे गौण है.विपक्ष का मुख्य कार्य होता है जनता के उस मुद्दे को उठाना जिस पर सरकार ध्यान नहीं दे रही हो परन्तु विपक्ष ने इन सब मुद्दों पर बात करना  मुनासिब नहीं समझा.सरकार भी किसान और महंगाई जैसे मुद्दों पर खामोश रही.आज देश के किसानों की हालात कितनी दयनीय है ये बात किसी से छुपी नहीं है.हम देख रहे हैं कि किसान हर रोज़ आत्महत्या कर रहे हैं,महंगाई चरम पर है.ऐसे जन सरोकारी मुद्दों पर हंगामा और चर्चा करने की बजाय विपक्ष ऐसे मुद्दों पर हंगामा कर रहा है जिसमें उसके राजनीतिक स्वार्थ छिपे हुए हैं.इस अलोकतांत्रिक शोर –शराबे के चलते कांग्रेस की छवि और धूमिल हुई है.विपक्ष किसानों की आत्महत्या और महंगाई का मुद्दा उठाता तो जनता का भी उसे समर्थन हासिल होता लेकिन कांग्रेस ने इन सब मुद्दों को भूनाने के बदले अपने पैरो पर खुद कुल्हाड़ी मार लिया है तथा ये साबित कर दिया कि हमारे निजी स्वार्थ से बढ़ कर कुछ नहीं है.

Monday, 21 December 2015

जश्न-ए- भ्रष्टाचार



        जश्न-ए- भ्रष्टाचार


सोनिया और राहुल को बेल मिल गई.कांग्रेसियों के जश्न को  देखकर  लग रहा कि सोनिया और राहुल को नोबेल मिल गया है.अगर नो –बेल मिलता तो स्थिति कुछ और होती.आज-तक आपने जन्मदिन का जश्न, शादी का जश्न और तमाम प्रकार के जश्न का नाम सुना होगा लेकिन कल एक नएं जश्न का जन्म हुआ.बताते है.कांग्रेस जश्न मना रही है मगर किसका ? मैंने एक कांग्रेसी मित्र से पूछा, दोस्त ये अचानक जश्न क्यों मना रहें हो. उसने बताया कि कांग्रेस अध्यक्ष और हमारे युवराज़ को हेराल्ड पर जमानत मिल गई है. मुझे अजीब लगा कि जमानत तो सबको मिल जाती है इस पर जश्न कैसा !जब अदालत ने फिर निमंत्रण दिया ही है,और मुद्दा भी भ्रष्टाचार का है.हमने भी बोल दिया मित्रवर ये जश्न भ्रष्टाचार का तो जश्न नही है फिर क्या था. चिढ बैठे हमारे ऊपर,फिर आगे की रणनीति पर बात होने लगी.उन्होंने कहा कि जैसा अध्यक्ष जी ने कहा है कि हम लड़ेंगे, डरेंगे नही.पूरी कांग्रेस सोनिया –राहुल के साथ खड़ी है. अब देखिये न अजीबोगरीब स्थिति है भ्रष्टाचार इन दोनों ने किया है लेकिन कांग्रेस में किसी को ये कहना उचित नही लग रहा कि “जैसी करनी वैसी भरनी” क्या कहा जा सकता है.अगर कांग्रेस में ओहदा चाहिए तो भक्त बनना ही पड़ेगा फजूल में लोग बीजेपी को बदनाम किये हुए है.अब इससे बड़ी भक्ति क्या होगी चोरी और ऊपर से सीनाजोरी.मीडिया से कह रहें है हम कानून का सम्मान करते है आम आदमी की तरह कोर्ट में पेश हुए.अब मुझे किसी रोज़ पटियाला हाउस कोर्ट जाना पड़ेगा.ये देखने कि रोज़ ऐसे ही मीडिया वहां जमी रहती और सुरक्षा कड़ी रहती  है क्या? फिर ध्यान आया कि पेशी के साथ –साथ  शक्तिप्रदर्शन भी था.बहुत दिनों से कांग्रेसी सड़क पर उतरे नही थे लेकिन हे! हेराल्ड धन्य हो तुम, सड़क पर ला दिए.दरअसल हमारें गावं  में बूढ़े- बुजुर्ग कहा करते है कि चोरी किये हो तो मुंह छिपा के चलों लेकिन  अपने सियासतदानों को देखकर उनकी बात गलत लगती. अब चलन उल्टा ही हो गया है.चोरी किये हो तो प्रेस कांफ्रेंस करो.विरोधी होते किस काम के लिए है.उनको भी बतावो उन्होंने क्या किया अर्थात हमने तो भ्रष्टाचार किया ही है, वो कौन से दूध के धुले है.छोड़ो भईया ये  राजनीति है सभी आपस में मिले है.चाचा नेहरु कभी सोचे नही होंगे कि हमारी ही विरासत एक दूसरे को खत्म करने पर तुल जायेंगे दरअसल ये बात इसलिए क्योकि सोनिया और उनके सुपुत्र राहुल भी उन्ही की विरासत है और हेराल्ड भी.अब दोनों में ठन गई है पहले इन्होने हेराल्ड को बंद किया अब खुदा-न खस्ता हेराल्ड पर स्वामी ने जो कर दिखाया है हेराल्ड आज छाती चौड़ी कर बोल रहा होगा हमारे दफ्तर में ताला लगवाया अब इनकी बारी है.आखिर समय सबका आता है. कुछ भी हो हमने तो पूछ दिया ये जश्न क्यों हो रहा अकबर रोड पर आप ना पूछियेगा क्योकि आपका भी भ्रष्टाचार उजागर हो सकता है.फिलहाल कांग्रेस को जश्न-ए-भ्रष्टाचार की बधाई.

Wednesday, 9 December 2015

पाकिस्तान को लेकर अपना रुख स्पष्ट करें मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पैरिस में हुई एक अनौपचारिक मुलाकात को लेकर अभी बहस चल ही रही थी कि इसी बीच रविवार को भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों ने थाईलैंड की राजधानी बैंकाक में मुलाकात किया.लगभग चार घंटें तक चली इस बैठक में आतंकवाद और जम्मू –कश्मीर सहित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई.भारत के एनएसए अजीत डोभाल और पाकिस्तान के एनएसए नसीर खान जंजुआ की मुलाकात के बाद एक संक्षिप्त साझा बयान जारी किया गया.जिसके मुताबिक चर्चा सौहार्दपूर्ण और रचनात्मक माहौल में हुई साथ ही रचनात्मक सम्पर्क को आगे बढ़ाने पर भी सहमती बनी.इस बैठक को संयुक्त राष्ट्र समेत कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने सराहा है.लेकिन भारत में इस वार्ता की कड़ी आलोचना हो रही है. .कांग्रेस ने इस बैठक को देश के साथ धोखा करार दिया है तो वही एनडीए में  शमिल शिवसेना और बीजेपी के वरिष्ठ नेता यसवंत सिन्हा ने भी इस मुलाकात पर सवाल उठाएं है.बहरहाल,आखिर पाकिस्तान से भारत सरकार को बातचीत की आवश्यकता क्यों पड़ी.ये समझ से परे है.अगर पाकिस्तान कुछ आतंक विरोधी कदम उठाये होतें या फिर सीजफायर के उल्लंघन पर रोक लगाया होता  तब वार्ता बहाल करना समझ में आता.परन्तु, भारत सरकार बातचीत को लेकर इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई यह एक यक्ष प्रश्न की तरह है.जब पिछली बार अगस्त में बातचीत बंद हुआ तब से लेकर तभी तक पाकिस्तान ने अपनी  नीति में कोई बदलाव नही है.आज भी पाकिस्तान झूठ बोलने से बाज़ नहीं आता.हमें आज भी संयुक्त राष्ट्र की सभा में नवाज शरीफ द्वारा दिया गया भाषण याद है जिसमें नवाज़ ने संयुक्त राष्ट्र को भ्रमित करतें हुए एनएसए स्तर की वार्ता विफल होनें का ठीकरा भारत से सर फोड़ा था.लेकिन हकीकत पूरी दुनिया को पता है, कि पाकिस्तान,आधिकारिक वार्ता से पहलें हुर्रियत नेताओं से बातचीत करना चाहता था.फलस्वरूप भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार करते हुए वार्ता को रदद् कर दिया था.भारत  उस वार्ता को रदद् करते हुए स्पष्ट संकेत दिया था कि,भारत अब किसी भी कीमत पर आतंक को बर्दास्त नहीं करेगा.नवाज शरीफ के इस सफेद झूठ के बाद भी  हमने सीख नही लिया.जो देश वैश्विक मंच पर भारत के ऊपर झूठे आरोप लगाता हो उस देश के आगे हम बार –बार दोस्ती का हाथ बढ़ाएं निश्चित ही ये हमारी निम्न स्तर की कूटनीति का परिचय हैं.भारत की नीति साफ रही है आतंकवाद और वार्ता एक साथ नहीं हो सकती लेकिन, आज सरकार इस नीति से समझौता कर रही है.जो आने वालें दिनों में घातक सिद्ध हो सकती है.गौरतलब है कि पाकिस्तान ऐसा देश है, जिसकी पहचान आतंक को बढ़ावा देने तथा आतंकियों को अपना हीरो मानने की रही है.ऐसे देश से हम उम्मीद लगायें की ये आतंकवाद पर चर्चा करेगा तथा आतंक के खात्मे के लिए हर संभव मदद करेगा तो ये बेमानी होगी.पाकिस्तान हमेसा से आतंकवाद का हिमायती रहा है.जिसके हजारों साक्ष्य दुनिया के सामने है.दरअसल जब भी भारत में आतंकवादी हमला होता उसमे पाक के नापाक मंसुबें दुनिया देखती है. लेकिन उस पीड़ा को सहते हम है.मोदी द्वारा दोस्ती का हाथ बढ़ाने और नवाज शरीफ का बीना शर्त बातचीत के बयान की दुनिया में भलें ही तारीफ हो रही है परन्तु हकीकत यही है कि पाक कायराना हरकत करने से बाज़ कभी नहीं आता .एक तरफ भारत-पाकिस्तान एनएसए की मुलाकात में सौहार्द बनाने की बात करने वाले पाकिस्तान की पोल चंद घंटो बाद ही खुल गई.जब कश्मीर में सीआरपीएफ के काफिले पर पाक परस्त आतंकियों ने हमला किया ,जिसमे हमारे 6 जवान घायल हो गये.ऐसा में हम कैसे मान लें कि पाकिस्तान अपने पोषित आतंकियों पर रोक लगाएगा.आतंक को लेकर भारत का रुख बिल्कुल स्पष्ट है.भारतीय प्रधानमंत्री आतंकवाद का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र से लगाए हर मंच से इसका विरोध करतें रहें है तथा आतंकवाद के खात्मे के लिए समूचे विश्व को एक साथ खड़े होने की बात करते रहें है.ऐसे में मोदी को ये सोचना होगा कि पाकिस्तान आतंकवाद जैसे मुद्दे पर भारत का साथ देगा? एनएसए स्तर की बातचीत से कुछ दिन पहले पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा था कि पाकिस्तान बीना शर्त के भारत से वार्ता करने को तैयार है.ये बात किसी से छिपी नही है कि पाक के कथनी और करनी में जमींन-आसमान का फर्क होता है .महज इस बयान को आधार मान कर अगर हम बातचीत शुरू किये है तो जगह बैंकाक क्यों ?प्रधानमंत्री दोनों देशों के बीच जमीं बर्फ पिघलाने के लिए इतनी उत्सुक थे तो, ये वार्ता नई दिल्ली या इस्लामाबाद में क्यों नही किया गया ? इसका मतलब सीधा है कि अगर ये बैठक दिल्ली में होती तो पाकिस्तान से अलगाववादी नेता रूठ जाते.पाकिस्तान ने चालाकी दिखाते हुए बैंकाक को बैठक के लिए उपयुक्त स्थान समझा.ये बात जगजाहिर है कि भारत सबसे ज्यादा पाकिस्तान में पोषित आतंकी संगठनों के निशाने पर रहा है.इसके लिए नवाज़ शरीफ ने अभी तक कोई बड़ा कदम नही उठाया है.ये सब मामलें सरकार के संज्ञान में है फिर भी अगर भारत सरकार पाकिस्तान के प्रति नरम रुख अपनाएगी तो इसके कोई दोराय नही कि पाकिस्तान के हौसलें में और मजबूती आएगी और पाक इन हरकतों पर लगाम नही लगाएगा.पाक को कड़े संदेश देने की जरूरत है लेकिन हम और नरम होतें जा रहें है.पाकिस्तान से हमने कई दफा दोस्ती के हाथ बढ़ा चुके है अगर नवाज शरीफ को संबंध को सुधारने की थोड़ी भी इच्छा रहती तो मोदी के शपथ ग्रहण समारोह के बाद सीजफायर और आतंकी वारदातों पर लगाम लगायें होते,लेकिन बार –बार भारत सरकार की कोशिश यही रही है कि पाक से संबंध सुधर जाएँ लेकिन पाकिस्तान ने कभी इस पर सकारात्मक सोच नही रखा.बहरहाल,इस मुलाकात के बाद दोनों देशों के बीच जमी बर्फ कितना पिघला है.ये तो आने वाला वक्त बतायेगा. परन्तु पाकिस्तान से जो संकेत मिल रहें है उससे पता चलता है कि न तो उसकी नियत बदली है और न नीति.दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की मुकालात के बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज दो दिवसीय यात्रा पर पाकिस्तान पहुंची है.इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य अफगानिस्तान पर हो रहें बहुपक्षीय सम्मेलन शिरकत करना है लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि सुषमा स्वराज, नवाज शरीफ से भी मिल सकती है.एनएसए की मुलाकात के बाद विदेश मंत्री की यात्रा दोनों देशों के संबंधो तथा बातचीत को नई उचांई मिल सकती है.हमारी भावना शुरू से यही रही है कि दोनों देश आपस में मिलकर रहें लेकिन पाकिस्तान की नीति और नियत दोनों में भारत के प्रति खोट रहा है.फिर भी हम रूठने –मानने की नीति पर चलते आ रहें है. अब समय आ गया है सरकार को एक स्थाई नीति के तहत पाकिस्तान से वार्ता करनी चाहिए.जिससे पाकिस्तान को कड़ा संदेश मिल सकें..


Monday, 2 November 2015

प्रतिभा पर आरक्षण भारी ( सामना, दैनिक जागरण,नेशनल दुनिया में प्रकाशित )

     आदर्श तिवारी -


आरक्षण पर बहस अभी चल ही रही थी कि सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश ने इसे और आगे बढ़ा दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने दुःख जताते हुए कहा कि उच्च शिक्षण संस्थाओं से सभी प्रकार के आरक्षणों को समाप्त कर देना चाहिएं.कोर्ट ने मंगलवार को आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में सुपर स्पेशयलिटी कोर्सेज को लेकर योग्यता मानको को चुनौती देने के संबंध में दायर याचिका पर सुनवाई  के दौरान ये बातें कहीं .सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को ये याद दिलाया कि देश को आज़ाद हुए 68 वर्ष हो गए,लेकिन वंचितों के लिए जो सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई थी,उनमें कोई बदलाव नहीं हुआ हैं.इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार को राष्ट्रहित को ध्यान में रखतें हुए इस संदर्भ में उपयुक्त कदम उठाने की बात कही है. न्यायधीश दीपक मिश्रा और न्यायधीश पीसी पंत की बेंच ने कहा कि सुपर स्पेशयलिटी कोर्सेज़ में चयन का प्रारम्भिक मापदंड मेरिट ही होनी चाहिएं. उनके मुताबिक मेरिट बनाने के लिए केंद्र
और राज्य सरकारों को कई बार स्मरण दिलाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है.कोर्ट ने आगे कहा कि मेरिट पर आरक्षण का आधिपत्य रहता है,अब समय आ गया है कि उच्च शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता में सुधार किया जाए, साथ ही मौजूद स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाकर देश के लोगो की मदद की जाए.मौजूदा परिस्थितियों पर गौर करें तो कोई भी राजनीतिक दल आरक्षण को समाप्त करने की बात तो दूर उसकी समीक्षा की बात कहने तक से हिचकिचाते है.ऐसे में आरक्षण खत्म करना दूर की कौड़ी है.आरक्षण को खत्म हरगिज़ नहीं किया जा सकता, वंचितों और समाज के सबसे पिछड़े पायदान पर रहने पर रहने वाले गरीब लोगो को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण सहायक है.लेकिन,ये भी सही है कि आज आरक्षण का इस्तेमाल वैसाखी के रूप  से हो रहा है.असल में जिन दलित,अल्पसंख्यक या अन्य वंचित जातियों को आरक्षण की जरूरत है,उन्हें ये लाभ अभी तक नहीं मिल पा रहा है.जिसके जिम्मेदार हमारे राजनेता है.हमारे राजनीतिक दलों ने आरक्षण के नाम पर समाज को पहले विभाजित किया फिर आरक्षण के बहाने खूब सियासत साधने का काम हमारे हुक्मरानों ने किया और अब भी कर रहे हैं. इनके इस रवैये से देश में व्यापक बहस जो आरक्षण को लेकर होनी चाहिएं थी वो आज तक नही हुई.नतीजन आज आरक्षण के लिए कुछ समुदाय हिंसा पर भी उतारू हो चलें हैं.इस पर भी सरकारें मौन रहती है..बहरहाल,जब आरक्षण को लागू करने के बात आई थी तब संविधान सभा के अध्यक्ष डा.अम्बेडकर ने कहा था कि हर दस साल के बाद सरकार इसकी समीक्षा करेगी कि जिनको आरक्षण दिया जा रहा है उनकी स्थिति में कुछ सुधार हुआ या  नहीं? उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि यदि किसी वर्ग का विकास हो जाता है तो उसके आगे की पीढ़ी को इस व्यवस्था से वंचित रखा जाए.इस समीक्षा का मतलब ये था कि जिन उद्देश्यों के लिए आरक्षण को प्रारम्भ किया गया है.वो कितनी कारगर साबित हुई है.लेकिन आज तक किसी राजनीतिक दल में इतनी शक्ति नहीं हुई की आरक्षण की समीक्षा करवा सकें. गौरतलब है कि पिछले माह आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने अपने एक बयान में कहा था कि आरक्षण का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हो रहा है तथा इस बात की समीक्षा करने की जरूरत है कि आरक्षण की जरूरत किसे और कब तक है. पूरे राजनीतिक गलियारे में संघ प्रमुख के इस बयान का पुरजोर विरोध हुआ था. सनद रहें कि समीक्षा का मतलब आरक्षण खत्म करना नही होता. इसका मतलब केवल इतना ही है कि आरक्षण का लाभ गरीब व पिछड़ो तथा जो इसके लाभार्थी है उन तक पहुँचाना है.आरएसएस और बीजेपी का रिश्ता जगजाहिर है.इसके बावजूद सत्तारूढ़ बीजेपी ने भी संघ प्रमुख के इस बयान से अपने को अलग रखते हुए सरकार की तरफ से बकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर के कहा कि आरक्षण को लेकर जो व्यवस्था चली आ रही है,भारत सरकार उसके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं करेगी अर्थात जैसे सबको आरक्षण मिल रहा उसी अनुसार मिलता रहेगा रहेगा.अब देखने वाली बात होगी की सुप्रीम कोर्ट के इस टिप्पणी को सरकार कितने गंभीरता से लेती है.बहरहाल,वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा में आरक्षण को लेकर जो चिंता जताई है इस पर सरकार को विचार करना होगा.आरक्षण खत्म करना समाज के वंचित वर्ग के साथ बेमानी होगी परन्तु अब समय आ गया कि सरकार आरक्षण की समीक्षा करें एवं इसके मानको में बदलाव करें क्योंकि आज हमारे देश के युवाओं के पास योग्यता की कमी नही है.आज के छात्र प्रतिभा के धनी है.लेकिन आरक्षण के आगे उनकी प्रतिभा तथा उनकी योग्यता धरी की धरी रह जाती है.अब सवाल ये उठता है कि क्या योग्यता पर आरक्षण भारी भर रहा है ?इस सवाल की तह में जाएँ तो इसके कोई दो राय नहीं कि आरक्षण योग्यता की तौहीन कर आगे निकल जा रहा है.आज 10 से 15 फीसदी अंक पाने वाले छात्रों को प्रवेश मिल जाता है किंतु वही अपनी मेहनत और लगन से अध्ययन करने वाले छात्रों को आरक्षण की मार झेलनी पडती है अर्थात उसे दाखिला नही मिलता है.आरक्षण की नीति में खोट के कारण छात्रों को कितने दिक्कतों का सामना करना पड़ता है,क्या किसी राजनीतिक दल ने वोट बैंक से  इतर इस बात को कभी सोचा है ? किसी राजनीतिक दल ने आरक्षण की इस खोट को दूर करने का प्रयास किया है ?आज स्थिति ये है कि कम अंक पाने वालें छात्र आरक्षण के सहारे चिकित्सक बन जातें है और योग्य छात्र हाथ मलते रह जाते हैं. अब आप खुद कल्पना कर सकतें है कि जो महज 5 फीसदी अंक पाकर चिकित्सक बन रहें है.वो किसी मरीज के लिए लाभकारी कैसे होंगे? ये बात किसी से छिपी नही है कि उच्च संस्थानों में आरक्षण से सीट हासिल करने वालें छात्रों का प्रदर्शन बहुत अच्छा नही रहता.इसी में मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणी किया है.एक बात तो स्पष्ट है कि आरक्षण में सुधार की दरकार है.अगर हम सुधार की बात करें तो हमारे पास आरक्षण के खोट को दूर करनें के कई उपाय है.मसनल सरकार आरक्षण को आर्थिक रूप से लागू करती है तो इसके अनेकानेक लाभ है.गरीब हर वर्ग के लोग है.चाहें वो दलित हो या सवर्ण अगर सभी को आर्थिक आधार मान कर आरक्षण दिया जाएँ तो सभी तबके के गरीब लोगो को इससे मदद मिलेगी और आरक्षण उनके विकास में सहायक सिद्ध होगा.हमारी गरीबी को लेकर जो लड़ाई है उसमें आरक्षण मिर का पत्थर साबित हो सकता है तथा तक जहाँ शिक्षा में आरक्षण का सवाल है, उच्च शिक्षण संस्थानों में चयन सिर्फ मेरिट के आधार पर होनी चाहिए जिससे छात्रो के प्रतिभा को सम्मान मिल सकें उनके उस परिश्रम का लाभ उन्हें प्राप्त हो सकें.इन सब के बीच एक सवाल बना हुआ है कि क्या सरकार आरक्षण की  समीक्षा करने की हिम्मत दिखाएगी ?

Monday, 26 October 2015

दलहन पर आत्मनिर्भर बनें भारत

                     
एक कहावत है कि दाल –रोटी से ही गुज़ारा हो रहा है.लेकिन अब ये कहावत  कहने में भी लोग डरने लगें हैं,दालों के दाम आसमान छू रहे है.खास कर तुवर जिसे हम अरहर की दाल भी कहतें है.गत एक वर्षो में अरहर की दाल की कीमतों में बेतहासा वृद्धि हुई है.पिछले साल अरहर  के दाल की कीमत महज 70 रूपये किलों थी.लेकिन अब इसके दाम दोगुने से भी अधिक हो गए है.आज अरहर की दाल 200 रूपये के करीब पहुंच गई है.जिसके कारण गरीब और माध्यम वर्ग परिवार की थालियों से दाल गायब होती जा रही है.दाल आवश्यक प्रोटीन उपलब्ध करती है,जाहिर है कि आम जनमानस दाल का इस्तेमाल संतुलित आहार के लिए करता है.अन्य दालों की अपेक्षा अरहर की दाल में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है.इसके महंगे होने से न केवल थाली से दाल गायब है.वरन हम ये कह सकतें है कि आज गरीब तथा माध्यम वर्ग की थाली से पोषण गायब हो रहा है.इस साल बेमौसम बारिश और मानसून में आई कमी के कारण किसानों के फसल बर्बाद हो गए है.मौसम विभाग ने पहले ही इस बात की पुष्टि कर दिया था कि फसल के बर्बाद होने से खास कर दलहन और सब्जियों के उत्पाद में भारी कमी आएगी.गौरतलब है कि दालों की उत्पाद में पहले की तुलना में औसतन वृद्धि दर्ज की गई.दलहन का उपयोग दिन –ब दिन बढ़ता गया लेकिन उत्पाद में कोई भारी अंतर देखने को नही मिला.जिससे ये विषम परिस्थिति उत्पन्न हुई है.1960 -1961 में दालों की पैदावार 130 लाख टन थी,उस समय के उपयोग अनुसार ये उत्पाद पर्याप्त थे और तब दाल सबको आसानी से उपलब्ध हो जाती थी.लेकिन आज पांच दशक के बाद भी हम दालों के उत्पाद को औसतन उपयोग के आधार पर बढ़ाने में विफल रहें है. 2007 -08 के दौरान दालों के उत्पाद में पहले की तुलना में थोड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी.2007 में देश में दाल का उत्पाद लगभग 148 लाख टन हुआ था.जो 2013-14 में बढकर 198 लाख टन पहुँच गया.लेकिन 2014 -15 में दाल की उत्पाद में भारी गिरावट देखने को मिली.खरीफ फसल के दौरान कम हुई बारिश का असर दालों की उत्पाद को सीधे तौर पर प्रभावित किया.जिससे उत्पादन घट कर 174 लाख टन ही रह गया.इस साल सरकार ने दाल उत्पादन का लक्ष्य 200 लाख टन रखा था,लेकिन नतीजा आज हमारे सामने है.कृषि मंत्रालय की एक रिपोर्ट में मुताबिक इस साल दाल का उत्पादन लगभग 182 -185 लाख टन रह सकता है.भारत में दाल की खपत, उत्पादन के मुकाबले कहीं ज्यादा है.जिससे हर साल भारत को दाल का आयात विदेशों से करना पड़ता है.भारत में दाल की खपत 220 से 230 लाख टन सालाना है.जिसके कारण हर वर्ष तकरीबन 30 लाख टन दालों का आयात करना पड़ता है.लेकिन इस साल आयात के सभी आकड़ो को पीछे छोड़ते हुए सरकार अभी तक 46 लाख टन दाल का आयात कर लिया है.अभी आयात की मात्रा में बढ़ोतरी के लिए भी सरकार तैयार बैठी है.पिछले कुछ समय से हम देखतें आ रहें है कि जब भी किसी वस्तु की कमी से उसकी महंगाई बढ़ती है तो सरकार कोई दीर्घकालीन उपाय करने के बजाय सीधे तौर पर उसके आयात को बढ़ा देती है और जैसे –तैसे उसके बढ़ी कीमतों पर काबू पा जाती है.जिसके फलस्वरूप हम उसके अन्य उपाय ढूढ़ने के बजाय आयात पर ही निर्भर हो जातें है.बहरहाल,जब आयात होने के बाद हमारे पास दाल की उपलब्धता हमारे जरूरत के हिसाब से हो गई तब भी दाल के दाम आसमान क्यों छू रहें है ?अगर बढ़े दामों के कारणों की तलाश करें तो कई बातें हमारे सामने आती है.पहला कालाबाजारी और जमाखोरी ये एक ऐसा कारण है जिसका हल अभी तक किसी भी सरकार ने नहीं निकाला.किसी की भी सरकार हो जमाखोरो की बल्ले-बल्ले ही रही.जब भी हमारे रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम बढ़ते है तो सरकार जमाखोरी और कालाबाजारी का हवाला देकर अपनी पीठ थपथपा लेती है तथा अपनी जवाबदेही को यही तक सीमित कर देती है.बहरहाल,इन सब के बीच खबर आ रही है कि केंद्र के साथ कई राज्यों की सरकारों ने अधिकतम स्टाक सीमा फिक्स कर जगह –जगह जमाखोरों के यहाँ छापेमारी की कार्यवाही शुरू कर दी है.सरकारों के इस सक्रियता के परिणामस्वरूप 13 राज्यों में 6,077 जगहों पर छापेमारी के दौरान अभी तक 75,000 टन के करीब  दाल जब्त की गई है.जिसमें महाराष्ट्र सरकार ने सबसे ज्यादा 46,397 टन दाल जमाखोरों से जब्त किया गया है.अब ये क़यास लगाएं जा रहें है कि आने वाले कुछ ही दिनों बाद दाल के दामों में कमी देखने को मिल सकती है.इसके लिए इन सभी राज्य एवं केंद्र सरकार की सराहना करनी चाहिएं लेकिन सवाल ये खड़ा होता है कि जब केंद्र तथा राज्य दोनों सरकारों को मालूम था कि दालों के कम उत्पाद होने से जमाखोरों एव बिचौलियों की नजर दाल पर है तो कार्यवाही करने में इतनी देरी क्यों ?अगर सरकारें यही छापेमारी कुछ माह पहले ही कर देतीं तो आज दालों के दाम स्थिर रहतें.जनता को प्याज के बाद दाल की महंगाई की से तो कम से कम बचाया जा सकता था.लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया.सरकार के इस सुस्त रवैये के कारण दाल की आयात भी बढ़ाना पड़ा इसके साथ ही जनता को महंगाई की दोहरी मार भी झेलनी पड़ी.दूसरा सवाल ये कि सरकार दलहन के लिए कोई ठोस योजना क्यों नही बना रही ?सरकार को चाहिएं कि देश में ही दालों की पैदावार बढ़ाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करें.जिस प्रकार आज हम गेहूं और चावल में आत्मनिर्भर हुए है,ठीक उसी प्रकार हमें दलहन पर भी आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता है.इसके लिए सरकार की ये जिम्मेदारी बनाती है कि किसानों को दलहन के अच्छे किस्म के बीज,सस्ती कीटनाशक दवाइयों  का प्रबंध करें.जिससे किसानों को प्रोत्साहन मिलें और दलहन के लिए किसान  अन्य फसलों के साथ –साथ इसका रकबा भी बढ़ाएं.मगर इसके लिए जरूरी है कि सरकार पहले किसानों के फसल बर्बाद होने पर उचित मुआवज़ा तथा पैदावार की सही लागत मूल्य देने की घोषणा करें.

Sunday, 18 October 2015

लोकतांत्रिक स्तंभों में टकराव

  


सुप्रीम कोर्ट नेशुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए सरकार द्वारा गठित राष्ट्रीय न्यायिक न्युक्ति आयोग को असंवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया है तथा इससे संबंधित अधिनियम को भी रदद् कर दिया.केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की न्युक्ति और तबादले के लिए राष्ट्रीय न्यायिक न्युक्ति आयोग एक्ट का गठन किया था.जिसके अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ जज,केंद्रीय कानून मंत्री तथा दो हस्तियों को शामिल किया गया था,लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने इसे संविधान की अवधारणा के खिलाफ बताते हुए खारिज़ कर दिया है.सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस संशोधन  से संविधान के मूल ढांचे का उलंघन होता,इसके साथ ही उच्चतम न्यायलय ने एनजेएसी को लाने के लिए 99वें संशोधन को भी निरस्त कर दिया है.सुप्रीम कोर्ट ने ये स्पष्ट किया है कि, जजों की न्युक्ति पुराने काँलेजियम प्रणाली के तहत ही होगी.हलाँकि कोर्ट के इस फैसले से सरकार को करारा झटका लगा है,टेलिकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इस फैसले को संसदीय संप्रभुता के लिए झटका करार दिया है.गौरतलब है कि संविधान समीक्षा आयोग,प्रशासनिक सुधार आयोग और संसदीय स्थाई समितियों ने अपनी तीन रिपोर्ट्स में ऐसे कानून की सिफारिश की थी.जिसको सरकार संज्ञान में लेते हुए एनजेएसी को ससंद के दोनों सदनों से पारित करवाया था.सरकार को ये विश्वास था कि न्युक्ति आयोग के आने से न्यायधीशों की न्युक्तियों में कॉलेजियम प्रणाली की अपेक्षा ज्यादा पारदर्शिता रहेगी लेकिन कोर्ट ने इसे दरकिनार कर दिया है.अब सवाल ये उठता है कि एनजेएसी पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर क्यों नहीं लगाई ? अगर सवाल की तह में जाएं तो कई बातें सामने आती हैं,प्रथम दृष्टया एनजेएसी  में बतौर सदस्य केंदीय कानून मंत्री को शामिल किया गया है.जिससे कोर्ट को डर था कि इसके चलते न्यायपालिका पर सरकार का सीधा हस्तक्षेप हो जायेगा और सरकारें अपने राजनीतिक फायदे के लिए इसका इस्तेमाल कर सकती है.जो भारतीय न्याय व्यवस्था के विरुद्ध है,इस कारण न्यायपालिका का वजूद भी खतरे में पड़ सकता था.जाहिर है कि कोर्ट के पास सरकार के खिलाफ सबसे ज्यादा मुकदमें है, मसलन कोल ब्लॉक में हुई धांधली,2जी समेत ऐसे कई बड़े मामले अभी तक कोर्ट में चल रहें है.जिसका निस्तारण कोर्ट को ही करना है,इस अवस्था में कार्यपालिका का न्यायपालिका में दखल तर्कसंगत नहीं होता.कहीं न कहीं इन मामलों पर सरकार का हस्तक्षेप जरुर देखने को मिलता साथ ही आयोग की निष्पक्षता भी खतरे में रहती.दूसरा ये कि इस आयोग में दो हस्तियों को सरकार ने शामिल करने की बात की है परन्तु ,उनकी योग्यता को लेकर कोई पैमाना सरकार ने नही बताया है और ना ही वो व्यक्ति किस क्षेत्र से रहेंगे इस मसलें पर भी सरकार का रवैया संदिग्ध नजर आता है.ये दो मुख्य कारण है,जिसको ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये एतिहासिक फैसला सुनाया.ऐसा नही है कि काँलेजियम प्रणाली में खामियां नहीं है,कोर्ट ने खुद स्वीकार किया है कि तीन नवंबर को कॉलेजियम प्रणाली में सुधार में मुद्दे पर सुनवाई करेगा.1993 में जब इस प्रणाली को लागू किया गया था तो, इसका उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में न्यायधीशों की न्युक्तियों पर कार्यपालिका के बढ़ते दखल को रोकना था तथा न्यायपालिका की स्वत्रंता को बरकार रखना था,सुप्रीम कोर्ट शुरू से ही इस बात का हिमायती रहा है कि जजों की न्युक्ति न्यायपालिका का आंतरिक मामला है.इसमें सरकार की कोई भूमिका नही रहनी चाहिएं.इसमें उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायधीश और सुप्रीम कोर्ट के चार अन्य वरिष्ठ न्यायधीश, जजों की न्युक्ति व स्थानांतरण की सिफारिश करतें है लेकिन इस प्रणाली में पारदर्शिता का आभाव देखने को मिलता रहा है.बंद कमरों में जजों की न्युक्ति की जाती रही है.व्यक्तिगत और प्रोफेसनल प्रोफाइल जांचने की कोई नियामक आज तक तय नहीं हो पाया है.जिसके चलतें इसके पारदर्शिता को लेकर हमेसा से सवाल उठतें रहें है.कुछ लोगो ने तो कॉलेजियम प्रणाली पर आपत्ति जताते हुए भाई –भतीजावाद एवं अपने चहेतों को न्युक्ति देने का आरोप भी लगाया.जो हमें आएं दिन खबरों के माध्यम से देखने को मिलता है.बहरहाल,कॉलेजियम बनाम एनजेएसी के विवाद में सबसे ज्यादा दिक्कत आम जनमानस को हो रही है.देश की अदालतों में लगभग 3,07,05,153 केस आज भी लंबित पड़े है.देश के कोर्ट कचहरियों में फाइलों की संख्या बढ़ती जा रही है,लंबित मुकदमों की फेहरिस्त हर रोज़ बढ़ती जा रही है.आदालतों में भ्रष्टाचार के मामलें आए दिन सामने आ रहें है .फिर भी हमारे लिए गौरव की बात है कि आज भी आमजन का विश्वास न्यायपालिका पर बना हुआ है.अगर उसे शासन से न्याय की उम्मीद नही बचती तब वो न्यायपालिका ने शरण में जाता है.ताकि उसे उसका हक अथवा न्याय मिल सकें.लेकिन न्यायपालिका की सुस्त कार्यशैली एवं इसमें बढ़ते भ्रष्टाचार आदालतों की छवि को धूमिल कर रहें.जिसे बचाने की चुनौती कोर्ट के सामने है.ग्रामीण क्षेत्रों में आलम ये है कि लोग कोर्ट -कचहरी के नाम पर ही सर पकड़ लेते है, इसका मतलब ये नही कि उनको कोर्ट या न्यायपालिका से भरोसा उठ गया है,वरन जिस प्रकार से वहां की कार्यवाही और न्यायालय की जो सुस्त प्रणाली है,इससे भी लोगो को काफी दिक्कतों का सामना करता पड़ता है.जो अपने आप में न्यायालय की कार्यशैली पर सवालियां निशान लगाता है.सवाल ये कि क्या महज़ जजों की न्युक्ति का रास्ता साफ होने से ये समस्याएं समाप्त हो जाएँगी ?न्याय की अवधारणा है कि जनता को न्याय सुलभ और त्वरित मिलें.परन्तुं आज आमजन को इंसाफ पाने में एड़ियाँ घिस जा रही,पीढियां खप जा रही है.माननीय कोर्ट को इस पर भी विचार करने की आवश्यता है.जिससे लोगो को न्यायपालिका में प्रति सम्मान बना रहें. इस फैसले के आने के बाद अब लगभग 400 जजों की न्युक्ति का रास्ता साफ हो गया है.अब देखने वाली बात होगी कि आगामी तीन नवंबर को सुप्रीम कोर्ट इस प्रणाली में इन सब सुधारों के साथ त्वरित न्याय दिलाने के लिए क्या कदम उठाता है.कोर्ट के इस फैसलें के आतें ही न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव होने की स्तिथि नजर आ रही है.खबर आ रही है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसलें पर पुनर्विचार के लिए बड़ी बेंच जा सकती है तथा एनजेएसी के गठन संबंधी कानून में संशोधन के लिए विधेयक लाने पर भी विचार कर रही है .लेकिन सरकार को उन बातों पर भी गौर करना चाहिए,जिसके कारण कोर्ट ने इस विधेयक को निरस्त किया है.सरकार का तर्क है कि कॉलेजियम प्रणाली में खामियां है,परन्तु सरकार को ये भी जानना चाहिएं कि माननीय कोर्ट ने उन कमियों को दूर करने की बात की है.फिर भी अगर आगे न्यायपालिका और सरकार का गतिरोध बढ़ता है तो, ये भारत के लोकतंत्र के लिए अच्छा नही होगा

Sunday, 4 October 2015

कश्मीर पर बेनक़ाब होता पाकिस्तान


संयुक्त राष्ट्र के मंच से भारत ने पाकिस्तान को एक मर्तबा फिर करारा जवाब दिया है.विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा को संबोधित करतें हुए पाकिस्तान को कड़े शब्दों में जवाब देते हुए कहा कि वार्ता और आतंकवाद दोनों एक साथ नहीं चल सकतें.जाहिर है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से कश्मीर का मसला उठाया था तथा भारत से बातचीत बहाल करने के लिए चार सूत्रीय प्रस्ताव रखा था.भारत ने इन सभी प्रस्ताओं को ठुकरा दिया.भारत, पाकिस्तान के दोहरे चरित्र से अब तंग आ चुका है.संयुक्त राष्ट्र सभा में कश्मीर राग अलापने वालें पाकिस्तान को भारत ने उसी की भाषा में जवाब दिया है.नवाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र को भ्रमित करतें हुए एनएसए स्तर की वार्ता विफल होनें के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया था लेकिन हकीकत पूरी दुनिया को पता है कि पाकिस्तान,आधिकारिक वार्ता से पहलें हुर्रियत नेताओं से बातचीत करना चाहता था.फलस्वरूप भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार करते हुए वार्ता को रदद् कर दिया था.भारत द्वारा उस वार्ता को रदद् करते हुए स्पष्ट संकेत दिया था कि भारत अब किसी भी कीमत पर आतंक को बर्दास्त नहीं करेगा.अगर पाकिस्तान, भारत से बातचीत बहाल करना चाहता है तो, उसे आतंक, सीजफायर जैसी ओछी हरकतों पर विराम लगाना होगा.मोदी ने अपने शपथ ग्रहण कार्यक्रम में सभी पड़ोसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को बुलाकर अपनी मधुर व्यवहार का परिचय दे दिया था.फिर भी पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आया है.अभी हालहि में भारत ने एक पाकिस्तानी आतंकवादी को जिंदा पकड़ा है.जो नवाज शरीफ के आतंक विरोधी सभी दावों की पोल खोल रहा,दुनिया के सामने आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान फिर से बेनकाब हुआ है.बहरहाल इनदिनों पाक अधिकृत कश्मीर से खबरें आ रही है कि वहां के लोग पाकिस्तान सरकार के नीतियों से खुश नहीं है.वहां की आम जनता पाकिस्तान सरकार और सेना के विरोध में सड़क पर उतर आई है.दरअसल एक और आबादी पाकिस्तान से मुक्ति चाहती है,जो उसके दमन और उत्पीड़न से तंग आ गई है.यहाँ तक कि लोग न केवल सरकार के विरुद्ध में नारें लगा रहें बल्कि गुलाम कश्मीर में लोग चीख –चीख कर भारत में शामिल होने की मांग कर रहें है.पाक परस्त कश्मीर से एक वीडियो सार्वजनिक हुआ है.जिसमें पाकिस्तानी फौजं और हुकूमत की ज्यादतियां सामने आई है,तस्वीरों से ये साफ हो गया है कि ये मासूम इंसान कैसे पाक सेना की बर्बरता को झेल रहें है.हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इस वीडियो को फर्जी बता रही है.जो मुल्क अपने सैनिकों को स्वीकारने से इनकार कर दें उससे वीडियो स्वीकारने की बात करना बेमानी होगी.गौरतलब है कि गिलगिट, बालिस्टान में पाकिस्तानी सेना किस प्रकार से जुल्म कर रही है.ये लोग पाक गुलामी से आज़ादी चाहतें है,लेकिन वहां की सेना ने उनका जीना मुहाल कर रखा है.दुनिया के सामने पाकिस्तान कश्मीर के लिए घड़ियाली आंसू बहाता है,लेकिन अब पाक अधिकृत कश्मीर का सच विश्व के सामने आने लगा है.बहरहाल,सवाल ये उठता है कि पाकिस्तान भारत अधिकृत कश्मीर की मांग करता है,लेकिन जो उसके अधिकार में है वहां ऐसे हालात,ऐसी बर्बरता क्यों ?सवाल की तह में जाएं तो कई बातें सामने आतीं है,पहली बात पाकिस्तान इन लोगो के साथ हमेशा गुलामों की तरह बर्ताव करता रहा है तथा राजनीतिक वस्तु की तरह इस्तेमाल कर रहा है.नतीजन वहां रत्ती भर विकास नहीं हुआ है.अब लोग इससे त्रस्त आ चुंके है,इसी साल गिलगिट –बालटिस्तान में हुए चुनाव में लोकतंत्र की धज्जियां उडातें हुए पाकिस्तान सरकार ने यहाँ असंवैधानिक रूप से मतदान कराया, यहाँ तक कि महिलाओं को मतदान नहीं करने दिया गया.वहीँ हमारे कश्मीर में लोकतंत्र है,लोगो को अपने पसंद के प्रत्यासी को वोट देने की पूरी स्वंत्रता रहती है.लोगो को धार्मिक ,समाजिक हर प्रकार की स्वत्रंता हमारे संविधान ने दे रखीं है,हमारें यहाँ सिस्टम है,नियम है,सरकार की नीतियाँ है जो भारतीय कश्मीर के विकास के लिए समर्पित है.आज हमारे कश्मीर में सरकार निवेश करती है, अच्छे –अच्छे संस्थान है. शिक्षा ,पर्यटन आदि के क्षेत्रों में हमारा कश्मीर विकास की ओर अग्रसर है.जो पाक कश्मीर के लोगों को लुभा रहीं हैं.वहीँ दूसरी तरफ पीओके की हालत दयनीय है.इस्लामाबाद में रहने वालें अधिकारी इन्हें उपेक्षित नजरों से देखते है,सरकार इनकी हर मांग को दरकिनार कर देती है.बहरहाल ,दूसरी बात पर गौर करें तो पाक अधिकृत कश्मीर में भारी तादाद में शिया मुसलमान रहतें है,जो बाकी पाकिस्तान में शिया मस्जिदों पर लगातार हो रहें हमलों से डरे हुए है,खेती –बाड़ी, पर्यटन,औधोगिक विकास आदि में मसले में पाक अधिकृत कश्मीर सुरु से ही पिछड़ा रहा है.आज़ादी के बाद से ही पीओके पाकिस्तान का सबसे गरीब और उपेक्षित हिस्सा रहा है,सरकारें बदली,सत्ताधीश बदलें लेकिन किसी ने भी इनकी समस्याओं को दूर करना ,इस क्षेत्र का विकास करना वाजिब नहीं समझा.वहीँ हमारें कश्मीर के विकास में सभी सरकारों ने महती भूमिका निभाई है.हमारी सरकार ने श्रीनगर से रेलवे की सुविधा वहां के नागरिकों के लिए सुरु कर दी है ,तो वहीँ पाक अधिकृत कश्मीर में लोग सड़कों के लिए तरस रहें.इन्ही सब कारणों से तंग आकर आज ये स्थिति पैदा हो गई कि,ये लोग आज़ादी की मांग करने लगे.इन लोगो पर पाकिस्तान सरकार और सेना बेरहमी से पेश आ रही है,फिर भी ये आज़ादी का नाराबुलंद किये हुए है.सम्भवतः यह पहली बार हुआ है जब पाकिस्तान में पाकिस्तान विरोधी नारें लगे है,वो भी भारत के पक्ष में, भारत को चाहिए कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की जो खबरें है तथा वहां के आवाम की जो आवाज़ है.उसे एक रणनीति के तहत दुनिया के सामने रखें ताकि पाकिस्तान जो हमेशा भारत पर संघर्ष विराम उलंघन का झूठे आरोप लगाता है तथा कश्मीर पर जनमत संग्रह की बात करता है,उसका ये दोहरा चरित्र दुनिया के सामने आ सकें.इसके साथ ही ये आंदोलन उनके लिए भी सबक है जो, आएं दिन भारत में पाकिस्तान के झंडे लहराते हैं.पाक अधिकृत कश्मीर की हालत पाकिस्तानी हुकूमत के नियंत्रण से बाहर है.अत: इससे यही प्रतीत होता है कि इसको स्वतंत्र किये जाने की मांग जो भारत करता रहा है,वो जायज है.इस पर विश्व समुदाय एवं संयुक्त राष्ट्र को भी गंभीरता से विचार करना होगा.भारत सरकार को चाहिएं कि संयुक्त राष्ट्र का ध्यान पाक अधिकृत कश्मीर की तरफ आकृष्ट करें.जिससे नवाज शरीफ का कश्मीर के प्रति जो ढोंग है,उसे दुनिया देख सकें.इस मामले के प्रकाश में आने के बाद भारत अधिकृत कश्मीर पर बात करने के लिए अब पाकिस्तान अपना नैतिक बल भी गावां चुका है.   


Thursday, 1 October 2015

डिजिटल इंडिया को लेकर सरकार गंभीर

   



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी महत्वकांक्षी योजना डिजिटल इंडिया को साकार करने के लिए सिलिकाँन वैली में तकनीक क्षेत्र की सभी दिग्गज कंपनियों के प्रमुखों से मुलाकात की.प्रधानमंत्री मोदी ने डिजिटल इंडिया के उद्दश्यों व लक्ष्यों के बारें इन सभी को बताया.तकनीक जगत सभी शीर्षस्थ कंपनियां मसलन गूगल,माइक्रोसॉफ्ट तथा एप्पल के सीईओ ने भारत सरकार की इस योजना का स्वागत करते हुए, भारत में निवेश को लेकर अपने –अपने प्लानों के दुनिया के सामने रखतें हुए भारत को भविष्य की महाशक्ति बताया है. इन सभी कंपनियों को बखूबी मालूम है कि भारत आज सभी क्षेत्रों  नए- नए आयाम गढ़ रहा है. इसको ध्यान में रखतें हुए गूगल के सीईओ सुंदर पिचई ने भारत के 500 रेलवे स्टेशनों को वाई -फाई से लैस करवाने के साथ 8 भारतीय भाषाओं में इंटरनेट की सुविधा देने की घोषणा की तो वहीँ माइक्रोसॉफ्ट ने भी भारत में जल्द ही पांच लाख गावों को कम लागत में ब्रोडबैंड तकनीकी पहुँचाने की बात कही है.इस प्रकार सभी कंपनियों के सीईओ ने भारत को डिजिटल बनाने के लिए हर संभव मदद के साथ इस अभियान के लिए प्रधानमंत्री मोदी से कंधा से कंधा मिलाकर चलने की बात कर रहें है. वहीँ दूसरी तरफ  विश्व की सबसे बड़ी सोशल साइट्स फसबुक के सीईओ मार्क जुकरवर्ग ने तो प्रधानमंत्री के इस योजना के लिए एक विशेष प्रकार की फोटो को सबके सामने प्रस्तुत किया जो भारत के तिरंगे के जैसी है ,जैसे ही मार्क ने इसको अपने फेसबुक वाल पर लगाया, कुछ ही समय बाद ऐसा लग रहा था ,मानों आज कोई राष्ट्रीय पर्व है.हर तरफ तिरंगा की रंग के फोटो से फेसबुक सराबोर हो गया.फेसबुक के इस प्रयोग से डिजिटल इंडिया कहीं न कहीं जन –जन तक पहुंचा और लोगो ने इसके प्रति सकारात्मक रवैया अख्तियार किया.इन कंपनियों के द्वारा किये गये घोषणा से कुछ बडा बदलाव देखने को मिल सकता है.उल्लेखनीय है कि गूगल ने 500 रेलवे स्टेशनों को फ्री में वाई –फाई की सुविधा देने की बात की है. इस पर सरकार को भी इसके सदुपयोग के लिए एक मैप तैयार करना चाहिएं जिससे इसका ज्यादा से ज्यादा लाभ यात्रियों को मिल सकें. इसके लिए सरकार को चाहिएं कि रेलवे के साधारण टिकट की ऑनलाइन बिक्री शुरू कर दे, जिससे यात्रियों को लंबें समय तक कतार में खड़े रहने की समस्या से निजात मिल सकेगा तथा समय की बचत होगी.इस प्रकार कई छोटी –छोटी खामियां रेलवें के अंदर है,अगर सरकार इस पर गौर करें तो इंटरनेट के माध्यम से जोड़कर इसका निवारण आसानी से कर सकती है.इसके बाद माइक्रोसॉफ्ट का योगदान भारत के ग्रामीण जीवन में कई  प्रकार के बदलाव ला सकता है.5 लाख गावं को ई –गावं बनाने की माइक्रोसॉफ्ट की योजना ग्रामीणों के लिए नई दिशा एवं दशा प्रदान कर सकती है.ये हकीकत है कि, आज भी गावों में इंटरनेट की व्यवस्था नदारद है.अगर किसी क्षेत्र में इंटरनेट है भी, तो उसकी गति काफी कम है तथा अपेक्षाकृत  महंगा भी, लेकिन फिर भी कुछ लोग इसी के इस्तेमाल से अपनी उपस्थिति इंटरनेट पर दर्ज करा रहें है.माइक्रोसॉफ्ट वाई-फाई के माध्यम से गावों में इंटरनेट उपलब्ध कराती है तो इससे अनेकानेक लाभ है मसलन आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार की कोई  योजना समय पर नहीं पहुँचती,ऐसे वक्त में माइक्रोसॉफ्ट की ये पहल वाकई काबिलेतारीफ़ है.इस योजना की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि लोग इंटरनेट का इस्तेमाल किस लिए कर रहें. इसका प्रबंध सरकार को करना चाहिएं इसके लिए तमाम प्रकार के विकल्प हमारे सामने नजर आतें है.मसलन सरकार को गावों में  ई –लाइब्रेरी बनाने की बात पर बल देना चाहिएं.जिससे ग्रामीण क्षेत्र के युवा, जो  महंगी किताबें पैसों के आभाव में नहीं खरीद पातें, वों आसानी से ई-लाइब्रेरी के  माध्यम से अपनी मन चाहीं पुस्तक पढ़ सकेंगे.इसके साथ ही बैंको को इंटरनेट से जोड़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ बदलाव के आसार नजर आतें है.अगर सरकार भविष्य में ऐसा करने की योजना बनाती है, तो केंद्र सरकार के लिए यह बड़ी उपलब्धी होगी.भारत सरकार के इस अभियान का सीधा मकसद नागरिकों को तकनीकी दृष्टि से सक्षम बनाने की है.सरकार ने भी 2017 तक 2.5 लाख गावों तक ब्राडबैंड इंटरनेट उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा है.डिजिटल इंडिया के संबंध में अनेक चुनौतियाँ है.पहला साक्षरता की कमी .भारत की 68 प्रतिशत आबादी गावों में रहती है.ग्रामीण इलाके के लोग शिक्षा के मामलें में काफी पीछे है. गावं,कस्बो में आज भी कम्प्यूटर की भारी मात्रा में कमी है, जिसका मुख्य कारण अशिक्षा है, हमारे ग्रामीण क्षेत्र में आज भी 37 फीसदी लोग पढ़े लिखें नहीं है. जिनके लिए डिजिटल इंडिया का कोई मतलब नहीं होता.सरकारी आकड़ो के मुताबिक देश के ग्रामीण इलाकों में रह रहें 88.4 करोड़ लोगो में से 37 फीसदी लोग अशिक्षित है.इसके साथ आज भी हमारे देश का एक बड़ा तबका इंटरनेट से दूर है आकड़ो की माने तो लगभग लगभग 90 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करतें जिसको ध्यान में रखते हुए सरकार ने डिजिटल साक्षरता अभियान की शुरुआत की है.जिसके तहत सरकार लोगों को आईटी साक्षर बनानें,कम्प्यूटर एव डिजिटल उपकरण चलाने, ईमेल भेजने और उसे ग्रहण करने तथा इंटरनेट आदि का प्रशिक्षण लोगों को दिया जा रहा है .दूसरी बड़ी चुनौती हमारे देश में नेटवर्किंग की है.आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लोग नेट्वर्क के लिए अपने छतों आदि पर जाते है, नेटवर्किंग के क्षेत्र में भारत 115वें स्थान पर है किंतु इन सब सुविधाओं के आभाव में हम सम्भावनाओं  को दरकिनार नहीं कर सकतें.जिस प्रकार से प्रधानमंत्री इस योजना के सही  क्रियान्वयन के लिए तकनीक जगत की हस्तियों से मिलकर इन सभी समस्याओं का निदान ढूढ़ रहें इससे यही प्रतीत होता है कि सरकार डिजिटल इंडिया के प्रति काफी गंभीर है. मोदी जानतें है कि अगर योजना सफल हुई तो गावों में सरकार आसानी से पहुँच पाएगी तथा जनता भी सीधे तौर पर सरकार की योजनाओं का लाभ ले सकेंगी.डिजिटल इंडिया के जरिये अगर सरकार  गावों को इंटरनेट से जोड़ देती है तो दुनिया हमारे तरफ ध्यान देने को मजबूर हो जाएगी तथा भारत और मजबूत शक्ति के रूप में विश्व के सामने उभरेगा.   

Sunday, 27 September 2015

प्रबंधन की कमी से हुआ हादसा

        

अभी कुछ ही दिन पहले की बात है जब सऊदी अरब के मक्का में क्रेन गिरने से हुए हादसें के दौरान 107 लोग काल के गाल में समा गयें थे. अभी ये जख्म भरा भी नहीं था कि फिर से गुरुवार को वहां से बुरी खबर  आई.बकरीद के साथ ही हज की अंतिम रस्म जिसमें मीना,मुज़दलफा और मैंदान-ए अराफात से लौटने के बाद जमेरात में शैतान को पत्थर मारनें की परंपरा है.उसी वक्त मीना के पास भगदड़ मचने के कारण 700 से अधिक लोग मौत की नींद सो गयें और लगभग 800 से अधिक लोग घायल हो गयें. इस घटना का कारण अभी पूरी तरह से स्पष्ट नही हुआ है. लेकिन कुछ बातें निकल कर सामने आ रहीं है.मसलन जिस रास्तें से पत्थर मारने के लिए श्रद्धालु जातें है, उसके बाद दूसरे गेट से बाहर निकलतें हैं लेकिन यहाँ लोग उसी रास्तें से वापस भी आने लगें जिससे भीड़ अनियंत्रित हो गई. लोग एक दूसरे के ऊपर गिरने लगें और चंद मिनट में ही लाशों के ढेर बिछ गयें.इस हादसें ने सभी देशों के जनमानस को झकझोर कर रख दिया.सभी देश इस घटना के बारे में सुनकर अपने दुःख और पीड़ा को व्यक्त कियें बगैर नहीं रह पाएं.जिसको जब खबर मिली टीवी तथा रेडियो से चिपक गया.इस घटना ने कई देश को हिला के रख दिया,मक्का मुसलमान समुदाय का सबसे पवित्र तीर्थ स्थान माना जाता हैं.यहाँ हर साल लगभग 15 से 20 लाख की संख्या में भिन्न –भिन्न देशों के श्रद्धालु आतें है.हादसा भलें ही सऊदी अरब के मीना में हुआ हो लेकिन भारत के उन सभी  घरों के लोग पूरी तरह से बेचैन हो उठें है. जिनके परिजन हज यात्रा के लिए मक्का गएँ हैं.भारत से लगभग 1 लाख 50 हजार श्रद्धालु हज करने गएं हैं .इन सभी परिवारों को अपनो के खोने का डर सता रहा है,अभी तक इस हादसें में भारत के विदेश मंत्रालय ने 22 भारतीयों की मौत की पुष्टि की है. ये संख्या और बढ़ने के अनुमान भी लगाएं जा रहें है.भारत सरकार ने इस घटना पर तुरंत सक्रियता दिखातें हुए हेल्पलाइन नंबर जारी किया, इसके साथ सरकार ने लोगो को ये विश्वास भी दिलाया की हम अपने नागरिकों को यथा संभव हर मदद के लिए प्रतिबद्ध है.बहरहाल,ये पहला मौका नहीं है जब मक्का में इस प्रकार की वीभत्स हादसा हुआ हो.इससे पहले 1990 के दौरान टनल में भगदड़ से 1426 लोगों की मौत हो गई थी.इस प्रकार वहां निरंतर तीन –चार  साल पर लगातार घटनाओं की एक लंबी फेहरिस्त है. जो सऊदी अरब सरकार पर कई सवाल खड़ें करती है.एक बात तो साफ है कि सऊदी अरब सरकार ने पिछली  घटनाओं से सबक नहीं लिया है.अगर सरकार ने कुछ भी सबक लेना उचित समझा होता तो इस प्रकार की दर्दनाक घटना से बचा जा सकता था.वहां की सरकार को इस बात पर भी गौर करना चाहियें की ये महज़ एक देश का मसला नही वरन एक अंतराष्ट्रीय मसला है.गौरतलब है कि यहाँ हर देश के मुस्लिम समुदाय के लोग बड़ी तादाद में आतें हैं,इसके मद्देनजर सउदी अरब सरकार को सुरक्षा के व्यापक इंतजाम के साथ भीड़ नियंत्रण को लेकर ठोस योजना बनाने की जरूरत थी लेकिन इस मसले पर सरकार पूरी तरह विफल रहीं.ऐसा नहीं है की भारत में इस प्रकार की घटनाएँ नहीं होती लेकिन हमारें यहाँ सुरक्षा को लेकर व्यापक प्रबंध कियें जाते हैं.नतीजन हादसें नियमित नहीं होते, हम पिछली घटनाओं से कुछ न कुछ जरुर सिखतें है.अभी हालहि में झारखंड स्थित वैधनाथ धाम में भगदड़ हुई थी लेकिन हमारे प्रशासन से उससे निपटने के आपातकालीन व्यवस्था कारगर साबित हुई और हम बड़े हादसें से बच गयें,इस प्रकार सऊदी अरब सरकार ने भी आपातकालीन व्यवस्था पर जोर दिया होता तो आज वहां लाशों से ढेर नहीं बिछ्तें.हम भगदड़ के मुख्य कारणों की बात करें तो कई बातें सामने आती है प्रथम दृष्टया आयोजकों का प्रशासन के बीच भीड़ नियंत्रण  के कोई बड़ी योजना नही होती अगर होती भी है तो उसे अमल नहीं किया जाता तथा आयोजकों और प्रशासन में दरमियाँन बेहतर तालमेल नही होता है. जिसका खामियाजा वहां आएं लोगो को भुगतना पड़ता है.सही तालमेल के आभाव में  वहां भीड़ का आवागमन रूक जाता है,रास्ता जाम हो जाता है फलस्वरूप इस प्रकार के दुखद घटना हो जाती है.दूसरा सबसे बड़ा कारण यें है कि श्रद्धालु बहुत ज्यादा उतावलें हो जातें है और अपना आपा खों देतें है श्रद्धालुओं की इस लापरवाही को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन के दिशानिर्देशों पर गौर करें को प्रबंधन ने  भीड़ नियंत्रण के लिए कई बातों का व्यापक स्तर पर जिक्र किया है मसलन आपात निकासी निर्बाध हों लेकिन आपात स्थिति में काम आएं,पर्याप्त अग्निशामक की व्यवस्था हो तथा आपात स्थिति में चिकित्सा की सुविधाओं के पर्याप्त इंतजाम हों. इस तरह आपात प्रबंधन के सुझावों को भी ध्यान में रखकर प्रशासन काम करें तो किसी भी भगदड़ को रोकने में सहायक साबित होंगी .लोग पूण्य के लिए अपने तीर्थस्थान पर जातें है ताकि अपने पापों से मुक्त हो सकें लेकिन इस प्रकार के हादसों से लोगो के मन में खौफ पैदा हो जाता हैं.उनके आस्था पर चोट पहुँचती है.इस खौफ को दूर करने का जिम्मा प्रशासन और शासन का हैं.सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन नायेफ ने हादसें की जाँच के आदेश तो दे दिएँ है लेकिन  इस हादसें से राष्ट्रीय ही नहीं वरन अन्तराष्ट्रीय स्तर पर सउदी अरब की साख पर जो बट्टा लगा है उसकी पूर्ति करना वहां की सरकार के लिए आसान नहीं हैं।


Tuesday, 22 September 2015

नेपाल की धर्मनिरपेक्षता पर सवालियाँ निशान

       विश्व का एक मात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल अब धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य  हो गया है.तकरीबन सात साल के जद्दोजहद के बाद नेपाल में भी राजतंत्र के  पतन के बाद गणतंत्र का उदय हुआ है.239 साल पुराना राजवंश 2008 में खत्म कर दिया गया था.तब से ही नेपाल को इस दिन का बेसब्री से इंतजार था.नए संविधान की घोषणा होते हुए जिस प्रकार से हिंसा का माहौल समूचे नेपाल में देखा जा रहा है यह चिंताजनक है.कहीं ख़ुशी से पटाखें छोड़े जा रहें,लोग सड़को पर हाथ में राष्ट्रीय झंडा लिए अपने इस गणतंत्र के लागू होने का जश्न मना रहें .अगर हम नेपाल के नए संविधान को देखे तो उन सभी कानून ,नियम कायदे है जो किसी गणतंत्र राज्य के लिए होने चाहिए.नेपाल के राष्ट्रपति राम बरन यादव ने नए संविधान लागू होने की घोषणा की.इस संविधान का सकारात्मक पक्ष पर गौर करें तो एक दो बातें सामने आती है मसलन नेपाल का गणतंत्र संस्थागत हुआ है संघीय ढांचे को भी मूर्त रूप दिया गया है.नेपाल के संविधान को ज्यादा विस्तृत न करते हुए संविधान सभा ने संविधान को छोटा रखना  ही सही समझा है.संविधान सभा ने नेपाल के संविधान को 37 खंड,304 आर्टिकल व 7 अनुसूचियां को स्वीकृति प्रदान की है.जिसके सभी जातियों, भाषाओं को मान्यता दी गई है.इसके साथ ही जो सात नये राज्य गठित किये गये है.उन्हें अपनी राज्य भाषा चुनने का भी अधिकार प्रदान किया गया है.नए कानून के तहत धर्मपरिवर्तन गैरकानूनी होगा तथा पिछड़ी समुदाय के लोग दूसरी जाती को नहीं अपना सकते अगर ऐसा करते है तो उसे कानून का उलंघन माना जायेगा.नेपाल को दुनिया का एक मात्र हिन्दू राष्ट्र कहा जाता था लेकिन अब नेपाल भी भारत की तरह धर्मनिरपेक्ष व लोकतांत्रिक हो गया.परन्तु इस बात पर भी जोर दिया गया है कि सनातन धर्म की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य होगा व गाय को राष्ट्रीय पशु बनाया गया है. जो धर्मनिरपेक्षता पर सवालियाँ निशान लगाता है.अगर एक बात पर गौर करे तो नेपाल धर्मनिरपेक्ष तो हो गया लेकिन  दूसरी तरफ जगह –जगहसाम्प्रदायिक तनाव, हिंसा व विरोध इस बात की पुष्टि करतें है कि इस नए संविधान को पूरी नेपाल की जनता एकमत से स्वीकार नहीं कर रही संविधान समावेशी रूप देने में वहां की संविधान सभा की सभी कोशिशें विफल रही है.नेपाल के दक्षिणी तराई से लेकर पश्चिमी इलाकें में नेपाल को सात राज्यों में बांटने के प्रस्ताव को  लेकर हिंसक प्रदर्शन हो रहें है.दक्षिणी नेपाल के मधेसी और थारू समुदाय के लोग वर्षों से अपने लिए अलग राज्य की मांग कर रहें थे मगर संविधान सभा ने इनकी मांगो को दरकिनार कर दिया है.अभी तक इस हिंसा में 40 लोग अपनी जानें गवां चुके है,संविधान सभा को इनकी मांगो पर विचार करने की जरूरत है नहीं तो आने वाले दिनों में जिस प्रकार भारत से  तेलंगाना के गठन को लेकर व्यापक हिंसा व आंदोलन हुए थे ऐसे स्थिति आने से पहले नेपाल सरकार को इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है ताकि नेपाल में कोई और क्षति न हो, ये साल नेपाल के लिए वैस ही त्रासदी भरा रहा है.बहरहाल, सवाल ये उठता है कि मधेसी समुदाय नाराज क्यों है ? अगर सवाल की तह में जाएं तो मधेसी लोगो की नराजगी की मुख्य वजह ये है कि वहां का  इलाका मैदानी है व सभी संसाधनों ये युक्त है.अब यहाँ भी पहाड़ी लोग भारी तादाद के रहने लगें है जिससे उनके व्यापार क्षेत्र में पहाड़ियों ने अतिक्रमण कर लिया है जिसके कारण उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है.मधेसी समुदाय ने नेपाल सरकार पर अपने समुदाय की उपेक्षा करने का आरोप  भी लगाया है तो वही दूसरी तरफ आरपीपी –एन और आरपीपी  संगठनों  ने भी इस संविधान का पुरजोर विरोध किया है. नए संविधान के मुताबिक जो राज्य बनेंगे सभी राज्यों की सीमा भारत को स्पर्श करेगी.नेपाल भारत का पड़ोसी देश है अगर वहां हिंसा होती है तो नेपाल के लिए ही नहीं वरन भारत सरकार के लिए भी चिंता का विषय है.क्योंकि सीमा से लगे नेपाली इलाकों में हिंसा बढने से इसका असर भारत पर भी पड़ेगा.भारत और नेपाल के बीच सदियों से सांस्कृतिक और भौगौलिक संबंध रहें है.वहां की संस्कृति हमारी संस्कृति से काफी हद तक मिलती –जुलती है खास करनेपाल सीमा से सटे बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगो से तो पारिवारिक संबंध भी है इसलिए भारत सरकार को इस बात की भी  चिंता है कि बड़ी संख्या में लोग अपनी जान बचाने के लिए भारत आयेंगे.इसपर नेपाल सरकार ने सक्रियता दिखाते हुए भारत से सटे इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया है ताकि हिंसा की आग भारत में न फैले. जाहिर है की अगले माह बिहार विधानसभा चुनाव होने है और इस समय भारत सरकार  किसी भी प्रकार का जोखिम लेना नहीं चाहेगी,नतीजन भारतीय विदेश मंत्रालय ने नेपाल के संविधान की घोषणा के बाद अपना असंतोष जाहिर किया तथा नेपाल ने नेताओं से सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की अपील भी की है गौरतलब है कि इससे पहले भी जब नेपाल भूकंप की त्रासदी झेल रहा था तब सबसे पहले भारत ने ही नेपाल सरकार को हर संभव मदद का किया था.बहरहाल, 26 जनवरी 1950 भारत में संविधान लागू किया गया था तब सभी ने एकमत से संविधान को समावेशी बताया था लेकिन  नेपाल का संविधान कहने को तो धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य हो गया लेकिन जनता  को एकमत करने में असफल रहा है.


Tuesday, 25 August 2015

कांग्रेस में बड़े बदलाव की जरूरत

   

भारतीय राजनीति में सबसे पुरानी और सबसे अनुभवी पार्टी कांग्रेस आज सबसे बुरी हालत में है,विगत लोकसभा चुनाव के बाद इस विरासत का पतन निरंतर देखने को मिल रहा है,पार्टी को एक के बाद एक चुनावों में मुंह की खानी पड़ रही है, फिर भी अभी तक कांग्रेस अध्यक्षा ने पार्टी में कोई बड़ा अमूलचूल बदलाव नहीं किया है और न ही इसके संकेत अभी तक दिए हैं.130 वर्ष पुरानी पार्टी जिसने आज़ादी के आन्दोलन से लेकर देश के सतत विकास में प्रमुख भूमिका निभाई .आज वही पार्टी हर चुनावों में सबसे ज्यादा निराशाजनक प्रदर्शन कर रही है. हाल ही में हुए मध्यप्रदेश और राजस्थान नगर निकाय चुनाव में फिर सत्ताधारी दल बीजेपी को भरी बढ़त देखने को मिली तथा कांग्रेस को फिर एक मर्तबा करारी शिकस्त झेलनी पड़ी,ये बात दीगर है कि नगर निकाय चुनाव और विधानसभा चुनाव दोनों अलग –अलग मुद्दों पर लड़ा जाता है और जनता भी दोनों चुनावों को भिन्न –भिन्न नजरिये से देखती है.बीजेपी के लिए इस जीत के मायने भले ही कम हो लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं कि कांग्रेस के लिए ये एक बड़ी हार है क्योंकि ये उन्हीं राज्यों की जनता का मत है जिस राज्य में व्यापमं और ललित गेट हुए हैं, जिस मसले पर अभी कुछ ही दिनों पहले संसद के मानसून सत्र में कांग्रेस ने संसद में हंगामा किया और संसद को एक दिन भी सुचारू रूप से नहीं  चलने दिया था. मध्यप्रदेश में व्यापमं, राजस्थान में ललित गेट इन दोनों मुद्दों को लेकर कांग्रेस इन राज्यों के मुख्यमंत्री सहित विदेश मंत्री तक के इस्तीफे की मांग कर रही है.वहीँ दूसरी तरफ उसी राज्य की जनता ने बीजेपी को अपना मत देकर कांग्रेस के सभी आरोपों को खारिज कर दिया .कांग्रेस ललित गेट,व्यापमं और चावल घोटाले को लेकर भले ही संसद से लेकर सड़क तक विरोध कर रही हो लेकिन इस विरोध को जनता से जोड़ पाने में कांग्रेस पूर्णतया विफल रही है. कांग्रेस एक नकारात्मक विपक्ष की भूमिका का निर्वहन कर रही है.जिस प्रकार से मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ा पूरा देश अपने द्वारा चुन कर भेजे गए प्रतिनिधियों को देखा की किस प्रकार से वे लोकतंत्र की मर्यादा को धूमिल कर रहे है.बहरहाल, सवाल ये उठता है कि तमाम सरकार विरोधी मुद्दे होने के बावजूद कांग्रेस को जनता स्वीकार क्यों नहीं कर रही ?अगर सवाल की तह में जाए तो एक बात तो साफ नजर आती है,वो है कांग्रेस आज भी जनता से दुरी बनाए हुए है जिसका परिणाम ये है कि जनता के बीच से अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है.कांग्रेस अभी भी जमीन से नहीं जुड़ी.आज भी पार्टी के कई नेता जनता से जुड़ने के बजाय एयर कंडीसन कमरों में रहना पसंद कर रहे हैं.कांग्रेस के इन आला नेताओं को समझना होगा कि अगर पार्टी को फिर से सफलता के रास्ते पर लाना है तो,उसे कई कड़े फैसले लेने होंगे जो पार्टी के हित में हो .कांग्रेस शुरू से ही गाँधी – नेहरु परिवारवाद से ग्रस्त रही है.अब समय आ गया है,जब पार्टी को परिवारवाद से मुक्त कर दिया जाए और कांग्रेस के किसी आला नेता को पार्टी की कमान सौप दी जाए जो जमीन से जुड़ा हुआ व्यक्ति हो ,जनता की नब्ज को टटोलना जानता हो अगर कांग्रेस ऐसे व्यक्ति को अध्यक्ष बनाती है तो, इससे पार्टी ही नहीं वरन देश की जनता में कांग्रेस के प्रति एक सकारात्मक भाव पहुंचेगा.पहला तो उनके कार्यकर्ताओं में एक नई उर्जा का संचार होगा जो लगातार मिल रही पराजयों से शिथिल पड़ गई है तथा सबसे बड़ा आरोप जो पार्टी पर लगता रहा है वो है वंशवाद, इससे कहीं न कहीं पार्टी इन आरोपों से भी बच सकती है.कांग्रेस को लोकसभा चुनाव के बाद ही कुछ बड़े बदलाव करने चाहिए थे लेकिन कांग्रेस ने अभी तक नहीं किया इसका एक कारण ये भी है की कांग्रेस के अदद कुछ नेताओं को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस का एक बड़ा तबका एक परिवार की चापलूसी कर अपना काम निकाल लेना चाहता है और पार्टी में बने रहना चाहता है.वहीँ दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी को मिल रहें जनसमर्थन और मोदी की लोकप्रियता के आगे कांग्रेस की लोकप्रियता बहुत ही कम है. अगर कांग्रेस ऐसा नहीं करती है तो कांग्रेस को खोई हुई लोकप्रियता तथा खोई हुई जमीन को हासिल करने में अभी कितना वक्त लगेगा ये कहना बेमानी होगी.क्योकि अभी भी मोदी की लोकप्रियता जनता के बीच बनी हुई है.कांग्रेस को अगर अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाना है तो एक नया चेहरा ढूढने की कवायद शुरू कर देनी चाहिए, जिसकी पार्टी को दरकार है. कांग्रेस के कई बड़े नेता राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनाने की मांग कर रहें हैं,पर उन्हें ये भी गौर करना चाहिए कि लोकसभा तथा उसके बाद कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में राहुल ही पार्टी का मुख्य चेहरा थे.जिसे जनता ने सिरे से खारिज कर दिया.ये कांग्रेस का वही तबका है जो चापलूसी कर पार्टी में अपने ओहदे पर बना रहना चाहता है.अगर बात कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी की करें तो वो किसानों से मिलना ,गरीबों से मिलना तथा जनता से जुड़ने में अपना समय तो दे रहे है.परन्तु जनता के दिल में अपनी पार्टी की छवि सुधारने में विफल साबित हो रहे हैं.जो पार्टी देश में सबसे ज्यादा सत्ता पर काबिज़ रही हो, आज उसी पार्टी की लोकप्रियता हासिए पर है, गौरतलब है कि उस खोए हुए जनाधार को वापस पाने की बड़ी चुनौती आज राहुल गाँधी के सामने खड़ी है.कांग्रेस की सियासी जमीन खिसक रही है, उस खिसकती हुई जमीन को बचाने का प्रयास राहुल गाँधी कर रहें हैं.पार्टी को ये समझना होगा कि अब समय संगठन को सुदृढ़ करने का है, राहुल गाँधी हर मसले पर आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए सीधा निशाना प्रधानमंत्री पर साधते है समय आने पर प्रधानमंत्री उन्ही सवालों से ही उनको जबाब दे देते है. यहाँ राहुल गाँधी की राजनीतिक नासमझी देखने को मिलती है एक बात तो स्पष्ट है कि राहुल गाँधी अभी भी राजनीति में पूरी तरह से परिपक्व नहीं है उन्हें कांग्रेस के इतिहास से ही बहुत कुछ सीखने की जरूरत है.जिस प्रकार से 1977 में कांग्रेस को दुबारा खड़ा करने के लिए इंदिरा गाँधी ने संघर्ष किया और पार्टी को पुनर्जीवित किया था. इंदिरा गाँधी की उस रणनीति को कांग्रेस को समझना होगा जिससे पार्टी को नई दिशा मिली थी,अगर कांग्रेस ऐसा करती है तो आगामी कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी को सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं तथा कांग्रेस जनता के दिल में फिर से जगह बना सकती है.